रवीन्द्रनाथ त्यागी की रचनाएँ

पाँच बज गए

पाँच बज गए

दफ़्तरों के पिंजरों से
हज़ारों परिन्दे (जो मुर्दा थे)
सहसा जीवित हो गए…
पाँच बज गए…

आकुल मन
शलथ तन…

भावनाओं के समु्द्र
शब्दों के पक्षी
गीतों के पंख खोल
उड़ गए… उड़ गए…
पाँच बज गए।

सामने फ्लैट पर

सामने फ्लैट पर
जाड़ों की सुबह ने
अलसाकर जूड़ा बाँधा;

नीचे के तल्ले में
मफ़लर से मुँह ढाँप
सुबह ने सिगरेट पी

चिक पड़ी गोश्त की दुकान पर
सुबह के टुकड़े-टुकड़े किए गए,

मेरे बरामदे में
सुबह ने अख़बार फ़ेंका;

इसके बाद बन्बा खोल
मांजने लगी बरतन

किनारे की बस्तियों से
कमर पर गट्ठर लाद
सुबह चली नदी की ओर;

सिगनल के पास
मुँह में कोयला भरे लाल सीटी देती
सुबह पुल पर गुज़री।

कहकहों की तरह चटक पत्ते

कहकहों की तरह चटक पत्ते पेड़ ने पहिने
पीले फूलों के खेत में खड़ा हो गया
दिन का हरिण

छींट का रुमाल जेब में रखे
किसी रईसजादे की तरह
बसन्त निकल पड़ा

रात कोई जंगलों में हँसा।

मुस्कानों के नेपकिन बिछा

मुस्कानों के नेपकिन बिछा
वे एक-दूसरे को ही खाने लगे
चुपचाप

पलाश, भाद्रपदी हवाएँ और वर्षा
उन्होंने कुछ नहीं देखा;

उन्होंने सिर्फ़ उन्हें आँका
जिनके खा जाने के बाद
उनका भय और बढ़ना था

समुद्र की मेज़ पर
शाम के बावर्ची ने
सूरज का मुर्गा कर दिया हलाल

और वे सब अफ़सर, दलाल और वकील
उन लोगों से गले मिलने लगे
जिन्हें निगलना अभी बाक़ी था

पलाश, भाद्रपदी हवाएँ और वर्षा
उन्होंने कुछ नहीं देखा।

वासंती झोंका

उसने जूड़े में फूल खोंस लिये
फूले पलाश जैसा चांद
दहक उट्ठा
किसी दुर्घटना के कारण
सारे का सारा मौसम
खुशी में बदल गया सहसा

पनघट

ग्राम अलका अप्सराएँ
पनघट पर नीर भरे!

सुन्दर सजीले अंग
अचल हिले खुले पंख
वस्त्र कसे, करे व्यंग्य
अधर रस बूंद भरे!

अचल हिलाता मारूत
धीरे-धीरे बजे नुपुर

उर-उर में मधुर
अंग में उमंग भरे!

मधुर हास स्नेह सने
खींच वारि कर थमे,

घूंघट तूणीर, तने-
नयनों के बाण चले!

आर्द्र-द्रुम छाया सघन
नभ नील-उज्ज्वल घन

हँसती-सी मलयज पवन
पुष्पों के पंख हिले!

उच्च नील शैल झलक
देता, आ घट में छलक
होती फिर हास किलक
काम कल चाप धर!

विहँस उड़ी विहग वधू
नीड़ चलीं ग्राम वधू
प्राणों की वीणा में
जीवन का राग भरे।

सांझ

धीरे-धीरे सांझ हो गई
अब बेला के फूल हिल गए
नभ में जमा भाव वह नए,
जगभर को मृदु स्वप्न दे गई!

ग्राम डगर पर खिसका अंचल
स्वर्ण विहग ले सोता पीपल
उठ जल से वह रेखा चंचल
अभी-अभी नभ में खो गई!

उधर सो गया धीरे, सविता
नभ में फैला कोमल कविता
जो बिखरे बादल की संध्या
नीरव पग धर मुझे दे गई!

अभिनेता

बातों का खो गया सारा अर्थ
शेष रह गई मात्र उसकी आवाज़
आज का दिन नाव-सा चला गया
न कोई मांझी, न कोई पाल

शब्दों के केंचुल ने ढक दिया मेरा प्रश्न,
और तुम्हारा उत्तर-
तुम्हारे ही साथ सीढ़ियों से उतर गया;
कविता में कौन पकड़ पाया सत्य,
कवि स्वयं अपनी व्याख्या

तुम कुछ भी कर लो मगर
किसी का हृदय कभी नहीं छीना जा सकता,
जीवन का युद्ध रहा सदा दुखान्त
इसमें कभी कोई नहीं जीता,
न युद्ध न प्रेम
किसी का कोई अर्थ कहीं नहीं होता…
मेरा न कोई वर्तमान, नकोई भविष्य
फिर भी जरूरी है स्वप्नों का गीत
मत छीनों मुझसे
मेरा कलपता अतीत

बातों की फुलझड़ियों से जला लें साँझ,
द्वार पर भीड़ जुड़ी
मैं ठहरा जाने वाला अतिथि,
मैं रहा एक ऎसा अभिनेता
जिसे रंगमंच से निकलना नहीं आता,
निकल भी जाता तो बोलता क्या-
नाटककार ने कहीं नहीं लिखा…

मैंने अपने गानों को जन्म दिया

मैंने अपने गानों को जन्म दिया
एकदम चुपचाप-अकेले,
पर फिर भी एक दिन
उन सबके कण्ठ खुले,
और एक सुबह
– पंख उगे पक्षियों की तरह
वे रोके न रुके
उड़ निकले;
कुछ ने आशीर्वाद दिया
कुछ मुस्कराए;
और
मेरी आँखों से
ख़ुशी के – डर के
दो आँसू बह निकले।

अपने इन दुखों को

अपने इन दुखों को
बेकार मत जाने दो
चेहरे के चिराग से
आँसुओं के पतंगों को
यूँ ही न उड़ जाने दो,
ये सागर की लहरें हैं
इनमें ज्वार आया है
इन्हें यूँ ही न बह जाने दो।

दुख तुम्हें यतन करने से मिले हैं
बर्षों के तप और प्रतीक्षा से मिले हैं
इन्हें यूँ ही न खो जाने दो

आओ, इन दुखों से धरती बो दें
इन्हें चारों ओर घर-घर बिखरा दें
जिससे गानों की फ़सल उगे
लाल-लाल रंगीन भरे-पूरे गाने
तुम्हारे हृदय के रक्त से सने।

फाँसी पर टंग गया आकाश

फाँसी पर टंग गया आकाश
समुद्र अपने ही भँवर में डूब गया
खाइयों में से निकलकर सहसा
वे सब मारने लगे उन्हें
जिन्हें वे जानते तक नहीं थे

पहिले मरा संगीत
फिर मरे, प्रेम, यौवन और रूप
दक्षिण दिशा को घोड़ा फेंकता राजकुमार
और इसके बाद मर गए वे,
सब के सब ख़ुद भी
तोपों के क़ब्रिस्तान में
दफ़्न हो गया बारूद का बूढ़ा जादूगर

वे सब के सब किसलिए मरे थे
इसका पता उन्हें कभी नहीं लगा।

हिंडोले जैसी झूमती पागल ऋतु

हिंडोले जैसी झूमती पाग़ल ऋतु
वक्ष-सी फड़कती हवाएँ
तुम्हारी साड़ी की भाँति पहली हरी-हरी घास
वर्षा का अनन्त क्रम
झील-सा डूबेगा दिन

निगाहें फिर मुड़ गईं घड़ी की ओर
वही एक सच्ची दिशा
हो गया दफ़्तर चलने का वक़्त

प्यार, घुड़कियाँ, फ़ाइलें और हजामत

प्यार, घुड़कियाँ, फ़ाइलें और हजामत
कान्वेन्ट के लिए तैयार होना बच्चों का

बढ़ते दाम, ईर्ष्या, सुख-दुख और भय
ऋतु का हिंडोला और चन्द्रमा का जाल
पहाड़ों पर डाक बंगले में चाय का कप
चेकबुक, प्राविडेंट फ़ंड,
कविता और सैकिन्ड शो
देह की भूख, शाम की उदासी
और कभी-कभी एक चेहरे की याद
रेल की पटरियों की तरह
अपने ही नीचे दबी

पाप और पुण्य से विरक्त
हम सबसे उदासीन
गुज़रता जा रहा है चालाक वक़्त
हमारे ही माध्यम से
हम सबसे ऊपर

वह फिर कभी नहीं लौटेगा
कभी नहीं।

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