रंजन कुमार झा की रचनाएँ

मेरा गाँव

खोया खोया सा लगता है
कल का मेरा गाँव

गाँव वही था, जिसमें जीवन
होता था खुशहाल
मिलती थी जी भर खाने को
सब्जी- रोटी- दाल
अपने हित में किया किसी ने
जहाँ कभी न कांव

जहाँ परिन्दे भी करते थे
राम नाम का जाप
वहाँ भजन भी लगता सबको
केवल शोर – प्रलाप
रही न तुलसी घर-आँगन में
खोई पीपल-छांव

जहाँ ‘अतिथि देवो भव’ वाला
संस्कार-व्यवहार
वहाँ गली हर, घर-घर में अब
मात-पिता ही भार
भाई ही भाई पर नित दिन
खेला करते दांव

उष्ण हुआ धरती का मन

क्रुद्ध हुआ है सूर्य गगन में
उष्ण हुआ धरती का मन

पेड़ सभी मिट रहे धरा से
तुनुकमिजाजी मनु बन बैठे
तनिक न चिंता जीव-जगत की
सब अपने-अपने में ऐंठे
प्रगति-पंथ ने क्या लूटा है
करना होगा यह चिंतन

साल-साल दर बढ़ती जाती
सही न जाती है अब गर्मी
फिर भी कोई नहीं चेतना
मानव चित हो गया विधर्मी
स्वार्थ-सिद्धि को कंटक बोए
अब भी तो हो सही जतन

ऐसे ही हालात बुरे हैं
उसपे तपकर फसल जल रही
घाव बहुत गंभीर मिलेंगे
अगर न सोचा गलत क्या सही
जीवन रह पाए धरती पर
करें समस्या का मंथन

नए वर्ष का स्वागत 

नये वर्ष का स्वागत तब हम
नव उमंग सरगम से करते

दुःसह दुखों की स्याह निशा में
नयन नीर का भार न ढोते
उपवन के पुष्पों से माली
यदि अपना अधिकार न खोते
शिशुकालों में ही साखों से
पात न यूँ बेमौसम झरते

तिमिरग्रस्त न होता जीवन
तार न होती मर्यादाएँ
स्वप्न किसी के नहीं बिखरते
बालाएँ हों या अबलाएँ
बुलबुल को उन्मुक्त गगन में
छोड़ घोंसले अगर न डरते

मजहब की ऊँची दीवारें
पाखंडों का मोल न होता
काम सभी हाथों को मिलता
श्रम का हिस्सा गोल न होता
व्यर्थ विवादों में पड़कर न
पल-पल जीते , पल-पल मरते

क्या होगा

तुम संग एकाकार हुआ तो क्या होगा

सुमुखि! तुम्हारे माथे का सिंदूर बनूँ
इन कजरारे नैनों का मैं नूर बनूँ
चूड़ी, कंगना ,बिंदिया सब आभूषण के
पहनावे का मैं प्रेमिल दस्तूर बनूँ
यदि ऐसा श्रृंगार हुआ तो क्या होगा

प्रिये! तुम्हारे अधरों पर मुस्कान सजे
दोनों हृद में प्रेम भरा मृदु तान सजे
मिले तुम्हारे मन से मेरे मन का स्वर
दो कंठों में एक प्रेम का गान सजे
यदि ऐसा अभिसार हुआ तो क्या होगा

जीवन के बोझिल प्रश्नों के हल पाकर
तुम्हें साधकर मधुरिम जीवन फल पाकर
जग की चिंता किये बिना हम एक रहें
एक-दूसरे का हर पल सम्बल पाकर
सपना यह साकार हुआ तो क्या होगा

रोटी का प्रश्न

रोटी का ही प्रश्न हाशिये पर रहता हर हाल में
हमने खुद को फाँस लिया है धर्म-जाति के जाल में

देश हुआ आजाद तो ऐसा लगा कि दिन अब बहुरेंगे
निर्धनता-पीड़ित मानवता, दिवस न ज्यादा ठहरेंगे
टूट गए सारे ही सपने राजनीति की चाल में

आगे चलकर लोकतंत्र की पावन-पुण्य तिथि आई
धूम-धाम से हमने छब्बीस तारीख की महिमा गायी
उस छब्बीस से अबतक भी क्या मिला साल-दर-साल में

दिनकर जी के वंशज अब भी दूध वसन चिल्लाते हैं
जिन्हें व्योम से स्वर्ग लूटना था वे नजर न आते हैं
सारे नेता छल-विक्रेता, सब कुछ काला दाल में

पोंगा पंडित-मुल्लाओं का सजा हुआ बाजार है
नटगुरु के हाथों में गिरवी देश बना लाचार है
चूस रहे कुछ जोंक वतन को खादी की ही खाल में

निर्मल-आसाराम सरीखे बाबाओं के दौर में
माँगो जो रोटी तो गोली मिलती है मंदसौर में
जो थे ढोंगी बन गए योगी, मुल्क काल के गाल में

भठियारों का सत्ता पर अब पूरी तरह नियंत्रण है
हक की बातें देशद्रोह की धारा का आमंत्रण है
संसद ही तब्दील हुआ जब गैया के गोहाल में

देश सबका

देश सबका, जीयेंगे सभी शान से
पालती सबको है एक ही धरती माँ
जान दी है सबों ने वतन के लिए
चाहे हिन्दू कोई हो या मुस्लिम जवां

कितने अद्भुत रचे गीत मजरूह ने
औ नेपाली की रचना लुभाती रही
धुन सचिनदेव के हों या रहमान के
राग रंगों के दीये जलाती रही
हों मोहम्मद रफ़ी याकि दीदी लता
भूल सकता है कैसे ये हिन्दोस्ताँ

मिट्टी तुलसी की, ग़ालिब की, मीरा की यह
इसमें खुसरों भी हैं सूर रसखान हैं
सानिया सायना में है अंतर ही क्या
सब तो अपने धरा की ही संतान है
एक साझी विरासत है इस देश की
कितनी सुन्दर अनोखी अजब दास्ताँ

रहते आये हैं सदियों से सद्भाव से
एक दूजे से हिल-मिल गुजारे हैं दिन
साथ होली हुई और रमजान भी
रह सके न कभी एक दूजे के बिन
हिन्दू के दुःख में मुस्लिम भी रोते रहे
हर जगह साथ रहने के मिलते निशां

आँधियां आती हैं तो उजड़ते हैं घर
सबके हिंदु के हों या मुसलमान के
सब बराबर हैं नज़रों में अल्लाह के
फर्क कुछ भी नहीं दिल में भगवान के
राह सबकी जुदा एक मंजिल मगर
एक ही है धरा एक ही आसमाँ

वो हैं कायर जो लड़ते धरम के लिए
गर लड़ें तो लड़ें हम वतन के लिए
सबको रोटी मिले और सम्मान भी
कोई तरसे न दो गज कफ़न के लिए
स्नेह के भाव सबके दिलों में बसे
भेद कोई रहे न कभी दरम्याँ

एक तुम्हारे जाने से

दिल से रिक्त हुआ ज्यों सीना
एक तुम्हारे जाने से

वासंती थी फ़िजा-छटाएँ, मन -मयूर के घन तुम थे
ग्रीष्म ऋतु में सर्द हवा की बहकी हुई छुअन तुम थे
अब न रहा वो साल-महीना
एक तुम्हारे जाने से

चार नयन दो मधुर ख्वाब के बुनते आए जाले थे
पास हृदय था और नहीं कुछ प्रेम-गान मतवाले थे
टूट गई वो मधुरिम वीणा
एक तुम्हारे जाने से

नीड़ एक करने की जिद थी, चाह रही हम साथ रहें
सुख-दुख की सारी घड़ियाँ में, लिए हाथ में हाथ रहें
रास न आता है अब जीना
एक तुम्हारे जाने से

छलक न जाना

सुनो हृदय के पीर दृगों से
गालों पर तुम छलक न जाना

समझ रहे तुम आँसू जिनको
वो सबके सब गंगाजल हैँ
हृद-मंदिर के देवों के सिर
चढ़ने वाले नीर धवल हैं
इसे भाव की स्याही में भर
नव गीतों के बोल सजाना

पत्थर दिल दुनिया वाले सब
मोल भला क्या इनका जाने
एक बूँद जो गिरी धरा पर
रो जाएँगे सब दीवाने
तुम्हें कसम है दीवानों की
इन बूँदों की लाज बचाना

गालों पर गिर जाएँ ये तो
लोग न जाने क्या बोलेंगे
होगी दुनिया में बदनामी
राज सभी जब वे खोलेंगे
ये हैं मोती की वो लड़ियाँ
जिन्हें हार को जीत बनाना

तुम आई 

तुम्हें देख मेरे गीतों ने अपना है शृंगार किया

तुम आईं तो मन-आँगन की महक उठी यह फुलवारी
गेहूँ-सरसों के खेतों-सी झूम रही मन की क्यारी
ऋतु वसंत आया जीवन में, खुशियों ने अभिसार किया

शब्दों को हैं प्राण मिल गए, मिली काव्य को है काया
कलम हो रहे मतवाले, छंदों ने गान मधुर गाया
मुग्ध नयन से कविताओं ने प्रिय! को चूमा,प्यार किया

तुम आईं जीने की आशा लिए हुए ज्यों आँचल में
जैसे काले मेघ बरसने आन पड़े हों मरुथल में
खुशियों से भींगी आँखों ने गालों को मझधार किया

तुम कब आओगी 

अपलक पंथ निहारा करता
तुम कब आओगी
घर को रोज सँवारा करता
तुम कब आओगी

व्यथा-वेदना के दर्दीले साये में रहकर
गीत लिखे सुमुखि! तुम्हारे जाने के दुख सहकर
दिए तुम्हारे वचनों पर है ऐतवार मुझको
‘आ जाऊंगी जल्दी ही’ तुम गयी यही कहकर
पल वह नहीं बिसारा करता
तुम कब आओगी

आती हो तुम रोज़ मगर ख्वाबों में आती हो
बाहुपाश में मुझे समेटे प्यार जताती हो
कभी तुम्हारे हाथ मेरे हाथों में रहते हैं
कभी दूर ही खड़ी नयन से सब कह जाती हो
यूँ ही रात गुजारा करता
तुम कब आओगी

तुम आती, चंदा से कहता ‘दूर अभी तू जा’
तुझे देख शरमा जाएगी मेरी महबूबा
तारों से कहता मुझको तू देख न ऐसे जल
मुझको रहने दे कुछ पल, आलिंगन में डूबा
क्या सब नहीं विचारा करता
तुम कब आओगी

दिल मेरा किसका दीवाना है

पूछो मत यह दिल मेरा किसका दीवाना है
दिल के इस गुलशन में सबका आना जाना है

जो भी मित्र हमारे हैं, चंदा से शीतल हैं
खरे स्वर्ण के सिक्के सब हैं, मन से निश्छल हैं
सबका इक-दूजे के दिल में ठौर- ठिकाना है

रखते हैं समभाव , सभी ‘वादों’ से हैं ऊपर
कभी नहीं समझौता करते स्वार्थवशी होकर
ज्ञात है सबको कैसे अपना फ़र्ज़ निभाना है

मेरे मित्रों-सा ही भगवन मित्र सभी को दें
चम-चम चमकें ऐसा धवल चरित्र सभी को दें
यह मन्नत हो गर क़ुबूल तो फिर क्या पाना है

पथिक बनो दिए खुद पथ के

पथिक बनो दीये खुद पथ के
वर्ना हरसू अंधकार है

वज्र इरादों के शोलों सँग
दीवाली हर निशा मनाओ
पथ दुर्गम में पड़ी शिलाएँ
तोड़ो-फेको, दूर हटाओ
मांग वक्त की भांप चला जो
विजय रश्मियों पर सवार है

चट्टानी -फौलादी ताकत
दृढ़ संकल्पित निमिष न हिलना
सीख लिया जिसने जीवन के
कंटक में पुष्पों-सा खिलना
मंजिल केवल उसके पग का
ही करती नित इंतजार है

नभ के तारे सभी तुम्हारे
होंगे आज न कल, है निश्चित
निज पाँवों पर खड़े शूल की
आघातों से मत हो विचलित
भरत भूमि की इस माटी का
‘अप्प दीप भव’ संस्कार है

दर्द भरे सपने जैसा था

तुम्हें देखना इस जीवन के
दर्द भरे सपने जैसा था

तुमको पाने -अपनाने के
पंथ सभी पथरीले पाए
जिस उपवन में खिले कुसुम तुम
उसमें झाड़ कंटीले पाए
हाथ बढ़ाया ज्योंही मैंने
कांटो के चुभने जैसा था

जिस नभ के तुम चांद बने थे
उसमें वह विस्तार नहीं था
शीतलता का नाममात्र भी
संस्कार -व्यवहार नहीं था
मैंने मुख जो उधर किया तो
दाह मिली ,तपने जैसा था

जब खुद को मैं सँभालने की
कोशिश में सब भूल रहा था
तब भी तेरी यादों के ही
गलफांसे में झूल रहा था
अधर खुले जब व्यथा बाँटने
तो केवल कपने जैसा था

हम इधर रह गए तुम उधर रह गए 

गम हमारे-तुम्हारे नहीं थे अलग
हम इधर रह गए तुम उधर रह गए

एक झोंका हवा का उड़ा ले गया
गंध उपवन की हमसे चुरा ले गया
फूल नाज़ुक थे, हम रह गए देखते
कुछ इधर झर गए कुछ उधर झर गए

डूबती आस को न किनारा मिला
चुक रही श्वास को न सहारा मिला
यूँ मुहब्बत की दरिया में डूबे हुए
हम इधर बह गए तुम उधर बह गए

हम न भर ही सके वक़्त के घाव को
व्यक्त कर न सके पीर के भाव को
देवताओं के दर सर पटककर व्यथा
हम इधर कह गए तुम उधर कह गए

थी रिवाजों की मजबूत जंजीर वह
खोल पाए कभी हम न उसकी गिरह
दर्द-संताप ही झेलना था लिखा
हम इधर सह गए तुम उधर सह गए

मेघ तुम्हारी यादों के

घिर-घिर आते पवन सहारे मेघ तुम्हारी यादों के
कटते हैं कैसे बोलूँ फिर पल भारी अवसादों के

पहली बार जो तुमने रक्खे थे कंधों पर हाथ प्रिय
नहीं भुलाए भूल रहा मन वह पहली बरसात प्रिय
कहाँ गए वे दिन आलिंगन के, प्रेमिल अनुवादों के

तुम सजती फिर मुझे पूछती थी, बतलाओ कैसी हूँ
क्या मैं तेरे प्रणय गीत के सुर सरगम के जैसी हूँ
मुस्कानें मेरी कह देती थी ‘हाँ’ बिन संवादों के

तेरी डोली सजी मिलन की झूली गैर की बाहों में
मुझको अर्थी मिली प्रेम की अभिशापों में-आहों में
भस्म हुए सुख स्वप्न सलोने अपने अटल इरादों के

गीत मैंने लिखे हैं तुम्हारे लिए

बीती यादों के अनगिन सहारे लिए
गीत मैंने लिखे हैं तुम्हारे लिए

वो तुम्हारी छुअन का जो अहसास था
मिल रही निज धरा से ही आकाश था
मांग हमने गगन से सितारे लिए

कोई तुमसे जुदा कर, न ले जाए छिन
दो तुम्हारे नयन तकते थे रात-दिन
उन नयन से मिलन के इशारे लिए

पर मेरी साधनाएं अधूरी-विकल
रह गयी, गैर के संग गए तुम निकल
आँख के बहते अश्रु के धारे लिए

अब हो उस पार तुम बीच में है नदी
बिन तुम्हारे लगे चार पल भी सदी
बह रही धार गुमसुम किनारे लिए

हँसने का वरदान

कुदरत ने हमको दिया, हँसने का वरदान
हँसकर हमने गढ़ लिए,कितने ही प्रतिमान

हँसने के सुख का अगर, करें सभी उपभोग
दुखियारी संसार के, भागेंगे हर रोग

हँस लो मेरे दोस्तों, जीवन के दिन चार
रोने पर बुजदिल सदा, कहता है संसार

आती आँखो में उतर, सुंदर-सी तस्वीर
हँसती सूरत देखकर, घट जाती है पीर

हँसना औषधि के सदृश, हँसना है व्यायाम
होती इससे ना कभी, असमय जीवन -शाम

हँसने के उपचार का, जो कर लें उपयोग
मिट जाएँगे दाह सब, अद्भुत है यह योग

खुलके हँस कर देखिए, आएगा बदलाव
तट को चूमेगी फँसी, बीच भँवर जो नाव

हँसना दिल के रोग का, सबसे बड़ा निदान
यह मैं ही कहता नहीं, कहता है विज्ञान

हँसते बच्चे यूँ लगें, उतरें हों भगवान
सभी संपदा क्षार है, सिवा एक मुस्कान

हँसने वालों को मिला, सदा ईश उपहार
खुश रहने की कोशिशें, नहीं गई बेकार

हँस लो , हँस कर जीतना, जीवन का संग्राम
रोने से, कब कौन-सा, पूर्ण हुआ है काम

मुस्काती कलियाँ खिलीं, भौंरे आए पास
हँसकर कलियों ने लिया, जीत भ्रमर -विश्वास

होती है मुस्कान से, प्रेम-मिलन शुरुआत
आगे बढ़ती बात तब, सजती है बारात

हँसते फांसी पर चढ़े, हँस कर दे दी जान
भगत सिंह का आज भी, करते हम सम्मान

हँसने के दिन चार हैं, रोने के भी चार
हँसकर हल्की जिंदगी, रोकर होती भार

मुझको अपनों ने कहा, हँसते हो क्या खूब
कोई क्या जाने हँसी, है मेरी महबूब

हँस लो आँसू पोछकर, क्यों होते गमगीन
अश्रु बनाएगा तुम्हें, कायर और बलहीन

प्रेम ,खुशी और जीत का, हँसना दूजा नाम
हँसना उगता भानु है, रोना ढलती शाम

लोगों की शुभकामना, और मिला सम्मान
हँसने के कारण मिली, ‘रंजन’ को पहचान

मेरी मंगलकामना, सब मुख हो मुस्कान
हँसता-खिलता देश यह, बने विश्व की शान

Share