राजा अवस्थी की रचनाएँ

कथा कौन-सी

अपनी ही पीड़ा के पन्ने
बाँच नहीं पाये
तुमको वे कैसे समझाते
अर्थ व्यथाओं के.

कई पीढ़ियों से पुरखों ने
पोथी सत्यनारायण बाँची;
किसने कही, सुनी किसने थी
कथा कौन-सी, कैसी साँची;

नई खाद का असर
छोड़ बैठे यजमान को
पोते पूछ रहे बाबा से
अर्थ कथाओं के.

तोता हुंकारी भरता है
चिड़िया अमर कथा कहती है;
मन की मैना तन कोटर में
अपने में खोई रहती है;

सदियों के अनुभव
दादी समझाती-गाती हैं
अक्षर-अक्षर खोल रहे हैं
अर्थ प्रथाओं के.

शिव की अमरकथा को सुनकर
अमर हुए तोते की गाथा;
सोयीं उमा जानकर शंकर
पीट रहे हैं अपना माथा;

गली-गली शुकदेव
कथा का गायन करते हैं
मथुरा वृन्दावन में मेले
संत कथाओं के.

वहीं मत्स्यगंधा का किस्सा
ठगी गई द्रौपदी वहीं है;
त्यक्त धनुर्धर वहीं कर्ण-सा
गांधारी की आँख वहीं है;

मोह और कर्तव्य-न्याय का
द्वन्द्व नहीं छूटा
पृष्ठ भरे इन धृतराष्ट्रों से
अमर कथाओं के.

छाँव की नदी

छाँव की नदी
आग लिये बैठी है,
छाँव की नदी।

नरभक्षी सिंह हुये
सिंहासन के सारे;
किससे फरियाद करें
राजा जी के मारे;
धर्मराज चौसर का
शौक पुनः पाले हैं,
कण्ठ से प्रवाहमान
दाँव की नदी।

जंगल सब खत्म
राज में जंगल व्याप गया;
आतंकित ऋतुयें सब
मौसम तक काँप गया;
रेत बढ़ी, सूख गया
पानी संवेदन का,
बैठी है घाट तक
नाव की नदी।

पाँव की प्रबलतम गति
अवरोधों की मारी;
हाथ नहीं आया कुछ
बनिये से की यारी;
मोल हमारा
उसकी नजरों में ग्राहक भर
उमड़ाई बाढ़ भरी
‘साव’ की नदी।

एक हुए जीने का
भ्रम पाले झुण्ड बना;
झण्डों के बीच स्वयं
एक अग्निकुण्ड बना;
आदिम ने आदिम को
लगातार होम किया,
सबकी उपलब्धि एक
घाव की नदी।

संशय के मारे

धरती क्या छोड़ें
आकाशहीन-से,
खुशियों के पल-छिन
अनुप्रासहीन-से।
पार किये रिश्तों के
जितने भी गलियारे
सारे के सारे ही
हैं संशय के मारे;
आहत निष्ठायें ले
अंतस के ही द्वारे
हम हारे के हारे
फिर आये मन मारे;
सब साबित पल-छिन
विश्वासहीन-से।

मटके—सी एक उम्र
क्या फोड़ें छलकायें
जितनी हैं सुविधायें
उतनी ही दुविधायें;
किससे कैसी अनुनय-
विनय करें रिरियायें
छोड़ें या अपनायें
ये हासिल कुण्ठायें;
बंधन के सब धागे
श्वासहीन-से।

हस्तिनापुर आजकल

हस्तिनापुर में पितामह
आजकल किस हाल होंगे
उन दिनों-से चित्र शायद
आज भी विकराल होंगे।

युद्ध में अब भी
शिखण्डी को बनाता ढाल अर्जुन
और उस पर दम्भ
जीता महाभारत-सा समर;
कलंकित मातृत्व को कर
राजसुख स्वीकारने को
शूल कुन्ती ने बिछाये
कर्ण के पथ हर प्रहर;
अश्वत्थामा हतो का
उद्घोष करके कृष्ण! क्या?
पार्थ के या तुम्हारे ही
गर्व लायक भाल होंगे?

द्रोण अंधे भागते
प्रतिशोध, धन, पद, मद लिये
चिढ़ाता—सा अँगूठा
एकलव्य का कटकर पड़ा है;
तीव्रता से राज्य का सब
कोष खाली हो रहा
कोषपालों का भवन
पुखराज पन्नों से जड़ा है;
द्वार की ध्वनियाँ
नहीं सुनता सचिव जब
तो कहो फिर! न्याय के ‘ औ
नीति के क्या हाल होंगे।

मर्ज बढ़ाती रहीं निरन्तर

करते रहे अमल नुस्खों पर
लेकिन यह क्या?
मर्ज बढ़ाती रहीं निरन्तर
बंधु दवायें।

उतरे हुए नजर से
कैसे तुम्हें सुहायेंगे;
कैसे गीत बधाई के
घर आकर गायेंगे;

खाद और पानी ने यारी
करली कीटों से,
उम्मीदों का चैत
काट ले गईं हवायें।

पथ पर सुविधाओं के साधन
शूल विषैले बोये;
चकाचौंध में मेलजोल के
अर्थ निरन्तर खोये;

कटुताओं की फसल
पनप आई अँगनाई में,
हमसे आहत हुईं
मिलन की धवल प्रथायें।

औरों के घर का उजियारा
जिनको कभी न भाये;
दीपक बँटवाने के ठेके
उनने ही हथियाये;

साठ-गाँठ हो गई
कुम्हारों से उनकी पक्की,
अँधियारे के वृत्त
जनों के हिस्से आयें।

तपते वर्ष में

कब तक चुप्पी साधें
इस तपते वर्ष में।

बरसों से नदिया ने
होंठ नहीं चूमे हैं
प्यासे के प्यासे
तटबंध जल रहे;
जी भरकर फिर कछार
नहा नहीं पाये हैं
उमड़-घुमड़ चले गये
मेघ छल रहे;
जीवटता बाकी है
जीना संघर्ष में।

भीतर की माटी सब
रेत हुई जाती है,
यन्त्रों ने चूस लिया
अन्तस का पानी;
आमों के बाग काट
विजयी ध्वज फहराये,
नीलगिरी रोप रही
नित कुर्सी रानी;
कौन मनाये उत्सव
किसके उत्कर्ष में।

सन्न अँधेरे में

बीज मन्त्र के सर्जक आये
किसके घेरे में,
अवचेतन के सन्न अँधेरे में।

खोज रहे हैं रेख किरण की
बची-खुची ताकत ले मन की
तोड़-फोड़ को भोग रही
पीढ़ी के डेरे में।
अवचेतन के सन्न अँधेरे में।

पारिजात बगिया में महकें
फिर पेड़ों पर टेसू दहकें
जगें पुरातन संस्कार के
चिह्न बसेरे में।
अवचेतन के सन्न अँधेरे में

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