रमेश ऋतंभर की रचनाएँ

एक उत्तर आधुनिक समाज की कथा

एक आदमी सुबह से शाम तक खेत जोतता है
एक आदमी सुबह से शाम तक फावड़ा चलाता है
एक आदमी सुबह से शाम तक बोझ ढोता है
एक आदमी सुबह से शाम तक जूता सिलता है
तब भी उसे दो वक़्त की रोटी नसीब नहीं होती
वही एक आदमी खाली झूठ बोलता है
एक आदमी खाली बेईमानी करता है
एक आदमी खाली दलाली करता है
एक आदमी खाली आदर्श बघारता है
तो वह चारों वक़्त ख़ूब घी-मलीदा उड़ाता है
प्रिय पाठको! यह किसी आदिम-समाज की कथा नहीं
एक उत्तर-आधुनिक सभ्य समाज की कथा है,
जिसके पात्र, घटना और परिस्थितियाँ
सबके सब वास्तविक हैं
और जिनका कल्पना से कोई भी सम्बन्ध नहीं।

शीशे का शहर

आजकल मेरे शहर का मिजाज
कुछ अच्छा नहीं दिखता
मेरे शहर में
अन्धेरे की साजिशें
रोज-ब-रोज बढ़ती ही जा रही हैं
और उजाले की कोशिशें
निरंतर नाकाम होती जा रही हैं
मुझे
शहर के मिज़ाज के बिगड़ने का अन्देशा
उसी दिन से हो गया था
जिस दिन से शहर के तमाम पत्थर
किसी के दास हो गये
जब से पत्थरों ने दासत्व स्वीकारा है…
तब से शीशे के घरों के लिए ख़तरा बढ़ गया है
और यह ख़तरा तब और ही बढ़ जाता है…
जब सारा का सारा शहर शीशे का बना हो।
भला, शीशे का शहर
कब तक अपने-आप को पत्थरों से बचा पायेगा…
मेरा शहर भी तो शीशे का शहर है
और जब कोई मेरे शहर पर पत्थर फेंकता है
तो वह टूट-टूट कर अनगिन किरचों में बिखर जाता है।

मैं अपने शहर के टूट कर बिखरे हुए उन्हीं किरचों को
अपने हाथों से चुनता हूँ
क्योंकि मैं अपने शहर को कभी टूट कर बिखरा हुआ
नहीं देख सकता।

मेरे टूटे शहर को देख कर हँसने वालो!
यह शहर तो कल फिर बन-संवर जायेगा
लेकिन मैं उस दिन से डरता हूँ
जब कोई पत्थर तुम्हारा भी शहर तोड़ेगा
तब तुम रोने के सिवा कुछ भी नहीं कर पाओगे
क्योंकि टूटे शीशे को चुनना तो
तुमने कभी सीखा ही नहीं!

रेत का कथ्य

रेत,
रेत के विस्तार की मृगतृष्णा मत पालो
रेत, हमेशा रेत ही होती है…
उसमें कोई सभ्यता पनप नहीं सकती
उसकी रचना-प्रक्रिया को भरसक टालो
मरुस्थल
साक्षी है उस सत्य का
जो सभ्यताओं के मलबे से उपजता है।
एक पेड़
जो अपनी छाया और हरेपन को विस्तार
देने के क्रम में बरसों जूझता है
और रेत
उसे पल-भर में निगल लेती है
पर वह यह भूल जाती है कि
हरेपन से ही सभ्यताएँ जिन्दा रहती हैं।
जब सभ्यताओं पर रेत के इरादे
हावी होने लगते हैं
तब उनका अस्तित्व खतरे में दिखाई देता है
तब रेत के विस्तार का भय उन्हें सालता है
और जब हरेपन की सभ्यता कि कब्र पर
रेतों की रचना शुरु होती है
तब कहीं जाकर एक रेगिस्तान
अस्तित्व में आता है।
ओ नीति-निर्माणको
तुम कभी भी
रेत को अनदेखा मत करो
कम से कम
उससे यह तो सीख मिलती ही है कि
हरेपन से सम्बध कभी तोड़ा नहीं जा सकता।
तुम
रेत के कथ्य पर पर्दा मत डालो
उसे कहने दो
उसे उड़कर आँखों में पड़ने दो
ताकि तुम्हें यह आभास हो सके कि
हरेपन और छाया का जीवन में कितना महत्त्व है
और फिर कल
तुम हरेपन की सभ्यता को समाधिस्थ
करने की सोच न सको।

सारी नश्वरता के बीच 

एक दिन
सब कुछ ख़ाक में मिल जायेगा
कुछ भी शेष नहीं रहेगा
यह रुप
यह सौंदर्य
यह देह
यह दुनिया
कुछ भी नहीं
हाँ, कुछ भी नहीं।
पर फिर भी
सारी नश्वरता के बीच
एक ‘शब्द’ बच रहेगा
समूचे ब्रह्मांड में भटकता कहीं
जो भटकते-भटकते पहुँच जायेगा
एक दिन
किसी कवि के पास
अपने सही ठिकाने पर
भाव की
एक भरी-पूरी दुनिया बनाने के लिए
सब कुछ ख़त्म होने के बाद भी।

ईश्वर को याद करता एक बूढ़ा

पिता काली चट्टान थे
जो विपत्तियों में भी नहीं टूटे थे कभी
जो हमे चिन्तित देख कह उठते थे
बेटा! जब तक मैं जिन्दा हूँ,
तुम्हारी ख़ुशी के लिए
अपनी देह की सारी हड्डियाँ गला दूँगा
तुम आश्वस्त रहना
लेकिन बहनों के हाथ पीले करते-करते
वह जगह-जगह से दरक गये
और उनके भीतर फूट आयीं सहसा
ढेर-सारी झुर्रियाँ
जो एक पूरी उम्र गुजार देने के बाद भी
नहीं फूटी थी उनमें।
पिता काले खरगोश थे
जिनके अन्दर हमेशा ठाठे मारा करता था
एक हँसता-खेलता बच्चा
जो उदासी के दिनों में बदल जाता था
ईश्वर को याद करते हुए
एक भोले-भाले बूढ़े में
जो अपने दुःख भरे दिनों को
यह कहते हुए गुजार देता-
‘प्रभु तेरी माया, कहीं धूप, कहीं छाया।’

अवज्ञा

अवज्ञा से ही शुरू होता है ज्ञान का पहला पाठ
हमारे आदिम पुरखे आदम और हव्वा ने
यदि अवज्ञा कर चखा न होता ज्ञान का सेव
और हुए न होते स्वर्ग से निर्वासित
तो हमारी ज्ञान की यात्रा शुरू ही नहीं हो पाती
और हम तब रच नहीं पाते इस दुनिया का इतना संरजाम।
यदि आदि शिशु ने अवज्ञा कर
नहीं जलाये होते आग में अपने कोमल हाथ
तो आग का धर्म क्या है
यह हम कभी नहीं जान पाते
यदि कोलम्बस ने परम्परित मान्यताओं की अवज्ञा कर
शुरू नहीं करता समुद्री यात्राओं का अनवरत सिलसिला
तो इस दुनिया का नक़्शा
इतना सुन्दर और प्यारा नहीं होता।
यदि जङ शास्त्र की अवज्ञा कर
ब्रूनो ने नहीं किया होता अग्नि-मृत्यु का वरण
सुकरात ने नहीं पिया होता जहर
गाँधी ने नहीं खाई होती लाठियाँ व गोलियाँ
तो हम अभी तक पङे होते
अज्ञान और गुलामी के अन्धे युग में।
यदि भीषण कष्ट से घबराकर
तुम कभी भी नहीं करोगे अवज्ञा
बने रहोगे हमेशा लकीर का फकीर
तो तुम कभी भी नहीं हो पाओगे ज्ञानवान
और न कभी कहला ही पाओगे
आदम-हव्वा कि असली सन्तान।

कहाँ से लाऊँ लोहे की आत्मा?

एक छोटी-सी गलती पर
मेरा कलेजा कांपता है
एक छोटे-से झूठ पर
मेरी ज़ुबान लङखङाती है
एक छोटी-सी चोरी पर
मेरा हाथ थरथराता है
एक छोटे-से छल पर
मेरा दिमाग़ गङबङा जाता है
कैसे कुछ लोग
बङा-सा झूठ
बङी-सी चोरी
बङा-सा छल कर लेते हैं
और विचलित नहीं होते
क्या उनका कलेजा पत्थर का है
या आत्मा लोहे की?
अब मैं कहाँ से लाऊँ लोहे की आत्मा
और कैसे बनाऊँ पत्थर का कलेजा?

हर बार

हर बार क़सम खाता हूँ
कि अगली बार किसी के बीच में नहीं बोलूंगा
लेकिन किसी को ग़लत बात करते सुन
चुप नहीं रह पाता

हर बार क़सम खाता हूँ
कि अपने काम से काम रखूंगा
लेकिन कुछ उल्टा-सीधा होता देख
हस्तक्षेप कर बैठता हूँ

हर बार क़सम खाता हूँ
कि चुपचाप सिर झुकाए अपने रास्ते पर जाऊंगा
लेकिन लोगों को झगङा-फसाद करते देख
अपने को रोक नहीं पाता

हर बार क़सम खाता हूँ
कि किसी की मदद नहीं करूंगा
लेकिन किसी को बहुत मजबूर देख
आगे हाथ बढ़ा देता हूँ

हर बार क़सम खाता हूँ
और वह हर बार टूट जाता है। S

अपने शहर पर

अपने शहर पर कभी-कभी बहुत गुस्सा आता है
जहाँ हर कोई हर किसी के बारे में बेमतलब जानकारी रखता है
हर तीसरा व्यक्ति रोक कर पूछता है
कि आजकल क्या कर रहे हो?
(जबकि उसे सामने वाले से कोई सहानुभूति नहीं होती)
हर किसी के पास बहुत सारा खाली समय होता है
और हर कोई हर-दूसरे की प्रगति से जलता है
अपने शहर पर कभी-कभी बहुत गुस्सा आता है
हर कोई हर किसी में अनावश्यक दिलचस्पी लेता है
हर कोई हर किसी के खाने-पहनने को लेकर सवाल करता है
हर किसी की बात सुनते-सुनते आदमी का कान पक जाता है
‘और लोग क्या कहेंगे’ में ही
हर किसी का जीना मुहाल हो जाता है
सचमुच
अपने शहर पर कभी-कभी बहुत गुस्सा आता है
कभी-कभी बहुत।

एक पिछङा हुआ आदमी

कभी वह किसी अन्धे को सङक पार कराने में लग गया
कभी वह किसी बीमार की तीमारदारी में जुट गया
कभी वह किसी झगडे के निपटारे में फंसा रह गया
कभी वह किसी मुहल्ले में लगी आग बुझाने में रह गया
कभी वह अपने हक-हकूक की लङाई लङ रहे लोगों के जुलूस में शामिल हो गया…
और अन्ततः दुनिया के घुङदौङ में वह पिछङता चला गया…
मानव-सभ्यता के इतिहास में दोस्तों
वही पिछङा हुआ आदमी कहलाया।

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