रमेश तैलंग की रचनाएँ

महाश्वेता क्या लिखती हैं

महाश्वेवता
गल्प नहीं लिखतीं ।
महाश्वेता रचती हैं
आदिम समाज की करुणा का महासंगीत ।
वृक्षों की,
वनचरों की,
लोक की चिंताओं का अलापती हैं राग ।

महाश्वेवता की अनुभूतियाँ
जब ग्रहण करती हैं आकार
वृक्षों का कंपन,
वनचरों का नर्तन,
लोक का वंदन
सब कुछ समाहित होता चलता है
उनकी रचनाओं में ।

महाश्वेता नहीं बाँचती अपनी प्रशस्तियों
या अपने दुःखों के अतिरंजित अध्याय,
वे घूमती हैं अरण्यों के बीच…
निःशंक,
प्रकाशपुँज की तरह,
जगाती हैं प्रतिरोध की शक्ति
निर्बल, असहाय, आकुल मनों में ।
देती हैं आर्त्तजनों को आश्रय
घोर हताशा के क्षणों में ।

महाश्वेता
अपने समय की सच्चाई को
मिथकों में ढाल कर
जोड़ती हैं स्मृतियों से,

परंपराओं से,
पुराकथाओं से ।

द्रोपदी मझेन,दूलन गंजू,
चण्डी वायेन, श्रीपद लाल,
जटी ठकुराइन
नहीं हैं महाश्वेता की कल्पना के पात्र,
हाड-मांस वाले जीते जागे चरित्र हैं वे
इसी चराचर जगत के ।

महाश्वेता का लिखा,
महाश्वेता का कहा,
महाश्वेता का जिया
हर शब्द…
हर कर्म…
सत्ता के अनाचार से सीधा टकराता है ।
वह लोक-रंजन का नहीं,
लोक-चिंतन का रास्ता दिखाता है ।

ठुमुक-ठुमुक-ठुम मुनवा नाचे

आसमान पर मेघा नाचे
वन में नाचे मोरा ।
ठुमुक-ठुमुक-ठुम मुनुआ नाचे
जैसे नंदकिसोरा ।

हरे पेड़ पर पत्ते नाचें
डाली ऊपर फुलवा ।
टप्पर ऊपर बुंदियां नाचें
अमुवा ऊपर झुलवा ।
दसों दिशा में छननन नाचे
रे, बिजुरी का छोरा ।

चूल्हा चढ़ी बटुलिया नाचे
खंभा चढ़ी गिलहरी ।
इंदरजी का धनुआ नाचे
सतरंगी दोपहरी ।
गैया संग-संग बछड़ा नाचे
नाचे दूध कटोरा ।

ठुमुक-ठुमुक-ठुम मुनुआ नाचे
जैसे नंदकिसोरा ।

माँ जो रूठे

चाँदनी का शहर, तारों की हर गली,
माँ की गोदी में हम घूम आए।
नीला-नीला गगन चूम आए।

पंछियों की तरह पंख अपने न थे,
ऊँचे उड़ने के भी कोई सपने न थे,
माँ का आँचल मिला हमको जबसे मगर
हर जलन, हर तपन भूल आए।

दूसरों के लिए सारा संसार था,
पर हमारे लिए माँ का ही प्यार था,
सारे नाते हमारे थे माँ से जुड़े,
माँ जो रूठे तो जग रूठ जाए।

आशीर्वाद दीजो 

छोटों के नमस्कार लीजो,
नानी!
हमको जी भर आशीर्वाद दीजो ।

आएँगे जब हम ननिहाल में,
पूछेंगे-‘तुम हो किस हाल में?’
अपने सब हाल-चाल दीजो ।
नानी!
हमको जी भर आशीर्वाद दीजो ।

घुटनों का दर्द हुआ कम कितना,
बतलाना, जब हो अपना मिलना,
बातों में नहीं टाल दीजो,
नानी!
हमको जी भर आशीर्वाद दीजो ।

भूल नहीं पाए हैं हम अभी,
नानाजी की वो हा-हा, ही-ही,
एक बार फिर निहाल कीजो,
नानी!
हमको जी भर आशीर्वाद दीजो ।

फूलों का गजरा 

बहना, तेरी चोटी में
फूलों का गजरा ।

फूलों के गजरे ने
घर-भर महकाया,
बतलाना, बतलाना
कौन इसे लाया ?
साँसों में छोड़ गया
ख़ुशबू का लहरा ।

गजरे में फूल खिले
बेला-जुही के,
आँखों में तेरी हैं
आँसू खुशी के,
चेहरे पर बिखरा है
जादू सुनहरा ।

तुझ पर ही नज़रें हैं
छोटे-बड़ों की,
बात हुई बहना,
आज क्या अनोखी ?
क्या इसमें है कोई
राज बड़ा गहरा ?

दीदी की आँखों में 

दीदी लिपस्टिक के नखरे करे ।
छुटकू डोलें मुँह में मिट्टी भरे ।

दीदी को मिली नई फूलदार साड़ी,
छुटकू को मिली तीन पहियों की गाड़ी,
दीदी कमाऊ है, फैशन करे ।
छुटकू डोलें मुँह में मिट्टी भरे ।

दीदी संभालती रहे काला चश्मा,
छुटकू चिल्लाते रहें अम्माँ ! अम्माँ !
दीदी की आंखों में सपने भरे ।
छुटकू डोलें मुँह में मिट्टी भरे ।

दीदी का सैलफ़ोन बजता ही रहता,
कोई है, जो बातें करता ही रहता,
दीदी हँस-हँस कर क्या बातें करे ?
छुटकू के पल्ले न कुछ भी पड़े ।

बस्ते में चिप

बस्ते में चिप लगी हुई है, सबको अता-पता देगी ।
कौन कहाँ क्या गड़बड़ करता है, ये सभी बता
देगी ।

जासूसों की दादी है ये,
वह भी नए ज़माने की,
ख़बर इसे हो जाती है
पल में हर ठौर-ठिकाने की ।
अगर किसी ने ग़लती की तो ये भरपूर सज़ा देगी ।
कौन कहां क्या गड़बड़ करता है, ये सभी बता
देगी ।

छोटी-सी इस चिप का है
कंट्रोल सधू कुछ हाथों में,
इस चिप को न लेना तुम
हँसी-हँसी की बातों में,
ख़तरा होते ही ख़तरे की घंटी कहीं बजा देगी ।
कौन कहाँ क्या गड़बड़ करता है, ये सभी बता
देगी।

चंदोवा तना

पूनम की उजियारी खिली रे जुन्हाई,
सिर पर चंदोवा तना ।
हो जी, सिर पर चंदोवा तना ।

दूधो नहाए जी महले, दुमहले,
काले-कलूटे दिखे सब रुपहले,
जग-मग हुआ आँगना ।
हो जी, सिर पर चंदोवा तना ।

अम्माँ रसोई की करके सफ़ाई,
कोठे पे जा बैठी लेकर चटाई,
बानक ख़ुशी का बना ।
हो जी, सिर पर चंदोवा तना ।

भाग बड़े, खुला आकाश पाया,
माथे पर है पूरे चाँद का साया,
शीतल, सुखदायी घना ।
हो जी, सिर पर चंदोवा तना ।

अम्माँ की रसोई में

हल्दी दहके, धनिया महके,
अम्माँ की रसोई में ।

आन बिराजे हैं पंचायत में
राई और जीरा ।
पता चले न यहाँ किसी को
राजा कौन फकीरा ।
सिंहासन हैं ऊँचे सबके
अम्माँ की रसोई में ।

आटा-बेसन, चकला-बेलन,
घूम रहे हैं बतियाते ।
राग-रसोई बने प्यार से
ही अच्छी, ये समझाते ।
रूखी-सूखी से रस टपके
अम्माँ की रसोई में ।

थाली, कड़छी और कटोरी,
को सूझी है मस्ती।
छेड़ रही है गर्म तवे को
छूर-छूर हँसती-हँसती।
दिखलाती हैं लटके-झटके
अम्माँ की रसोई में।

सुबह का गीत

अले,
छुबह हो गई
आँगन बुहाल लूँ
मम्मी के कमले की तीदें संभाल लूँ।

कपले ये धूल भले,
मैले हं यहाँ पले,
ताय भी बनाना ह,
पानी भी लाना ह,
पप्पू की छट्ट फटी, दो ताँके दाल लूँ।
मम्मी के कमले की तीदें संभाल लूँ।

कलना है दूध गलम,
फिल लाऊँ तोछत नलम,
झट छे इछतोब जला,
ब्लतन फिल एक चढा,
कल के ये पले हुए आलू उबाल लूँ।
मम्मी के कमले की तीदें संभाल लूँ।

आ गया पलाग’ नया,
काम छभी भूल गया,
जल्दी में या कल लूँ,
जल्दी छे अब भग लूँ,
छंपादक दादा के नए हाल-चाल लूँ।
मम्मी के कमले की तीदें संभाल लूँ।

 

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