रामेश्वर नाथ मिश्र ‘अनुरोध’की रचनाएँ

जय जननी जय भारत माता  

जय जननी जय भारत माता
हरे-भरे, वन-पर्वत शोभित
मोहित विश्व-विधाता

कलकल करती बहतीं नदियाँ
गुणगण गायन करतीं सदियाँ
सर्व सौख्य -संपन्न धन्य यह
धरती-शौर्य-प्रदाता
जय जननी, जय भारत माता

सत्वशील सत्-तत्पर सब नर
व्यवहारी,गुणग्राही, श्रुतिधर
नीतिनिष्ठ, बहु शास्त्र -विज्ञ, अति
वत्सल, यश-रस-ज्ञाता
जय जननी जय भारत माता

युद्ध -दक्ष, ध्रुवबुद्धि, प्रियंवद
नृत्य-गीति-प्रिय, प्रीति-वशंवद
जनवल्लभ, दुर्वृत्ति-विवर्जित
क्रियाकृती,सारज्ञ, प्रदाता
जय जननी, जय भारत माता

तुलसी तुमको सौ बार नमन

हे काव्य-सूर्य! हे कविकुल गुरु! संस्कृति संरक्षक ! शोक-शमन:!
हे संतशिरोमणि! भक्त प्रवर तुलसी! तुमको सौ बार नमन:।।

तुमने निज मानस मंथन से जो प्राप्त किया मोती महान ,
वह ‘रामचरित’ बन चमक रहा, ज्योतित जिससे सारा जहान ।
हे देवदूत! हे तपःपूत! सक्षम सपूत! तारक तुलसी!
तुमसे भारत-भू धन्य हुई, तुमको पाकर ‘हुलसी’ हुलसी।।

तेरा विचार आचार बना, आदर्श बना नूतन विधान ,
हे युगदृष्टा! हे युग स्रष्टा! हे युग नायक! हे युग-निधान!
बहु भेद-भाव की ज्वाला से मानवता को सहसा निकाल,
तुमने अमृत का दान किया, हो गया विश्व मानव निहाल।

हे भारत माँ के मणिकिरीट! तुमने, पशुता का किया दमन।
हे संतशिरोमणि ! भक्त प्रवर तुलसी ! तुमको सौ बार नमन:।।

सम्पूर्ण वेद, उपनिषद, धर्म-शास्त्रों का लेकर सरस सार,
मानस का करके महत सृजन निज संस्कृत ली तुमने उबार
दासता – दंश से दीन, देश जड़ता से था प्रस्तरी भूत,
उसका तुमने उद्धार किया हे पुण्यात्मा! हे सुधा-स्यूत!

बरसा कर चिंतन-विमल वारि, हर कर जग का दारुण प्रदाह,
हे युग के मनु तुमने दे दी, जन को दे दी जीने की नयी राह
तव मानस से जन-मानस की, नस-नस में भरकर रस अपार
फूटी करुणा की कालिन्दी, टूटी वीणा के जुड़े तार।

मिट गए द्वेष, लुट गए पाप, उत्फुल्ल हुए सब जड़-चेतन।
हे संतशिरोमणि! भक्त प्रवर तुलसी! तुमको सौ बार नमन:।।

हे जन के कवि ! जन हेतु रचा जो तुमने यह मानस महान,
उसमें संचित है भाव भव्य, रस, रीती, नीति, परमार्थ ज्ञान।
उसमें से निकली रामभक्ति की सुर-गंगा की अमियधार,
बह गए कलुष-कर्दम के गिरी, जन-जीवन में आया निखार।

श्री राम नाम का गूँज उठा, मानव-उद्धारक महामंत्र ,
हो गए गगन, नक्षत्रपुंज, दिग औ’ दिगन्त सहसा स्वतंत्र।
चहुँ ओर समन्वय – समता का लहराया तेरा द्वाज सहर्ष,
सहसा विशिष्ट हो गया शिष्ट इस धरती पर, अजनाभवर्ष।

हे कव्य-कला के कलित कुञ्ज! विज्ञानं-ज्ञान के चारु चमन।
हे संतशिरोमणि! भक्त प्रवर तुलसी! तुमको सौ बार नमन:।।

तुमने देखा जो रामराज्य का स्वप्न सुखद, आलोक वरण,
बन गया वही इस जगती के साधन का पुरश्चरण।
उसको पाने के लिए सतत गतिशील यहाँ पर लोकतंत्र,
बस ‘राम-राज्य’ स्थापन ही बन गया विश्व का मूल-मंत्र।

अधुनातन सकल समस्या का प्रस्तुत जिसमें समुचित निदान,
जो शक्ति, शील, सौन्दर्य, मनुज-मर्यादा का मोहक वितान।
जो है जीवन का श्रेय, प्रेय, नव-रस, यति, गति, लय, ताल, छन्द,
त्रयताप-शाप से पूर्ण मुक्ति, कल्याण-कलित, अविकल अमन्द।

जो है मानवता का गौरव, भू-मण्डल का है शांति -अमन।
हे संतशिरोमणि! भक्त प्रवर तुलसी ! तुमको सौ बार नमन:।।

हमें प्रकाश चाहिए

हमें प्रकाश चाहिए, हमें प्रकाश चाहिए ,
हमें प्रकाश चाहिए, नया प्रकाश चाहिए।

जो घोर अन्धकार में नयी किरन को घोल दे,
जो नींद से मुंदे हुए सहस्त्र नेत्र खोल दे,
जो मौन है उन्हें ज्वलन्त दर्पदीप्त बोल दे,
जो डग यहाँ रुके हुए उन्हें सहर्ष डोल दे,

जो ला सके नया विहान वो उजास चाहिए,
हमें नवीन सूर्य का नया उजास चाहिए ,
हमें उजास चाहिए, नया उजास चाहिए ।
हमें प्रकाश चाहिए, नया प्रकाश चाहिए ।।

कि जो विलासपूर्ण जिन्दगी के छोड़ मोह को,
स्वदेश के लिए वरे विराट राजद्रोह को,
करे न भूल कर जो उफ़, भरे आह-ओह को,
कि जो समान मानता हो गेह और खोह को

जो दुःख में रहे अडोल वो हुलास चाहिए ,
हमें असीम आस का नया हुलास चाहिए ,
हमें हुलास चाहिए, नया हुलास चाहिए ।
हमें प्रकाश चाहिए, नया प्रकाश चाहिए ।।

कि जो स्वदेश की गुहार पर तुरन्त आ सके,
जो तोड़ व्यूह शत्रु का समुद्र पार जा सके,
कि जो अकुंठ कंठ से अमर्त्य गान गा सके,
कि लोक में अशोक स्वाभिमान को जगा सके,

जो दे सके नया विधान वो सुभाष चाहिए,
हमें प्रदीप्त प्राण का नया सुभाष चाहिए ,
हमें सुभाष चाहिए, नया सुभाष चाहिए ।
हमें प्रकाश चाहिए, नया प्र काश चाहिए ।।

कि जो स्वदेश के लिए स्वदेह को घुला सके,
दधीचि-सा स्वमृत्यु को स्वयं यहाँ बुला सके,
बना विशाल फ़ौज को जो शत्रु को रुला सके,
जिसे कभी नहीं स्वदेश भूलकर भुला सके
जो ला सके वसंत मास वो विकास चाहिए ,

हमें समस्त देश का नया विकास चाहिए ,
हमें विकास चाहिए, नया विकास चाहिए ।
हमें प्रकाश चाहिए, नया प्रकाश चाहिए ।।

हमें जो दे अमेय राम विश्वमित्र ज्ञान से,
हमें जो दे अजेय पार्थ द्रोण स्वाभिमान से,
हमें जो दे सुचारू चन्द्र विष्णुगुप्त ज्ञान से,
हमें जो दे सके प्रताप विप्र प्राण दान से

जो दे सके हमें शिवा वो रामदास चाहिए ,
हमें समर्थ गुरु महान रामदास चाहिए ,
कि रामदास चाहिए, कि रामदास चाहिए ।
हमें प्रकाश चाहिए, नया प्रकाश चाहिए ।।

जिसका है ताप सूर्य में औ शीत सोम-सोम में,
जिसके स्वदेश प्रेम का समुद्र रोम – रोम में,
जिसकी अडोल आस्था अनन्त ओम-ओम में,
जिसकी मशाल प्रज्वलित तमस्त्रि तोम-तोम में,

जो व्योम को कंपा सके वो अट्टहास चाहिए .
हमें भावेश रूद्र का महाट्टहास चाहिए
महाट्टहास चाहिए, महाट्टहास चाहिए ।
हमें प्रकाश चाहिए , नया प्रकाश चाहिए ।।

जिनके कुकर्म से स्वदेश आज खंड-खंड है,
नीच-चोर बोलता अभीत अंड-बंड है
जो राम के नहीं हराम के प्रचण्ड भंड है
जो रीति-नीति से सदा अविज्ञ जंड-शंड है

उनको करे द्विखंड जो वो सुर्यहास चाहिए
विराट देश को , विराट सूर्यहास चाहिए
कि सुर्यहास चाहिए, सुर्यहास चाहिए।
हमें प्रकाश चाहिए, नया प्रकाश चाहिए।।

जो आज ढोंग से अरे, बने हुए महान हैं,
जो है प्रचण्ड भ्रष्ट, किन्तु देश में प्रधान है ,
जिनके कठोर हाथ में अपंग संविधान है,
जिनसे स्वदेश आज हो रहा लहुलुहान है

उनका करे विनाश जो वो सर्वनाश चाहिए ,
हमें अनीति का तुरंत सर्वनाश चाहिए ,
कि सर्वनाश चाहिए, कि सर्वनाश चाहिए ।
हमें प्रकाश चाहिए, नया प्रकाश चाहिए ।।

कि चाहिए हमें कराल कलिका दिगम्बरा,
शत्रु – मान – मर्दिनी , कपर्दिनी चिदम्बरा ,
कि चाहिए दुर्गावती , प्रभावती , प्रमद्वरा,
महान ज्ञान मंडिता सुपंडिता ऋतंभरा,

कि जो बेडौल पत्थरों को देव रूप दे सके,
वो सं’ तराश चाहिए, वो सं’ तराश चाहिए
कि सं’ तराश चाहिए, कि सं’ तराश चाहिए ।
हमें प्रकाश

अगर किसी का साथ मिले तो

अगर किसी का साथ मिले तो अपना जीवन भी सरगम हो ।
दुनिया भर का भी ग़म कम हो ।।

जिसके दर्शन से आँखों की हो जाती है दूर पिपासा ।
उल्टे पाँव भगा करती है चिंताओं से पूर्ण निराशा ।
सच कहता मैं खोज रहा हूँ बहुत दिनों से ऐसा उपवन;
मिले जहाँ वह फूल कि जिसके सौरभ से जीवन गमगम हो ।
दुनिया भर का भी ग़म कम हो ।।

अपनी अभिरुचि संवादों में जो सार्थक उल्लास भरे हों ।
अपनी पटरी उन लोगों से जो सच्चे संपूर्ण खरे हों ।
जो खटराग अलापा करते उनसे क्या अपना लेना है;
मैं तो उनको चाह रहा हूँ जिनकी बातों में दमखम हो ।
दुनिया भर का भी ग़म कम हो ।।

जब सुनसान अकेलेपन में अंतर में जलती है धूनी ।
मन में उद्वेलन होता है, तन्हाई खलती है दूनी ।
जी कहता तब और नहीं कुछ, अपना भी कोई साथी हो ;
खुशियों के नूपुर की मीठी कानों में बजती छमछम हो ।
दुनिया भर का भी ग़म कम हो ।।

अपनी तो हर चीज सहज है, सरल सहजता जीवन -निधि है ।
इसके सिवा नहीं कह सकता जीवन की क्या और प्रविधि है ।
ग़म खाना औ’ कम खाना ही, मैंने तो अब तक सीखा है;
चाहा है अपना यह जीवन दुख के तम में भी उत्तम हो ।
दुनिया भर का भी ग़म कम हो ।।

न जाने कब मीत मिलेगा? मन की मंशा होगी पूरी
कब उर पुर में शांति बसेगी? पूरी होगी चाह अधूरी ।
एक वियोगिन आशा लेकर मैं बैठा हूँ आँख बिछाये;
जाने कब चाँदनी खिलेगी? पूनम से जीवन चमचम हो ।
दुनिया भर का भी ग़म कम हो

चाहिए, नया प्रकाश चाहिए ।।

 

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