राजकिशोर सिंह की रचनाएँ

एक कप चाय 

एक कप चाय
दूध चीनी का केवल घोल नहीं
प्रेम का उपहार है
अतिथियों का स्वागत
आगंतुकों का सत्कार है

एक कप चाय
कुछ नहीं
केवल वार्ता का बहाना है
बराबरी का सूचक यह
प्रेम का ठिकाना है

धनवानों की चाय
गरीबों के लिए उपहार
धनहीनों की चाय
अमीरों का सत्कार
इस अफरा-तफरी संसार में
जहाँ मितव्ययता का बोल-बाला है
वहाँ अतिथियों के स्वागत में
सबसे आगे चाय का प्याला है

थके मांदो का पंथ यह
बूढ़ों की स्फूर्ति है
सभ्यता का प्रतीक यह
भावों की सच्ची प्रतिमूर्ति है

चाय एक बहाना है
मित्रों को घर बुलाने का
घूँट-घूँट में प्यार भरा है
और प्यार लुटाने का

चाय एक मानक है
मानव जीवन स्तर का
कौन बड़ा है, कौन छोटा
और नीचे-ऊपर का

बन जाती अमृत यह
जहाँ प्रेम का होता रूप
बन जाती वही जहर
अगर उपेक्षा की हो धूप

चाय अगर मिली नहीं
गर किसी के दरबार में
उड़ने लगती खिल्ली उसकी
इस भौतिक संसार में।

विश्व जनमत और अमेरिका

खाड़ी युद्ध के लिए बुश ने
विश्व जनमत पर किया कुठाराघात
प्रदर्शन, हड़ताल, विरोध पर
करता रहा इराक में रक्तपात

हुआ घमंड अमेरिका को
बल का हुआ उसे अहंकार
आतंकी आतंक का अफवाह बता
कर दिया इराक का संहार

मानवता पर घोर जुल्म
फिर भी मौन रहा संसार
भय के मारे आह न निकली
टूटता रहा इराक पर पहाड़

गनीमत है आज जीवित नहीं नेपोलियन
नहीं तो लजा जाती उसकी चाहत
आज अगर नादिरशाह भी होते
उन्हें भी नहीं मिलती बुश की राहत

हो गई इराक की शक्ति क्षीण
बची नहीं बेचारे की जमानत
लुट गई विश्व की धर्म-धरोहर
वर्षों की सब अनमोल अमानत

इंसानों का चमन उजाड़ा
जिससे शर्माती दानवता
चारों ओर चीत्कार-चीख है
हाय रे मानव! हाय मानवता!!

ज्यादती है अमेरिकी हमला
जो किया नहीं दुनिया में कोई
मानवता का दर्द देखकर
दानवता भी फूटकर रोई

कहा गया गरीबों की आह
जाती नहीं कभी भी व्यर्थ
चीख से आहत होगा अमेरिका
भुगतना पड़ेगा उसे घोर अनर्थ।

अशांत का जन्मदिन

नमन करो इस शब्द पुरुष को
जिसकी वर्षगांठ हमने मनाया है
अद्भुत शक्ति, समुंदर सा धीरज
चेहरा जिसका मन को भाया है

दुबला-पतला सीघा-साध
पहली बार जब देखी काया
अद्भुत शक्ति, समुंदर सा धीरज
चेहरा जिसका मन को भाया है

दिल में सद्गुण मन में साहस
इनके होठों पे सत्यवाणी है
पौरुष प्रतिमा व प्रीति प्राण
इनकी यही कहानी है

नाम अशांत पर दिल में शांति
फिर भी अशांत भोला है
प्रेम देने पर ये होते शबनम
घृणा पर तो शोला है

सादा जीवन उच्च विचार
ही इनकी आधर शिला है
मगर प्रेम प्रसंग काव्य में इनके
रंगीन फूलों सा खिला है

पैर पजामा तन में मलबरी कुर्त्ता
के अद्भुत परिधन में
रौनकता लगती ऐसी इनकी
जैसा किसी जवान में

कविता लिखना गोष्ठी करना
इनकी रक्त धारा है
नवसृजित कवियों का काव्य
इन्हें बहुत ही प्यारा है

साठ वर्षों की लेखनी में
प्रेम प्रसंग की है उमंग
कलम इनकी ऐसी पिचकारी
देती जो बिना होली के रंग

मजदूर दिवस के शुभ अवसर पर
जनमा है एक साहित्यिक मजदूर
काव्य सेवा से हिन्दी माँ की
जिसने की है सेवा भरपूर।

अगला युद्ध पानी के लिएt

भूमि के लिए ही इस धरती पर हुए कई संग्राम
अब तेल के लिए जगत में मच रहा कुहराम
पानी अब ख़त्म हो रहा है दुनिया में तमाम
पीने के लिए जग में लोग करेंगे कत्लेआम
भूमि……

भूमि के लिए जितना युद्ध हुआ नहीं घमासान
पानी के लिए विश्व होगा अब उतना ही वीरान
टके सेर खून सौ टके सेर पानी का होगा जब दाम
तब पानी के लिए जग में लोग करेंगे कत्लेआम
भूमि…………

गंगा में जल की कमी हुई यमुना हुई अशुद्ध
दिल्ली क्या पटना तक जलश्रोत हुआ अवरुद्ध
हाहाकार मचेगा जग में लोग होंगे सब त्राहिमाम
पानी के लिए जग में लोग करेंगे कत्लेआम
भूमि……..

भूमि खातिर भूपति लड़े, तेल लड़ाया धनवानों को
पानी टकरायेगा सबको युद्ध में
इस पर अधिकार जन सामान्य को
हर घर होगा इराक हरेक को होना पड़ेगा सद्दाम
पानी के लिए जगत में लोग करेंगे कत्लेआम
भूमि…..

देश-विदेश क्या भाई-भाई में युद्ध होगा सुबह-शाम
बाइसवीं सदी में हवा के लिए युद्ध दे रहा है पैगाम
बूंद-बूंद पानी बचाओ आएगा जग के काम
पानी के लिए जगत में लोग करेंगे कत्लेआम
भूमि…

शिक्षक : कल और आज

कहलाते हैं शिक्षक तब गुरु
जब ब्रह्म का रुप हुआ करते
शिव जैसा वचन देकर
विष्णु सा सृष्टि रचा करते

भारतीय शिक्षक कहलाते हैं अध्यापक
अंग्रेज कहलाते थे सर
काम करते पढ़ाने का
लेकिन होते थे मास्टर

हुआ जब निजी शिक्षकों का प्रचलन
मास्टर हुआ मस्सय
द्वारे-द्वारे नगरी-नगरी
शिक्षकों का यही है आशय

विद्यार्थी होते हैं तब शिष्य
जब शिक्षक होते है गुरु समान
होते हैं छात्रा जब स्टुडेंट
मास्टर का करते तब अपमान

मास्टर कहलाता तब मस्सय
जब सर को कोई ना ज्ञान
विषय वस्तु से दूर रहे
झूठे मन में शान

गुरु तो महर्षि धैम्य थे
जहाँ उपमन्यु-आरुणि अंतेवासी
गुरु हुए जब मुनि वशिष्ठ
तब दशरथ पुत्र हुए वनवासी

गुरु का स्थान जब रखे द्रोण
तब एकलव्य जैसा धनुर्धर हुआ
भेदकर श्वान मुख तीर से
द्वापर में धुरंधर हुआ

होते थे गुरु वैदिक काल में
मास्टर टीचर हाल में
सर की उपाधि अंग्रेज देते
अपनी कूटनीति चाल में

मित्रों ! गुरु कभी न मास्टर होगा
न मस्सय न सर
इसकी गरिमा ब्रह्म ही जाने
न पंडित न जर।

आखिर लोग क्या कहेंगे

घर में, खाने को दाने नहीं
फिर भी
अतिथियों के आ जाने पर
कर्ज लेकर
कराना पड़ता है
उन्हें लजीज जलपान
आखिर क्या कहेंगे
दूर से आये हुए मेहमान
पहनने के लिए घर में
एक भी नहीं है चिथड़ा
फिर भी
पड़ोसियों से लेकर, देना पड़ता है
उन्हें अंग वस्त्र का सामान
आखिर कैसे कहलाऐंगे
बहुत बड़ा धनवान
रहने के लिए, न है टूटी मड़ैया
फिर भी
भाड़े पर इंतजाम करते हैं
उनके लिए मकान आलीशान

आखिर क्या कहेंगे
नव आगन्तुक मेहमान
जेब में नहीं रहती
एक भी फूटी कौड़ी
फिर भी
शहर के लोगों के बीच
चंदा देने में हैं हम बदनाम
आखिर क्या कहेंगे
आशा लेकर आये हुए इंसान
पीते नहीं बीड़ी, खाते नहीं खैनी
फिर भी
दारु पीने के लिए
साथियों को देते रहते पैगाम
आखिर कैसे मिलेगा
लोगों से सम्मान
मिलती नहीं फुर्सत
सांस भी लेने की
फिर भी
आगन्तुकों के आने पर
बातों में हो जाती सुबह से शाम
नहीं तो क्या कहेंगे
गप्प लड़ाते हुए श्रीमान
काम की अधिकता में
दिल नहीं करता
औरों का मुँह भी देखूँ
फिर भी

लोगों के आ जाने पर
लाते हैं चेहरे पर
व्यापारिक मुस्कान
आखिर क्या कहेंगे
सामने बैठे इन्सान
मित्रों! दुनिया कुछ कहे
फिर भी
करो अपने मन मुताबिक काम
नहीं तो
लुट जाओगे, हो जाओगे कंगाल
बिक जाएगा घर, सारा सामान
अंत में क्या कहेंगे
ये सारे इन्सान।

उत्सवों का मौसम

मन वंशी के स्वर सा तन जाता है
जब-जब उत्सवों का मौसम आता है
तब पिफर से सजायी जाती है दुकान
होठों पे दिऽती है व्यापारिक मुस्कान

होली में पिचकारी रंग व गुलाल
और आ जाता है वस्त्रों का भूचाल
दिवाली में होती पटाऽों की भरमार
और केंडिलों से जगमगाता संसार

एक ऐसा मौसम भी आता त्योहार का
विज्ञापन से तन छुप जाता दीवार का
तब नए-नए स्कूलों का होता निर्माण
तब उसकी भी सजती ऽूब दुकान

बदनाम करते स्थापित स्कूलों को
अपफवाहों से भरमाते लोगों को
नीचता की सीमाएँ लाँघता इंसान
भगवान भी देऽकर होते हैरान।

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