रम्ज़ अज़ीमाबादी की रचनाएँ

ऐब जो मुझ में हैं मेरे हैं हुनर तेरा है

ऐब जो मुझ में हैं मेरे हैं हुनर तेरा है
मैं मुसाफ़िर हूँ मगर ज़ाद-ए-सफ़र तेरा है

तीशा दे दे मिरे हाथों में तो साबित कर दूँ
सीना-ए-संग में ख़्वाबीदा-शरर तेरा है

तू ये कहता है समुंदर है क़लम-रौ में मिरी
मैं ये कहता हूँ कि मौजों में असर तेरा है

तू ने रौशन किए हर ताक़ पे फ़ुर्क़त के चराग़
जिस में तन्हाइयाँ रहती हैं वो घर तेरा है

संग-रेज़े तो बरसते हैं मिरे आँगन में
जिस का हर फल है रसीला वो शजर तेरा है

मैं तो हूँ संग-ए-हिदायत की तरह इस्तादा
हाँ मगर ज़ाब्ता-ए-राहगुज़र तेरा है

लाख बे-माया हूँ इतना भी तही-दस्त नहीं
मेरी आँखों के सदफ़ में ये गुहर तेरा है

लाख बे-माया हूँ इतना भी तही-दस्त नहीं
मेरी आँखों के सदफ़ में ये गुहर तेरा है

मुझ को तन्हाई से रग़बत तुझे हँगामों से प्यार
ज़ुल्मत-ए-शब है मिरी नूर-ए-सहर तेरा है

डूबते हैं जो सफ़ीने ये ख़ता किस की है
तह-नशीं मौज मिरी है तो भँवर तेरा है

‘रम्ज़’ हर तोहमत-ए-ना-कर्दा से मंसूब सही
ये मगर सोच ले उस में भी ज़रर तेरा है

है समुंदर सामने प्यासे भी हैं पानी भी है

है समुंदर सामने प्यासे भी हैं पानी भी है
तिश्नगी कैसे बुझाएँ ये परेशानी भी है

हम मुसाफ़िर हैं सुलगती धूप जलती राह के
वो तुम्हारा रास्ता है जिस में आसानी भी है

मैं तो दिल से उस की दानाई का क़ाएल हो गया
दोस्तों की सफ़ में है और दुश्मन-ए-जानी भी है

पढ़ न पाओ तुम तो ये किस की ख़ता है दोस्तों
वर्ना चेहरा मुसहफ़-ए-आमाल-ए-इंसानी भी है

ज़िंदगी उनवान जिस क़िस्से की है वो आज भी
मुख़्तसर से मुख़्तसर है और तूलानी भी है

रतजगे जो बाँटता फिरता है सारे शहर में
वो फ़सील-ए-ख़्वाब में बरसों से ज़िंदानी भी है

बे-तहाशा वो तो मिलता है मोहब्बत से मगर
कुछ परेशानी भी है और ख़ंदा-पेशानी भी है

अपना हम-साया है लेकिन फ़ासला बरसों का है
ऐसी क़ुर्बत इतनी दूरी जिस में हैरानी भी है

ज़िंदगी भर हम सराबों की तरफ़ चलते रहे
अब जहाँ थक गिरे हैं उस जगह पानी भी है

‘रम्ज़’ तेरी तीरा-बख़्ती की ये शब कट जाएगी
रात के दामन में कोई चीज़ नूरानी भी है

इस सदी का जब कभी ख़त्म-ए-सफ़र देखेंगे लोग

इस सदी का जब कभी ख़त्म-ए-सफ़र देखेंगे लोग
वक़्त के चेहरे पे ख़ाक-ए-रहगुज़र देखेंगे लोग

तुख़्म-रेज़ी कर रहा हूँ मैं इसी उम्मीद पर
फूलते फलते हुए कल ये शजर देखेंगे लोग

अक़्ल-ए-इंसानी की जिस दिन इंतिहा हो जाएगी
ख़त्म होते चाँद सूरज का सफ़र देखेंगे लोग

काँच की दीवार पत्थर के सुतूँ लोहे की छत
हर जगह हर शहर में ऐसा ही घर देखेंगे लोग

जुरअत-ए-परवाज़ के अंजाम से वाक़िफ़ हूँ मैं
ख़ून में डूबा हुआ ये बाल ओ पर देखेंगेे लोग

क्या इसी दिन के लिए माँगी थी फूलों की दुआ
शबनमी-मौसम में भी रक़्स-ए-शरर देखेंगे लोग

ख़त्म हम पर हैं शब-ए-ज़िंदाँ की सारी सख़्तियाँ
ज़हन ओ दिल आज़ाद होगा वो सहर देखेंगे लोग

अंजुमन को फ़ैज़ पहुँचाएगी शम-ए-अंजुमन
क्या हसीं होती है उम्र मुख़्तसर देखेंगे लोग

जलने का हुनर सिर्फ़ फ़तीले के लिए था 

जलने का हुनर सिर्फ़ फ़तीले के लिए था
रोग़न तो चराग़ों में वसीले के लिए था

संदल का वो गहवारा जो नीलाम हुआ है
इक राज घराने के हटीले के लिए था

अय्याश तबीअत का है आईना इक इक ईंट
ये रंग-महल एक रंगीले के लिए था

कल तक जो हरा पेड़ था क्यूँ सूख गया है
जब धूप का मौसम किसी गीले के लिए था

मस्जिद का खंडर था न वो मंदिर ही का मलबा
जो गाँव में झगड़ा था वो टीले के लिए था

काँटों का तसर्रूफ़ उसे अब किस ने दिया है
ये फूल तो गुलशन में रसीले के लिए था

अब रहता है जिस में बड़े सरकार का कुम्बा
दालान तो घोड़े के तबेले के लिए था

शोहरत की बुलंदी पे मुझे भूल गया है
क्या नाम मिरा ‘रम्ज़’ वसीले के लिए था

तुम पसीना मत कहो है जाँ-फ़िशानी का लिबास

तुम पसीना मत कहो है जाँ-फ़िशानी का लिबास
धूप में चलते हुए रखते हैं पानी का लिबास

पर्दा-पोशी कम से कम होती है हर किरदार की
पैरहन लफ़्ज़ों का बनता है कहानी का लिबास

फिर उजाले से सफ़र होगा अंधेरे की तरफ़
जब उतारेंगे बदन से उम्र-ए-फ़ानी का लिबास

साथ चलते हैं चहकते बोलते इल्ज़ाम भी
बे-शिकन होता नहीं यारो जवानी का लिबास

इंकिलाब-ए-वक़्त का ये भी करिश्मा देखिए
है नुमाइश के लिए अब आँ-जहानी का लिबास

मुफ़लिसी ने कर दिया है उस की ख़ुद्दारी का ख़ून
वो पहनता है किसी की मेहरबानी का लिबास

हुक्मराँ तो दफ़्न हैं तारीख़ के औराक़ में
दर्स-ए-इबरत दे रहा है हुक्मरनी का लिबास

जगमगाता है ग़ज़ल के जिस्म पर हर दौर में
मैला होता ही नहीं जादू-बयानी का लिबास

चंद साअत भी ख़ुशी की अपनी क़िस्मत में कहाँ
रास कब आया है मुझ को शादमानी का लिबास

‘रम्ज़’ वो अहद-ए-गुलामी हो कि दौर-ए-हुर्रियत
इश्तिहार-ए-मुफ़लिसी हिन्दुस्तानी का लिबास

ये ज़िंदगी सज़ा के सिवा और कुछ नहीं

ये ज़िंदगी सज़ा के सिवा और कुछ नहीं
हर साँस बद-दुआ के सिवा और कुछ नहीं

बिखरी हैं रास्तों पे सफ़र की कहानियाँ
दुनिया नुक़ूश-ए-पा के सिवा और कुछ नहीं

बच्चों की लाश चाक-रिदा और बुरीदा-सर
हर शहर कर्बला के सिवा और कुछ नहीं

ज़म्बील ज़िंदगी में बड़ों का दिया हुआ
कुछ सिक्का-ए-दुआ के सिवा और कुछ नहीं

ये तजरबा मिरा है कि इक लम्हा-ए-नशात
मिट्टी भरी ग़िज़ा के सिवा और कुछ नहीं

अक्स और आईना में अगर राब्ता न हो
ये भी ग़लत अना के सिवा और कुछ नहीं

हर शय को उस के अस्ल की तमसील जानिए
कौनैन में ख़ुदा के सिवा और कुछ नहीं

ऐ ‘रम्ज़’ कोई दे दे मुझे ज़हर-ए-बे-हिसी
ये आगही सज़ा के सिवा और कुछ नहीं

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