राम नाथ बेख़बर की रचनाएँ

जद्दोजहद में ज़िंदगी अपनी गुजार के

जद्दोजहद में ज़िंदगी अपनी गुजार के
हारा नहीं हूँ आज भी हर जंग हार के।

कहने लगी है बाग़ में कोकिल पुकार के
हर सिम्त आने वाले हैं मौसम बहार के।

होता अगर जो वश में तो मैं बाँह को पकड़
उस चाँद को ले आता ज़मीं पे उतार के।

गुलशन को लूटने को लुटेरे चले मग़र
वो आ गए हैं जद में फ़क़त चुभते ख़ार के।

दिलवर तुम्हारे कान पे जूँ रेंगती नहीं
थक हार सा गया हूँ मैं तुझको पुकार के।

माना कि बेख़बर मैं रहा ग़म से हर इक दिन
लेकिन मुझे कचोटते हैं दिन वो प्यार के।

मुझको मिलता नहीं तेरे जैसा

मुझको मिलता नहीं तेरे जैसा
जिसको चाहूँ मैं चाहने जैसा।

बस में होता तो भूल जाता मैं
पर नहीं है तू भूलने जैसा।

पीठ पीछे भी वैसा दिखता है
हाँ, दिखा है तू सामने जैसा।

तुम कहो तो उतर के मैं देखूँ
यार सचमुच हो आइने जैसा।

बेख़बर देख लूँ मैं जी भर कर
तेरा चेहरा है देखने जैसा।

उठाऊँ बोझ कैसे ज़िन्दगी का 

उठाऊँ बोझ कैसे ज़िन्दगी का
नहीं जब साथ मिलता है किसी का।

कहाँ है ख़ौफ़ मुझको तीरगी का
मैं वाहक बन गया हूँ रौशनी का।

तुम्हारे हुस्न से मतलब कहाँ है
मैं कायल हूँ तुम्हारी सादगी का।

पड़ा है बोझ दिल पर ग़म का लेकिन
कोई मौसम नहीं मेरी ख़ुशी का।

तुम्हारी यादों के साये तले अब
लगा है रोग मुझको रतजगी का।

मुसलसल रोज़ ही अब बढ़ रहा हूँ
मैं दुखड़ा हूँ किसी गुज़री सदी का।

हमारे खेत प्यासे ही रहे पर
समन्दर पी गया पानी नदी का।

नहीं कोई हुआ मेरा अभी तक
कहाँ हूँ बेख़बर मैं भी किसी का।

रौशनी के चंद दीपक हम जलाएँगे ज़रूर

रौशनी के चंद दीपक हम जलाएँगे ज़रूर
तीरगी के पाँव इक दिन लड़खड़ाएँगे ज़रूर।

हैं फ़क़त काँटें ही काँटे जिंदगी की डाल पर
हाँ, मगर हम फूल बनकर मुस्कुराएँगे ज़रूर।

पालते हैं जिन परिंदों को अभी हम लाड़ से
पर निकलते एक दिन ये दूर जाएँगे ज़रूर।

हैं जमीं में दफ़्न जो अहले वतन के वास्ते
फिर ज़मीं की कोंख से वे लौट आएँगे ज़रूर।

लौटती किरणों को देखा तो हमें ऐसा लगा
शाम ढ़लते हम भी घर को लौट जाएँगे ज़रूर ।

खाद पानी और माली का मिला ग़र प्यार तो
शुष्क डाली पर किसी दिन फूल आएँगे ज़रूर।

हर सू ख़ुशी के रंग को हैं घोलने लगे

हर सू ख़ुशी के रंग को हैं घोलने लगे
पंछी चहक के बाग़ से कुछ बोलने लगे।

सूरज की जब चमन पे पड़ी सरसरी नज़र
हर शाख़ पर प्रसून नयन खोलने लगे।

हैं ख़ुशनुमा बयार में हर चीज़ ख़ुशनुमा
अब डाल, पात, फूल यहाँ डोलने लगे।

गुंजार करते फूल की हर इक दुकान पर
भौंरें मधु के भाव को हैं मोलने लगे।

फ़ुर्सत से आज बैठके ऊँचे मचान पर
हम भी तुम्हारी यादों की तह खोलने लगे।

छोड़कर नीले गगन को आ रही है चाँदनी

छोड़कर नीले गगन को आ रही है चाँदनी
खेत पोखर के दिलों को भा रही है चाँदनी।

हम शरद की रात की ही बात करते रह गए
क़ह्र फिर आकर दिलों पर ढ़ा रही है चाँदनी।

इक झरोखे से निकल सिहरन भरी इस रात में
सेज पर चुपके से बिछकर जा रही है चाँदनी।

शोख़ चंचल चुलबुली है हर अदा में बाँकपन
पत्र टहनी कास वन पर छा रही है चाँदनी।

बेख़बर थे हम जगत में यार तेरे प्यार से
हाँ, मग़र कुछ आज कल बहका रही है चाँदनी।

चाँदनी रात में खुली खिड़की

चाँदनी रात में खुली खिड़की
दूधिया रंग में धुली खिड़की।

शोखियाँ देख कर हवाओं की
गीत गाती है चुलबुली खिड़की।

चाँद को कमरे तक ले आने की
बच्चों सी ज़िद पे है तुली खिड़की।

ओस की बूँद ज्यों पड़ी तन पे
मोम सी रात भर घुली खिड़की।

मेरे कमरे

सच कहूँ माँ से नहीं कम मुल्क़ की मिट्टी

सच कहूँ माँ से नहीं कम मुल्क़ की मिट्टी
ज़ख्म पे बन जाती मरहम मुल्क़ की मिट्टी।

दूर जब परदेश में आकर बसा कुछ दिन
याद में बस जाती हरदम मुल्क़ की मिट्टी।

घंटियाँ जब मंदिरों की तुम बजाते थे
चूमते फिरते रहे हम मुल्क़ की मिट्टी।

हम जियेंगे मुल्क़ में यारों सदा हँसकर
लाएगी ख़ुशियों का मौसम मुल्क़ की मिट्टी।

काट जब गर्दन सिपाही के गए दुश्मन
कर रही यारों थी मातम मुल्क़ की मिट्टी।

बेख़बर जीना हमें है मिल्लतों के साथ
चाहती मज़हब का संगम मुल्क़ की मिट्टी।

के दिल को भाती है
चाँदनी रात में धुली खिड़की।

 

कब कहाँ किसी की भी अर्जियाँ समझती हैं

कब कहाँ किसी की भी अर्जियाँ समझती हैं,
बिजलियाँ गिराना बस बिजलियाँ समझती हैं।

गर पकड़ में आई तो पंख नोचे जाएंगे,
बाग़ की हक़ीक़त सब तितलियाँ समझती हैं।

पहले दाने डालेगा फिर हमें फँसाएगा,
चाल यह मछेरे की मछलियाँ समझती हैं।

फ़्लैट कल्चर आया है जब से अपने शहरों में,
रोशनी की कीमत सब खिड़कियाँ समझती हैं।

चल पड़ेंगे बुलडोजर छातियों पे इनकी भी,
बिल्डरों की नीयत को झुग्गियाँ समझती हैं।

वो उमंगें नाज़ुक-सी चैट वाले क्या जाने,
प्यार वाली जो बातें चिट्ठियाँ समझती हैंll

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