रज़ा लखनवी की रचनाएँ

ख़याल-ए-हुस्न में यूँ ज़िंदगी तमाम हुई

ख़याल-ए-हुस्न में यूँ ज़िंदगी तमाम हुई
हसीन सुब्ह हुई और हसीन शाम हुई

बक़ार-ए-इश्क़ बस अब सर झुका दे क़दमों पर
उधर से तेरे लिए सबक़त-ए-सलाम हुई

हर एक अपनी जगह ख़ुश हर इक यही समझा
निगाह-ए-ख़ास ब-तर्ज़-ए-निगाह-ए-आम हुई

नज़र मिली तो तबस्सुम रहा ख़मोशी पर
नज़र फिरी तो ज़रा हिम्मत-ए-कलाम हुई

बस अब तो तुम ने मोहब्बत का ले लिया बदला
मुआफ़ करना जो तकलीफ़-ए-इंतिकाम हुई

है देखने ही का वक़्फ़ा जिसे समझते हैं
‘रज़ा’ वो धूप चढ़ी दिन ढला वो शाम हुई

जो ख़ुद न अपने इरादे से बद-गुमाँ होता

जो ख़ुद न अपने इरादे से बद-गुमाँ होता
क़दम उठाते ही मंज़िल पे कारवाँ होता

फ़रेब दे के तग़ाफ़ुल वबाल-ए-जाँ होता
जो इक लतीफ़ तबस्सुम न दरमियाँ होता

दिमाग़ अशे पे है तेरे दर की ठोकर से
नसीब होता जो सज्दा तो मैं कहाँ होता

क़फ़स से देख के गुलशन टपक पड़े आँसू
जहाँ नज़र है यहाँ काश आशियाँ होता

हमीं ने उन की तरफ़ से मना लिया दिल को
वो करते उज़्र तो ये और भी गिराँ होता

समझ तो ये कि न समझे ख़ुद अपना रंग-ए-जुनूँ
मिज़ाज ये कि ज़माना मिज़ाज-दाँ होता

भरी बहार के दिन हैं ख़याल आ ही गया
उजड़ न जाता तो फूलों में आशियाँ होता

हसीन क़दमों से लिपटी हुई कशिश थी जहाँ
वहीं था दिल भी ‘रज़ा’ और दिल कहाँ होता

वास्ता कोई न रख कर भी सितम ढाते हो तुम

वास्ता कोई न रख कर भी सितम ढाते हो तुम
दिल तड़प उठता है अब काहे को याद आते हो तुम

मेरी सब आज़ादियाँ बंदा-नवाज़ी पर निसार
ऐ ख़ोशा क़ैद-ए-वफ़ा ज़ंजीर पहनाते हो तुम

लाते हो कैफ़-ए-तरब देते हो पैग़ाम-ए-हयात
क्या बताऊँ साथ क्या ले कर चले जाते हो तुम

इस तर छुपते हो जल्वों की फ़रावानी के साथ
मैं समझता हूँ कि जैसे सामने आते हो तुम

सुन के मेरा हाल हैं आँखें न मलने के वजूह
ये भी हो सकता है शायद अश्क भर लाते हो तुम

भेज कर ख़ुश-बू हवाओं में ब-अँदाज़-ए-पयाम
क्या ये सच है आज यूँ मेरी तरफ़ आते हो तुम

दिल-गुज़ारी भी लिए है इम्तियाज़-ए-हुस्न-ओ-इश्क़
ख़ून रो देता हूँ मैं और अश्क पी जाते हो तुम

चाँद में रंगत तुम्हारी फूल भी तुम से बसे
खींचती हैं दिल फ़ज़ाएँ याद आ जाते हो तुम

तुम से आरास्ता जज़्बात का ताज़ा चमन
जैसी रूत होती है वैसा फूल बन जाते हो तुम

ज़िक्र इस का है ‘रज़ा’ ने कीं वफ़ाएँ या नहीं
तुम ने आख़िर क्या किया काहे को शरमाते हो तुम

वो आँसू जो हँस हँस के हम ने पिए हैं

वो आँसू जो हँस हँस के हम ने पिए हैं
तुम्हारे दिए थे तुम्हारे लिए हैं

करें वो जो चाहें कहें वो जो चाहें
मैं पाबंद-ए-उल्फ़त मिरे लब सिए हैं

तुम्हारे ही रहम ओ करम के सहारे
न मालूम मर मर के क्यूँकर जिए है

बड़ी देर तक जिस से पोंछे थे आँसू
वो दामन अभी हाथ ही में लिए हैं

उसे मैं ही समझूँ उसे मैं ही जानूँ
सितम कर रहे हैं करम भी किए हैं

कहाँ पा-ए-नाज़ुक कहाँ राह-ए-उल्फ़त
मिरे साथ दो इक क़दम हो लिए हैं

हँसाता है सब को हमारा फ़साना
हमीं कहते कहते कभी रो लिए हैं

गुल ओ बाग ओ नग़्मा मह ओ मेहर ओ अंजुम
जो तुम हो मिरे सब ये मेरे लिए हैं

उठाते वो क्यूँ मिल के बार-ए-मोहब्बत
ये क्या कम है थोड़ा सहारा दिए हैं

भले हैं बुरे हैं किसी से ग़रज़ क्या
‘रज़ा’ वो बहर-हाल मेरे लिए हैं

हुस्न की फ़ितरत में दिल-आज़ारियाँ

हुस्न की फ़ितरत में दिल-आज़ारियाँ
उसे पे ज़ालिम नित नई तैयारियाँ

सादगी में आ गईं दिल-दारियाँ
फूल उठीं इक फूल में फुल-वारियाँ

मुत्तसिल तिफ़्ली से आग़ाज़-ए-शबाब
ख़्वाब के आग़ोश में बेदारियाँ

चारासाज़ों की वो क़ातिल ग़फ़लतें
दर्द-मंदों की वो ग़ैरत-दारियाँ

बस हुजूम-ए-शौक़ अब इस भीड़ में
खोई जाती हैं मिरी ख़ुद-दारियाँ

सोच कर उन की गली में जाए कौन
बे-इरादा होती हैं तैयारियाँ

उन की आँखों में भी आँसू आ गए
छोड़िए भी अब ग़रीब-आज़ारियाँ

दर्द-ए-दिल और जान-लेवा पुर्सिशें
एक बीमारी की सौ बीमारियाँ

और दिवाने को दीवाना बनाओ
अल्लाह अल्लाह इतनी ख़ातिर-दारियाँ

खींच देती हैं ख़त-ए-मौज-ए-शराब
मद-भरी आँखों में रंगीं धारियाँ

इश्क़ और ज़िदें ये रस्म ओ राह की
हाए दुनिया उफ़ री दुनिया-दारियाँ

बंध रहा है ऐ ‘रज़ा’ रख़्त-ए-सफ़र
हो रही हैं कूच की तैयारियाँ

 

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