राशिद ‘आज़र’ की रचनाएँ

अजीब जुम्बिश-ए-लब है ख़िताब भी न करे

अजीब जुम्बिश-ए-लब है ख़िताब भी न करे
सवाल कर के मुझे ला-जवाब भी न करे

वो मेरे क़ुर्ब में दूरी की चाशनी रक्खे
मिरे लिए मिरा जीना अज़ाब भी न करे

कभी कभी मुझे सैराब कर के ख़ुश कर दे
हमेशा गुमरह-ए-सहर-ए-सराब भी न करे

अजीब बरज़ख-ए-उल्फ़त में मुझ को रक्खा है
कि वो ख़फ़ा भी रहे और इताब भी न करे

वो इंतिज़ार दिखाए इस एहतियात के साथ
कि मेरी आँखों को महरूम-ए-ख्वाब भी न करे

वो रात भर कुछ इस अंदाज़ से करे बातें
मुझे जगाए भी नींदें ख़राब भी न करे

हर एक शेर में ‘आज़र’ नुक़ूश हैं उस के
मगर वो ख़ुद को कभी बे-नक़ाब भी न करे

हुस्न हो इश्‍क़ का ख़ू-गर मुझे रहने देते

हुस्न हो इश्‍क़ का ख़ू-गर मुझे रहने देते
तुम हो मंज़र पस-ए-मंजर मुझे रहने देते

मुझ से तहज़ीब-ए-रिया-कार की तज़ईं क्यूँ की
ना-तराशीदा था पत्थर मुझे रहने देते

मैं ने कब चाहा कि क़ैद-ए-दर-ओ-दीवार मिले
मैं तो आवारा हूँ बे-घर मुझे रहने देते

वक़्त ओ हालात से ख़्वाहिश थी फ़क़त चंद ही रोज़
क़ैद-ए-लम्हात से बाहर मुझे रहने देते

मैं ने असनाम तराशे तो बि

मालुम है वो मुझ से ख़फा है भी नहीं भी

मालुम है वो मुझ से ख़फा है भी नहीं भी
मेरे लिए होंटों पे दुआ है भी नहीं भी

मुद्दत हुई इस राह से गुज़रे हुए उस को
आँखों में वो नक़्श-ए-कफ़-ए-पा है भी नहीं भी

मुँह खोल के बोला नहीं जाता कि शिफ़ा दे
उस पास मिरे दिल की दवा है भी नहीं भी

कहते थे कभी हम कि ख़ुदा है तो कहाँ है
अब सोच रहे हैं कि ख़ुदा है भी नहीं भी

रक्खे भी नज़र बज़्म में देखे भी नहीं वो
औरों से ये अंदाज़ जुदा है भी नहीं भी

गो ज़ीस्त है मिटती हुई साँसों का तसलसुल
क़िस्तों में ये जीने की सज़ा है भी नहीं भी

या दिल में कभी या कभी सड़कों पे मिलेंगे
हम ख़ाना-ख़राबो का पता है भी नहीं भी

हम से जो बना सब के लिए हम ने किया है
मालूम है नेकी का सिला है भी नहीं भी

वो मोम भी है मेरे लिए संग भी ‘आज़र’
कहते हैं कि इस दिल में वफ़ा है भी नहीं भी

गाड़ा क्या था
तुम बराहीम थे ‘आज़र’ मुझे रहने देते

 

मुंतज़िर आँखों में जमता ख़ूँ का दरिया देखते

 

मुंतज़िर आँखों में जमता ख़ूँ का दरिया देखते
तुम नहीं आते तो सारी उम्र रस्ता देखते

वुसअत-ए-कौन-ओ-मकाँ इस रेग-ज़ार-ए-दिल में है
आरज़ू है तुम भी आ कर दिल का सहरा देखते

अपने मरने की ख़बर इकदिन उड़ाते काश हम
चाहने वालों का अपने फिर तमाशा देखते

सर पे सूरज आ गया फिर भी न खोली हम ने आँख
सुब्ह उठते भी तो आख़िर किस का चेहरा देखते

इस जहान-ए-रंग-ओ-बू में देखने को क्या रहा
तुझ को देखा और इन आँखों से हम क्या देखते

तेरे गालों के मुक़ाबिल दिल में हसरत रह गई
एक दिन तो हम शफ़क़ का रंग गहरा देखते

सारे चेहरे देख डाले सारी दुनिया छान ली
जुस्तुझू अब तक यही है कोई तुम सा देखते

सारे लम्हे याद आते जो गुज़ारे तेरे साथ
जंगलों में आग को जब हम दहकता देखते

क्या पता सीना जला देती हमारा ग़म की आग
हम जो अपनी तरह ‘आज़र’ उस को तन्हा देखते

समझ रहा है तिरी हर ख़ता का हामी मुझे

समझ रहा है तिरी हर ख़ता का हामी मुझे
दिखा रहा है ये आईना मेरी ख़ामी मुझे

ज़माँ की क़ैद है कोई न है मकाँ की ख़बर
कहाँ कहाँ लिए फिरती है तिश्‍ना-कामी मुझे

नहीं कि जुरअत-ए-इज़हार-ए-इश्‍क़ मुझ में नहीं
तबाह कर के रही मेरी नेक-नामी मुझे

कोई नहीं मिरा सामे इसी में ख़ुश हूँ मैं
कि रास आई बहुत मेरी ख़ुद-कलामी मुझे

मज़ा मिला न कभी मंज़िल-आश्‍नाई का
कुछ ऐसा कर गई आवारा तेज़गामी मुझे

हसीन चेहरों को तेवरी के बल बिगाड़ते हैं
गिराँ गुज़रती है फ़ितरत की बद-निज़ामी मुझे

शराब-ए-तुंद की तल्ख़ी का ज़ाइक़ा जैसे
पसंद आई हसीनों की बद-कलामी मुझे

नशात-ए-तकया-ए-ज़ानू से सर उठाने तक
सितारा सुब्ह का देता रहा सलामी मुझे

मैं फ़र्श-ए-राह यूँ ही तो नहीं हुआ ‘आज़र’
निढाल कर के रही उस की ख़ुश-ख़िरामी मुझे

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