रईस सिद्दीक़ी की रचनाएँ

और कुछ तेज़ चलीं अब के हवाएँ शायद 

और कुछ तेज़ चलीं अब के हवाएँ शायद
घर बनाने की मिलीं हम को सज़ाएँ शायद

भर गए ज़ख़्म मसीहाई के मरहम के बग़ैर
माँ ने की हैं मिरे जीने की दुआएँ शायद

मैं ने कल ख़्वाब में ख़ुद अपना लहू देखा है
टल गईं सर से मिरे सारी बलाएँ शायद

मैं ने कल जिन को अंधेरों से दिलाई थी नजात
अब वह लोग मिरे दिल को जलाएँ शायद

फिर वही सर है वहीं संग-ए-मलामत उस का
दर-गुज़र कर दीं मिरी उस ने ख़ताएँ शायद

अब वो कहता नहीं मुझे से कि बरहना तू है
छिन गईं उस के बदन की भी क़बाएँ शायद

इस भरोसे पे खिला है मिरा दरवाज़ा ‘रईस’
रूठने वाले कभी लौट के आएँ शायद

तिरे सुलूक का ग़म सुब्ह-ओ-शाम क्या करते

तिरे सुलूक का ग़म सुब्ह-ओ-शाम क्या करते
ज़रा सी बात पे जीना हराम क्या करते

कि बे-अदब का भला एहतिराम क्या करते
जो नास्तिक था उसे राम-राम क्या करते

वो कोई ‘मीर’ हो ‘ग़ालिब’ हों या ‘अनीस’-ओ-‘दबीर’
सुख़न-वरी से बड़ा कोई काम क्या करते

न नींद आँखों में बाक़ी न इंतिज़ार रहा
ये हाल था तो कोई नेक काम क्या करते

मिज़ाज में था तकब्बुर तो हरकतों में ग़ुरूर
फिर ऐसे शख़्स को हम भी सलाम क्या करते

‘रईस’ ख़ू-ए-वफ़ा ने हमें रूलाया है
फिर इस चलन को भला हम भी आम क्या करते

दुनिया में जो समझते थे बार-ए-गिराँ मुझे 

दुनिया में जो समझते थे बार-ए-गिराँ मुझे
वो ही सुना रहे हैं मिरी दास्ताँ मुझे

मुड़ मुड़ के देखता था तिरे नक़्श-ए-पा को मैं
तन्हा समझ के चल दिया जब कारवाँ मुझे

दो गाम मेरे साथ चले राह-ए-इश्क़ में
मिलता नहीं है ऐसा कोई राज़-दाँ मुझे

ख़ामोशियों से राब्ता का़एम जो कर लिया
दुनिया समझ रही है अभी बे-ज़बाँ मुझे

मैं ने ‘रईस’ ख़िदमत-ए-शेर-ओ-सुख़न जो की
इस वास्ते अज़ीज़ है उर्दू ज़बाँ मुझे

बस इक ख़ता मुसलसल सज़ा अभी तक है

बस इक ख़ता मुसलसल सज़ा अभी तक है
मिरे ख़िलाफ़ मिरा आईना अभी तक है

सभी चराग़ अंधेरों से मिल गए लेकिन
हरीफ़-ए-मौज-ए-हवा इक दिया अभी तक है

मिटा सके न उसे हादसों के दरिया भी
वो एक नाम जो दिल पर लिखा अभी तक है

गिरी है मेरी दस्तार ग़म हुआ लेकिन
ये शुक्र करता हूँ बंद-ए-क़बा अभी तक है

नज़र उठा के कहा मय-कदे में साक़ी ने
वो कौन है जो यहाँ पारसा अभी तक है

न जाने कौन से सदमों का शोर था इस में
गुज़र चुका वो इधर से सदा अभी तक है

ये ज़र्द चेहरा ये दर्द-ए-पैहम कोई सुनेगा तो क्या कहेगा

ये ज़र्द चेहरा ये दर्द-ए-पैहम कोई सुनेगा तो क्या कहेगा
ज़रा से दिल में हज़ार-हा ग़म कोई सुनेगा तो क्या कहेगा

न क़हक़हों के ही सिलसिले हैं न दोस्तों में वो रत-जगे हैं
हर इक से मिलना किया है कम कम कोई सुनेगा तो क्या कहेगा

बिछड़ने वालों का ग़म न कीजे ख़ुद अपने ऊपर सितम न कीजिए
उदास चेहरा है आँख पुर-नम कोई सुनेगा तो क्या कहेगा

तू सिर्फ़ अपनी ग़रज़ की ख़ातिर ये जलते दीपक बुझा रहा है
मगर ज़रा ये तो सोच हमदम कोई सुनेगा तो क्या कहेगा

बलाएँ कितनी भी आएँ सर पर ‘रईस’ ग़म की न कीजे शोहरत
ये आह-ओ-ज़ारी ये शोर-ए-मातम कोई सुनेगा तो क्या कहेगा

शामिल तू मिरे जिस्म मैं साँसों की तरह है

शामिल तू मिरे जिस्म मैं साँसों की तरह है
ये याद भी सूखे हुए फूलों की तरह है

दिल जिस का नहीं हर्फ़-ए-मोहब्बत से शनासा
वो ज़िंदगी वीरान मज़ारों की तरह है

फ़ितरत में है दौलत के खिलौनों से बहलना
इक दोस्त मिरा शहर में बच्चों की तर है

हर रात चराग़ाँ सा रहा करता है घर में
इक ज़ख़्म मिरे दिल में सितारों की तरह है

मत खोलियो मुझ पर कभी एहसाँ के दरीचे
ग़ैरत मुझे प्यारी तिरी यादों की तरह है

पत्थर सदा ज़िल्लत के तआकुब में रहेंगे
कोताही-ए-गुफ़्तार गुनाहों की तरह है

सभी अंधेरे समेटे हुए पड़े रहना 

सभी अंधेरे समेटे हुए पड़े रहना
चराग़-ए-राह-गुज़र इस तरह बने रहना

ये ख़्वाहिशों का समुंदर सराब जैसा है
सभी हो अपने तआकुब में भागते रहना

नई बहार की ख़ुशियाँ नसीब हों लेकिन
निशानियाँ गए मौसम की भी रखे रहना

उदास चेहरे कोई भी नहीं पढ़ा करता
नुमाइशों की तरह आ भी सजे रहना

मैं इतनी भीड़ में इक रोज़ खो भी सकता हूँ
किसी जगह तो मिरा नाम भी लिखे रहना

ऐ ज़िंदगी मिरे दुख-सुख कहाँ ये छोड़ आई
वो लम्हा-लम्हा बिखरना वो रत-जगे रहना

‘रईस’ कौन सा आसेब है मकानों में
तमाम शहर ये कहता है जागते रहना

हँसी हँसी में हर इक ग़म छुपाने आते हैं

हँसी हँसी में हर इक ग़म छुपाने आते हैं
हसीन शेर हमें भी सुनाने आते हैं

हमारे दम से ही आबाद हैं गली-कूचे
छतों पे हम ही कबूतर उड़ाने आते हैं

दरीचा खोल दिया था तिरे ख़यालों का
हवा के झोंके अभी तक सुहाने आते हैं

विसाल हिज्र वफ़ा फ़िक्र दर्द मजबूरी
ज़रा सी उम्र में कितने ज़माने आते हैं

हसीन ख़्वाबों से मिलने को पहले सोते थे
कि अब तो ख़्वाब भी नीदें उड़ाने आते हैं

‘रईस’ खिड़कियाँ सारी न खोलिए घर की
हवा के झोंके दिए भी बुझाने आते हैं

हर इक मंज़र बदलता जा रहा है

हर इक मंज़र बदलता जा रहा है
ये लम्हा भी गुज़रता जा रहा है

तिरा एहसास इक मुद्दत से मेरी
रग-ओ-पय में उतरता जा रहा है

शिकायत ज़िंदगी से करते करते
वो इक इक लम्हा मरता जा रहा है

पड़ा है जब से तेरा अक्स इस में
ये आईना सँवरता जा रहा है

वरक़ यादों के किस ने खोल डाले
मिरा कमरा महकता जा रहा हे

ये दुनिया तो सिमटती जा रही है
मगर इंसाँ बिखरता जा रहा है

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