रामराजश्वरी देवी ‘नलिनी’ की रचनाएँ

साध मिटाने दो!

साध मिटाने दो!

आँसू की तरल तरंगों में आहों के कण बह जाने दो।
उस क्षुब्ध अश्रु की धारा में उच्छ्वास-तरणि लहराने दो॥
ऊषा की रक्तिम आभा से लोचन रंजित हो जाने दो।
अन्तर्वीणा को व्यथा-भरी बस करुण रागिणी गाने दो॥
सुनती पीड़ा में व्यास प्रभो! मुझको पीड़ा अपनाने दो।
निज प्राण-विभव से मुझे देव! निज चरण अलंकृत करने दो॥
पीड़ा से कर के क्षार मुझे अपने ही में मिल जाने दो।
वैसे तुमको पाना दुष्कर ऐसे ही तो फिर पाने दो॥
तुम बनो देव आराध्य मेरे, निर्माल्य मुझे बन जाने दो।
निज चरणों के ढिंग आने दो! मुझको निज साध मिटाने दो॥

कामना

मम मन-मन्दिर में एक बार, बस एक बार ही तुम आते।
इस दुखिया की, इस दीना की, साधन सफल तुम कर जाते॥
बिठला करके हृदयासन पर, अंतर्पट शीघ्र लगा देती।
तेरे अभिनन्दन में प्रियतम जीवन-निधियाँ बिखरा देती॥

मम तृषित-दृगों को एक बार, तुम दर्शन-सुधा पिला जाते।
इस दुखिया की, इस व्यथिता की, सफला साधना बना जाते॥
अभिषेक तुम्हारा कर देती, तुमको ही मान इष्ट! ईश्वर।
अस्फुट भाषा बनकर मंजुल मृदु कुसुम, बिखर जाती तुम पर॥

मेरे आँसू बन नेह-नीर, करते पद-पंकज प्रक्षालन।
जीवन-वीणा पर तेरा ही अनुराग-राग करती गायन॥
मम प्राणों के कण-कण भगवन््! तुम में विलीन बस होजाते।
आहें बन जातीं प्रेम-भवन, वेदना मधुमयी मंजु लहर॥

मंजुल लहरी से हो जाता मधुसिक मृदुल मम अभ्यन्तर।
पीड़ा बन जाती वीणा-स्वर, गाती स्वागत के गान मधुर॥
उच्छ्वास प्रणय-सन्देश सुना प्रमुदित करते तुमको प्रभुवर।
तब हृदय-मंच प्रणय के नये प्रेम-अभिनय होते॥

मम-कलित-कल्पना कलिका का, तुमको लखकर विकास होता।
आशाओं की होती सुमूर्ति, अभिलाषा का विलास होता॥
हँस उठते मेरे शुष्कअधर, उल्लासों की क्रीड़ा होती।
मम-हृदय व्यथा भी मिट जाती, यदि हृदय-देव का पा जाती॥

‘नलिनी’ निज नयन बिछा देती, तव-पथ में यदि आ तुम जाते।
तन मन सर्वस्व समर्पण कर, मम प्राण तुम्हीं में रम जाते॥

वेदने!

 

अभ्यन्तर के निभृत प्रान्त में, प्राणों की सरिता के कूल।
खूब वेदने बाल! खेल, नयनों से बिखरा आँसू-फूल॥

आज हमारे प्रणय-जगत् में सजनि तुम्हारा है आह्वान।
है आराध्य-अभाव यहाँ तू, आ अभाव की मूर्ति महान॥

मृदुल हृदय परिरम्भण कर तू, कर सहर्ष हे सजनि विहार।
जीवन के उजड़े निकुंज में, भर दे निज वैभव का भार॥

अरी! चयन कर ले अंचल में, सुभग साधना-कुसुम पराग!
चपल चरण से कुच

हार

कुसुमों के कमनीय कलित कुंजो के कुसुम चयनकर नाथ।
मृदुल माल एक रुचिर बनायी रच-रचकर निज कम्पित हाथ॥
पूजा का कुछ साज नहीं है देव! आह! दुखिया के पास।
किन्तु हार, में संचित है मम सरल स्नेह की सरस सुबास॥
इस अनुराग-माल में गुम्फित है मेरा जीवन सुकुमार।
आओ! देव! पिन्हादे ‘नलिनी’ पा जावे जीवन का सार॥

ल मसल कर, गा तू अपना तीखा राग॥

 

जीवन-इतिहास

हृदय-देश के सुन्दर सूनेपन को आह मत लुटाओ।
अपनी वाणी का मृदु वैभव निठुर! यहाँ मत बिखराओ॥
नीरवता की गोदी मंे पीड़ाएँ सुख से सोती हैं।
बिखर गये नयनों की मंजूषा के सारे मोती हैं॥
सुखद शान्ति साधन यह मेरी मौन-समाधि न भंग करो।
ज्वाला ज्वलित न करो पुरानी सीपी में मुक्ता न भरो॥

आह! पढ़ो मत पढ़ न सकोगे यह विस्तृत सकरुण इतिहास।
लघु जीवन के ब्रण-वर्णन लूटे सुख का धुँधला आभास॥
कहीं न पृष्ठों के निनाद से सुप्त व्यथाएँ जग जायें।
सुभग-शान्ति-नन्दन कानन में आह न शोले बरसायें॥
कहीं न मुखरित आह हो उठे फिर वह नीरव हाहाकार।
तड़प न उठे भग्न उर फिर से विफल न होवे यह अभिसार॥

नहीं छलकता है मधु उससे नहिं मुसकानों का इतिहास।
नहीं हास्य-गाथा उसके सुनने का करो न विफल प्रयास॥
विस्मृति की मादक मदिरा पी मुझे मौन बस रहने दो।
जीवन-निर्झर को अनंत की ओर शीघ्र अब बहने दो॥
छोटे से जीवन की विस्तृत गाथा प्रकट न होने दो।
विस्मृति के घन अन्धकार में मूर्छित होकर सोने दो॥

कुसुमाकर!

आशा की सूनी कुटीर में यह नैराश्यों का अधिवास।
उर-उपवन में बिखर रहा है पीड़ाओं का मृदु मधुमास॥
आह! खोगई व्यथित हृदय की चिर संचित मृदु आकुल आस।
आज रोरही रजकण में मिल आह! विकल प्राणों की प्यास॥

जीवन की अवशेष घड़ी में देव! दया कर आजाना।
अपने करुण के अंचल से करुणाकण बिखेर जाना॥
प्रिय! मेरी आशा-समाधि पर दो आँसू ढुलका जाना।
तृषित मूक प्राणों की पागल प्रबला प्यास मिटा जाना॥

 

अनुरोध!

मलयज-शीतलता भार लिये, नव-कलिका सा मृदु प्यार लिये।
मम आशा की मधुमय कलियाँ बनकर बसंत विकसा जाना॥
बासंती सी मृदु सुषमा ले पुप्पांे सी मधु लालिमा लिये।
मम सूखे जीवन उपवन में मधु-सीकर बन के बरस जाना॥

शुचि सरस सुकोमल भावों की, कालिन्दी कलित कलोलमयी-
सरस सुकोलम भावों की, कालिन्दी कलित कलोलमयी-
बनकर मेरे कल्पना-देश में, देव! प्रवाहित हो जाना।
नव वीणा की झंकार लिये, मृदु अतीत गौरव-गान लिये-
वह भूला मोहक मधुर गान, बन जीवन-सार सुना जाना॥

शुचि स्वर्ण का विभव लिये सुख का अक्षय आभास लिये-
मेरी अलसाई पलकों पर तुम चिरनिद्रा बन छा जाना।
स्वर्गिक अनन्त सौंन्दर्य्य लिये, क्रीड़ा का हास-विलास लिये-
कोमल अलसित-सुषमा-लज्जित-निज मंजु रूप दिखला जाना॥

वरदानों का उपहार लिये, आशीष-सुधा की धार लिये-
मेरे हृद््-मंदिर में आकर आराध्य! सुशोभित हो जाना।
मुसकानों का संसार लिये, आनन्दमयी झंकार लिये-
पीड़ा से पागल प्राणों को, प्रिय! आकर आह हँसा जाना॥

कमनीय कलित सुविकाश लिये, ऊषा-सा अरुण प्रकाश लिये-
बनकर सुप्रभा-सौभाग्य सूर्य्य ‘नलिनी’ का हृदय खिला जाना।

मधुर मिलन

गोधूली के अंचल में, छिप गयी सुनहली ऊषा।
दिनकर चल दिये विदा हो, खुल गयी गगन-मंजूषा॥

सूने अम्बर पर बिखरीं निशि की विभूतियाँ सारी।
राका-राकेश-मिलन की आयी थी मधुमय वारी॥
मुसकाती इठलाती-सी कामिनी विभावरि आयी।
जग-शिशु मुख पर उसने निज अल कावलियाँ बिखरायीं॥

वह सूनेपन की रानी सूनापन लेकर आयी।
सारी संसृति में उसकी मुसकान मनोहर छायी॥

निज वैभव पर गर्वित हो हँसती थी रजनी-बाला।
आये फिर कर में लेकर निशिनाथ सुधा का प्याला॥

सारी संसृति में शशि ने स्वर्गीय सुधा ढलकायी।
चहुँ ओर असीम अलौकिक अनुपम मादकता छायी॥

करता था जग अवगाहन शशि-सुधा सुभग लहरों में।
उल्लास असीम भरा उन आह्लादों के प्रहरों में॥

गाती निशि निज वीणा पर नीरव संगीत निराला।
श्रुति-पुट में रस सरसा वह जग को करता मतवाला॥

मेरा हिय उलझ रहा था उद्गारों की उलझन में।
रह-रह पीड़ा होती थी अभिलाषा के कंपन में॥

आशाआंे के फूलों की बिखरी पंखड़ियाँ प्यारी।
उच्छ्वासों के झोकों में उड़ गयी आह! वह सारी॥

व्यथा सुपुता करवँट से हो उठी प्राण में तड़पन।
प्राणों की पागल पीड़ा से हुआ आह! मूर्छित मन॥

तब शान्तिमय निद्रामम गीली पलकों पर छायी।
इस करुण दशा पर मानों उसको थी करुणा आयी॥

दे शान्ति मुझे उसने यों स्वप्नों के साज सजाये।
मेरी आशाओं के धन मुझको उसने दिखलाये॥

निशि की काली अलकों में जो श्यामल वेष छिपाये-
वह करुणामय थे मेरे मृदु स्वप्न-जगत् में आये।

सुख सीमा हुई अपरिमित देखा जब प्रिय मानस-धन।
कृतकृत्य हो गयी करके करुणामय का शुभ दर्शन॥

उपमा क्या हो सकती है कोई मेरे उस सुख की।
असमर्थ जिसे कहने में हो जाता है सत्कवि भी॥

उन पद पह्मो मंे तत्क्षण निज मानस पुष्प चढ़ाया।
बनकर उपसिका स्वयमपि उनको आराध्य बनाया॥

उस क्षण-सुख में जीवन का सारा उल्लास खिला था।
उल्लासों के अंचल में पीड़ा का सार छिपा था॥

ऊषा के अवगुंठन में छिप गया सुनहला सपना।
मेरे सुखकी लाली ले शृृंगार किया हो अपना॥

 

 

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