राघवेन्द्र शुक्ल की रचनाएँ

भीड़ चली है भोर उगाने

भीड़ चली है भोर उगाने।

हांक रहे हैं जुगनू सारे,
उल्लू लिखकर देते नारे,
शुभ्र दिवस के श्वेत ध्वजों पर
कालिख मलते हैं हरकारे।

नयनों के परदे ढंक सबको
मात्र दिवस का स्वप्न दिखाने।

भीड़ चली है भोर उगाने।

दुंदुभि बजती, झूम रहे हैं,
मृगतृष्णा को चूम रहे हैं,
अपनी पीड़ाएं फुसलाकर
नमक-नीर में घूम रहे हैं।

किसी घाव पर किसी घाव के
शुद्ध असंगत लेप लगाने।

भीड़ चली है भोर उगाने।

नए वैद्य के औषधिगृह में
दवा नहीं बनती पीड़ाएं।
सत्य नहीं, कवि ढूंढ रहे हैं
चारणता की नव उपमाएं।

नेता राष्ट्रध्वजों से ढंकते
जन-स्वप्नों के बूचड़खाने।

सूरज को कल फिर आना है

सूरज को कल फिर आना है,

तप्त-खिन्न से पत्थर बोले,
तनिक सांस ले, बाँहें खोले।
शीत चांदनी से नहला दो
ऐ चंदा-सर! हौले-हौले।
शीतलता का दीप जला दो,
ज्वाल-अंध कल फिर छाना है।

दीप अगिन थे कभी जलाए,
उनका अब प्रकाश ना भाए,
चंद्र-खिलौने पर अड़कर, अब
हठवश हो सब दीप बुझाए।
उसे पता क्या नहीं! पूर्णिमा
को कुछ दिन में ढल जाना है।

जीवन के अर्जन में क्या है?
जो भी है, सब कुछ धुंधला है।
लघुता को निज बीज बनाकर
जो उग जाए वही फला है।
जो पत्थर ठोकर में हैं, कल
उनको ही पूजा जाना है।

सविता पर निर्भर क्या रहना?
कविता की भाषा क्या कहना?
जीवन के इस महायज्ञ में,
हविता सत्य, सत्य है दहना।
समर सिंधु में नाव, तिरोहण
या फिर पार उतर जाना है।

हम प्रतिकों को बचाते रह गये

कुछ अंह का गान गाते रह गए।
कुछ सहमते औ’ लजाते रह गए।
सभ्यता के वस्त्र चिथड़े हो गए हैं,
हम प्रतीकों को बचाते रह गए।

वेद मंत्रों की धुनों पर धूर्तता
सज्जनों का होम करती जा रही है,
शून्य मूंदे नैन अपने पथ चले
मूक धरती नृत्य करती जा रही है।

तोड़ अंतस के शिवालय हम सभी
नभ-देवताओं को बुलाते रह गए।

नीड़ के प्यासे परिंदों को लगा
इस बार बादल से गिरेंगे तृण नए।
इस बार हमने आंच बदली है नई
इस बार नभ में सिंधु-जल-जत्थे नए।

बूँद गिरना तो रहा, गरजे जलद,
हम नीड़ के सुर बड़बड़ाते रह गए।

यूं मना है जश्न उनकी जीत का,
आह के स्वर दब गए हैं शोर में।
कौन सा षड्यंत्र खेला चांद ने
एक भी तारा न आया भोर में।

घुल गई हर सांस में है रातरानी
हम सुबह के गीत गाते रह गए।

कर्म से ज्यादा जरूरी है प्रदर्शन,
कह रहे श्रीकृष्ण अब के पार्थ से।
धर्म की भाषा ने बदला व्याकरण,
नीति अपने अर्थ लेती स्वार्थ से।

सत्य है नेपथ्य में बंधक बना,
मंच बस मिथकों के नाते रह गए।

हम निरन्तर सभ्य होते जा रहे हैं
छोड़कर सिद्धांत सारे सभ्यता के।
रूचते हमको कहाँ हैं अब यथार्थ
हम समर्थक हैं तो केवल भव्यता के।

यूं गिरे उनके हवा-निर्मित महल
कान अब तक सनसनाते रह गए।

जड़ लिए हैं स्वप्न उन्होंने हमारे
राजसिंहासन के पायों में कपट से।
छोड़कर मंझधार में मांझी हमारे
खे रहे हैं नाव बैठे सिंधु-तट से।

कर लिया अनुबंध रजनी से सुबह ने
हम रात भर दीपक जलाते रह गए।

आँखें कुछ दिन से भारी हैं

आँखों पर भार बहुत है,
आँखें कुछ दिन से भारी हैं।

नींदों ने निगले चौराहे,
अनुकल्प चयन करना क्या है!
स्पष्ट दृष्टि के धुंधलेपन में,
दृश-यंत्र पहन करना क्या है!
यह पूर्व-लिखित पटकथा-बन्ध,
निज-बुद्धि कहन करना क्या है!
यह दौर बिके तर्कों का है,
प्रति-मर्श गहन करना क्या है!

हर ‘शब्द’ ऋणी लगते सबके,
हर ‘गर्व’ कहीं आभारी हैं।

आँखों के जल से सींच-सींच,
उगते पौधे सम्बन्धों के।
हैं बंधे रीढ़ के धागों से
काग़ज़-पत्तर अनुबंधों के।
पवनों के पाँव जकड़ते हैं,
लंगड़े सैनिक तटबंधों के।
अनफिट किरीट का भय गढ़ते
हैं अनुच्छेद प्रतिबंधों के।

अब धर्म वही, अब सत्य वही,
जो कृत्य-कथ्य सरकारी हैं।

हमको यह सब कब करना था

हमको यह सब कब करना था!

हमने अपने हाथ गढ़े थे,
हमने अपनी राह रची थी।
हमने तब भी दीप जलाए
जब दो क्षण की रात बची थी।

जुगनू की पदवी मिलते ही
पंख लगाकर आसमान के
जगमग जग में कब बरना था।

जब हम थे शपथाग्नि किनारे,
तुम भी तो थे हाथ पसारे
लिए शपथ की आंच खून में
रक्तिम प्रण नयनों में धारे।

युग के गांधी की लट्ठों को
सिस्टम की पाटों में पिस-पिस
इक्षु-दंड सा कब गरना था।

चंद मशालों की आंचों में
हमको रण का गुर पढ़ना था।
बची-खुची आवाजों से ही
इंकलाब का सुर गढ़ना था।

चट्टानी नीवों पर निर्मित,
घिस-घिस, पिस-पिस, हमको आखिर,
रेत-महल सा कब झरना था।

तुम बुला लो / राघवेन्द्र शुक्ल

 

तुम बुला लो,
इससे पहले भूल जाऊं लौट आना।

यह नगर है, आप हैं, आपत्व खोया।
मृत्यु का उद्यान, है अमरत्व सोया।
देह के पथ पर चले अनुभूति का रथ,
एक मंदर ज्यों रहा हो ज़िन्दगी मथ।

धूल हूँ मैं,
जानता हूँ चित्र-स्मृति ढांप जाना।

मैं श्रवण की अन्य पद्धति जानता हूँ,
मौन के चेहरे कई पहचानता हूँ,
भर गया जीवन परात्मालाप से,
ब्रह्मांड भी कम आयतन, संताप से।

शूल हूँ मैं
फूल था, अब भूल बैठा मुस्कुराना।
तुम बुला लो,
इससे पहले भूल जाऊं लौट आना।

मन हुआ जाता हिमालय ही निरन्तर,
चेतना तालाब सी ठहरी हुई है।
दृष्टि का परिसर समाया जिस परिधि में
तीरगी उसमें सदा गहरी हुई है।

उर नहीं यह,
है अमावस- चंद्रमाओं का ठिकाना।
तुम बुला लो,
इससे पहले भूल जाऊं लौट आना।

अभी संस्करण कई यहां तानाशाहों के

जीवन है मझधार में
जिन पर नैया पार लगाने का जिम्मा वह
डूबे मेघ-मल्हार में।

ताला टूट रहा है हर दिन,
धुर्रा छूट रहा है निशिदिन,
रिक्त देश की पीठ बज रही
धिनक-धिनक धिन,
धिनक-धिनक धिन।

अधिनायक जयकार में,
राष्ट्रगान की धुन पर मोहित जन-गण-मन यह
थिरक रहा अन्हार में।

घड़ियालों ने छोर संभाला,
आंसू बेचे, फंदा डाला।
मछली फंसी, मगर मगरों के
लिए खुला हर जाला-ताला।

डाकू चौकीदार में
घायल होकर देश मसीहा ढूंढ रहा क्यों
बहुरूपिये किरदार में।

आडम्बर का खेल रचा है,
धूल गगन तक जा पहुंचा है,
झूठ की वंशी बजा रहा है,
सत्य-सत्य का शोर मचा है।

गीदड़-सी ललकार में
देख रहा है विश्व वीरता जिनकी प्रतिदिन
खून सने अखबार में।

जैसा है कर्ता, प्रतिकर्ता
उसी रूप का कर्ता-धर्ता।
स्वप्न-हरण के ढंग पुराने
नए-नए आते अपहर्ता।

उत्तरवर्ती अधिकार में,
अभी संस्करण कई यहां तानाशाहों के
बैठे हुए कतार में।

सिक्का उछला रे!

सिक्का उछला रे!
जब किस्मत के मैदान में..

तौल रहे हैं खोए-खोए
क्या खोया क्या पाया।
सिक्के ने क्या नया लिखा है
क्या प्राचीन हटाया।

कितना सच होंगे?
जीवन भर के अनुमान में।
सिक्का उछला रे!
जब किस्मत के मैदान में।

रात चुनें या दिन बेहतर है,
किस विकल्प पर जाना!
दिल की बात सुने या जीवन
चुने, राह दिखलाना!

सच बतलाना रे!
इस अंतिम अनुसंधान में।
सिक्का उछला रे!
जब किस्मत के मैदान में।

एक ओर है हंसी फूल की
एक ओर है कांटा।
एक ओर संगीत सुरीला
एक ओर सन्नाटा।

अपनी बारी पर
जा अटका है असमान में।
सिक्का उछला रे!
जब किस्मत के मैदान में।

झन-झन-झन-झन झनक रहा, यूं
हवा बजाती कंगन।
कण-कण के ईश्वर की वाणी
का हो रहा तरंगन।

कुछ ‘गा’ आया है
पर, नियतिकार के कान में।
सिक्का उछला रे!
जब किस्मत के मैदान में।

थक गया है दोपहर

रेत सा मन मिल गया है,
अभी तपता, अभी शीतल
अभी उड़कर बिखर जाए
अभी भर ले हृदय में जल।

पत्थरों सा अहंकारी
दिवा-निशि संतप्त तपकर।
लेख जो कुछ भी,अमिट,
है बैर गति से, शून्य शंकर।

तिमिर-सा निज नेत्रहीन,
अनुर्वर, चिर सुप्तप्राय।
शोर: श्रम से श्रांत सोया,
कल्पनाएं कृष्णकाय।

निर्झरी वाचालता है
अधोगामी नित पतन है।
दूब-सी उगती अभीप्सा
क्यारियों में नागफन है।

एक ठहरे नाव-सा
गतिशील सरिता के सहारे।
देखता कातर, किनारा
एक यात्रा-चित्र धारे।

मेघ-सी यायावरी है,
मेघ-सी ही है विवशता।
कंठ तक भरकर न छलके
मन की ऐसी है कलशता।

क्षण में ही नव बाग़ फूले
क्षण में ही पतझर पधारे,
क्षण में सावन झूमता हो
क्षण में तपता जेठ जारे।

भोर देखी, प्रात छूटा,
नींद टूटी, स्वप्न टूटा।
बह गया कितना मरुस्थल,
बह गईं कितनी हवाएं,
बह चुकी है राप्ती में
नीर की कितनी सदाएं।

अड़ गया क्या!
टल गई भू इस दिशा से उस दिशा तक
सूर्य का रथ टस न मस,
पर!

थक गया है, दोपहर।

उस रोज

बस कलम उठाई, लिक्खा रंग।

उस रोज न रक्खा वश में मन
सब छंद कहीं पर छोड़, कवी
हर शर्त के नाके तोड़, कवी
सब भूल गया वर्जन-अर्जन।

उस रोज नहीं ढूंढे अक्षर
उस रोज नहीं खोजा शीर्षक
उस रोज लिखा जो कुछ, औचक
वह अर्थ-भाव जो चिर-दुर्धर।

ध्वस्त किया सब अनुशासन
प्रस्तर पर लिखे नियम-संयम
उन्मुक्त व्योम के मध्य स्वयं
का घोषित किया विश्व-निर्वासन।

इग्नोर किया सब राह-वाह
इक लीक धरी, फिर मेड़ पड़ी
परवाह जगत की, किया स्वाह
बहने ही दिया जीवन बेढंग।

बच्चनोत्तर ‘इस पार-उस पार’

मैं आज चला, कल आओगे तुम,
परसों सब संगी-साथी।
दुनिया रोती-धोती रहती, जिसको
जाना है, जाता है।।

जीवन-पथ में उत्तरवर्ती की,
हमको चाल हंसाती है,
यह भूल सभी जाते, सबको
यह सृष्टि यूं ही ले आती है।
जितना भी चलते जाएंगे,
हम छोर न अंतिम पाएंगे।
हर बार अभीप्साओं से कुछ
पग ही पीछे रह जाएंगे।
लघु माने, तो आजीवन ही
रोना-धोना साधारण है,
है जहाँ कहीं भी तृप्ति वहां,
फिर सुख-दुख का क्या कारण है।
यह पथ के गड्ढों का दुःख है,
सरिता ने उनको रिक्त तजा
जिसके मग में कुछ गर्त नहीं
वह क्या खोता-क्या पाता है,
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है।।

इक दीप हमारे अंदर था,
इक दीप हमारे बाहर था।
इक तिमिर हमारे भीतर था,
इक तिमिर हमारे बाहर था।
इक दीप जो अंदर था उसकी
छाया में जीवन हंसता था।
इक दीप जो बाहर था उसके
आतप से प्राण झुलसता था।
इक तिमिर जो भीतर था उसमें
सहचर दीपक मुसकाता था।
बाहर का तिमिर भयानक था,
बढ़ता था और डराता था।
कितनी नींदों का मूल्य दिया
इन दीपों की रखवाली में,
इक रोज प्रकृति का कोषपाल
सब कीमत लौटा जाता है।
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है।।

इक रोज मनुज के जीवन में
ऐसी भी सांझ उतरती है।
उज्ज्वल पथ की सुंदर चादर
इक रात कुतरने लगती है।
सपने आंखों से उतर कहीं
अंधेरे में खो जाते हैं,
अंतर्मन धुंधला जाता है,
सब दुश्मन-से हो जाते हैं।
हतप्रभ जीवन इस परिवर्तन का
हेतु समझने जाता है
तब बुद्धों-नचिकेतों-कृष्णों के
भाष्यों पर शीश लड़ाता है।
इस दुनियावी अंधेरों का इक
सूर्य ढूंढते आखिर में
इक रोज समय की बाती पर
जलता जीवन बुझ जाता है।
दुनिया रोती-धोती रहती,
जिसको जाना है, जाता है।।

यह जीवन-पत्र अलक्षित

होती विदग्ध अंतर की
ज्वाला से उर-वैतरणी।
जिसकी ऊष्मा से भीगी,
नयनों की उर्वर धरणी।

कुछ नए सपन उगते हैं,
आशा नव पल्लव जनती।
सागर-तट-नियति पटों पर
रेखाएं मिटती-बनती।

जब-जब भी अवसर आया,
जीवन में सुमन खिलाने,
यह निठुर नियति है लगती
पौधों के मूल हिलाने।

आरंभ करें उपक्रम को
उपवन से जब संगम का।
अंतर-भावों की जलधि में
उठता मैनाक अहम का।

मन विश्वामित्र का हठ है,
जीवन त्रिशंकु-सा अटका।
हर पल इक युद्ध सदृश है
पर पता नहीं प्रतिभट का।

दिन-दिन पर बाले सूरज,
पर भास नहीं होता है,
जाने किस श्याम विवर में
जीवन-प्रकाश खोता है।

ग्रहता ज्योतित आशा को
अज्ञात तिमिर का दानव,
अपने ही व्यूह के आगे
नतमस्तक होता मानव।

सुस्मिति के अवगुंठन में
दुःस्वप्न शयन करता है।
कितना झूठा जीवन का
अनुवाद नयन करता है।

ऐसा न हो कि मन-उपवन
ढलता जाए मरुथल में।
ढल जाए भरी दोपहरी
जीवन की, अस्तांचल में।

रथ है पर रथी विरथ है,
धनु है, शिंजिनी शिथिल है।
समरांगण की चौसर पर
अब दांव लगा तिल-तिल है।

स्वर अपने कभी डराते,
औरों के स्वर से हटकर।
उर का प्रतिरोध, स्वरण है
पोथी-पत्री रट-रटकर।

यह सच में बड़ा मनोहर
सुंदर संसार तुम्हारा।
मेरा अंतर-अनुशासन
इसके शासन से हारा।

प्रचलन उन्मुख प्रतियोगी
प्रतिपग प्रतिकूल प्रवर्तन।
प्रण प्रतिभट, प्राण प्रलय-सा
प्रस्तुत करता है नर्तन।

यह शर्तों की दुनिया है,
पांवों का पाश यही है।
धरती तो दे दी लेकिन
ऊपर आकाश नहीं है।

यह प्रेषित पग जिस पथ से
आया इस दूर विपथ पर।
पदचिन्ह मेटते तक, फिर
लो फिरा विचित्र सुरथ पर।

तोड़ो विधि, शिव-धनु जैसे,
बहती सरिता पलटा लो।
यह जीवन-पत्र अलक्षित
ऐ प्रेषक! फिर लौटा लो।

कविः भाव-पुरुष का प्रस्तोता

कवि! जीवन के मनस मंच पर
भाव-पुरुष का प्रस्तोता है।

घने विपिन के सन्नाटों में,
सुरभित सुमनों के कांटों में।
पर्वत के हठ, तरु की जड़ता,
निर्झर के स्वर की बर्बरता।
विविध घटों के जल में बिंबित
एक भाव का रवि होता है।

घन गर्जन की भय प्रतीति में,
दादुर की हर करुण गीति में।
झींगुर की झंकार वही है,
हर वीणा का तार वही है।
विविध सुरों की झंकृति में बस
एक वायु-आरति रोता है।

स्मृति मृत्तिका समयांतर की।
दीपावली अजन प्रान्तर की।
मरुथल की मृग-मरीचिकाएं,
तृष्णा- आशा- अभिलाषाएं।
कवि! जीवन के समर-यज्ञ का
ऋषी-ऋचा है, हवि-होता है।

सबसे उर्वर ज़मीन

पाषाण तराशे गए,
सुंदर और सुंदर।
भगवान कहा गया उन्हें।
स्तुति गाई गई।
प्रेम लुटाया गया।
लेकिन, यह एकतरफा निष्ठा थी।
एकतरफा आस्था थी।
भगवान की ओर से
प्रेषित-प्रेम की कोई पावती नहीं आयी।
लेकिन, पुजारी ने दावा किया कि
-भगवान सारे संसार से प्रेम करता है
– कि यह पत्थर नहीं
देव हैं, जो हमारी तकलीफें दूर करने के लिए
मूर्तियों से बाहर आ जाएंगे।
अतार्किक तर्क अस्तित्व में आए।
कहानीकारों को आमदनी हुई, लेकिन,
भेद तब खुल गया
जब मूरत के सामने
मनुष्यता का सबसे जघन्य और बर्बर दृश्य भी
भगवान के चेहरे पर शिकन न ला सका।
ईश्वर दरअसल,
कोई सत्ता नहीं, बल्कि समूचे विश्व की
अधूरी आकांक्षाओं, आपदाओं और विवशताओं का
विलगित अपराधबोध-पुंज है,
जिसमें झोंक देते हैं हम अपना समस्त अपराध
और बोल पड़ते हैं कि
उसकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं संभव।
हम उससे रखते हैं निष्ठा यह जानकर भी
कि एकतरफा निष्ठा
आशाओं, उपेक्षाओं और दुखों की
सबसे उर्वर जमीन है

क्यों पराजय गुनगुनाऊँ

शब्द की नव-सर्जना की शक्ति को मैं क्यों लजाऊं?
क्यों पराजय गुनगुनाऊँ?

पृष्ठ भावों के भरे हैं अगिन रंगों के सृजन से।
पर न जाने क्यों न जाती एक काली टीस मन से।
वायु के विजयी स्वरों ने राख में फिर अग्नि डाली।
सूर्य के रथ चढ़ नियति में लौट आयी रात काली।

अब करूं क्या! फिर सुलगने की कहाँ से शक्ति पाऊँ।
क्यों पराजय गुनगुनाऊँ!

जानते हैं सब, यहाँ जो कुछ मिले संजोग है।
हां, मगर यह जानकर भी कब रुका उद्योग है।
उद्योग, जिसकी परिणति में है न केवल जीत ही।
उद्योग लिखता जीत की प्रस्तावना भी, गीत भी।

प्रस्तावना को हार कह संभावनाएं क्यों बुझाऊँ!
क्यों पराजय गुनगुनाऊँ?

हमने चाहा है जिसे छीना गया वो हाथ से।
हम वो पारस स्वर्ण, होवे मृदा, जिसके साथ से।
नियति का यह रंग है फिर भी भुवन पर चढ़ रहे,
कुछ चित्र जीवन पृष्ठ पर बिन रंग ही के गढ़ रहे।

अब बस कभी रंगों के जंजालों में ना जीवन फंसाऊं।
क्यों पराजय गुनगुनाऊं।

हम चले थे कुछ अंधेरों की पहनकर बेंड़ियां।
उन पगों ने अब उजालों की रची हैं श्रेणियां।
थमना नहीं, बुझना नहीं यह विश्व चाहे वाम है-
मद्धम सही, पर सतत जलना ही दिए का काम है।

सोचता हूं क्यों न मद्धम दीप-सा ही झिलमिलाऊं?
क्यों पराजय गुनगुनाऊँ?

रिक्तताः मैं टटोल रहा हूं अक्षयपात्र

जीवन के अक्षयपात्र की रिक्तता
दुर्वासा और उनके सौ शिष्यों की
उपस्थिति से भयभीत है।
प्राण की वेदना
द्रौपदी की प्रार्थना में शरणागत है,
और मैं टटोल रहा हूं अक्षयपात्र
कि तुम मिल जाओ कहीं
चावल के तिनके की तरह..

कैलेंडर के बदले पन्ने बसंत नहीं लाते

जब जमीन से उठकर वृक्षों पर
लौट आते हैं पत्ते,
अगर बसंत वही है
तो अभी इंतजार के दियों में और तेल डाल लूं।
झील के किनारे गाती कोयल की कूक
में सुर के लौट आने का नाम है बसंत
तो मुझे अपने कान
अभी हाथों से बंद रखने होंगे।
शीत से भीत किरणों के बिछोह से दुखी
फूलों की आंखों में
मिलन की चमक से बसंत दिखता है
तो अभी रजाई से बाहर निकलना ठीक नहीं।
सज-धजकर जो बसंत आता है न
उसकी वैध सीमाएं
हर चौखट पार नहीं करती।
सबके अपने हिस्से के पत्ते हैं,
सबकी अपनी कोयल की कूक है
सबके अपने सूरज-अपने फूल हैं
हर किसी की बगिया में
कैलेंडर के बदले पन्ने बसंत नहीं लाते..

लौट चलें क्या!

समय बहुत है अभी न बीता,
लौट चलें क्या!

अभी खून में तुम्हारे घर की
महक ज़रा भी घुली नहीं है।
अभी सांस भी शरद ओस की
सुधा-वृष्टि से धुली नहीं है।
अभी अकेली ही है, किसी से
मनस-चिरइया मिली नहीं है।
अभी है गीली मृदा मोह की,
हृदय की खिड़की खुली नहीं है।

अभी न प्रतिद्वंदी न धावक,
न हर्षाहर्षित न मन सभीता,
लौट चलें क्या!

अभी न रण में रक्त बहुत है
अभी न परिचय जीत-हार से।
अभी न निंदा का रस चखा है
अभी न परिचय पुरस्कार से।
अभी न सावन-बसन्त देखा
अभी न पतझड़ के पर्ण देखे।
अभी न दिन-रात पल्ले पड़े हैं
अभी न दुनिया के बहु-वर्ण देखे।

समर शुरू है कि इससे पहले
श्रीकृष्ण कर दें आरम्भ गीता,
लौट चलें क्या!

जैसे हार गया था कलिंग अशोक से

प्रेम से व्याकुल
जब भी मैं तुम्हारे बारे में सोचता हूँ
सामने कभी नहीं आती तुम्हारी देह
आती हो तुम तत्वतः,
एक स्थूल अस्तित्व
निराकार
एक अनुभूति की तरह
व्याप्त हो जाती हो
मन-मस्तिष्क में।
हवा की तरह बहने लगती हो
रक्त में,
और झूमने लगती है मेरी धड़कन।
एक अपूर्व सौंदर्य का सौरभ
जो तुमसे निकलता
केवल मैं महसूस कर रहा हूँ,
यकीन मानो,
संसार के लिए तुम जैसी दृश्य हो
मेरी दृष्टि में वैसी नहीं,
मैंने तुम्हें आंखों से कम
अंतर्दृष्टि से ज्यादा देखा है
जहां तुम सम्पूर्ण सुन्दर हो,
इतनी कि तुम्हे खो देने का डर प्रतिक्षण
इसलिए भी होता है
कि किसी दिन
तुम्हारे बेशकीमती होने का
किसी को पता लग जाएगा
और प्रतिस्पर्धाओं से सदा भयभीत मैं
एक युद्ध में हार जाऊंगा तुम्हें
जैसे हार गया था कलिंग
किसी अशोक से।

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