रफ़ीक़ संदेलवी की रचनाएँ

अजब इक साया-ए-लाहूत में तहलील होगी

अजब इक साया-ए-लाहूत में तहलील होगी
फ़ुसूल-ए-हश्र से हैअत मिरी तब्दील होगी

किए जाएँगे मेरे जिस्म में नूरी इज़ाफ़े
किसी रौशन सितारे पर मिरी तक्मील होगी

दिया जाएगा ग़ुस्ल-ए-अव्वलीं मेरे बदन को
तिलिस्मी-बाग़ होगा उस के अंदर झील होगी

कभी पहुँचेगा हिस्स-ए-सामेआ तक हर्फ़-ए-ख़ुफ़्ता
कभी आवाज़-ए-ना-मालूम की तर्सील होगी

कभी उक़दे खुलेंगे इस असातीरी ज़मीं के
कभी उस दास्तान-ए-कुहना की तावील होगी

अना को ख़ुद पर सवार मैं ने नहीं क्या था

अना को ख़ुद पर सवार मैं ने नहीं क्या था
तुम्हारे पीछे से वार मैं ने नहीं क्या था

वो ख़ुद गिरा था लहू-फ़रोशी की पस्तियों में
उसी नहीफ़ ओ नज़ार मैं ने नहीं क्या था

पके हुए फल ही तोड़े थे मैं ने टहनियों से
शजर को बे-बर्ग-ओ-बार मैं ने नहीं क्या था

निशाना बाँधा था आशियानों की सम्त लेकिन
कोई परिंदा शिकार मैं ने नहीं क्या था

कुछ इस क़दर थे हवास गुम-सुम कि वक़्त-ए-हिजरत
बिलकते बच्चों को प्यार मैंने नहीं क्या था

मिरे मसाइल तो ख़ुद-ब-ख़ुद ही सुलझ गए थे
कहीं भी सोच ओ विचार मैं ने नहीं क्या था

कभी ज़ख़्मी करूँ पाँव कभी सर फोड़ कर देखूँ 

कभी ज़ख़्मी करूँ पाँव कभी सर फोड़ कर देखूँ
मैं अपना रूख़ किसी जंगल की जानिब मोड़ कर देखूँ

समाधी ही लगा लूँ अब कहीं वीरान क़ब्रों पर
ये दुनिया तर्क कर दूँ और सब कुछ छोड़ कर देखूँ

मुझे घेरे में ले रक्खा है अश्या ओ मज़ाहिर ने
कभी मौक़ा मिले तो इस कड़ को तोड़ कर देखूँ

उड़ा दूँ सब्ज़ पŸाों में छुपी ख़्वाहिश की सब चिड़ियाँ
कभी दिल के शजर को ज़ोर से झिंझोड़ कर देखूँ

अदम-तकमील के दुख से बचा लूँ अपनी सोचों को
जहाँ से सिलसिला टूटे वहीं से जोड़ कर देखूँ

ख़ता होने लगे थे राद से औसान मेरे

ख़ता होने लगे थे राद से औसान मेरे
अजब शोर-ए-क़यामत में घिरे थे कान मेरे

फ़ज़ा में एक लहज़े के लिए जब बर्क़ चमकी
अँधेरी रात से तय हो गय पैमान मेरे

लहू जमने के नुक़्ते पर जो पहुँचा तो अचानक
उलट डाले हवा ने मुझ पे आतिश-दान मेरे

मैं मिट्टी आग और पानी की सूरत मुंतशिर था
फिर इक दिन सब अनासिर हो गए यक-जान मेरे

ख़ेमा-ए-ख़्वाब की तनाबें खोल

ख़ेमा-ए-ख़्वाब की तनाबें खोल
क़ाफ़िला जा चुका है आँखें खोल

ऐ ज़मीं मेरा ख़ैर-मक़्दम कर
तेरा बेटा हूँ अपनी बाँहें खोल

डूब जाएँ न फूल की नब्ज़ें
ऐ ख़ुदा मौसमों की साँसें खोल

फ़ाश कर भेद दो-जहानों के
मुझ पे सर-बस्ता काएनातें खोल

कुछ रोज़ मैं इस ख़ाक के पर्दे में रहूँगा

कुछ रोज़ मैं इस ख़ाक के पर्दे में रहूँगा
फिर दूर किसी नूर के हाले में रहूँगा

रक्खूँगा कभी धूप की चोटी पे रिहाइश
पानी की तरह अब्र के टुकड़े में रहूँगा

ये शब भी गुज़र जाएगी तारों में बिछड़ कर
ये शब भी मैं कोहसार के दर्रे में रहूँगा

सूरज की तरह मौत मिरे सर पे रहेगी
मैं शाम तलक जान के ख़तरे में रहूँगा

उभरेगी मिरे ज़हन के ख़लियों से नई शक्ल
कब तक मैं किसी बर्फ़ के मलबे में रहूँगा

मैं हवा को मुंजमिद कर दूँ तो कैसे साँस लूँ

मैं हवा को मुंजमिद कर दूँ तो कैसे साँस लूँा
रेत पर गिर जाऊँ और फिर उखड़े उखड़े साँस लूँ

कब तलक रोके रक्खूँ मैं पानियों की तह में साँस
क्यूँ न इक दिन सतह-ए-दरिया से निकल के साँस लूँ

क़िला-ए-कोह-सार पर मैं रख तो दूँ ज़र्रीं-चराग़
लेकिन इतनी शर्त है कि उस के बदले साँस लूँ

ख़्वाब के मतरूक-गुम्बद से निकल कर एक दिन
अपनी आँखें खोल दूँ और लम्बे लम्बे साँस लूँ

मैं इक पहाड़ी तले दबा लूँ किसे ख़बर है 

मैं इक पहाड़ी तले दबा लूँ किसे ख़बर है
बड़ी अज़िय्यत में मुब्तिला हूँ किसे ख़बर है

किसे ख़बर है कि मेरा हर अक्स गुम हुआ है
मैं एक ख़मदार आईना हूँ किसे ख़बर है

किसी को क्या इल्म है कि मैं किस मदार में हूँ
मैं एक बे-अंत फ़ासला हूँ किसे ख़बर है

अजब शब ओ रोज़ का तसादुम हुआ है मुझ में
मैं इक सितारा हूँ या हवा हूँ किसे ख़बर है

अजीब बे-रंग धुंद मुझ में है ईस्तादा
मैं वस्त-ए-शब में कहीं खड़ा हूँ किसे ख़बर है

नींद के आब-ए-रवाँ को मात देने आऊँगा

नींद के आब-ए-रवाँ को मात देने आऊँगा
ऐ शब-ए-ना-ख़्वाब तेरा साथ देने आऊँगा

जब सितारे नुक़्ता-ए-अनफ़ास पर बुझ जाएँगे
मैं ख़ुदा को जान भी उस रात देने आऊँगा

नूर कीे मौज़ें मिरे हमराह होंगी और मैं
रात के हाथों में अपना हाथ देने आऊँगा

आसमाँ के नीले-गुम्बद से निकल कर एक दिन
मैं ज़मीं को क़ुर्मुज़ी ख़ैरात देने आऊँगा

उसे शौक़-ए-ग़ोता-ज़नी न था वो कहाँ गया

उसे शौक़-ए-ग़ोता-ज़नी न था वो कहाँ गया
मिरे नज्म-ए-आब मुझे बता वो कहाँ गया

जो लकीर पानी पे नक़्श थी वो कहाँ गई
जो बना था ख़ाक पे ज़ाइचा वो कहाँ गया

कहाँ टूटे मेरी तनाब-ए-जिस्म के हौसले
जो लगा था ख़ेमा वजूद का वो कहाँ गया

जो ज़मीन पाँव तले बिछी थी किधर गई
वो जो आसमान सरों पे था वो कहाँ गया

गए किस जिहत को तिकोन-ख़्वाब के ज़ाविए
जो रूका था आँख में दाइरा वो कहाँ गया

अभी अक्स उस का उभर रहा था कि दफ़अतन
मिरे आईने से बिछड़ गया वो कहाँ गया

कहाँ गुम हुईं वो ज़बान ओ काम की लज़्ज़तें
जो फलों में होता था ज़ाइक़ा वो कहाँ गया

ज़मीन पाँव तले सर पे आसमान लिए

ज़मीन पाँव तले सर पे आसमान लिए
निदा-ए-ग़ैब को जाता हूँ बहरे कान लिए

मैं बढ़ रहा हूँ किसी राद-ए-अब्र की जानिब
बदन को तर्क किए और अपनी जान लिए

ये मेरा ज़र्फ़ कि मैं ने असासा-ए-शब से
बस एक ख़्वाब लिया और चंद शम्अ-दान लिए

मैं सत्ह-ए-आब पे अपने क़दम जमा लूँगा
बदन की आग लिए और किसी का ध्यान लिए

मैं चल पड़ूँगा सितारों की रौशनी लेकर
किसी वजूद के मर्क़ज को दरमियान लिए

परिंदे मेरा बदन देखते थे हैरत से
मैं उड़ रहा था ख़ला में अजीब शान लिए

क़लील वक़्त में यूँ मैं ने इर्तिकाज़ किया
बस इक जहान के अंदर कई जहान लिए

अभी तो मुझ से मेरी साँस भी थी ना-मानूस
कि दस्त-ए-मर्ग ने नेज़े बदन पे तान लिए

ज़मीं खड़ी है कई लाख नूरी सालों से
किसी हयात-ए-मुसलसल की दास्तान लिए

 

 

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