रवि ज़िया की रचनाएँ

जब लफ़्ज़ थक गए तो सहारा नहीं दिया

जब लफ़्ज़ थक गए तो सहारा नहीं दिया
ख़ामोशियों ने साथ हमारा नहीं दिया।

यूँ तो फ़लक ने चाँद मिरे नाम कर दिया
जिस की तलाश थी वो सितारा नहीं दिया।

इक शख़्स पूछता रहा बस्ती में देर तक
लेकिन पता किसी ने हमारा नहीं दिया।

गहरे समुंदरों की फ़ज़ा रास आ गई
अच्छा किया कि दिल को किनारा नहीं दिया।

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