राय कृष्णदास की रचनाएँ

छहरि रही है कं, लहरि रही है कं

छहरि रही है कं, लहरि रही है कं,
रपटि परै त्यों कं सरपट धावै है।
उझकै कं, त्यों कं झिझकि ठिठकि जात,
स्यामता बिलोकि रोरी-मूंठनि चलावै है॥

कौंलन जगाइ, नीके रंग में डुबाइ, भौंर-
भीर को गवाइ, कितो रस बरसावै है।
केसर की माठ भरे, कर पिचकारी धरे,
पूरब-सुबाला होरी भोर ही मचावै है॥

पंछी जग केते दई दई जिन्हें रूप रासि

पंछी जग केते दई दई जिन्हें रूप रासि,
सुरह दिए हैं हठि हियो जौन छोरि लेत।
भावै पै न मोहिं कोऊ इतो जितो चातक, जो
अपनी पुकार में ही आपुनो दरस देत॥

आज लौं न देख्यो जाहि कैसो रूप कैसो रंग,
है अराल कै कराल, जाने किधौं स्याम सेत।
पूरन पढी पै जानै पाटी प्रेम की पुनीत,
जानत जो री कैसें जात हैं निबाह्यो हेत॥

दोहे

कत अचरज! सर प्रेम के, डूबि सकैं नहिं सोइ।
भारी बोझो लाज को, जिनके माथे होइ॥

सीस अलक, दृग पूतरी, त्यों कपोल तिल पाइ।
मिटी स्यामता-साध नहिं, गुदनो लियो गुदाइ॥

अपुनो मोहन रूप जो, तुमहिं निरखिबो होय।
इन नैनन में आई कै, नैकु लेहु पिय! जोय॥

पंचाली को पट जथा, खींचे बाढयो और।
सुरझाएं अरुझात अरु, नैना वाही तौर॥

रूप-कनी इन चखनि गडि, जखम करति भरपूर।
कसकि कसकि जिय लेति है, कबं होति न दूर॥

नासा मोरि, कराहि कै, अंगनि भौंहीन ऎठि।
कांटो नाहिं काढन दियो, कांटे-सी हिय पैठि॥

बंसी! कर न गरूर हरि, धरत अधर हर-जाम।
अधरन लाए रहत , रटत हमारोइ नाम॥

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