रविन्द्र जैन की रचनाएँ

अँखियों के झरोखों से

अँखियों के झरोखों से, मैने देखा जो सांवरे
तुम दूर नज़र आए, बड़ी दूर नज़र आए
बंद करके झरोखों को, ज़रा बैठी जो सोचने
मन में तुम्हीं मुस्काए, बस तुम्हीं मुस्काए
अँखियों के झरोखों से…

इक मन था मेरे पास वो अब खोने लगा है
पाकर तुझे हाय मुझे कुछ होने लगा है
इक तेरे भरोसे पे सब बैठी हूँ भूल के
यूँही उम्र गुज़र जाए, तेरे साथ गुज़र जाए
अँखियों के झरोखों से…

जीती हूँ तुम्हें देख के, मरती हूँ तुम्हीं पे
तुम हो जहाँ साजन मेरी दुनिया है वहीं पे
दिन रात दुआ माँगे मेरा मन तेरे वास्ते
कहीं अपनी उम्मीदों का कोई फूल न मुरझाए
अँखियों के झरोखों से…

मैं जब से तेरे प्यार के रंगों में रंगी हूँ
जगते हुए सोई रही नींदों में जगी हूँ
मेरे प्यार भरे सपने कहीं कोई न छीन ले
दिल सोच के घबराए, यही सोच के घबराए
अँखियों के झरोखों से …

कुछ बोलके खामोशियाँ तड़पाने लगी हैं
चुप रहने से मजबूरियाँ याद आने लगी हैं
तू भी मेरी तरह हँस ले, आँसू पलकों पे थाम ले,
जितनी है खुशी यह भी अश्कों में ना बह जाए
अँखियों के झरोखों से…

कलियाँ ये सदा प्यार की मुसकाती रहेंगी
खामोशियाँ तुझसे मेरे अफ़साने कहेंगी
जी लूँगी नया जीवन तेरी यादों में बैठके
खुशबू जैसे फूलों में उड़ने से भी रह जाए
अँखियों के झरोखों से…

एक दिन तुम बहुत बड़े बनोगे

एक दिन, तुम बहुत बड़े बनोगे एक दिन
चाँद से चमक उठोगे एक दिन
will you forget me then?
how i can, tell me how i can?

मान लो कहीं की शहज़ादी
बैठी हो तुम्हारे लिये आँखें बिछाए
और उसे ये ज़िद हो कि वो शादी
किसी से ना करेगी तुम्हारे सिवाय
will you forget me then?
yes i can, if only you can

एक दिन, ले गया तुम्हे जो कोई अजनबी
ग़ैर की जो हो गई ये ज़िंदगी
will you forget me then?
gentleman, oh no gentleman

साँस साँस में तुम्हारी ख़ुशबू
किस तरह जियूँगा बोलो तुमको भुलाके
दिल पे जाँ पे कर चुकी हो जादू
जानती हो पूछती हो फिर भी सता के
gentleman, sorry gentleman

गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा

गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा
मैं तो गया मारा
आके यहाँ रे, आके यहाँ रे
उसपर रूप तेरा सादा
चन्द्रमधु आधा
आधा जवाँ रे, आधा जवाँ रे

जी करता है मोर कि पैरों में पायलिया पहना दूँ
कुहू कुहू गाति कोयलिया को, फूलों क गहना दूँ
झर झर झरते हुए झरने, मन को लगे हरने
ऐसा कहाँ रे, ऐसा कहाँ रे
उसपर रूप तेरा सादा …

रंग बिरंगे फूल खिले हैं, लोग भी फूलों जैसे
आ जाये इक बार यहाँ जो, जायेगा फिर कैसे
यहीं घर अपना बनाने को, पंछी करे देखो
तिनके जमा रे, तिनके जमा रे
उसपर रूप तेरा सादा …

परदेसी अन्जान को ऐसे कोई नहीं अपनाता
तुम लोगों से जुड़ गया जैसे जनम जनम का नाता
अपने धुन में मगन डोले, लोग यहाँ बोले
दिल की ज़बाँ रे, दिल की ज़बाँ रे
उसपर रूप तेरा सादा…

जब दीप जले आना जब शाम ढले आना

जब दीप जले आना, जब शाम ढले आना
सन्देस मिलन का भूल न जाना मेरा प्यार ना बिसराना
जब दीप जले आना …

नित सांझ सवेरे मिलते हैं
उन्हें देखके तारे खिलते हैं
लेते हैं विदा एक दूजे से कहते हैं चले आना
जब दीप जले आना …

मैं पलकन डगर बुहारूंगा
तेरी राह निहारूंगा
मेरी प्रीत का काजल तुम अपने नैनों में मले आना
जब दीप जले आना …

जहां पहली बार मिले थे हम
जिस जगह से संग चले थे हम
नदिया के किनारे आज उसी
अमवा के तले आना
जब दीप जले आना…

तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले

तू जो मेरे सुर में
सुर मिला ले, संग गा ले
तो ज़िंदगी हो जाए सफ़ल

तू जो मेरे मन का
घर बना ले, मन लगा ले
तो बंदगी हो जाए सफ़ल
तू जो मेरे सुर में

चाँदनी रातों में, हाथ लिए हाथों में
चाँदनी रातों में, हाथ लिए हाथों में
डूबे रहें एक दूसरे की, रस भरी बातों में
तू जो मेरे संग में
मुस्कुरा ले, गुनगुना ले
तो ज़िंदगी हो जाए सफ़ल
तू जो मेरे मन का…
तू जो मेरे सुर में…

क्यों हम बहारों से, खुशियाँ उधार लें
क्यों हम बहारों से, खुशियाँ उधार लें
क्यों न मिलके हम खुद ही अपना जीवन सुधार लें
तू जो मेरे पथ में
दीप गा ले ओ उजाले
तो बंदगी हो जाए सफ़ल

तू जो मेरे सुर में
सुर मिला ले, संग गा ले
तो ज़िंदगी हो जाए सफ़ल

आज से पहले आज से ज़्यादा 

आज से पहले आज से ज़्यादा
ख़ुशी आज तक नहीं मिली
इतनी सुहानी ऐसी मीठी
घड़ी आज तक नहीं मिली
आज से पहले आज से ज़्यादा…

इस को संजोग कहें या क़िस्मत का लेखा
हुम जो अचानक मिले हैं
मन चाहे साथी पाकर हम सब के चेहरे
देखो तो कैसे खिले हैँ

तक़्दीरों को जोड़ दे ऐसे
किन्हीं तक़्दीरों को जोड़ दे ऐसे
लड़ी आज तक नहीँ मिली
आज से पहले आज से ज़्यादा…

सपना हो जाये पूरा, जो हमने देखा
ये मेरे दिल की दुआ है
ये पल जो बीत रहें हैं इन के नशे में
दिल मेरा गाने लगा है

इसी ख़ुशी को ढूँढ रहे थे
हम इसी ख़ुशी को ढूँढ रहे थे
यही आज तक नहीं मिली
आज से पहले आज से ज़्यादा…

घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ 

घुँघरू की तरह बजता ही रहा हूँ मैं
कभी इस पग में कभी उस पग में बँधता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह …

कभी टूट गया कभी तोड़ा गया
सौ बार मुझे फिर जोड़ा गया
यूँ ही टूट-टूट के, फिर जुट-जुट के
बजता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह …

मैं करता रहा औरों की कही
मेरे मन की ये बात मन ही में रही
है ये कैसा गिला जिसने जो कहा
करता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह …

अपनों में रहे या ग़ैरों में
घुँघरू की जगह तो है पैरों में
कभी मन्दिर में कभी महफ़िल में
सजता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह…

अंचरा में फुलवा लई के 

अंचरा में फुलवा लई के
आये रे हम तोहरे द्वार
अरे हो हमरी अरजी न सुन ले
अरजी पे कर ले ना बिचार
हमसे रूठ ले बिधाता हमार
काहे रूठ ले बिधाता हमार

बड़े ही जतन से हम ने पूजा का थाल सजाया
प्रीत की बाती जोड़ी मनवा का दियरा जलाया
हमरे मन मोहन को पर नहीं भाया
अरे हो रह गैइ पूजा अधूरी
मन्दिर से दिया रे निकाल
हमसे रूठ ले बिधाता हमार …

सोने की कलम से हमरी क़िसमत लिखी जो होती
मोल लगा के लेते हम भी मन चाहा मोती
एक प्रेम दीवानी हाय ऐसे तो न रोती
अरे हो इतना दुःख तो न होता
पानी में जो देते हमें डार
हमसे रूठ ले बिधाता हमार …

पुरवैया के झोंके आये 

पुरवैया के झोंके आये
चन्दन बन की महक भी लाये
दूर वो निन्द्या रानी मुस्काये
मूँद लो नैना तो नैनों में आ जाये
पुरवैया के झोंके आये

नींद की दुल्हन बड़ी शर्मीली
उजियारे में न आये
कोई जो चौंके कोई कुछ बोले
तो रस्ते पे मुड़ जाये
दीप बुझा दो तो पल भर में आ जाये
मूँद लो नैना तो …

नींद की चिन्ता ले के जो जागे
उसको नींद न आये
फूल सा मनवा ले के जो सोये
उसको ही नींद सुलाये
छोड़ दो चिन्ता तो पल भर में आ जाये
मूँद लो नैना तो …

 

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