रफ़ी रज़ा की रचनाएँ

आँख सहमी हुई डरती हुई देखी गई है

आँख सहमी हुई डरती हुई देखी गई है
अमन की फ़ाख़्ता मरती हुई देखी गई है

क्या बचा कितना बचा ताब किसे है देखे
मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़रती हुई देखी गई है

ऐसे लगता है यहाँ से नहीं जाने वाली
जो सियह-रात ठहरती हुई देखी गई है

दूसरी बार हुआ है कि यही दोस्त हुआ
पर परिंदों के कतरती हुई देखी गई है

एक उजड़ी हुई हसरत है कि पागल हो कर
बैन हर शहर में करती हुई देखी गई है

मौत चमकी किसी शमशीर-ए-बरहना की तरह
रौशनी दिल में उतरती हुई देखी गई है

फिर किनारे वे वही शोर वही लोग ‘रज़ा’
फिर कोई लाश उभरती हुई देखी गई है

आना जाना है तो क़ामत से तुम आओ जाओ 

आना जाना है तो क़ामत से तुम आओ जाओ
दर-ए-इज़हार-ए-मुरव्वत से तुम आओ जाओ

वो तहय्युर जो तुम्हें ले के यहाँ आया था
उस तहय्युर की विसातत से तुम आओ जाओ

हम किसी सम्त बगोलों को नहीं रोकते हैं
गर्मी-ए-ज़ौक़ शरारत से तुम आओ जाओ

कफ़ उड़ाने पे भी पाबंदी नहीं है कोई
हाँ मगर थोड़ी निफ़ासत से तुम आओ जाओ

हमें उम्मीद-ए-बलाग़त तो नहीं है तुम से
बस ज़रा थोड़ी बुलूग़त से तुम आओ जाओ

किस ने रोका है सर-ए-राह-ए-मोहब्बत तुम को
तुम्हें नफ़रत है तो नफ़रत से तुम आओ जाओ

तुम की तिफ़्लान-ए-अदब साथ लगाए हुए हो
किसी मनक़ूल शरीअत से तुम आओ जाओ

हम ने अशआर का दरवाज़ा खुला रक्खा है
जब भी जी चाहे सहूलत से तुम आओ जाओ

अगरचे वक़्त मुनाजात करने वाला था 

अगरचे वक़्त मुनाजात करने वाला था
मिरा मिज़ाज सवालात करने वाला था

मुझे सलीक़ा न था रौशनी से मिलने का
मैं हिज्र में गुज़र-औक़ात करने वाला था

मैं सामने से उठा और लौ लरज़ने लगी
चराग़ जैसे कोई बात करने वाला था

खुली हुई थी बदन पर रवाँ रवाँ आँखें
न जाने कौन मुलाक़ात करने वाला था

वो मेरे काबा-ए-दिल में ज़रा सी देर रूका
ये हज अदा वो मिरे साथ करने वाला था

कहाँ ये ख़ाक के तौदे तले दबा हुआ जिस्म
कहाँ मैं सैर-ए-समावात करने वाला था

एक मज्ज़ूब उदासी मेरे अंदर गुम है

एक मज्ज़ूब उदासी मेरे अंदर गुम है
इस समुंदर में कोई और समुंदर गुम है

बेबसी कैसा परिंदा है तुम्हें क्या मालूम
उसे मालूम है जो मेरे बराबर गुम है

चर्ख़-ए-सौ रंग को फ़ुर्सत हो तो ढूँढे उस को
नील-गूँ सोच में जो मस्त क़लंदर गुम है

धूप छाँव का कोई खेल है बीनाई भी
आँख को ढूँड के लाया हूँ तो मंज़र गुम है

संग-रेज़ों में महकता है कोई सुर्ख़ गुलाब
वो जो माथे पे लगा था वही पत्थर गुम है

एक मदफ़ून दफ़ीना इन्हीं अतराफ़ में था
ख़ाक उड़ती है यहाँ और वो गौहर गुम है

कभी जो ख़ाक की तक़रीब-ए-रू-नुमाई हुई

कभी जो ख़ाक की तक़रीब-ए-रू-नुमाई हुई
बहुत उड़ेगी वहाँ भी मिरी उड़ाई हुई

ख़ुदा का शुक्र-ए-सुख़न मुझ पे मेहरबान हुआ
बहुत दिनों से थी लुक्नत ज़बाँ में आई हुई

यह है ग़ज़्ज़-ए-बसर ये है देखना मेरा
रहेगी आँख तहय्युर में डबडबाई हुई

तुम्हारा मेरा तअल्लुक़ है जो रहे सो रहे
तुम्हारे हिज्र ने क्यूँ टाँग है अड़ाई हुई

पकड़ लिया गया जैसे कि मैं लगाता हूँ
बुझा रहा था किसी और की लगाई हुई

लहू लहू हुआ सज्दे में दिल अगरचे ‘रज़ा’
शब-ए-शिकस्त बड़े जोर की लड़ाई हुई

मैं अपनी आँख को उस का जहान दे दूँ क्या

मैं अपनी आँख को उस का जहान दे दूँ क्या
ज़मीन खींच लूँ और आसमान दे दूँ क्या

मैं दुनिया ज़ाद नहीं हूँ मुझे नहीं मंज़ूर
मकान ले के तुम्हें ला-मकान दे दूँ क्या

कि एक रोज़ खुला रह गया था आईना
अगर गवाह बनूँ तो बयान दे दूँ क्या

उड़े कुछ ऐसे कि मेरा निशान तक न रहे
मैं अपनी ख़ाक को इतनी उड़ान दे दूँ क्या

ये लग रहा है कि ना-ख़ुश हो दोस्ती में तुम
तुम्हारे हाथ में तीर ओ कमान दे दूँ क्या

समझ नहीं रहे बे-रंग आँसुओं का कहा
उन्हें मैं सुर्ख़-लहू की ज़बान दे दूँ क्या

सुना है ज़िंदगी कोई तह-ए-समुंदर है
भँवर के हाथ में ये बादबान दे दूँ क्या

ये फ़ैसला मुझे करना है ठंडे दिल से ‘रज़ा’
नहीं बदलता ज़माना तो जान दे दूँ क्या

मैं अपनी आँख को उस का जहान दे दूँ क्या
ज़मीन खींच लूँ और आसमान दे दूँ क्या

मैं दुनिया ज़ाद नहीं हूँ मुझे नहीं मंज़ूर
मकान ले के तुम्हें ला-मकान दे दूँ क्या

कि एक रोज़ खुला रह गया था आईना
अगर गवाह बनूँ तो बयान दे दूँ क्या

उड़े कुछ ऐसे कि मेरा निशान तक न रहे
मैं अपनी ख़ाक को इतनी उड़ान दे दूँ क्या

ये लग रहा है कि ना-ख़ुश हो दोस्ती में तुम
तुम्हारे हाथ में तीर ओ कमान दे दूँ क्या

समझ नहीं रहे बे-रंग आँसुओं का कहा
उन्हें मैं सुर्ख़-लहू की ज़बान दे दूँ क्या

सुना है ज़िंदगी कोई तह-ए-समुंदर है
भँवर के हाथ में ये बादबान दे दूँ क्या

ये फ़ैसला मुझे करना है ठंडे दिल से ‘रज़ा’
नहीं बदलता ज़माना तो जान दे दूँ क्या

पेड़ सूखा हर्फ़ का और फ़ाख़ताएँ मर गईं 

पेड़ सूखा हर्फ़ का और फ़ाख़ताएँ मर गईं
लब ने खोले तो घुटन से सब दुआएँ मर गईं

एक दिन अपना सहीफ़ा मुझ पे नाज़िल हो गया
उस को पढ़ते ही मिरी सारी ख़ताएँ मर गईं

याद की गुदड़ी को मैं ने एक दिन पहना नहीं
एक दिन के हिज्र में सारी बनाएँ मर गईं

मैं ने मुस्तक़बिल में जा कर एक लम्बी साँस ली
फिर मिरे माज़ी की सब हासिद हवाएँ मर गईं

मैं ने क्या सोचा था उन के वास्ते और क्या हुआ
मेरे चुप होने से अंदर की सदाएँ मर गईं

इस तरफ मिट्टी थी मेरे उस तरफ़ इक नूर था
मैं जिया मेरे लिए दो इंतिहाएँ मर गईं

रात मैं शाना-ए-इदराक से लग कर सोया 

रात मैं शाना-ए-इदराक से लग कर सोया
बंद की आँख तो अफ़्लाक से लग कर सोया

ऊँघता था कहीं मेहराब की सरशारी में
इक दिया सा किसी चक़माक़ से लग कर सोया

एक जलता हुआ आँसू जो नहीं सोता था
देर तक दीदा-ए-नमनाक से लग कर सोया

अन-गिनत आँखें मिरे जिस्म पे चुँधयाई रहीं
बुक़ा-ए-नूर मिरी ख़ाक से लग कर सोया

कुज़ा-गर ने मिरे बारे में ये दफ़्तर में लिखा
चाक से उतरा मगर चाक से लग कर सोया

नींद की शर्त थी तन्हा नहीं सोना मुझ को
हिज्र था सो उसी सफ़्फ़ाक से लग कर सोया

रात काँटों पे गुज़ारी तो सवेरे सोचा
किस लिए ख़ेमा-ए-उश्शाक़ से लग कर सोया

नींद सूली पे चली आई सौ ज़ख़्म उर्यां
अपनी इक ख़्वाहिश-ए-पोशाक से लग कर सोया

वहशत में निकल आया हूँ इदराक से आगे 

वहशत में निकल आया हूँ इदराक से आगे
अब ढूँढ मुझे मजमा-ए-उश्शाक़ से आगे

इक सुर्ख़ समुंदर में तिरा ज़िक्र बहुत है
ऐ शख़्स गुज़र दीदा-ए-नमनाक से आगे

उस पार से आता है कोई देखूँ तो ये पूछूँ
अफ़्लाक से पीछे हूँ कि अफ़्लाक से आगे

दम तोड़ न दे अब कहीं ख़्वाहीश की हवा भी
ये ख़ाक तो उड़ती नहीं ख़ाशाक से आगे

जो नक़्श उभारे थे मिटाए भी हैं उस ने
दरपेश फिर इक चाक है इस चाक से आगे

आईने को तोड़ा है तो मालूम हुआ है
गुज़रा हूँ किसी दश्त-ए-ख़तरनाक से आगे

हम-ज़ाद की सूरत है मिरे यार की सूरत
मैं कैसे निकल सकता हूँ चालाक से आगे

ज़मीं को बोझ और उस पर ये आसमान का बोझ

ज़मीं को बोझ और उस पर ये आसमान का बोझ
उतार फेंक दूँ काँधों से दो-जहान का बोझ

पड़ा हुआ हूँ मैं सज्दे में कह नहीं पाता
वो बात जिस से कि हल्का हो कुछ ज़बान को बोझ

फिर इस के बाद उठाऊँगा अपने आप को मैं
उठा रहा हूँ अभी अपने ख़ानदान का बोझ

दबी थी आँख कभी जिस मकान-ए-हैरत से
अब उस मकाँ ज़ियादा है ला-मकान का बोझ

अगर दिमाग़ सितारा है टूट जाएगा
चमक चमक के उठाता है आसमान का बोझ

तो झुर्रियों ने लिखा और क्या उठाओगे
उठाया जाता नहीं तुम से जिस्म ओ जान का बोझ

पलट के आई जो ग़फ़लत के उस कुरे से निगह
तो सिलवटों में पड़ा था मिरी थकान का बोझ

जो उम्र बीत र्ग उस को भूल जाऊँ ‘रज़ा’
पर-ए-ख़याल से झटकूँ गई उड़ान का बोझ

 

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