राजा खुगशाल की रचनाएँ

दुनिया का चेहरा

एक समय था
जब दुनिया के दो चेहरे थे
यूनान के देवता ज़ेसस कीतरह

एक चेहरा बिल्कुल ख़ामोश
दूसरा बेहद बुलन्द
एक चेहरा एकदम सौम्य
दूसरा गुस्से से तमकता हुआ हर समय
एक चेहरा ख़ुशी से मुस्कराता हुआ
और दूसरा दुखी
आँसू बहाता हुआ दिन-रात

लेकिन वह समय अब नहीं रहा
अब पहचान नहीं सकते हम
दुनिया का चेहरा
जैसा चाहें वैसा देख सकते हैं
जो चाहें वह चेहरा दे सकते हैं दुनिया को

बेहद आसान है अब चेहरा बदलना
चेहरा ओढ़ना
चेहरा बेचना और ख़रीदना
अब एक चेहरे पर कई चेहरे हैं

बेहद आसान है अब चेहरा बदलना
जब किसी के पास अपना चेहरा न हो
जब दुनिया के अनेक चेहरे हों
और चेहरे का हर भाव
बाज़ार में बिकता हो ।

पर्यावरण-1

वह जैसा था
वैसा ही गूँजता रहा हवा में
उसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया
और न इसके लिए उसने
किसी तरह का कोई वातावरण रचा

वह उठा
और चुपचाप चला गया सभा-कक्ष से
सड़क पर बस की प्रतीक्षा में उसने पाया
अमलतास का दरख़्त नीला
और आसमान हरा

उसने देखा पृथ्वी की चिन्ता में
भाप उठने लगी है समुद्रों से
धरती से भू-उपग्रहों की ओर
पहले कुछ पत्ते उड़े, फिर थोड़े से लोग
फिर बारिश में घुलने लगा
वक़्त का बुझा हुआ चेहरा ।

पर्यावरण-2

कुछ लोग बाँध बन गए नदियों पर
कुछ लोगों ने धुएँ से ढक दिए जंगल
कुछ मास्क पहन कर निकले सड़कों पर
कुछ लोग दूरबीन से देखने लगे
यूनियन कार्बाइड और चेरनोबिल की चिमनियाँ

चीख़ने-चिल्लाने लगे कुछ लोग
बचाइए, पृथ्वी को बचाइए
बचाइए, धरती पर मनुष्य का जीवन

कुछ लोग
संज्ञाशून्य पृथ्वी से पूछने लगे :
नक्षत्रों के बीच धुएँ के अक्षरों में
किसने लिख दिया तुम्हारा नाम

कुछ लोग
पृथ्वी के पर्यावरण पर बोलते हुए
चुपचाप बचा गए एक-दूसरे को ।

मील के पत्थर

मील के पत्थर
सड़क के किनारे मिलते हैं हमें
समय की भाग-म-भाग को
चुपचाप देखते हुए

मील के पत्थर
सिर्फ़ तराशे हुए पत्थर नहिं हैं
वे पथ-प्रदर्शक भी होते हैं हमारे

मील का कोई भी पत्थर
अकेला नहीं होता सड़क पर
हर पत्थर से पहले और बाद में
मील-दर-मील खड़े होते हैं
मील के पत्थर

मील के पत्थर
अपरिचित और अनजान रास्तों के
अनिश्चय से उबारते हैं हमें

वे हर यात्रा में
सुनिश्चित करते हैं हमारी स्थिति

मील के पत्थर
सहयात्री होते हैं हमारे
वे प्रमाणित करते हैं
हमारी हर यात्रा को ।

अनन्त में मौन

स्व० शमशेर जी के प्रति सादर

कुछ दूर गए शमशेर
और फिर रुक गए
जैसे कह रहे हों —
मुझे एक कहकशाँ कहना है
इस रात के साए से

जैसे कह रहे हों —
कहाँ सीढ़ियाँ उतरने की
ज़हमत उठाए चाँद
मैं अकेला पार कर लूँगा पर्वत

परत-दर-परत
कितना ठोस, कितना स्वच्छ
कितना चमकदार है आसमान
‘आसमान में गंगा की रेत
आइने की तरह चमक रही है ।’

क़दम-दर-क़दम
फिर मुखरित है अनन्त में मौन ।

कविता-विमर्श

कविता क्या है ?
इस सवाल पर
एक आलोचक ने कहा —
कविता जन-जीवन का आईना है

दूसरे आलोचक ने कहा —
कविता मनुष्य के अन्तःकरण की
सबसे अनुशासित अभिव्यक्ति है

तीसरे आलोचक का कहना था —
कविता महज एक कला रूप है

चौथे आलोचक का मत था —
जीवन की विसंगतियों के बरक्स
कविता एक सार्थक हस्तक्षेप है

पाँचवे आलोचक की राय थी —
कविता आम आदमी के पक्ष में
दिया गया कवि का बयान है

कविता क्या है ?
इस सवाल पर अपनी-अपनी आख्या
पेश करते रहे आलोचक
लेकिन यह सवाल
ज्यों का त्यों बना रहा अपनी जगह ।

दयाशंकर का कहना है

दयाशंकर का कहना है
ताज्जुब की बात है
पहाड़ पर पहुँचते ही कुछ लोग
फ़र्क भूल जाते हैं आदमी और घोड़े में

वे भूल जाते हैं
धरती और आसमान का अन्तर

दयाशंकर का कहना है
जाड़ों में बर्फ़ जब
घाटियों में खदेड़ती है हमें
आसमान से पहाड़ पर
देवतागण उतरते हैं
और फिसलते हैं हमारे सपनों में

दयाशंकर का कहना है
ज्ञान और सामर्थ्य के इन्हीं सीमान्तों से
शुरू होता है
आदमी का बैकुण्ठ ।

दुख

वे दुख हैं
जो आदमी को जीने नहीं देते
आदमी की तरह
जो आदमी को अलग करते हैं आदमी से
जो आदमी को जितना माँजते हैं
उतना ही मलिन करते हैं

वे दुख हैं
जो आदमी को कसते हैं
नई-नई कसौटियों पर, जो आदमी को
न घर पर रहने देते हैं चैन से, न बाहर
जो आदमी से छीन लेते हैं
आदमी का हुनर
जो आदमी के हाथों से छीन लेते हैं काग़ज़-क़लम
और बेख़ौफ़ पसर जाते हैं शब्दों पर

वे दुख हैं
जो दोस्त नहीं, दुश्मन हैं आदमी के
जो कोल्हू के बैल की तरह घुमाते हैं
छक्के छुड़ा देते हैं आदमी के

वे दुख हैं
जो अनाज से भूसे की तरह फटकते हैं धैर्य को
जो दिन-रात तोड़ते रहते हैं आदमी की कुव्वत को
जो पतझर के पत्तों की तरह
सुखा देते हैं सम्वेदना को ।

भोटिए

खेतों में पकने लगती है गेहूँ की फ़सल
धीरे-धीरे गर्माने लगता है मौसम
भेड़-बकरियों के अपने झुण्ड के साथ
भोटिए घर लौटते हैं

पीठ पर ऊन के गट्ठर लादे
नवजात मेमनों को कन्धों पर रखे
वे नदी-नदी, जंगल-जंगल उत्तर की ओर बढ़ते हैं
गंगा-यमुना के उद‍गम की ओर
भाबर के वनों से तिब्बत की सरहद तक

कोई भी पर्वत,कोई भी जंगल
अगम-अगोचर नहीं है उनके लिए
उन्हें आकर्षित करते हैं पेड़ों के कोमल पत्ते
अच्छे लगते हैं उन्हें
लहलहाती घासों के वन, हरे-भरे झुरमुट
घास और पानी जहाँ मिलते हैं उन्हें, भेड़-बकरियों के साथ
वे वहीं रह जाते हैं कुछ दिन

नदी के निर्जन तट पर
ऊन की लच्छियाँ बनाते, तकलियाँ घुमाते
भोटिए प्रकृति के हर रहस्य को जानते हैं
वे जानते हैं कौन-सी नदी
किस स्वर्ग से निकलती है धरती पर
किस मिट्टी से बना है कौन-सा पहाड़
किस ढलान पर उगती है सबसे मुलायम घास

वे देखते हैं
रात के अन्धेरे में अर्राते पेड़, जलते जंगल
वे पहचानते हैं ऋतुओं के रंग
ज़मीन के ज़र्रे-ज़र्रे को
धँसते पहाड़, कटते जंगल,सूखती नदियों को
स्रोतों और सिवानों को

वे बहुत क़रीब से महसूस करते हैं
पहाड़ के हर संकट को
घर से दूर निरभ्र आकाश के नीचे वे
चाँदनी में, जलते अलाव के आसपास नाचते-गाते हैं
वे जंगल में मंगल किए रहते हैं
सोते-जागते नज़र रखते हैं वे
बकरियों के झुण्ड पर
वे कुत्तों के गुर्राने से भाँप लेते हैं
अन्धेरे के सम्भावित ख़तरे ।

कबीर के लिए

वह न हिन्दू है
न मुसलमान
वह आदमी है, मामूली आदमी
सीधा-सच्चा आदमी
अपनी तरह का एक बेलौस आदमी

वह सिर्फ़ सन्त नहीं है
सिद्ध नहीं है
पीर नहीं है
पैगम्बर नहीं है
न वह पण्डित है
न पुजारी
वह एक कारीगर है, मामूली कारीगर
जो कपड़े बुनता है करघे पर
तजुरबे के ताने-बाने से
बुनता है अपनी कविताएँ

वह लिखना नहीं जानता
पढ़ना नहीं जानता
वह अनपढ़ है
फकीर है
लेकिन कवि है
सच्चे अर्थों मे कवि

ऐसा कवि
जिसकी कविता की अहमियत
सबसे अधिक है आज
ऐसा कवि
जिसने कठिन समय में
ईश्वर और इन्सान में
इन्सान को चुना

गुरु और गोविन्द में
गुरु को
शास्त्र और सबद में
सबद को
सहज-असहज में
सहज को चुना

ऐसा कवि
जिसके लिए कोई फ़र्क नहीं है
राम और रहीम में
जो शहर-दर-शहर
गाँव-दर-गाँव घूम-घूम कर
अलख जगाता है प्रेम की ।

Share