रमानाथ अवस्थी की रचनाएँ

करूँ क्या 

सुर सब बेसुरे हुए करूँ क्या ?
उतरे हुए सभी के मुखड़े
सबके पाँव लक्ष्य से उखड़े
उखड़ी हुई भ्रष्ट पीढ़ी से
विजय-वरण के लिए कहूँ क्या ?
सागर निकले ताल सरीखे
अन्धों को कब आँसू दीखे
अन्धों की महफ़िल में आँसू
जैसी उजली मौत मरूँ क्या ?
झूठी सत्ता की मरीचिका
आत्मभ्रष्ट कर रही जीविका
बौनों की बस्ती में बोलो
ऊँचे क़द की बात करूँ क्या ?

वे दिन

याद आते हैं फिर बहुत वे दिन
जो बड़ी मुश्किलों से बीते थे !

शाम अक्सर ही ठहर जाती थी
देर तक साथ गुनगुनाती थी !
हम बहुत ख़ुश थे, ख़ुशी के बिन भी
चाँदनी रात भर जगाती थी !
हमको मालूम है कि हम कैसे
आग को ओस जैसे पीते थे !
घर के होते हुए भी बेघर थे
रात हो, दिन हो, बस, हमीं भर थे !
डूब जाते थे मेघ भी जिसमें
हम उसी प्यास के समन्दर थे !
उन दिनों मरने की न थी फ़ुरसत,
हम तो कुछ इस तरह से जीते थे !
आते-जाते जो लोग मिलते थे
उनके मिलने में फूल खिलते थे !
ज़िन्दगी गंगा जैसी निर्मल थी,
जिसमें हम नाव जैसे चलते थे !
गंगा की ऊँची-नीची लहरों से
हम कभी आगे कभी पीछे थे !
कोई मौसम हो हम उदास न थे
तंग रहते थे, पर निराश न थे !
हमको अपना बना के छोड़े जो
हम किसी ऐसे दिल के पास न थे !
फूल यादों के जल गए कब के
हमने जो आँसुओं से सींचे थे ।

सारी रात

धीरे-धीरे बात करो सारी रात प्यार से ।

भोर होते चाँद के ही साथ-साथ जाऊँगा
हो सका तो शाम को सितारों के संग आऊँगा
धीरे-धीरे ताप हरो प्यार के अंगार से |

तन का सिंगार तो हज़ार बार होता है
किंतु प्यार जीवन में एक बार होता है
धीरे-धीरे बूँद चुनो ज़िन्दगी की धार से ।

कोई नहीं विश्व में जो प्यार बिना जी सके
और गीत गाने वाले अधरों को सी सके
धीरे-धीरे मीत खींचो प्राण के सितार से ।

देख-देख हमें तुम्हें चाँद गला जा रहा
क्योंकि प्यार से हमारा प्राण छला जा रहा
धीरे-धीरे प्राण ही निकाल लो दुलार से ।

उस समय भी

जब हमारे साथी-संगी हमसे छूट जाएँ
जब हमारे हौसलों को दर्द लूट जाएँ
जब हमारे आँसुओं के मेघ टूट जाएँ

उस समय भी रुकना नहीं, चलना चाहिए,
टूटे पंख से नदी की धार ने कहा ।

जब दुनिया रात के लिफाफे में बंद हो
जब तम में भटक रही फूलों की गंध हो
जब भूखे आदमियों औ’ कुत्तों में द्वन्द हो

उस समय भी बुझना नहीं जलना चाहिए,
बुझते हुए दीप से तूफ़ान ने कहा ।

बुलावा

प्यार से मुझको बुलाओगे जहाँ
एक क्या सौ बार आऊँगा वहाँ

पूछने की है नहीं फ़ुर्सत मुझे
कौन हो तुम क्या तुम्हारा नाम है
किस लिए मुझको बुलाते हो कहाँ
कौन सा मुझसे तुम्हारा काम है

फूल से तुम मुस्कुराओगे जहाँ
मैं भ्रमर सा गुनगुनाऊँगा वहां

कौन मुझको क्या समझता है यहाँ
आज तक इस पर कभी सोचा नहीं
आदमी मेरे लिए सबसे बड़ा
स्वर्ग में या नरक में वह हो कहीं

आदमी को तुम झुकाओगे जहाँ
प्राण की बाजी लगाऊँगा वहाँ

जानता हूँ एक दिन मैं फूल-सा
टूट जाऊँगा बिखरने के लिए
फिर न आऊँगा तुम्हारे रूप की
रौशनी में स्नान करने के लिए

किन्तु तुम मुझको भूलाओगे जहाँ
याद अपनी मैं दिलाऊँगा वहाँ

मैं नहीं कहता कि तुम मुझको मिलो
और मिल कर दूर फिर जाओ चले
चाहता हूँ मैं तुम्हें देखा करूँ
बादलों से दूर जा नभ के तले

सर उठाकर तुम झुकाओगे जहाँ
बूँद बन-बन टूट जाऊँगा वहाँ

ऐसी तो कोई बात नहीं 

तुमसे भी छिपा सकूँ जो मै
ऐसी तो कोई बात नहीं जीवन में |

मन दिया तुम्हें मैंने ही अपने मन से
रंग दिया तुम्हें मैंने अपने जीवन से
बीते सपनो में आए बिना तुम्हारे
ऐसी तो कोई रात नहीं जीवन में ।

जल का राजा सागर कितना लहराया
पर मेरे मन की प्यास बुझा कब पाया
जो बूँद बूँद बन प्यास तुम्हारी पी ले
ऐसी कोई बरसात नहीं जीवन में ।

कलियों के गाँवों में भौंरे गाते है
गाते-गाते वह अक्सर मर जाते हैं
मरने वाले को जो मरने से रोके
ऐसी कोई सौगात नहीं जीवन में |

सौ बातों की एक बात है

सौ बातों की एक बात है ।

रोज़ सवेरे रवि आता है
दुनिया को दिन दे जाता है
लेकिन जब तम इसे निगलता
होती जग में किसे विकलता
सुख के साथी तो अनगिन हैं
लेकिन दुःख के बहुत कठिन हैं

सौ बातो की एक बात है |

अनगिन फूल नित्य खिलते हैं
हम इनसे हँस-हँस मिलते हैं
लेकिन जब ये मुरझाते हैं
तब हम इन तक कब जाते हैं
जब तक हममे साँस रहेगी
तब तक दुनिया पास रहेगी

सौ बातों की एक बात है |

सुन्दरता पर सब मरते हैं
किन्तु असुंदर से डरते हैं
जग इन दोनों का उत्तर है
जीवन इस सबके ऊपर है
सबके जीवन में क्रंदन है
लेकिन अपना-अपना मन है

सौ बातो की एक बात है ।

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