राजा चौरसिया की रचनाएँ

मैंने चित्र बनाया

पर्वत से जो निकल रही है
मैदानों में मचल रही है,
कल-कल करती हुई नदी का
मैंने चित्र बनाया तो!

इधर मुड़ी है, उधर मुड़ी है
गाँव-शहर के साथ जुड़ी है,
हल्के-गाढ़े रंगों से भी
मैंने उसे सजाया तो!

झाड़ी-झुरमुट आसपास हैं
ऊँचे, पूरे पेड़ ख़ास हैं,
कैसा भी बन पड़ा चित्र है
करके काम दिखाया तो!

इसी तरह अभ्यास करूँगा
बढ़िया और प्रयास करूँगा,
चित्रकार भी बनना है, यह
मेरे मन में आया तो!

-साभा

ता-ता थैया

एक चिरैया
है गौरेया,
खूब फुदकती
और चहकती,
उड़ती दिनभर
मगर न थकती,
गाए, नाचे
ता ता थैया!

कभी द्वार पर
कभी तार पर,
मन को रहती
नहीं हार कर,
जाती पनघट
ताल तलैया!

बड़ी सयानी
श्रम की रानी,
कभी न माँगे
दाना-पानी,
इसे निहारे
छोटा भैया!

जोड़े तिनका
अपने मन का,
लाड-प्यार
पाती जन-जन का,
उड़े फुर्र से
बैठ मड़ैया!

र: नंदन, अक्तूबर, 1998, 43

कितनी अच्छी बात है 

मन में गुस्सा कभी न आए
कितनी अच्छी बात है,
फूलों जैसा मन मुस्काए
कितनी अच्छी बात है।

गुस्से की मर जाए नानी
या हो जाए पानी-पानी,
बात पेट में ही पच जाए
कितनी अच्छी बात है।

बनता काम बिगड़ जाता है
क्रोधी सबसे लड़ जाता है,
मुखड़ा सदा हँसी झलकाए
कितनी अच्छी बात है।

हेलमेल से हरदम रहना
बात पते की है ये कहना,
सबको खुश करना आ जाए
कितनी अच्छी बात है।

-साभार: बाल भारती, मई, 2000

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