रविंदर कुमार सोनी की रचनाएँ

सुकूँ से आशना अब तक दिल ए इनसाँ नहीं है 

सुकूँ से आशना अब तक दिल ए इनसाँ नहीं है
कहूँ क्यूँ कर कि अहसास ए ग़म ए दौराँ, नहीं है

भरोसा अपने दस्त ओ पा पे है मुझको अज़ल से
वो मुश्किल कौन सी है मेरी जो आसाँ नहीं है

रबाब ए गुल से नग़में फूट निकले हैं मगर अब
परस्तार ए रिहाई क़ैदी ए ज़िन्दां नहीं है

ख़्याल ए साहिल ए मक़्सूद है दिल में अभी तो
मिरी कश्ती सिपुर्द ए मौज ए तूफाँ नहीं है

हूँ उस से दूर तो भी है वफ़ा का पास दिल में
उसे मैं भूल जाऊँ ये मिरा ईमाँ नहीं है

कहाँ तक आँख से आँसू बहाऊँ मैं लहू के
कहो इक बार फिर इस दर्द का दरमाँ नहीं है

रवि इस ज़िन्दगी में हो मुझे भी चैन हासिल
सिवा इस के मिरे दिल में कोई अरमाँ नहीं है

ये तमाशा नहीं हुआ था कभी

ये तमाशा नहीं हुआ था कभी
है वो अपना, जो दूसरा था कभी

अब वही जानता नहीं मुझको
जिसे अपना मैं जानता था कभी

पास आकर भी क्यूँ है पज़मुर्दा
दूर रह कर जो रो रहा था कभी

वक़्त का हेर फेर है वर्ना
जो पुराना था वो नया था कभी

लग़ज़ीश ए पा ने कर दिया मजबूर
मैं संभलता हुआ चला था कभी

घर के दिवार ओ दर से ही पूछें
कौन आकर यहाँ रहा था कभी

उतर आया हूँ शोर ओ शैवन पर
ख़ामशी से न कुछ बना था कभी

भरता हूँ दम यगान्गी का तिरा
मुझ से बेगाना तू हुआ था कभी

शेएर कहने लगा हूँ मैं भी रवि
मुझ से ऐसा नहीं हुआ था कभी

न पूछ मुझ से ये सारा जहान किस का है

न पूछ मुझ से ये सारा जहान किस का है
ज़मीन किस की है और आसमान किस का है

रह ए हयात में देखो क़दम न रुक जाएं
वो दूर धुन्दला-सा मिटता निशान किस का है

हवा ए तुन्द भी जिस को न कर सकी बरबाद
वो रेगज़ार के दिल में मकान किस का है

भँवर की लहर में क्यूँ अब वो इज़्तराब नहीं
पहुँच गया जो किनारे गुमान किस का है

ये कौन मुझ से मुख़ातिब हुआ पस ए परदा
बताऊँ क्या मिरा दिल पासबान किस का है

उदास क्यूँ हो, रवि आओ पूछ लें दिल से
यक़ीन किस का है उस को गुमान किस का है

अँधेरे के पस ए परदा उजाला खोजता क्यूँ है

अँधेरे के पस ए परदा उजाला खोजता क्यूँ है
जो अन्धा हो गया वो दिन में सूरज ढूँढता क्यूँ है

बताया तो था लैला ने मगर सहरा नहीं समझा
कि मजनूँ रेतीले दर पर सर अपना फोड़ता क्यूँ है

ये रोज़ ओ शब की गरदिश ही अगर है मक़सद ए हस्ती
तो सू ए आसमाँ ऊँची नज़र से देखता क्यूँ है

ये माना हिज्र का ग़म तुझ पे तारी है दिल ए नादाँ
जो आया है वो जाएगा तू नाहक़ सोचता क्यूँ है

सहर होने को है शायद, सितारे हो गए मद्धम
शब ए ग़म जा रही है तू अभी तक ऊँघता क्यूँ है

यक़ीनन कुछ सबब था, तेरी ज़न्जीरें नहीं टूटीं
मगर पा ए शिकस्ता राह से बन्धन तोड़ता क्यूँ है

ये दीवारें मिरे घर की खड़ी खामोश सुनती हैं
मेरे अन्दर छुपा जज़्बा अलम का बोलता क्यूँ है

जो तूफ़ानी हवाओं के मुक़ाबिल हो नहीं सकता
चलो देखें समुन्दर से वो आख़िर खेलता क्यूँ है

ख़ुद को पहचानता नहीं हूँ मैं 

 

ख़ुद को पहचानता नहीं हूँ मैं
तुझ को अपना रहा नहीं हूँ मैं

अपनी ही ज़ात में हूँ खोया हुआ
तुझ से लेकिन जुदा नहीं हूँ मैं

है कमी भी, बुराई भी मुझ में
आदमी हूँ ख़ुदा नहीं हूँ मैं

तेरे होने का है यक़ीं मुझ को
तूने क्या कह दिया नहीं हूँ मैं

क्यूँ उठाते हो बज़्म ए इशरत से
साज़ ए ग़म की सदा नहीं हूँ मैं

दिल को ये कह के क्यूँ न खुश कर लूँ
ग़म से ना आशना नहीं हूँ मैं

मैं हूँ दीदार जू, नकाब उठाओ
देख लो आइना नहीं हूँ मैं

ज़ीस्त की आँख से न जो टपका
क़तरा वो खून का नहीं हूँ मैं

मुद्दा ए मुद्दई मतलब की बात 

मुद्दा ए मुद्दई मतलब की बात
आप ने भी ख़ूब की मतलब की बात

बे ग़रज़ दीवान्गान ए शौक़ हैं
कब कही, किस ने सुनी मतलब की बात

होश में आने नहीं देते मुझे
कह न दूँ मैं भी कोई मतलब की बात

हो गया मायूस आख़िर दिल मिरा
हाए तू ने क्यूँ सुनी मतलब की बात

कहते कहते दास्तान ए दर्द ए दिल
लब पे आ कर रुक गई मतलब की बात

बात अच्छाई की भी सुनते नहीं
जिन को है लगती बुरी मतलब की बात

बुत ख़ुदा हो जाएंगे, उन से अगर
ऐ रवि कह दें कभी मतलब की बात

वो नूर जो ज़ुल्मत से जुदा हो नहीं सकता

वो नूर जो ज़ुल्मत से जुदा हो नहीं सकता
जलते हुए सूरज में कभी खो नहीं सकता

खोया हुआ हूँ अपने ख़यालात में, मुझ को
दुनिया के नज़ारों का फ़सूँ खो नहीं सकता

ईमान की ताईद करेगा कोई काफ़िर
हक़ बात कहेगा वो यक़ीं हो नहीं सकता

पत्थर को ख़ुदा जान के हम पूज रहे हैं
पत्थर तो कभी अपना ख़ुदा हो नहीं सकता

तूफ़ान सिमट जाते पिघल जाते हैं पत्थर
हिम्मत हो जवाँ अपनी तो क्या हो नहीं सकता

मैं गर्द हूँ सहरा ए मुहब्बत की, मुझे भी
बे वक़्त उड़ा देगी हवा हो नहीं सकता

रहमत तो उसी बन्दे पे होती है ख़ुदा की
अश्कों से जो दामान गुनाह धो नहीं सकता

बे ज़ुबानों को बे ज़ुबां कहिये 

बे ज़ुबानों को बे ज़ुबां कहिये
बे ज़ुबानी की दास्ताँ कहिये

रक़स करती हो ज़िन्दगी जिस में
कोई ऐसी भी दास्ताँ कहिये

बज़्म ए शेअर ओ सुख़न में है अब और
आप-सा कौन ख़ुशबयाँ कहिये

ये तो झगड़ा है दो दिलों का, आप
किस को लाएँगे दरमियाँ कहिये

हम को तो एक ही प्याले में
मिल गए जैसे दो जहाँ कहिये

हो गए उन से बे तआलुक़ हम
आप इसे दिल का इम्तिहाँ कहिये

दिल को कहिये जो रहनुमा ए अक़ल
अक़ल को दिल का पासबाँ कहिये

कारवान ए हयात क्यूँ है रवि
सू ए मंज़िल रवाँ दवाँ कहिये

आँसुओं से आशना होता रहा

आँसुओं से आशना होता रहा
दाग़ ए हसरत दिल के मैं धोता रहा

कौन था राह ए वफ़ा में हमसफ़र
पा के मंज़िल का निशाँ खोता रहा

मैं ने क्या चाहा था, मैं अब क्या कहूँ
तुझ को जो मन्ज़ूर था, होता रहा

तुझ को पा लूँगा मगर अपना पता
जुस्तजू में मैं तिरी खोता रहा

और क्या करता, ये बार ए ज़िन्दगी
ना तवाँ काँधों पे मैं ढोता रहा

अहल ए दुनिया की दोरंगी देख कर
मैं कभी हँसता रहा, रोता रहा

ताबिश ए ख़ुर्शीद को देखा किया
रोशनी आँखों की गो खोता रहा

जागती दुनिया बहुत आगे गई
नींद क्यूँ गफ़लत की तू सोता रहा

दामन ए सहरा हो अश्कों ही से तर
तुख़म ए ग़म इस वास्ते बोता रहा

हर चन्द चाहता हूँ कि उनका कहा करूँ

हर चन्द चाहता हूँ कि उनका कहा करूँ
लेकिन ये आरज़ू कि तमाशा किया करूँ

सूरज की रोशनी ने किया दिल को दाग़ दाग़
ली है पनाह तीरगी ए शब में क्या करूँ

हर अश्क ए ख़ून ए दिल के है जी में ये आजकल
ऐसा भी हो कि पलकों से उनकी बहा करूँ

हो यूँ, कि दिन ढले कोई आकर मिरे क़रीब
रूदाद मेरी मुझ से कहे, मैं सुना करूँ

लब पर शिकायत ए ग़म ए दौराँ न आ सकी
मायूसियों ने शर्त लगाई थी, क्या करूँ

बे बाल ओ पर सही ये मगर बे अमल नहीं
मुर्ग़ ए चमन को क़ैद ए क़फ़स से रिहा करूँ

उठ कर दर ए हबीब से दिल में है ये, रवि
जा कर दयार ए ग़ैर में तन्हा रहा करूँ

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