रमई काका की रचनाएँ

धरती हमारि! धरती हमारि!

धरती हमारि ! धरती हमारि !
है धरती परती गउवन कै औ ख्यातन कै धरती हमारि |
धरती हमारि ! धरती हमारि !

हम अपनी छाती के बल से धरती मा फारु चलाइत है |
माटी के नान्हें कन – कन मा , हमही सोना उपजाइत है ||
अपने लोनखरे पसीना ते ,रेती मा ख्यात बनावा हम |
मुरदा माटी जिन्दा होइगै,जहँ लोहखर अपन छुवावा हम ||
कँकरील उसर बीजर परती,धरती भुड़गरि नींबरि जरजरि |
बसि हमरे पौरख के बल ते,होइगै हरियरि दनगरि बलगरि ||
हम तरक सहित स्याया सिरजा , सो धरती है हमका पियारि …
धरती हमारि ! धरती हमारि !

हमरे तरवन कै खाल घिसी , औ रकत पसीना एकु कीन |
धरती मइया की सेवा मा , हम तपसी का अस भेसु कीन ||
है सहित ताप बड़ बूँद घात , परचंड लूक कट – कट सरदी |
रोंवन – रोंवन मा रमतु रोजु , चंदनु अस धरती कै गरदी ||
ई धरती का जोते – जोते , केतने बैलन के खुर घिसिगे |
निखवखि,फरुहा,फारा,खुरपी,ई माटी मा हैं घुलि मिलिगे ||
अपने चरनन कै धूरि जहाँ , बाबा दादा धरिगे सम्हारि …
धरती हमारि ! धरती हमारि !

हम हन धरती के बरदानी ,जहँ मूंठी भरि छाड़ित बेसार |
भरि जात कोंछ मा धरती के,अनगिनत परानिन के अहार||
ई हमरी मूंठी के दाना , ढ्यालन की छाती फारि – फारि |
हैं कचकचाय के निकरि परत,लखि पौरुख बल फुर्ती हमारि||
हमरे अनडिगॆ पैसरम के , हैं साक्षी सूरज औ अकास |
परचंड अगिन जी बरसायनि,हमपर दुपहर मा जेठ मास ||
ई हैं रनख्यात जिन्दगी के ,जिन मा जीतेन हम हारि-हारि …
धरती हमारि ! धरती हमारि !

कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री 

सुनिकै तोरि गोहार कोयलिया,
सुनिकै तोरि पुकार री……!

बनके पात पुरान झरे सब, आई बसन्त बहार,
मोरी आँखिन ते अँसुवन कै, होति अजहुँ पतझार।
कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

डारैं सजीं बौर झौंरन ते, भौंर करैं गुँजार,
मोर पिया परदेस बसत हैं, कापर करौं सिंगार।
कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

भरौं माँग मा सेंदुर कइसे, बिन्दी धरौं सँवारि,
अरी सेंधउरा मा तौ जानौ, धधकै चटक अँगार।
कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

चुनरी दिखे बँबूका लागै, राख्यों सिरिजि पेटार,
कूकनि तोरि फूँक जादू कै, दहकै गहन हमार।
कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

अरी जहरुई तोरे बोले, बिस कै बही बयारि,
अब न कूकु त्वै, देखु तनिकुतौ, ढाँखन फरे अँगार।
कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

हउकनि मोरि कंठ मा भरिले, ले टेसुन का हार,
कूकि दिहे पहिराय गरे मा, अइहैं कंत हमार।
कोयलिया सुनिकै तोरि पुकार री॥

हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा

हम गयन याक दिन लखनउवै, कक्कू संजोगु अइस परिगा
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख, सो कहूँ – कहूँ ध्वाखा होइगा

जब गएँ नुमाइस द्याखै हम, जंह कक्कू भारी रहै भीर
दुई तोला चारि रुपइया कै, हम बेसहा सोने कै जंजीर
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु, मुल चारि दिनन मा रंग बदला
उन कहा कि पीतरि लै आयौ, हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा

म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट, मुंह पौडर औ सिर केस बड़े
तहमद पहिरे कम्बल ओढ़े, बाबू जी याकै रहैं खड़े
हम कहा मेम साहेब सलाम, उई बोले चुप बे डैमफूल
‘मैं मेम नहीं हूँ साहेब हूँ ‘, हम कहा फिरिउ ध्वाखा होइगा

हम गयन अमीनाबादै जब, कुछ कपड़ा लेय बजाजा मा
माटी कै सुघर महरिया असि, जहं खड़ी रहै दरवाजा मा
समझा दूकान कै यह मलकिन सो भाव ताव पूछै लागेन
याकै बोले यह मूरति है, हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा

धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ, मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी
मुंहु पौडर पोते उजर – उजर, औ पहिरे सारी सुघर बड़ी
हम जाना मूरति माटी कै, सो सारी पर जब हाथ धरा
उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं, हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा

यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो

लरिकउनू बी ए पास किहिनि, पुतहू का बैरू ककहरा ते।
वह करिया अच्छरू भैंसि कहं, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

दिनु राति बिलइती बोली मां, उइ गिटपिट गिटपिट बोलि रहे।
बहुरेवा सुनि सुनि सिटपिटाति, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

लरिकऊ कहेनि वाटर दइदे, बहुरेवा पाथर लइ आई।
यतने मा मचिगा भगमच्छरू, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

उन अंगरेजी मां फूल कहा, वह गरगु होइगे फूलि फूलि।
उन डेमफूल कह डांटि लीनि, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

बनिगा भोजन तब थरिया ता, उन लाय धरे छूरी कांटा।
डरि भागि बहुरिया चउका ते, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

लरिकऊ चले असनान करै, तब साबुन का उन सोप कहा।
बहुरेवा लइकै सूप चली, यह छीछाल्यादरि द्याखौ तो।

अब तड़के का कसि कै नहाबु

अब तड़के का कसि कै नहाबु
हयँ भूलि गयीं भगतिनि चाची।
लोटिया भर पानी डारयँ तौ
घर मा घूमयँ नाची-नाची॥

ई जाड़े मा हारी मानेनि,
पानी ते पंडित सिव किसोर।
तन पर थ्वारै पानी चुपरयँ
मुलु मंत्र पढ़त हयँ जोर-जोर॥

बप्पा हम आजु नहइबै ना,
लरिकउना माँगत माफी हय।
दुइ कलसा पानी का करिबै
अब तौ चुल्लू भर काफी हय॥

बहुरिया सास का भय कइकै
बसि सी-सी-सी सिसियाय दिहिस।
आड़े मा धोती बदलि लिहिस
पानी धरती पै नाय दिहिस॥

हम गयन याक दिन लखनउवै

हम गयन याक दिन लखनउवै,
कक्कू संजोगु अइस परिगा।
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख,
सो कहूँ – कहूँ ध्वाखा होइगा —

जब गएँ नुमाइस द्याखै हम,
जंह कक्कू भारी रहै भीर।
दुई तोला चारि रुपइया कै,
हम बेसहा सोने कै जंजीर।।

लखि भईं घरैतिन गलगल बहु,
मुल चारि दिनन मा रंग बदला।
उन कहा कि पीतरि लै आयौ,
हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा।।

म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट

म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट,
मुँह पौडर औ सिर केस बड़े।
तहमद पहिरे कम्बल ओढ़े,
बाबू जी याकै रहैं खड़े।।

हम कहा मेम साहेब सलाम,
उई बोले चुप बे डैमफूल।
‘मैं मेम नहीं हूँ साहेब हूँ‘,
हम कहा फिरिउ ध्वाखा होइगा।।

हम गयन अमीनाबादै जब

हम गयन अमीनाबादै जब,
कुछ कपड़ा लेय बजाजा मा।
माटी कै सुघर महरिया असि,
जहँ खड़ी रहै दरवाजा मा।।

समझा दूकान कै यह मलकिन
सो भाव ताव पूछै लागेन।
याकै बोले यह मूरति है,
हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा।।

धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ

धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ,
मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी।
मुँहु पौडर पोते उजर–उजर,
औ पहिरे सारी सुघर बड़ी।।

हम जाना मूरति माटी कै,
सो सारी पर जब हाथ धरा।
उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं,
हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा।।

ध्वाखा

हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा!

[१]

हम गयन याक दिन लखनउवै, कक्कू संजोगु अइस परिगा।
पहिलेहे पहिल हम सहरु दीख, सो कहूँ–कहूँ ध्वाखा होइगा—
जब गएँ नुमाइस द्याखै हम, जंह कक्कू भारी रहै भीर।
दुई तोला चारि रुपइया कै, हम बेसहा सोने कै जंजीर॥
लखि भईं घरैतिन गलगल बहु, मुल चारि दिनन मा रंग बदला।
उन कहा कि पीतरि लै आयौ, हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा॥

[२]

म्वाछन का कीन्हें सफाचट्ट, मुंह पौडर औ सिर केस बड़े।
तहमद पहिरे कम्बल ओढ़े, बाबू जी याकै रहैं खड़े॥
हम कहा मेम साहेब सलाम, उई बोले चुप बे डैमफूल।
‘मैं मेम नहीं हूँ साहेब हूँ’ , हम कहा फिरिउ ध्वाखा होइगा॥
[३]

हम गयन अमीनाबादै जब, कुछ कपड़ा लेय बजाजा मा।
माटी कै सुघर महरिया असि, जंह खड़ी रहै दरवाजा मा॥
समझा दूकान कै यह मलकिन सो भाव ताव पूछै लागेन।
याकै बोले यह मूरति है, हम कहा बड़ा ध्वाखा होइगा॥

[४]

धँसि गयन दुकानैं दीख जहाँ, मेहरेऊ याकै रहैं खड़ी।
मुंहु पौडर पोते उजर–उजर, औ पहिरे सारी सुघर बड़ी॥
हम जाना मूरति माटी कै, सो सारी पर जब हाथ धरा।
उइ झझकि भकुरि खउख्वाय उठीं, हम कहा फिरिव ध्वाखा होइगा॥

 

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