रमेश तन्हा की रचनाएँ

इक चमकते हुए अहसास की जौदत हूँ मैं

इक चमकते हुए अहसास की जौदत हूँ मैं
देख ले जो पसे-पर्दा वो बसीरत हूँ मैं।

ऐ नये दौर मैं तू हूँ, तिरी जिद्दत हूँ मैं
बरहमी देख मिरी तेरी इलामत हूँ मैं।

क्या खरीदोगे मुझे फहमो-फिरासत हूँ मैं
खर्च करने से बढ़े और जो, दौलत हूँ मैं।

ख़ाक और खून की दिलबर सी शरारत हूँ मैं
हासिले-अर्ज़ो-समा, लम्स की लज़्ज़त हूँ मैं।

इक शफ़क़-रंग शिगूफा हूँ मैं शव के रुख़ पर
इक नई सुबहे-द्रखशां की बसीरत हूँ मैं।

मिट गई हो के जो मेहराबे-हवा पर तहरीर
बर्क़-रफ्तार किसी सोच की सुरअत हूँ मैं।

मेरा नज़्जारा है ज़रख़ेज़ ज़मीनों का सवाब
आप ही जिन्स हूँ और आप ही क़ीमत हूँ मैं।

मेरी तज़ईन किसी शय से कहां मुमकिन है
जिस में चुप तक भी खनक जाये वो उज़लत हूँ मैं।

कोई तो आके मुझर छेड़े, मुझे झंझोड़े
किसी वीरान जज़ीरे की फरागत हूँ मैं।

मुझ में किरदारे-जमां लम्हा-ब-लम्हा बेदार
वरना लम्हों की अबद तक की मुसाफत हूँ मैं।

कोई भी शय मुझे बेदार नहीं कर सकती
एक उजले हुए किरदार की गफलत हूँ मैं।

कत्ल करता हूँ मैं औरों के भरम में खुद को
अपनी ही जान पे खुद आप ही आफ़त हूँ मैं।

मेरा पत्थर का जिगर है तो बदन लोहे का
मुझ से टक्कर न कोई ले कि सलाबत हूँ मैं।

मुझे भूले से भी ‘तन्हा’ कहीं छू मत लेना
इक दहकते हुए अहसास की हिद्दत हूँ मैं।

यूँ तो इक ज़माने से, बे-रफ़ीक़ो तन्हा हूँ

यूँ तो इक ज़माने से, बे- रकीफो-तन्हा हूँ
विर्दे-हर-ज़बां हूँ मैं, शहर भर का चर्चा हूँ।

मुझ से मिल के हर कोई, सर पकड़ के रह जाये
जो कहीं नहीं जाता, मैं वो बंद रस्ता हूँ।

आइना मगर ऐसा कुछ भी तो नहीं कहता
लोग मुझ से कहते हैं मैं भी एक चेहरा हूँ।

खींचते हो हर जानिब किस लिए लकीरें सी
मैं न कोई रावण हूँ मैं न कोई सीता हूँ।

भाग कर कहां जाऊं किस जगह अमां पाऊं
पत्थरों की बस्ती में मैं ही एक शीशा हूँ।

सिरफिरी हवाएं अब, छेड़ छेड़ जाती हैं
जो शजर को छोड़ आया, मैं वो ज़र्द पत्ता हूँ

मज़हरे-रऊनत हूँ, लेकिन इस से क्या हासिल
मैं हुजूमे-तिफलां में, सांप का तमाशा हूँ।

देखना अगर चाहो खुद को देख लो मुझ से
मैं मिजाज़े-दौरां का ,आइना सरापा हूँ।

तिश्ना-ए-समाअत हूँ, दश्त में सदाओं के
बात को तरसता हूँ, गुंग हूँ न बहरा हूँ।

देख लो अभी मुझको फिर न देख पाओगे
मैं हवा के नर्गे में, एक अब्र-पारा हूँ।

इक अबोध बालक के हाथ पड़ गया हूँ मैं
मैं भी ज़ात पर उनकी तंज़ करता रहता हूँ।

लोग ख्वाह कुछ बोलें, कोई नाम दें मुझको
मैं रमेश तन्हा था मैं रमेश तन्हा हूँ।

बाहर ख़ला है, ज़ात के अंदर भी कुछ नहीं

बाहर ख़ला है, ज़ात के अंदर भी कुछ नहीं
देखो तो डर बहुत है मगर डर भी कुछ नहीं।

फूलों की सेज कुछ नहीं, बिस्तर भी कुछ नहीं
ग़म-कुश्ता आदमी के लिए घर भी कुछ नहीं।

बूढ़े शजर उखड़ गये इस में मलाल क्या
पागल हवा चलेगी तो पत्थर भी कुछ नहीं।

आतिश-मिजाज़ लोग भी कहते सुने गये
सूरज वहम है, मह-ओ-अख़्तर भी कुछ नहीं।

आईना-वार, खुश हैं बहुत बे लिबासियां
जैसे कि नंगो-नाम की चादर भी कुछ नहीं।

ये क्या कि मौसमे-सितम-ईजाद के लिए
बर्गो-समर भी हेच गुले-तर भी कुछ नहीं।

जो गुम-रही की आंख से देखा तो यूँ लगा
फहमो-ज़का-ओ-शौक़ के दफ़्तर भी कुछ नहीं।

मुझको हक़ीर कहने से पहले ये सोच ले
क़तरा जो कुछ नहीं, तो समंदर भी कुछ नहीं।

आवारगाने-शौक़ के आगे हवा तो क्या
महशर-क़दम हवाओं के लश्कर भी कुछ नहीं।

फिक़्रो-सुख़न में खून जला कर पता चला
सौदा भी एक वहम है और सर भी कुछ नहीं।

सादिक़ निगाह के लिए हर शय में लुत्फ है
वरना निशातो-कैफ़ के मंज़र भी कुछ नहीं।

तर्के-तलब भी सोचिये ‘तन्हा’ तो ठीक है
लेकिन फिर अपने शौक़ से बेहतर भी कुछ नहीं।

नागहां ऐसा भी क्या हो गया बेज़ा मुझ से 

नागहां ऐसा भी क्या हो गया बेज़ा मुझ से
शहर का शहूर ही फिरता है खफ़ा सा मुझ से।

कब समझता है मिरे कर्ब को आइना भी
कब बताता है कि है क्या मिरा रिश्ता मुझ से।

अब तो साये से भी मेरे है सरासर बेज़ार
कर चुका, कतअ-तअल्लुक वो कभी का मुझ से।

उसके पत्थर का जो चाहूँ, तो दूँ पत्थर से जवाब
मेरी मुश्किल कि यही तो नहीं होता मुझ से।

उस ने नाहक़ ही मुझर शहर में बदनाम किया
उसे शिकवा था अगर आ के तो कहता मुझ से।

राज़दारी का तकल्लुफ तो निभाया होता
कुछ भी कह लेता मगर यूँ तो न करता मुझ से।

पहले कब धूप ने यूँ साथ मिरा छोड़ा था
पहले कब यूँ था गुरेज़ा मिरा साया मुझ से।

मैं, कि हालात की तहरीर को पढ़ ही न सका
किस क़दर करता रहा वक़्त तक़ाज़ा मुझ से।

कैसे बतलाऊँ कि क्या कुछ नहीं गुज़री मुझ पर
वक़्त के हाथ ने क्या कुछ नहीं छीना मुझ से।

मेरी आवारा-मिज़ाजी ने मगर इक न सुनी
पूछता रह गया घर का पता रस्ता मुझ से।

मेरी उल्फ़त ने उसे कर दिया बे-दस्तो-पा
वो कि रखता था अदावत का इरादा मुझ से।

सामने आ के भी अब ऐसे गुज़र जाता है
जैसे उसका न कभी था कोई रिश्ता मुझ से।

और तन्हाई से क्या मिलता ब-जज़ खोफ़ा-हिरास
पहरों रोता रहा मिल कर मेरा कमरा मुझ से।

आश्ना मेरी हक़ीक़त से जो होना चाहो
बे-इरादा कभी आकर मिलो ‘तन्हा’ मुझ से।

उट्ठा है जो तूफ़ान, ज़रा थम भी तो जाये 

उट्ठा है जो तूफ़ान, ज़रा थम भी तो जाये
कुछ देर को ये कर्ब का मौसम भी तो जाये।

खुशियां हैं सराबों की तरह दश्ते-बला में
उन तक भी मगर सिलसिलह-ए-ग़म भी तो जाये।

फिर कर्बे-अना से मची अहसास में हलचल
बे-चारगी-ए-दीदा-ए-पुरनम भी तो जाये।

ऐजाज़े-हुनर को भी नवा पहुंचेगी, बे शक
हमराह मगर राग की सरगम भी तो जाये।

मुमकिन है कि घूमे फिरे तन्हाई भी शब में
खूं ऐसे में रग रग में मगर जम भी तो जाये।

दहशत जो थी माहौल में कम हो तो गयी है
ज़हनों से मगर दहशते-कम कम भी तो जाये।

सब रास्त ही चलते हैं मगर राह में चलते
नागाह जो आ जाये है वो खम भी तो जाये।

बे-सम्त तगो-ताज़ को हो सम्त भी हासिल
आवारा हवाओं का मगर बल भी तो जाये

हर छोटा बड़ा काम समंदर नहीं करते
गुंचो का वज़ू करने को शबनम भी तो जाये

शायद तेरा किरदार मिसाली भी हो ‘तन्हा’
आकाश में ऊंचा तिरा परचम भी तो जाये।

चांद भी ज़र्द-रू हुआ, तारों में भी ज़िया नहीं 

चांद भी ज़र्द-रू हुआ, तारों में भी ज़िया नहीं
मैं हूँ कि दूर दूर तक, मेरा भी कुछ पता नहीं।

चल गयी जाने क्या हवा, बोलता घर खण्डर हुआ
रौज़नों-दर हैं रू-सियाह तक में भी दिया नहीं।

टेढ़ी सी है मिरी डगर चलना है मुझको रात भर
उस पे भी मेरा हमसफ़र कोई मिरे सिवा नहीं।

इम्तिहां है क़दम क़दम आदमी की हयात भी
कौन है ऐसा अपने ही, साये से जो डरा नहीं।

ज़ब्त ने बन्द कर दिये शौक़ के सारे रास्ते
यानी वो दर्द मिल गये जिनकी कोई दवा नहीं।

बाग़ में तितलियाँ के पर, लगते हैं खुशनुमा मगर
मचले है उन पे क्यों नज़र कोई ये जानता नहीं।

मेरी उड़ान का फुसूं काग़ज़े-फ़न पे गौना गूं
शायरे-खुश-ख़याल हूँ, ताइरे-खुश-नवा नहीं।

तोहफा-ए-वज्दो-सर-खुशी, हासिले-फिक्रो-आगही
शायरी अज़ पयम्बरी बन्दगी है ख़ुदा नहीं।

सोच की एक जस्त है कल की लगन में मस्त है
हासिले बूदो-हस्त है शायरी और क्या नहीं।

छोड़ के इस दयार को, किज़्ब के ख़ारज़ार को
आओ चलें वहां जहां झूठ नहीं रिया नहीं।

ख़ातिरे-मक़्त-ऐ-ग़ज़ल तन्हा को बे अलिफ़ लिखूं
ऐब निकालें ऐब-जु शिकवा नहीं गिला नहीं।

गायब थी मंज़िलें कहीं रस्ते धुआँ धुआँ 

गायब थी मंज़िलें कहीं रस्ते धुआँ धुआँ
आवारगी लिये फिरी मुझको कहाँ-कहाँ।

बर्गे-गुले-वजूद हूं ख्वाबों के दरमियाँ
या ज़र्रा फैसला हुआ ता-हद्दे-लामकाँ।

हाइल हिजाब लाख हैं दोनों के दरमियाँ
वो मेरा राज़दार हूँ मैं उसका राज़दाँ।

दिन कट गया उमीद की खुश-फ़हमियों के साथ
शब भी गुज़र ही जायेगी ख्वाबों के दरमियाँ।

थी हद्दे-मुमकिनात में तज़सीमे-हर ख़याल
रंगों का इज़्दहाम थे सौ वहम सौ गुमाँ।

जैसा भी हो, यहां से है बेहतर निकल चलें
किस किस का सर बचायेगा ये शहर-बे-अमां।

इक अब्र-पारा दोशे हवा पर है हर खुशी
ग़म मुस्तक़िल ग़ुबार सा जैसे कि आसमां।

ये कौन लोग हैं जो तआकुब में हैं मिरे
मैं ने तो अपने आप को समझा था राएगां।

रिश्तों का कर्ब, सोच की अंगड़ाइयाँ थकन
ले दे के बस यही तो है इंसां की दास्ताँ।

दर-पेश हैं हयात को अब भी वो मसअले
खोली नहीं है वक़्त ने जिन पर अभी ज़बां।

मैं बारे-इल्तिफ़ाते-फरावां न सह सका
वरना तुम्हारे कर्ब में था लुतफ़े-दो-जहाँ।

‘तन्हा’ हिसारे-ज़ात के जिन्दां में हब्स है
फिर क्यों न इसको तोड़ के हो जाओ केकरां।

पहले ख़ुद को आइने जैसा करो

पहले खुद को आइने जैसा करो
आइने में खुद को फिर देखा करो।

हर किसी के भी न हो जाया करो
साथ अपने खुद को भी रक्खा करो।

आइने से रोज़ क्या पूछा करो
अपने अंदर आप ही झांका करो।

ज़िन्दगी क्या है? समझने के लिए
खुद को खो कर खुद ही को ढूंढा करो।

सिर्फ होना ही नहीं है ज़िन्दगी
अपने होने का सबब पैदा करो।

पहले खो जाओ ख़लाओं में कहीं
तारा तारा खुद को फिर ढूंढा करो।

आइनों से दोस्ती अच्छी नहीं
यूँ न खुद को टूट कर चाहा करो।

क्या खबर लग जाये कब किस की नज़र
अपने भी आगे से मत निकला करो

ज़िन्दगी है आप ही अपना जवाज़
ज़िन्दगी क्या है ये यूँ सोचा करो।

मत करो तशहीर अपनी ज़ात की
हो सके तो खुद से भी पर्दा करो।

क्यों न ला-मज़हब दरख़्तों की तरह
सब पर अपने लुत्फ़ का साया करो।

अपना सर तक भी न कांधों पर रहे
इस क़दर भी खुद को मत ‘तन्हा’ करो।

वस्ल क्या चीज़ है जुदाई क्या?

वस्ल क्या चीज़ है जुदाई क्या?
दस्तरस क्या है ना-रसाई क्या?

मेरी खुशियों से दोस्ती क्या है
मेरी ग़म से है आशनाई क्या?

मैं कि ज़िंदाने-जिस्म में क्या हूँ
मेरी इस क़ैद से रिहाई क्या?

चलता पानी तो सिर्फ पानी था
ठहरे पानी पे है ये काई क्या?

अभी खुद ही से मैं नहीं निपटा
मेरी तुम से भला लड़ाई क्या?

दिल जलाना था रौशनी के लिए
शमअ तक भी नहीं जलाई क्या?

जब फ़ना तक ही सब को जाना है
रहनुमा कैसा रह-नुमाई क्या?

रहज़नी जिसकी रहबरी सी लगे
ऐसे दिलबर की दिलरुबाई क्या?

सादा-लौही को उसकी क्या कहिये?
ज़हले-मुतलिक कि परसाई क्या?

जिसने आईना तक नहीं देखा
उसने देखा है मेरे भाई क्या?

ज़ात का कर्ब, आगही का धुआं
बस यही है तिरी ख़ुदाई क्या?

बन के सूरज बिख़र गई ‘तन्हा’
बस यही है तिरी खुदाई क्या?

मिरी ज़िन्दगी दर्द की सान है

मिरी ज़िन्दगी दर्द की सान है
यही मेरी हस्ती का उन्वान है।

चलो खैर माना वो शैतान है
किसी ज़ाविये से तो इंसान है।

ज़मानो-मकां उसकी मुट्ठी में हैं
जो धरती पे दो दिन का मेहमान है।

अंधेरे को शायद खबर ही नहीं
वो क्या रौशनी से परेशान है।

मुझे देख कर आइना चीख उठा
मिरी तरह तू भी तो हैरान है।

अंधेरों की नगरी के वासी हैं हम
हमें ही कहां अपनी पहचान है।

न है धुंध छटने की उम्मीद कुछ
न मौसम बदलने का इमकान है।

वही चार सांसें तअफ़्फुन भरी
यही ज़िन्दगी भर का सामान है।

गरीबों को फुटपाथ अमीरों को घर
बड़े शहर का सब पर एहसान है।

कोई कुछ किसी दूसरे के लिए
करेगा नहीं लेकिन इमकान है।

तुम्हारा अगर साथ मिलता रहा
तो फिर कोई मुश्किल आसान है।

तुझे मेरी हर बात की फ़िक्र है
मुझे तेरी हर बात का ध्यान है।

दो आलम हैं मेरी नज़र का ग़ुबार
मिरा नाम इदराक, इरफान है।

अदावत उसे मुझ से होगी तो हो
वो ‘तन्हा’ मिरे दिल का अरमान है

हमारी राह में ये आ गये शजर कैसे

हमारी राह में ये आ गये शजर कैसे
भटक गये हैं तो पहुंचेंगे अपने घर कैसे।

न हादिसा ही कोई और न मोजज़ा हूँ मैं
मुझे यूँ देख रहा है ये हर बशर कैसे?

ये शहर पिछले बरस किस क़दर चहकता था
इस एक साल ही में हो गया खण्डर कैसे।

मैं जानता हूँ बस इक दो नफ़स हैं साथ मिरे
हवा को मान लूं फिर अपनी हम सफ़र कैसे?

हमारी राह जुदा थी हमारी राह जुदा
हम आ के मिल गये फिर एक मोड़ पर कैसे?

अब अपनी राहें यहां से अलग अलग होंगी
हम एक साथ रहेंगे हयात भर कैसे?

मिरी तरफ से तो ऐसा न कुछ हुआ सर-ज़द
दिलों में बस गया लोगों के फिर ये डर कैसे?

बिगाड़ देते हैं अच्छी भली हरिक सूरत
हमारे अहद के हैं साहिबे-हुनर कैसे?

सुना तो ये था कि सुनता नहीं किसी की वो
तिरे कहे का फिर उस पर हुआ असर कैसे?

वो खुद तो मिलता है आईना बन के सब से मगर
खुद आईने ही से करता है दर-गुज़र कैसे?

तुम आखिर उस से, ख़िलाफ़े-उमीद, उलझ ही पड़े
वही हुआ कि जो होना न था, मगर कैसे?

समय का फेर तो देखो तनावरों को भी
हवा बिखेर रही है इधर उधर कैसे?

तुम्हारे शहर में , सोचो तो क्या नहीं मिलता
तुम ऐसे फिरते हो ‘तन्हा’ ये दर-बदर कैसे?

 

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