रवीन्द्र भ्रमर की रचनाएँ

गीतों से पहले

पँछी में गाने का गुन है
दो तिनके चुनकर
वह तृप्त जहाँ होता है
गीतों की कड़ियाँ
बोता है !
सूखा पेड़
कँटीली टहनी
बियाबान, सुनसान —
उसे नहीं खलते हैं
उसके तन में
चुभी हुई है
कोई वंशी,
उसके रोम-रोम में
सुरवाले, मीठे सपने पलते हैं ।

चान्द को झुक-झुक कर देखा है

चान्द को झुक-झुक कर देखा है ।

साँझ की तलैया के
निर्मल जल दर्पन में
पारे सी बिछलन वाले
चमकीले मन में —

रूप की राशि को परेखा है ।

दिशा बाहु पाशों में
कसकर नभ साँवरे को —
बहुत समझाया है
इस नैना बावरे को —

वह पहचाने मुख की रेखा है ।
चान्द को झुक-झुक कर देखा है ।

बान्ध लिए अँजुरी में जूही के फूल

बान्ध लिए
अँजुरी में
जूही के फूल ।

मधुर गन्ध,
मन की हर एक गली महक गई,
सुखद परस,
रग रग में चिनगी सी दहक गई
रोम-रोम
उग आए
साधों के शूल !!

जोन्हा का जादू
जिन पँखुरियों था फैला,
छू गन्दे हाथों
मैंने उन्हें किया मैला,
हाथ काट लो —
मेरे…
सज़ा है क़बूल !!

आह !
हो गई मुझसे
एक बड़ी भूल !
अँजुरी में
बान्ध लिए
जूही के फूल !!

उनसे प्रीत करूँ, पछताऊँ

उनसे प्रीत करूँ, पछताऊँ !

सोन महल लोहे का पहरा,
चारों ओर समुन्दर गहरा,
पन्थ हेरते धीरज हारूँ
उन तक पहुँच न पाऊँ ।।

प्रीत करूँ, पछताऊँ !

इन्द्र धनुष सपने सतरंगी
छलिया पाहुन छिन के संगी,
नेह लगे की पीर पुतरियन
जागूँ, चैन गवाऊँ ।

प्रीत करूँ, पछताऊँ !

दिपे चनरमा नभ दर्पन में
छाया तैरे पारद मन में,
पास न मानूँ, दूर न जानूँ
कैसे अंक जुड़ाऊँ ?

प्रीत करूँ, पछताऊँ !
उनसे प्रीत करूँ, पछताऊँ !

एक पल निहारा तुम्हें

एक पल निहारा तुम्हें
एक दुख रीत गया ।

वारी तुम्हें एक दृष्टि,
मिली अमित सुधा सृष्टि,
एक क्षण दुलारा तुम्हें —
एक युग बीत गया ।।

वंशी के पहले स्वर,
गूँज गए भू-अम्बर,
एक शब्द वारा तुम्हें
गुन एक गीत गया ।।

तन के मन के अर्पण,
बने प्रीत के दर्पण,
एक दाँव हारा तुम्हें
एक जनम जीत गया ।।

एक पल निहारा तुम्हें
एक दुख रीत गया ।

धीरे-धीरे स्वर उठाओ

धीरे-धीरे स्वर उठाओ
कोई तार टूटे ना !

प्रीत बंसरी अमोल
पोर-पोर रिसे बोल
गीत हौले-हौले गाओ
कोई छन्द छूटे ना !

राग रँग रँगे गात
नैन ओट सारी बात
प्यार पलकों में छिपाओ
कोई भेद फूटे ना !

नाव न तो कूल गहे
औ’ न बीच धार बहे
पाल आधे से झुकाओ
कोई लहर रूठे ना !

कोई तार टूटे ना
धीरे-धीरे स्वर उठाओ …

तुम बिन यह मौसम

तुम बिन !
यह मौसम कितना उदास लगता है —
तुम बिन !

घर पीछे तालाब
उगे हैं लाल कमल के ढेर
तुम आँखों में उग आई हो
प्रात गन्ध की बेर;

यह मौसम कितना उदास लगता है —
तुम बिन !

झर-झर हरसिंगार झरते हैं
पवन पुलक के भार
हार गूँथ लूँ, किन्तु
करूँ किस वेणी का शृँगार;

यह मौसम कितना उदास लगता है —
तुम बिन !

नई हवा की छुवन
बोल पंछी के नए नए
सब कुरदते याद तुम्हारी
मन पर सब उनये;

यह मौसम कितना उदास लगता है —
तुम बिन !

बात है शब्द नहीं है

बात है शब्द नहीं हैं
कैसे खोल दूँ ग्रन्थित मन !!

तुम अधीर प्रान हुए कुछ सुनने को
मर्म के उगे दो आखर चुनने को,
प्रीति है
मुक्ति नहीं है,
कैसे तोड़ दूँ सब बन्धन ?

बांसुरी लगी है लाज नहीं बजेगी
स्वर की सौतन राधा नहीं सजेगी,
कण्ठ है
गान नहीं है,
रूठ न जाना मन मोहन ।।

पाँव लग रहूँगी मौन, सहूँगी व्यथा,
कह न सकूँगी अपने स्वप्न की कथा,
भाव है
छन्द नहीं है,
मौन ही बनेगा समर्पन !!

कैसे खोल दूँ ग्रन्थित मन ?
बात है शब्द नहीं हैं,
मौन ही बनेगा समर्पन ।।

जादूगर की जात तुम्हारी 

जादूगर की जात तुम्हारी ।
मेरी विद्या तुमसे हारी ।।

बड़े सयाने हो मायावी !
अपने मुँह पर चान्द उगा कर
मेरी आँखों में लहरा देते हो
अबुझ प्यार का सागर,
खारे जल में बह जाती हूँ —
मैं व्याकुल बिरहा की मारी !

जादूगर की जात तुम्हारी ।
मेरी विद्या तुमसे हारी ।।

अधरों में मुस्कान बसी है,
मोहन मन्त्र पढ़ा करते हो !
वंशी के स्वर वशीकरण के —
कोमल छन्द गढ़ा करते हो ।
बिना दाम ही नाम तुम्हारे —
मैं बिक बैठी हूँ बनवारी !!

जादूगर की जात तुम्हारी ।
मेरी विद्या तुमसे हारी ।।

सच कहती हूँ, श्याम, तुम्हारे
नैनों में जादू-टोना है,
इनके चलते इसी जनम में,
अब जाने क्या क्या होना है !
आज हुई बदनाम और कल …
सारा जन्म रहूँगी क्वाँरी ।

जादूगर की जात तुम्हारी ।
मेरी विद्या तुमसे हारी ।।

पथ अगोरते लाज लुट गई

पथ अगोरते लाज लुट गई
मीत नहीं आए ।

रन्ध्र रन्ध्र रिस गई बांसुरी
पोर पोर रीते,
स्वर संवारते बेला रूठी
गीत नहीं आए ।

पँखुरियाँ मुरझीं पंकज की —
मुख छवि म्लान हुई,
नयन नीर रीते
दुख के दिन बीत नहीं पाए ।

एक लाग है, एक लगन है
उन्हें रिझाने की,
इतनी आयु गवांकर
अब तक जीत नहीं पाए ।

पथ अगोरते लाज लुट गई
मीत नहीं आए ।

जितने क्षण बीते हैं तुम्हारे बिना

जितने क्षण बीते हैं तुम्हारे बिना
उन सबमें केवल प्रणाम तुम्हें भेजे हैं ।

सपने में संग संग
जगने में परदेस,
छिन सम्मुख छिन ओझल
छलिया के भेस,

जितने क्षण भटके हैं तुम्हारे बिना
उनमें साधों के विश्राम तुम्हें भेजे हैं ।

ओसों सुबहें रोईं
दियों जली शाम,
तारों रातें टूटी —
दिन गिनते नाम,

जितने क्षण तड़पे हैं तुम्हारे बिना
उन सबमें आँसू अविराम तुम्हें भेजे हैं ।

पथ अगोरती आँखें
पथराई हैं,
अवधि जोहती बाँहें
अकुलाई हैं,

जितने क्षण छूटे हैं तुम्हारे बिना
उन सबमें वय के विराम तुम्हें भेजे हैं ।

टूट चले वंशी स्वन
रुक चली पुकार,
टेरते तुम्हें, मेरे —
गीत गए हार,

जितने क्षण टूटे हैं तुम्हारे बिना
उनमें सांसों के परिणाम तुम्हें भेजे हैं ।
जितने क्षण बीते हैं तुम्हारे बिना
उन सबमें केवल प्रणाम तुम्हें भेजे हैं ।।

गुच्छ-गुच्छ फूले कचनार

गुच्छ-गुच्छ फूले कचनार !
भूली बिसरी राहों लौट आ
ओ मेरे प्यार !

आ कि तुझे अलसाये स्वर दूँ
कोकिल की कू-हू वाला नीलाम्बर दूँ,
आ कि तुझे नई कोंपलों की सौगन्ध
आ कि आम्र मंजरियों फूट गई गन्ध,
वन-उपवन, घर बाहर,
उठ रही गुहार
एक ही गुहार —
भूली बिसरी राहों लौट आ
ओ मेरे प्यार !

कण्ठ कण्ठ उठते ये गीत नए
खेतों खलिहानों पर होरी के छन्द छये,
जौ गेहूँ की जवान बालों सा हिया
स्वागत में खिरकी दरवाज़े सब खोल दिए,
डर लगता, अनसुनी न हो,
यह पुकार
एक ही पुकार —
भूली बिसरी राहों लौट आ
ओ मेरे प्यार !

कुछ अजब उदासी, कुछ टूट रहा
मुखरित साधों का पल अनगाया छूट रहा,
फूलों वाला मौसम, चोटें अनगिन
असफल प्रतीक्षा ज्यों रीत रहे दिन,
हर क्षण को डुबो रहा,
फागुन का ज्वार
कहाँ मिले पार —
भूली बिसरी राहों लौट आ
लौट आ, ओ मेरे प्यार !
फूले कचनार …

तान दिए चन्दवे

तान दिए चन्दवे
हरियाली के !

केसर से भर दीं रस क्यारियाँ
गुच्छों में झुला दिए फूल
मधुवासित कर दीं फुलवारियाँ

सपने लौटे हैं
वनमाली के !

तान दिए चन्दवे
हरियाली के !

कोकिल के कण्ठ कुहुक-गान दिए
पपीहे को पिया की सुमिरिनी
अपने को झूठे क्षण, मान दिए

घाव क्यों भरें
मेरी आली के !

तान दिए चन्दवे
हरियाली के !

हवा से कहा, बहिना ! धीरे बह
मेरी मँजरियाँ अनमोल
झर न जाएँ, पिछवारे बैठी रह

टिकोरे मिलेंगे
रखवाली के !

तान दिए चन्दवे
हरियाली के !

मन ने छाप लिया 

आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।

रंग पंखुरी केसर टहनी नस-नस के सब ताने-बाने,
उनमें कोमल फूल बना जो, भोली आँख उसे ही जाने,
मन ने सौरभ के वातायन से–
असली रस भाँप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था
मन ने उसको छाप लिया।

छवि की गरिमा से मंडित, उस तन की मानक ऊँचाई को,
स्नेह-राग से उद्वेलित उस मन की विह्वल तरुणाई को,
आँखों ने छूना भर चाहा,
मन ने पूरा नाप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।

आँख पुजारी है, पूजा में भर अँजुरी नैवेद्य चढ़ाए,
वेणी गूँथे, रचे महावर, आभूषण ले अंग सजाए,
मन ने जीवन-मंदिर में-
उस प्रतिमा को ही थाप लिया।
आँखों ने बस देखा भर था,
मन ने उसको छाप लिया।

सुर-पाँखी

प्राणों के पिंजरे में पाला,
साँस-साँस में गाया,
बड़े जतन से वह सुर-पाँखी मेरे बस में आया।

साँझ-सकारे मन-बंसी पर मैंने उसको टेरा,
रसना की रेशमी धार पर दिन दुपहरिया फेरा,
अक्षर-मंत्र, शब्द के टोने, स्वर के बान चलाए
धीरे-धीरे उस निर्मम से कुछ अपनापा पाया।
बड़े जतन से वह सुर-पाँखी मेरे बस में आया।

जाने किस अनुराग पगीं उसकी रतनारी आँखें,
किस पीड़ा के नील रंग में रंगी हुई हैं पांखें,
उसके गहरे प्रेमराग को बूझ न पाया अब तक
अतुल स्नेह से उसके पंखों को हर क्षण सहलाया।
बड़े जतन से वह सुर-पाँखी मेरे बस में आया।

उसके रोम-रोम में महके वन-फूलों की प्रीत,
उसकी हर थिरकन में गूँजे घाटी का संगीत,
उसकी बोली में गूंगा आकाश मुखर हो जाए
मैंने शब्द-तूलिका से उसका यह चित्र बनाया।
बड़े जतन से वह सुर-पाँखी मेरे बस में आया।

बदलते सन्दर्भ

सारा संदर्भ
बदल जाता है ।

इस कोने के फूलदान को
ज़रा उस कोने कीजिए,
इस आले के दर्पण को
उस आले,
या इस मेज़ का रुख़
ज़रा-सा यूँ
कि उधरवाली खिडकी का
आकाश दिखाई पडने लगे !

सारा संदर्भ
बदल जाता है
प्रत्येक दृश्य
नए-नए अर्थ देने लगता है

इस-ऐसे अनूठे
सत्य की उपलब्धि
मुझे तब हुई
जब
इधर की दीवार पर लगे
तुम्हारे चित्र को
मैंने उधर की दीवार पर लगा दिया!

दे दिया मैंने

आज का यह दिन
तुम्हें दे दिया मैंने

आज दिन भर तुम्हारे ही ख़यालों में लगा मेला,
मन किसी मासूम बच्चे-सा फिरा भटका अकेला,
आज भी तुम पर
भरोसा किया मैंने ।

आज मेरी पोथियों में शब्द बनकर तुम्हीं दीखे,
चेतना में उग रहे हैं अर्थ कितने मधुर-तीखे,
जिया मैंने ।

आज सारे दिन बिना मौसम घनी बदली रही है,
सहन आँगन में उमस की, प्यास की धारा बही है,
सुबह उठकर नाम जो
ले लिया मैंने ।

 

नदी के साथ

चलो, नदी के साथ चलें ।

नदी वत्सला है, सुजला है,
इसकी धारा में अतीत का दर्प पला है,
वर्तमान से छनकर यह भविष्य-पथ गढ़ती,
इसका हाथ गहें
युग की जय-यात्रा पर निकलें ।
चलो, नदी के साथ चलें ।

सदा सींचती जीवन-तट को,
स्नेह दिया करती आस्था के अक्षय-वट को,
घट को अनायास पावन पय से भर देती,
इसकी लहरों में उज्ज्वल कर्मों के-
पुण्य फलें ।
चलों, नदी के साथ चलें ।

इसके आँचल की छायाएँ,
मानस के गायत्री-प्रात, ॠचा-संध्याएँ,
लहरों पर इठलातीं दूरागत नौकाएँ
जादू की बाँसुरी बजाएँ
जिनमें गान ढलें ।

चलो, नदी के साथ चलें।

सिन्धु-वेला

सिंधु-वेला ।
तप्त रेती पर पड़ा चुपचाप मोती सोचता है, आह !
मेरा सीप, मेरा दूधिया घर,
क्या हुआ, किसने उजाड़ा मुझे
ज्वार आए, गए, जल-तल शाँत-निश्चल,
मैं यहाँ निरुपाय ऐसे ही तपूँगा ।

ओ लहर ! फिर लौट आ मुझको बहा ले चल ।
बहुत संभव, फिर न मुझको मिले
मेरा सीप, मेरा दूधिया घर ।
किंतु, माता-भूमि ।
आह ! स्वर्गिक भूमि ।।
सिंधु, उसकी अनथही गहराइयाँ
शंख, घोंघे, मछलियाँ, साथी-संघाती,
आह ! माता भूमि !

ओ लहर! फिर लौट आ मुझको बहा ले चल ।
तप्त रेती पर पड़ा चुपचाप मोती सोचता है ।

सिंधु-वेला ।

बाँध लिए अँजुरी में

बाँध लिए अँजुरी में-
जूही के फूल ।

मधुर गंध,
मन की हर एक गली महक गई,
सुखद परस,
रग-रग में चिनगी-सी दहक गई
रोम-रोम उग आए-
साधों के शूल ।

जोन्हा का जादू
जिन पंखुरियों था फैला,
छू गंदे हाथों-
मैंने उन्हें किया मैला,
हाथ काट लो-
मेरे…
सज़ा है क़बूल ।

आह !
हो गई मुझसे एक बड़ी भूल ।
अँजुरी में बाँध लिए जूही के फूल ।

बात है शब्द नहीं हैं

बात है
शब्द नहीं हैं
कैसे खोल दूँ ग्रंथित मन !!

तुम अधीर प्रान हुए कुछ सुनने को
मर्म के उगे दो आखर चुनने को,
प्रीति है
मुक्ति नहीं है,
कैसे तोड़ दूँ सब बंधन ?

बाँसुरी लगी है लाज नहीं बजेगी
स्वर की सौतन राधा नहीं सजेगी,
कण्ठ है
गान नहीं है,
रूठ न जाना मनमोहन !

पाँव लग रहूँगी मौन, सहूँगी व्यथा,
कह न सकूँगी अपने स्वप्न की कथा,
भाव हैं
छंद नहीं हैं,
मौन ही बनेगा समर्पन !!

कैसे खोल दूँ ग्रंथित मन ?
बात है, शब्द नहीं हैं
मौन ही बनेगा समर्पन !!

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