राखी सिंह की रचनाएँ

मध्यमवर्ग

जिनके हिस्से में कम होती हैं खुशियाँ
वो मध्यमवर्गीय मार्ग अपनाते हैं
कम कम ख़र्चते हैं
बचत के प्रयासों में जुटे रहते हैं
फिर भी,
महीने के आख़िर की तरह
दिन का अंत होने तक
चरमरा जाता है उनका बजट

उनके द्वारा किये सारे जतन का मुहं
बंद करके छोड़े ताले की भांति टेढ़ा मिलता है
जिसे वे छोड़कर तो सीधा ही गए होते हैं
उनके प्रयासों के पावं उन्हें मिली सफलता की चादर से बड़े लंबे होते हैं
मुड़ तुड़ कर ढंकते हैं वह स्वयं को

वो जिन्हें नहीं मिलती विरासत में मुस्कुराहटें
किसी मजदूर की भांति कड़ी मेहनत से कमाते हैं थोड़ी-सी हंसी
सहेजते हैं,
ये सहेजना उनकी तसल्ली है
वो तलाश में रहते हैं ऐसी योजनाओं के
जिनके तहत दोगुनी चौगुनी होती हो खिलखिलाने की वज़हें
पर प्रायः ये योजनायें भी
सरकारी दावों की भांति ध्वस्त हो जाती हैं
वो पूरी ताक़त से जुट जाते हैं
फिर नई नीतियों के जुगाड़ में।

वर्षा-गीत

कुछ लड़के बारिश बनकर आते हैं
बादल का छोटा-सा टुकड़ा लिए
बरसने को तत्पर
नीली पोशाक वाले
उद्दंड बूंदों से लड़के!

हरी भरी फूलों से लदी क्यारी-सी गीली सीली लड़की
यूँ निहाल होती है के मानो
जन्मी ही मरुस्थल में हो
के जैसे उसकी पिछली कई पीढ़ियों ने
कभी मेघ का कोई दृश्य नहीं देखा
जबकि, अभी-अभी होकर आई है
पिछली बरसात से,
केवाल मिट्टी-सी वह नम लड़की

क्योंकि मन की देह धंसीली है उसकी
अ-भार छींटों के भी उभर आते हैं अक्षर

इन्ही अक्षरों से सूखे के दिनों के लिए
लिखे गए हैं वर्षा के गीत
जलधर की कामना में जिन्हें गाती हैं
मेरे गाँव की
भींजने को आतुर लड़कियाँ।

वो पुरस्कृत कविता

एक कविता पढ़ रही हूँ।
उस युवा विद्रोही कवि की नए तेवर की कविता!
चार पृष्ठ लम्बी कविता के शुरुआती अंश मुझे समझ नहीं आए
मैने स्वयं को कोसा!
फिर मैने अंत से शुरुआत की
अंतिम पूरा पैरा पढ़ने के बाद भी दिमाग की बत्ती नहीं जली

अपनी भोथरी बुद्धि पर तरस खाते हुए
मैने पढ़ना स्थगित कर दिया।

कुछ दिन बाद वही कविता एक बड़े प्रख्यात नामचीन ब्लॉग पर पढ़ने मिली
एक नामी वरिष्ठ कवि की टिप्पणी थी-
इसे समझना आसान नही
सबके समझ आने वाली कविता नहीं है ये।

अपनी कुंद बुद्धि के प्रति उपजा मेरा क्रोध अब चरम पर था

मैने कवि महोदय को नमस्ते का संदेश भेजते हुए पूछा:
सर, उस कविता में छुपे अवयवों पर थोड़ा प्रकाश डालें
तो हम जैसों के ज्ञान का थोड़ा विकास हो

कवि महोदय ठठा पड़े-
अरे क्या खाक प्रकाश
मैं स्वयं आंखे मूंदे लाठी भांज कर निकल आया हूँ!

कविता की भूमि

मुझे दस कविताएँ लिखने को कहा गया है
नई, ताजी दस कविताएँ।
उस प्रकाशक की शर्त है
कविताएँ पूर्णतः अप्रकाशित होनी चाहिए

दस कविताएँ!
शायद दस साल लग जाये मुझे
या क्षण भर में तैयार हो जाये दस कविताओं की भूमि

उन्होंने कहा-मन स्थिर करके बैठ जाएँ, लिख लेंगी।
कैसे समझाऊँ,
स्थिर मन? यानी कोई हलचल नहीं?
और लिख ली जाएंगी कवितायें? मेरे लिए ये परिहास की बात है बंधु!
मन जिस वेग से चलायमान होगा
मस्तिष्क में उतने ही कविताओं के बीज गिरेंगे

हाँ, मैं मन को
नाचने, गिरने, टूटने और सुबकने के साधन के विषय पर ग़ौर कर सकती हूँ

मुझे याद आया, किसी ने या
शायद मैने ही कहा था एक बार
कि एक प्रेम का हासिल है
एक साबुत इंसान के चंद रुआँसे खण्ड
हर खण्ड से निकली कुछ रोचक प्रतिक्रियाएँ
खंडित हृदय कविता की शरण लगता है
पंत जी ने भी तो कहा है-
निकल कर आंखों से चुपचाप,
बही होगी कविता अनजान।

हालांकि ये प्रेम और कविता दोनो के साथ
बरता गया बेहद ओछा वर्ताव होगा, फिर भी
कुछ नई कविताओं के प्रजनन के लिए
कवि और एक नए प्रेम का समागम
इतना बुरा भी नहीं!

अप्रत्याशित प्रयोजन

जिन दिनों तुम शामिल हुए थे मेरे जीवन मे
या यूं कह लो कि मैने शामिल होने दिया था तुम्हे
उन दिनों मेरे आसपास भीड़ रहने लगी थी
दोस्त, संगी, परिचित, रिश्तेदारों से घिरी मुझसे
छूट चला था मेरा एकांत
मेरे पास कोई विषय नहीं था
जिसकी चर्चा हेतु मैं
मेरे एकांत से मिलती

ऐसे कोलाहल भरे समय में तुम मुझे मिले
जिसमे ये पात्रता थी कि
उस भीड़ में से मेरी बाहँ पकड़ कर उठा ले
अकेले अंधेरे में ले जाकर भले छोड़ दे मुझे
पर मिला दे मुझे मेरे बिछड़े, रूठे एकांत से

तो सुनो मेरे पूर्व प्रिय!
तुम्हारे अभिमान का श्रेय तुम्हारी श्रेष्ठता नही
वरन मेरा चुनाव था
मुझे उपयुक्त लगे तुम्हारे बढ़े हांथ
जिसे इतने हौले से थामा गया
कि तुम्हारी तीव्र गति को इनके छूटने का भान तक न हो

तुम मेरे सर्वाधिक प्रिय एकांत से
मिलवाने वाले प्रयोजन हो
मेरे और एकांत के बीच चल रहे मनन के विषय का एक अध्याय मात्र!

मेरी ख़राब कविताएं

जब भी कहीं मेरी प्रिय कविता की बात होती है
मुझे मेरी सबसे ख़राब कविताएँ याद आती हैं

वो जिनमे नहीं थी पसन्द पर खरे उतरने जितनी पात्रता
वो जिसमे नहीं था कोई आकर्षण
वो जिसे नकार दिया था सबने
वो मेरी छाती से चिपक बैठी
मेरी स्मृतियों में सदा प्रथम पायदान पर बनी रही
मैने बड़े दुलार से पोषित किया उन्हें
कि वह भी अन्य सराही गई रचनाओं की भांति निकली थी मेरी क्षमताओं के बूते से
उनका क्षीण होना, उनकी नही
मेरी क्षीणता थी
उन निर्दोष अभिव्यक्तियों की
दोषी मैं थी

जिस प्रकार माँ एक समान पालती है गर्भ में शिशु को
पर सभी नहीं होतीं एक समान
इसीलिए तो कई सन्तानो की माँ को
होता है विशेष स्नेह
सबसे दुर्बल, सबसे निर्धन
संतान से।

अ-कारण

कई बातें बिना प्रयोजन के ख़ुशी दे जाती है

आज एक नया फूल खिला
उजला फूल
इस फूल का ये रंग मैने पहली बार देखा
पहली बार उजला मुझे इतना भला लगा
कई बार देखी कोई आम-सी बात
किसी विशेष स्थान से जुड़ कर कितनी खास हो जाया करती है

मैने इसे छूकर देखा
जो अच्छा लगे, हम उसे छूना चाहते हैं
चाहते हैं न!
फिर चाहे हांथो से या केवल आंखों से
या ध्वनि से।
मुझे लगा फूल मुझे ताक रहा
के मानो ये मेरे लिए खिला हो
सब मालूम है इसको कि
इसका खिलना मेरे गुमसुम दिनों में हरारत भरेगा
जबकि क्या मैं नहीं जानती
खिलना कर्म है इसका

कुछ वहम हम जानबूझ के बनाते हैं
फूल देखना भी बहाना था
किसी ने मुस्कुरा कर पूछ लिया-
कैसी हो तुम?
और मेरी प्रसन्नता कविता बनकर निकली।

गंगा से मिलकर

मैं उस समय और परिवेश में जन्मी
जब हवा में यात्रा करना स्वप्न सरीखा था
लोग जीवन में कम से कम एक बार अवश्य
इस स्वप्न को साध लेने का स्वप्न देखते थे
उन दिनों में जब
हवाई जहाज को निकट से देखना कौतूहल का विषय हुआ करता था
मैं नदी किनारे जाने के बहाने तलाशा करती थी
जब लोगो की दृष्टि आकाश में उड़ते जहाज पर टिकी होतीं
मैं नदी के सीने पर हिलकोरे लेती नाव देखा करती

नदी में पावं डालकर बैठना,
नदी के जल को स्पर्श करना
मुझे किसी रहस्य को भेदने-सा प्रतीत होता

अब जब हवा में यात्रा करना सुलभ हो चला
मैं अब भी,
पानी में हिलती नाव पर एक लंबी यात्रा करने का स्वप्न देखती हूँ
कोई एक गीत जितनी लम्बी यात्रा-
मनमीत जो घाव लगाए
उसे कौन मिटाए …!

माँ के लिए

कितने वर्ष बीत गए होंगे फिर भी
कल की ही बात लगती है
कि दो दिन रह जाये सर्दी-खांसी
तो माँ कर डालती थी कितने टोटके
कहाँ कहाँ के कितने अजूबे नुस्खे आते थे उसे
-हतना गोर काहे ला भयलु
घुडी घुडी नजरियाईये जा लू!
कितना चिढ़ते थे हम
कैसा विज्ञान है
नज़र नाक में घुस जाती है

अब जब तकिये के नीचे सपनो से अधिक
रखी जाती हैं दवाइयाँ
पढ़ी जा रही कोई प्रिय किताब
सिरहाने रखना भूल जाएँ भले
नही भूलनी चाहिए दवाओं की पोटली
के मानो यही ऑक्सीजन हो।
ऑक्सीजन ही तो है!
माँ के बाद कोई नहीं करता बेटियों के लिए कोई टोटका

जब नहीं रहतीं दुलार में नखरैल हुई बेटियों की माएँ
बेटियाँ समझदार गृहिणी बन जाती हैं
होता है बच्चे को मामूली बुख़ार
सारा विज्ञान भूल
निहुछने के लिए खोजती हैं
रसोई में राई-मिरचाई।

बेटे के लिए

तारीख़ें बदलती हैं
बढ़ते वर्ष के साथ
बदलते हैं कैलेंडर

उठो, पढो, राइटिंग सुधारो
की रट लगाई माँ को पता नहीं चलता
कब उसका बेटा उसके लिए चाय बनाने लग गया
कब उसके काम में हाँथ बटाने लग गया।
” पार्लर चलोगी माँ?
पापा की बाइक दिला दो,
मै ले चलूंगा”
बेटे के पैर इतने लंबे हो गए,
मुखड़ा निहारती माँ को
पता नहीं चलता

माँ के साथ सोने की ज़िद करने वाला बच्चा
आधी रात, अपने कमरे से निकल कर
धीरे से माँ के बगल में घुस कर सो जाने वाला बच्चा,
डोरेमोन, सिन-चैन देखते-देखते कब ‘बादशाह’ के ‘बज़्ज़’ का फैन हो गया,
माँ जान नहीं पाई

‘मिनी मिलेशिया’ खेलते खेलते
कब स्कूल की लड़की से चैट करने लग गया,
सब शेयर करने वाले बेटे की माँ भी
कहाँ कुछ देख पाई

कब बेटा खेलते जाते हुए भी हाफ पैंट की ज़गह
जींस पहनने लग गया,
माँ को पता नहीं चला,
धूल-मिट्टी-धूप में बेफिक्र रहने वाला बच्चा
कब डीओ, सेट वेट का शौक़ीन हो गया
माँ को भनक तक न लगी

सेकंड, मिनट, घण्टे, दिन
महीने और साल
आँखों में बसा लाडला
कब किशोर बन गया,
माँ को खबर ही न हुई

अचानक एक दिन उसकी तन्द्रा भंग होती है:-
बाहर? कैसे रहेगा?
बहुत छोटा है।
बच्चा है अभी।
सारी पढ़ाई-लिखाई,
विचारों की जागरूकता,
आधुनिकता दम साध लेती है
जाग उठती है एक पारम्परिक माँ,
जब उसके साथ के लोग टोकते हैं,
” पगली, बच्चा नहीं रहा अब
लड़का हो गया है तुम्हारा बेटा।

आत्मसंवाद

क्या सच में इतना मुश्किल था?

सड़क पर किसी पिल्ले को लगी चोट से द्रवित होने वाला मन
देता रहा चोट किस तरह स्वयं को
दूर देश की किसी घटना से व्यथित हो उठने वाले हृदय ने
अपने ही प्रति कैसे बरती इतनी निष्ठुरता
कहीं से आती धमाकों की आवाज़ से दहल उठने वाली छाती के कानो ने
कैसे सहा होगा दिल के चूर होने की चीत्कार

मैं, जिसे एक हरे पत्ते का पीला पड़ जाना भर देता हो उदासी से
अपनी गुलाबी मुस्कुराहटों का पीलापन
स्वीकार था सहर्ष ही?

चुटकी भर बारिश में तर
मुट्ठी भर बादल पर सवार
उड़ने वाली कामनाओं ने क्योंकर
अपने ही पंजो नोच डाला
अपना आकाश
झिर्रियों के अवसर तलाशती अस्तित्व
को चुभने लगी हवाएँ क्यों

क्या इतना दुष्कर था साथ हमारा
कि रख ली हमने दूरियों की भभकती चिंगारी
तुमने बायीं जेब मे
मैने कपड़े के भीतर, सीने के पास

क्या इतना मुक्कमल था रूठे रहना
क्या इतना मुश्किल था हमारा मना लेनायथ

तुम कह दो एक बार
तुम कहोगे तो मैं मान लूंगी
कि ये मेरे और तुम्हारे बनाये बहाने नही
ये सचमुच इतना ही मुश्किल था!

साथ

मैने जितनी पुकार लगाई
वे सब मुझ तक वापस लौट आई हैं
नितांत सन्नाटे में मैं उन्हें सुनती हूँ

मेरी अकेली ध्वनि
मुझसे छूटकर भी
मुझे अकेला नहीं छोड़ती

मैने साथ रहने की जितनी कल्पना की है
और तुमने दावे,
उन सबमे
अकेलेपन ने ही सम्पूर्णतः
साथ निभाया है।

छन्न की ध्वनि

मै मूढ़
इतना ही जान पाई प्रेम कि
एकांत की तन्द्रा भंग करने की शक्ति
है केवल आकुल पुकार के पास

इतनी तीव्र थी घात
कि देर तक गूंजती रही
मन के एकांत में
मन के टूटने की ध्वनि!

मन

सूने, एकांत कक्ष से मन।
क्यों नहीं लगाया कोई किवाड़?
ना ही एक भी कुंडी
कमसकम
हवाओं के खरखराने से
उपजी ध्वनि का भरम तो पनपे

मेरे मन!
भय किस बात का?
भला किस प्रकार रह लेते हो
यूँ दुर्ग समान अभेद किले के भीतर?

हर उपद्रव उपरांत करते हो चौकस दुगनी
तदोपरांत भी असफल रहे हो घुसपैठियों से

अच्छा कहो तो!
बचते हो फिर भी कितने दिन?
रहते हो कितने सुरक्षित?

मरीचिका

मेरे ओंठ;
रेत से सूखे ओंठ
मीठे जल से भरे ओक बने
तुम्हारे लिए

तुम्हारी दो आंखों में मुझे
मीलों फैला मरुस्थल दिखता है
तुम मेरी आँखें देखो
मेरी आँखों में तुम खुद को देखो

तुम इस झील में स्वयं को डूबता देखो।

परिकल्पना

सोचो!
तुमने मुझे सोचा और
मैं तुम्हारे समक्ष आ खड़ी हुई

तुम, सोच के
सच होने की कल्पना करो

तुम देखना; मुझ तक आने के
सारे रास्ते
तुम्हारे पैरों में
बिछ जाएंगे
तुम, अपना और मेरा मिलन देखना।

प्रभाव

तुम मेरा नाम पुकारो
हवाओं में
और देखो;
मैं कविताएँ लिखती हूँ कि नहीं

तुम उन्हें पढ़कर मुस्कुरा दो
और देखो;
कुछ फूल उगते हैं कि नहीं

तुम अकेले में हंसकर,
मेरी तस्वीर छूकर,
कह दो-पागल!

तुम आंखे मूंदो
और देखो;

मैं तुम्हारे अकवार में हूँ कि नही!

प्रतिछाया

कृष्णपक्ष अंबर के वक्ष पर
चाँद समान बिम्ब उभरा है
अभेद अंधकार पारदर्शी हुआ
सायास ही!

न था छोर कोई जिसका
उसके इस पार मैं थी
उस पार भी था
प्रतिबिम्ब मेरा ही

उस अवर्णनीय क्षणों में
नेत्रों ने तोड़ा
मूंदे जाने का प्रतिबंध

जबकि थी मनाही छाया से उपजी प्रतिछाया की

था अपराध मेरा इतना ही
क्षमाप्रार्थी हूँ, इतनी ही।

निरस्त

हथेली पर हिना जैसे
रची जा रही थी
पृष्ठ पर एक कविता

कांच जैसा नुकीला
था नोक जिसका
तन्मयता के सीने
में धँस गया

था निमित निर्माण का जो
सब मिटा गया।

अपराध

भूल थी जो
कण जितनी सूक्ष्म
तुमने उसे विस्तार दिया

निर्दोष समान दोष
को क्यों छल कहा?

अपराध ही है जब, तो
लो अब
अंकित रहेंगे दंड इसके।

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