राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ की रचनाएँ

आसान नहीं होता

जिस घर में बुजुर्गो का सम्मान नहीं होता।
उस घर में कभी ईश्वर मेहरवान नहीं होता॥

वो तो कभी चैंन से ही रह नहीं सकता।
पक्का कभी भी जिसका ईमान नहीं होता॥

अच्छा क्या बुरा है वह कुछ नहीं समझता।
मूरख के पास इसका कुछ ज्ञान नहीं होता॥

अभिमन्यु की तरह ही लेता है ज्ञान को वह।
इस दौर का बच्चा भी नादान नहीं होता॥

रखते है दिल ही दिल में वह दर्द को छुपाकर।
ये दर्द बुजुर्गो का आसान नहीं होता॥

करते है प्यार सबसे देते है वह दुआये।
बाक़ी तो बुढ़ापे में अरमान नहीं होता॥

क्यों ढँूढ़ते फिरते हो तुम इस जहाँ में ‘राना’ ।
ईश्वर का कहीं कोई मकान नहीं होता॥

 

ज़िन्दगी

ज़िन्दगी भी मोम-सी गलने लगी है।
जब से जहरीली हवा चलने लगी है॥

क्या करूँ इस दर्दे दिल का मैं इलाज।
दिल में फिर इक आग-सी जलने लगी है॥

आपके बिन जी के आखि़र क्या करे।
ज़िन्दगी तन्हा हमें खलने लगी है॥

आस क्या दुनिया से रक्खूँ मुझसे तो।
बच के अब छाया मिरी चलने लगी है॥

सी के लव बैठों न ‘राना’ जी उठो।
अब हवा तूफ़ानों में ढ़लने लगी है॥

लिख रहा हूँ ज़िन्दगी में

बाजुवाँ लगती मुझे ख़ामोशियाँ सच्चाई की।
लिख रहा हूँ ज़िन्दगी में तल्खियाँ सच्चाई की॥

भूख से बेहाल बच्चा रो रहा है सड़क पर।
कैसे खिलाती माँ उसे रोटियाँ सच्चाई की॥

क़रीब रहते हुए भी दूर दिल से होने लगे।
नहीं देखने को मिली अब झलकियाँ सच्चाई की॥

झूठ के काँटे बिछे थे फ़ूल के चारों तरफ।
पास कैसे आती अब तितलियाँ सच्चाई की॥

ज़ुल्म होता देखकर भी ख़ामोश है अब तो ख़ुदा।
“राना” फसीं खूब अब तो मछलियाँ सच्चाई की॥

दिल में उतर जाता हूँ

बेवफ़ा तुझको मैं बेशक नज़र आता हूँ।
दुश्मनों के भी मगर दिल में उतर जाता हूँ॥

दूर कितना भी रहँू फ़ासले कितने हों मगर।
दिल के नज़दीक हमेशा मैं तुझे पाता हूँ॥

आँख से बहने नहीं देता हँू आँसू बनकर।
ग़म की दौलत को मैं सीने में छिपा आता हूँ॥

याद जब आती है उस शख़्स की तन्हाई में।
दिल को अपने मैं उदासी से घिरा पाता हूँ॥

ग़ैरों के बल पै सूरज न बनूँगा “राना” ।
दीप हूँ मैं तो अन्धेरे में टिमटिमाता हूँ॥

मुलाक़ात होगी

जहाँ ज़िन्दगी में मुलाक़ात होगी।
हसीं ख्वाहिशों की भी बरसात होगी॥

पड़ा क्यों तू मज़हब के चक्कर में नादां।
अगर है तू इंसा तो इक ज़ात होगी॥

जो होगी कशिश गर हमारी वफ़ा में।
कहीं न कहीं फिर मुलाक़ात होगी॥

करेगा इबादत जो दिल से अगर तू।
फिर उसके करम की भी बरसात होगी॥

सजी है जो महफ़िल यहाँ अपनी “राना” ।
तेरी शायरी में भी कुछ बात होगी॥

सर झुकाकर देखिए 

मिले सब तुझे दिल में बसाकर देखिए।
उसके दर पर सर झुकाकर देखिए॥

लुट जाओगे दिल लगाकर देखिए।
हो जिन्हें शक़ आज़माकर देखिए॥

हर जगह मिल जायेगा वह भी तुम्हें।
जिस तरफ नज़रें उठाकर देखिए॥

बन जाये ना दुश्मन सारा जहाँ।
नफ़रतों से गिर रही दीवार देखिए॥

ज़िन्दगी में मिल सके बेहद मज़ा।
तुम यहाँ सबको हँसाकर देखिए॥

मैं हूँ ‘राना’ देता हूँ दिल से दुआ।
एक मुफलिस को बनाकर देखिए॥

 

बहुत दिन गुजर गये

देखे हुये किसी को बहुत दिन गुजर गये।
अरमान थे जो दिल के सारे बिखर गये॥

हर इक तरफ़ तो देखो दरिन्दों की भीड़ है।
इंसान नेकदिल थे जो जाने किधर गये॥

अब तुमसे दूर रहके हम बेहद उदास हैं।
आँखों में सजे सपने थे वह भी बिखर गये॥

ऐसी भी क्या थी बेरूखी हमको बताइये।
न देखा मुड़के तुमने दुबारा किधर गये॥

“राना” भी अपने प्यार की गहराई नापने।
उन झील-सी आँखों में कैसे उतर गये॥

 

क्या दिया आपने

दर्दे दिल के सिवा क्या दिया आपने।
काम हरदम सितम से लिया आपने॥

ग़म ही ग़म से है भर दी मिरी ज़िन्दगी।
किस जनम का ये बदला लिया आपने॥

प्यार का अपने चाहा था हमने सिला।
बेवफ़ाई का तोहफ़ा दिया आपने॥

बददुआयें न देंगे कभी आपको।
भूल जायेगें जो भी किया आपने॥

मस्कुराने की जो मैंने की कोशिशे।
“राना” हरदम रूला ही दिया आपने॥

कहर हो गया

प्रदूषण का इतना असर हो गया।
सांस लेना भी अब तो ज़हर हो गया॥

कभी नाम उनका बुलंदी पर था।
है बदनाम सारा शहर हो गया॥

शहर में रहा था अमन चैंन भी।
ज़ालिमों का जो बढ़ता कहर हो गया॥

देखना एक दिन तो झुकेंगे वहीं।
प्यार का मेरे इतना असर हो गया॥

इमान दुनिया से क्या उठ गया।
“राना” बदमाश कितना बशर हो गया॥

मेरी जान तिरंग 

देश की है शान मेरी जान तिरंगा।
न हिन्दू है इसाई, मुसलमान तिरंगा॥

झुकने न देंगे हम कभी तन भी निसार है।
लाखों हो गये है शाने कुरबान तिरंगा॥

बँटने न देंगे देश चाहे जान भी जाये।
दुश्मन के लिए मौत का फरमान तिरंगा॥

आपस में भाई चारा हो हिन्दोस्तान में।
है अज़मते इन्सान की पहचान तिरंगा॥

है नौजवान ‘राना’ क़दम पीछे न हटे।
सीमा का हमेशा ही निगहवान तिरंगा॥

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