रमा द्विवेदी की रचनाएँ

हर सांस बंदी है यहाँ

कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहाँ ?
कैसे रचे इतिहास जब आकाश बन्दी है यहाँ?

अंकुर अभी पनपा ही था कि नष्ट तुमने कर दिया,
कैसे लेंगे जन्म जब गर्भांश बन्दी है यहाँ?
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहाँ?

सपने भी जब देखे हमने उनपे भी पहरे लगे,
कैसे पूरे होंगे जब हर ख्वाब बन्दी है यहाँ?
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहाँ?

सदियों से रितु बदली नहीं,अपनी तो इक बरसात है,
कैसे करें त्योहार जब मधुमास बन्दी है यहाँ?
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहाँ?

त्याग की कीमत न समझी त्याग जो हमने किए,
छीन लीन्हीं धडकनें पर,लाश बन्दी है यहाँ।
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहाँ ?

कुछ कहने को जब खोले लब,खामोश उनको कर दिया,
कैसे करें अभिव्यक्त जब हर भाव बन्दी है यहाँ?
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहाँ?

खून की वेदी रचा कर तन को भी दफ़ना दिया,
कैसे जिएं? कैसे मरें? अहसास बन्दी है यहाँ।
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बन्दी है यहाँ?

माँ के आँचल को

मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं।
फूल से पंखुरी जैसे झरती रही॥

जन्म लेते ही माँ ने दुलारा बहुत,
अपनी ममता निछावर करती रही।
मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

वक़्त के हाथों में, मैं बड़ी हो गई,
माँ की चिन्ता की घड़ियाँ बढ़ती रहीं।
मेरी साँ सों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

ब्याह-कर मैं पति के घर आ गई,
माँ की ममता सिसकियाँ भरती रही।
मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

छोड़कर माँ को,दिल के दो टुकड़े हुए,
फिर भी जीवन का दस्तूर करती रही।
मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

वक़्त जाता रहा मैं तड़पती रही,
माँ के आंचल को मैं तो तरसती रही।
मेरी सांसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

एक दिन मैं भी बेटी की माँ बन गई,
अपनी ममता मैं उस पर लुटाती रही।
मेरी सांसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

देखते-देखते वह बड़ी हो गई,
ब्याह-कर दूर देश में बसती रही।
मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

टूटकर फिर से दिल के हैं टुकड़े हुए,
मेरी ममता भी पल-पल तरसती रही।
मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

वक़्त ढ़लता रहा, सपने मिटते रहे,
इक दिन माँ न रही, मैं सिसकती रही।
मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

सब कुछ मिला पर माँ न मिली,
माँ की छबि ले मैं दिल में सिहरती रही।
मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

फूल मुरझा के इक दिन जमीं पर गिरा,
मेरी साँसों की घड़ियाँ दफ़न हो रहीं।
मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

जीवन का नियम यूँ ही चलता रहे,
ममता खोती रही और मिलती रही।
मेरी साँसों की घड़ियाँ बिखरती रहीं॥

कैसे करें उल्लास

कैसे करें उल्लास जब हर सांस बंदी है यहाँ?
कैसे रचे इतिहास जब आकाश बंदी है यहाँ?

अंकुर अभी पनपा ही था कि नष्ट तुमने कर दिया,
कैसे लेंगे जन्म जब गर्भांश बंदी यहाँ?
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बंदी है यहाँ?

सपने भी जब देखे हमने उनपे भी पहरे लगे,
कैसे पूरे होंगे जब हर ख्वाब बंदी है यहाँ?
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बंदी है यहाँ?

सदियों से ऋतु बदली नहीं,अपनी तो इक बरसात है,
कैसे करें त्योहार जब मधुमास बंदी है यहाँ?
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बंदी है यहाँ?

त्याग की कीमत न समझी, त्याग जो हमने किए,
छीन लीन्हीं धड़कनें, पर लाश बंदी है यहाँ।
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बंदी है यहाँ?

कुछ कहने को जब खोले लब,खामोश उनको कर दिया,
कैसे करें अभिव्यक्त जब हर भाव बंदी है यहाँ?
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बंदी है यहाँ?

खून की वेदी रचाकर तन को भी दफ़ना दिया,
कैसे जियें, कैसे मरें अहसास बंदी है यहाँ?
कैसे करें उल्लास जब हर सांस बंदी है यहाँ?

मुझको हरित बनाओ अब

यह धरती अकुला रही,हमें तुम्हें बुला रही,
मुझको हरित बनाओ अब, पुकार यह लगा रही।

लगाओ पेड़-पौधे तुम, प्रदूषण को भगाओ तुम
पाओगे ताजी हवा, रोगों से मुक्ति पाओ तुम,
चेहरा रहे खिला-खिला यही हमें बता रही,
मुझको हरित बनाओ अब, पुकार यह लगा रही॥

जिसनें दिया तुम्हें जन्म है,उसको न यूँ सताओ तुम,
जन्मने का हक़ उसे भी दो,यूँ भ्रूण न मिटाओ तुम,
सृष्टि चलेगी उससे ही, बस बात यह बता रही।
मुझको हरित बनाओ अब, पुकार यह लगा रही॥

मुझ पर बनाते घर-मकां, मुझ पर बनाते हो महल,
मुझ पर उगाते अन्न-फल, मुझे रौंदते हो हर पहर,
मुझमें मिलोगे अंत में, बस बात यह समझा रही।
मुझको हरित बनाओ अब, पुकार यह लगा रही॥

सदियों से रुदन कर रही, न सिसकियां तुमने सुनी,
जर्जर हुई हर साँस है, टूटेगी जाने किस घड़ी,
चेतावनी यह समझो प्रलय की घड़ी आ रही।
मुझको हरित बनाओ अब, पुकार यह लगा रही ॥

इतना सताओ न मुझे दुनिया में क़हर ढ़ाऊं मैं,
अपनी नहीं चिन्ता मुझे कैसे तुम्हें बचाऊं मैं ,
इंसान ही के वास्ते, मैं खुद को थी मिटा रही।
मुझको हरित बनाओ अब, पुकार यह लगा रही॥

मुझ पर बढ़ा जो भार है,उसको जरा घटाओ तुम,
आतंक को तुम रोक दो, यूँ रक्त न बहाओ तुम,
खुशहाल हों सबही यहाँ ,मैं मन्नतें मना रही।
मुझको हरित बनाओ अब, पुकार यह लगा रही॥

प्यार के झरोखे न होते

खुदा ने अगर दिल मिलाए न होते।
तो तुम, तुम न होते, हम, हम न होते॥

न ये हिम पिघलता, न नदियाँ ये बहतीं,
न नदियाँ मचलती, न सागर में मिलतीं,
सागर की बाहों में गर समाए न होते ।
तो तुम, तुम न होते, हम, हम न होते॥

न सागर यह तपता, न बादल ये बनते,
न बादल पिघलते, न जल-कण बरसते,
जल-कण धरा में गर समाए न होते ।
तो तुम, तुम न होते, हम, हम न होते॥

न ऋतुएँ बदलती, न ये फूल खिलते,
न तितली बहकती, न भौंरे मचलते,
अगर प्यार के ये झरोखे न होते ।
तो तुम, तुम न होते, हम, हम न होते॥

खुदा ने अगर दिल मिलाए न होते।
तो तुम, तुम न होते, हम, हम न होते॥

वे हिमालय से भी बड़े 

यूँ तो प्रहरी से खड़े हैं ये हिमालय हैं बड़े।
जो देश की रक्षा में अर्पित, वे हिमालय से भी बड़े॥

शब्द गा सकते नहीं,तेरे जीवन की कहानी,
देश के हित झोंक दी है, तूने पूरी ज़िन्दगानी,
देश का जन-जन ऋणी है, छाँव में जो तेरी पले।
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े॥

तुझसे ही तो यहाँ की हर कली मुस्कायेगी,
तेरे बिन तो यहाँ की हर गली सो जायेगी,
तुम नहीं तो हम नहीं, तुम हर दुआओं से बड़े।
जो देश की रक्षा में अर्पित, वे हिमालय से भी बड़े॥

जल-थल-नभ में तेरा रुतबा, अरु तेरी ही शान है,
तुझसे अपनी आबरू है, अरु तुम्हीं से आन है,
तुम समन्दर अरु धरा, आकाश से भी तुम बड़े।
जो देश की रक्षा में अर्पित वे हिमालय से भी बड़े॥

यूँ तो प्यारा झंडा हमारा,झुकता नहीं है यह कभी,
पर तेरे सम्मान में झुक जाता है यह हर कहीं,
करते नमन, शत-शत नमन, हर साँस में तू ही चले।
जो देश की रक्षा में अर्पित, वे हिमालय से भी बड़े॥

भूल हम पाते नहीं

याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं।
लम्हा-लम्हा जीते हैं,साहिल को हम पाते नहीं॥

टूट न जाए कहीं यह सांसों का है सिलसिला ।
लड रहे हैं ज़िन्दगी से मर भी हम पाते नहीं..
याद करते हैं तुम्हे,बस भूल हम पाते नहीं॥

मन मेरा बोझिल तमन्नाओं की ख्वाहिश में यहां
दिल को समझाया बहुत,बस भूल हम पाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥

राहों में तुम जब मिले दिल में मेरे कुछ-कुछ हुआ।
जाने क्या हो जाता है,हम बात कर पाते नहीं..
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥

ज़िन्दगी जी लेंगे यूं ही तेरी चाहत के सहारे।
प्यार के कुछ पल तुम्हारे,भूल हम पाते नहीं….
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥

तुम मिलो या न मिलो,तेरी याद मेरे दिल में है ।
दिल मेरा बेचैन है क्यों आके बहलाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥

तेरी आंखों में भी हमने प्यार का समन्दर।
कौन सा वो राज़ है जो हमको बतलाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हे,बस भूल हम पाते नहीं॥

क्या करें?कैसे करें?तेरे प्यार से शिकवा सनम।
दिल ने है सोचा बहुत पर कुछ भी कह पाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥

तुमको चाहा,तुमको पूजा,क्या खता हमसे हुई?
ऐसा मेरा प्यार है,भगवान भी पाते नहीं…
याद करते हैं तुम्हें,बस भूल हम पाते नहीं॥

कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है

कि नारी सदा ही सताई गई है,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

कभी अपनों के खातिर बलिदान देती,
कभी उसकी बलि चढाई गई है….,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

कभी प्यार से सबने लूटा है उसको,
कभी मारकर वो जलाई गई है…,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

कभी खुद ही जौहर दिखाती रही है,
कभी उससे जौहर कराई गई है…..,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

कभी जन्मदाता ने बेंचा है उसको,
कभी सन्यासिनी वो बनाई गई है..,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

समूहों में मिल कर नोंचा-घसीटा,
फिर सडकों में निर्वस्त्र घुमाई गई है…,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

कि ले करके पैसे बने तुम हमारे,
फिर दासी वो कैसे बनाई गई है…,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

ये किस्से-कहानी की बातें नही हैं,
कि कोठे पे ज़बरन बिठाई गई है…,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

ज़रा सोच लो जुल्म करने से पहले,
तुम्हारी ही संगिनी क्यों बनाई गई है..,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

बने जिसलिए हम,न अधिकार पाया,
फिर क्यों-कर यह रचना रचाई गई है..,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

कभी जी के देखो हमारी जगह पर,
कि कितना वो सूली पे चढाई गई है?
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

कि कैसे चलेगा यह संसार सारा?
गर तुम्हीं से यह दुनिया चलाई गई है..,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

कि कैसे जिएं दर्द सह करके इतना?,
हुआ न खुदा, न खुदाई हुई है…,
कभी खुद मिटी है, मिटाई गई है।

प्रेम जिजीविषा का विकास है

प्रेम दिल की पुकार है
हृदय का विस्तार है
स्वप्निल संसार है
रस की फ़ुहार है
तन-मन झूम जाता है
गीत बन जाता है|

प्रेम जिजीविषा का विकास है
जीवन का प्रकाश है
अधरों का उल्लास है
रागात्मकता का विलास है
मन-मयूर नाच उठता है
गीत बन निखरता है|

प्रेम मन का विश्वास है
जीवन की मिठास है
तीखी तकरार है
मीठी मनुहार है
रोम-रोम लहलहाता है
गीत बन जाता है|

शूल कहीं चुभता है
मर्म चीख उठता है
मीत याद आता है
दर्द और भी बढ जाता है
अन्तस गुनगुनाता है
गीत बुन जाता है|

बसन्त रितु का प्रसार
नवयौवना का विरह श्रुंगार
प्रिय का इन्तज़ार
विरहणी की अश्रुधार
दर्द छलक जाता है
गीत बन-संवर जाता है|

क्या खोया क्या पाया

नगरों में औद्यॊगिक बस्तियां हंस रही हैं,
किन्तु चरित्र की दुल्हन आहें भर रही है।
विज्ञान की दीवार ऊंची उठ रही है,
धर्म की दीवार नीचे धंस रही है॥

सुविधाओं का चांद मुस्कुरा रहा है,
संयम का सूरज ढ़ल रहा है।
बुद्धि की प्रखरता प्रगति पथ पर अग्रसर है,
किन्तु हृदय की सुकुमारिता,म्रिग-मरीचका में भटकने लगा है॥

रंग रोगन जर्जर काष्ठ का काया कल्प करने लगा है,
बुरादा चाय के सांचे में ढ़लने लगा है।
सादगी फिसलने लगी है,फैशन संभलने लगा है,
स्वार्थ जमने लगा है,परमार्थ लड़खड़ाने लगा है॥

असलियत रोने लगी है, बनावट हंसने लगी है,
कृतज्ञता कुम्हलाने लगी है,कृतघ्नता लहलहाने लगी है।
स्नेह सिमटनें लगा है, वैमनस्य बढ़ने लगा है,
विश्वास उखड़ने लगा है,संदेह जमने लगा है॥

साहित्यिक उपवन में विधाओं की कोपलें फूटने लगी हैं,
किन्तु भावपक्ष का निर्झर सूखने लगा है ।
साहित्यिक कृतियों में वासना बसने लगी है,
आदर्श का दम घुटने लगा है॥

बांध बांधे गये,सड़कों,रेलवे लाईनों के जाल बिछाये गये,
वायुयान उड़ाये गये,शान्ति फिर भी न मिल सकी ,
वह न जाने कहां हवा हो गई?
सुविधाएं तो जरूर मिली , पर दुविधाएं तो हल न हो सकी॥

अर्थवाद की मीनार ऊंची उठी,
किन्तु नैतिकता की भित्तियां लरजने लगी ।
कारखानों की धुंआ उगलने वाली चिमनियां,
मानव हृदय को कालिमा से ढ़कने लगी ॥

वचन बद्धता से नाता टूट गया,
वचन भंगता मान्यता पाने लगी।
जनमानस के मदिरालय में,
भौतिकवादी सुरा छलकने लगी॥

आध्यात्मवाद का चमचमाता चषक
चूर-चूर हो गया है ।
वसुधैव कुटुम्बकम के गीत गानेवाले हम,
प्रान्तीयता के जाल में उलझे हुए हैं ॥

दया,क्षमा,त्याग,पर-दु:ख कातरता छोड़,
क्रूरता, पर-पीड़ा और स्वार्थ को गले लगाया है।
अब स्वयं निर्णय करो स्वतंत्र भारत ने ,
क्या खोया? क्या पाया है?क्या यही हमारा सपना था??

 

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