राही फ़िदाई की रचनाएँ

एहसास-ए-ज़िम्मेदारी बेदार हो रहा है

एहसास-ए-ज़िम्मेदारी बेदार हो रहा है
हर शख़्स अपने क़द का मीनार हो रहा है

आवाज़-ए-हक़ कहीं अब रू-पोश हो न जाए
हर्फ़-ए-ग़लत बरहना तल्वार हो रहा है

किस नक़्श की जिला है अनफ़ास-ए-कहकशाँ में
वो कौन साया-साया दीवार हो रहा है

मिन्नत-गह-ए-सियाही ऐलान-ए-ख़ैर-ए-ख़्वाही
कम-ज़र्फ़ वल्वलों का इज़हार हो रहा है

हैरत-ज़दा है ‘राही’ दरिया से एहतिजाजन
मासूम क़तरा-क़तरा ग़द्दार हो रहा है

हर इक फ़न में यक़ीनन ताक़ है वो

हर इक फ़न में यक़ीनन ताक़ है वो
अज़ल ही से बड़ा ख़ल्लाक़ है वो

जिसे तुम ने कहा था सम्म-ए-क़ातिल
अज़ीज़म असल में तिरयाक़ है वो

उसे संग-ए-तनफ़्फ़ुर से न रगड़ो
सुलग उट्ठेगा दिल चक़मसक़ है वो

ग़ुरूब-ए-सिदक़ का ख़दशा है बातिल
कहाँ मिन्नत-कश-ए-इशराक़ है वो

जरी इब्न-ए-शराफ़त नेक लड़का
क़बीले भर में लेकिन आक़ है वो

ब-बातिन आइना है क़ल्ब उस का
ब-ज़ाहिर सरवर-ए-फ़ुस्साक़ है वो

कहाँ से एहतिसाब-ए-नफ़स होगा
हिसाब-ए-दोस्ताँ बे-बाक़ है वो

मुक़फ़्फ़ल घर खुला है इक दरीचा
किसी की दीद का मुश्ताक़ है वो

जहाँ रक्खी है शम-ए-बे-सबाती
मिरी दीवार-ए-जाँ ताक़ है वो

अज़ाएम जिस पे पसपा हों सफ़र में
अमीर उस को कहें क़ज़्ज़ाक़ है वो

हवस भी क्या कोई ख़स्ता सुतूँ है
दरख़्त-ए-नारसा की साक़ है वो

बनाया उस ने सब को जुफ़्त ‘राही’
मगर हर ज़ाविए से ताक़ है वो

ख़ुद को मुम्ताज़ बनाने की दिली-ख़्वाहिश में

ख़ुद को मुम्ताज़ बनाने की दिली-ख़्वाहिश में
दुश्मन-ए-जाँ से मिली मेरी अना साज़िश में

रूह रौशन न हुई और न दिल ही बहला
वक़्त बर्बाद किया जिस की आराइश में

आज माकूस है आईना-ए-अय्याम-ए-जहाँ
नीम में रंग-ए-हिना ज़ोर-ए-तपिश बारिश में

ख़ुद को मिन्नत-कश-ए-क़िस्मत न करो दीदा-वरो
गुलशन-ए-शौक़ उगाना है तुम्हें आतिश में

दस्त-बस्ता है सहर शब की इजाज़त के लिए
अब के ख़ुददार तबीअत न रही ताबिश में

पस्ती-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र वहशत-ए-असरार-ओ-रूमूज़
हो रहा है ब-ख़ुदा जहल फ़ुज़ूँ दानिश में

क़ब्ज़ा-ए-वक़्त में जुगनू है सितारा कि शरार
हम फ़क़ीरों का भला होगा न आलाइश में

बाँध ले अपनी गिरह में ये नसीहत ‘राही’
ज़ब्त से काम ले नाख़ुन न बढ़ा ख़ारिश में

कोई नश्शा न कोई ख़्वाब ख़रीद

कोई नश्शा न कोई ख़्वाब ख़रीद
तीरा-बख़्ती है माहताब ख़रीद

है मुज़य्यन दुकान-ए-ला-अद्री
सौ सवालों का इक जवाब ख़रीद

कीसा-ए-तम्मा में छुपा दीनार
फिर बिला ख़ौफ़ एहसताब ख़रीद

बड़ी मब्सूत है किताब-ए-ख़ल्क़
कोई अच्छा सा इंतिख़ाब ख़रीद

तुझ में है बहर-ए-बे-कराँ का वजूद
तुझ से किस ने कहा हबाब ख़रीद

तोता-चश्मी के ऐब से है पाक
शक्ल बद ही सी ग़ुराब ख़रीद

तब कहीं जा के होगा तू ‘ग़ालिब’
असदुल्लाह का ख़िताब ख़रीद

मदह-ख़्वाँ होगा हर वरक़ ‘राही’
सिर्फ़ इक लफ़्ज़-ए

मता-ओ-माल-ए-हवस हुब्ब-ए-हाल सामने है

मता-ओ-माल-ए-हवस हुब्ब-ए-हाल सामने है
शिकार ख़ुद को बचा देख जाल सामने है

ख़याल-ए-कोहना मुक़य्यद है तेरी सोचों में
रिहाई दे कि सज़ा यर्ग़माल सामने है

मुझे मलाल है अपनी फ़लक-नशीनी पर
यही उरूज की हद फिर ज़वाल सामने है

रगों में ख़ून के बदले मचल रही है आग
ज़ियाँ बदन का न जाँ का वबाल सामने है

यही है काबा-ए-मक़्सूद इसी से जल्वा-ए-अर्श
उठा ले चाह से क़ूत-ए-हलाल सामने है

वो बा-कमाल सियाक़-ओ-सबाक़ पर हावी
गुज़िश्ता उस की नज़र में मआल सामने है

सज़ा की हिम्मत-ए-आली भी हो गई पसपा
हज़ार-हा अरक़-ए-इंफ़िआल सामने है

ख़ुलूस सिक्का-ए-उफ़्तादा जेब-ए-हस्ती का
उठा के डाल दे दस्त-ए-सवाल सामने है

हमारे सब्र की हद हम पे आश्कारा हो
मुसब्बिबा सबब-ए-इश्तिआल सामने है

मुझे अज़ीज़ है सहरा-ए-मुम्किनात की सैर
ये और बात बाग़-ए-मुहाल सामने है

नज़र ब-ख़ैर हो ‘राही’ कि बू-ए-गुल की तरह
छुपा है वो मगर उस का जमाल सामने है

-इंतिसाब ख़रीद

मुतालआ की हवस है किताब दे जाओ

मुतालआ की हवस है किताब दे जाओ
हमारे अह्द को सालेह निसाब दे जाओ

शहीर-ए-इल्म की झोली कमाल से ख़ाली
ख़ुदा के वास्ते कोई ख़िताब दे जाओ

कभी तो हुरमत-ए-सैराबी-ए-नज़र खुल जाए
समुंदरों को तिलिस्म-ए-सैराब दे जाओ

हक़ीक़तों को तमाशा नहीं बनाऊँगा
मुनाफ़िक़त की हवा है नक़ाब दे जाओ

तुम्हारी आख़िरी उम्मीद बन के लौटूँगा
विदा की घड़ियों का हिसाब दे जाओ

क़दीम रौशनियों से उन्हें शिकायत है
तो शप्परों का नया आफ़्ताब दे जाओ

कोई तो मशग़ला-ए-ना-मुराद जारी हो
ज़बाँ करे बदरिक़ा-ए-इंकिलाब दे जाओ

इसी में ख़ंदा-लबी शान-ए-बे-नियाज़ी है
हर एक तीर का साकित जवाब दे जाओ

सफ़र-ए-नसीब है ‘राही’ मिसाल-ए-बाद-ए-रवाँ
जहात-ए-शश की ज़माम ओ रेकाब दे जाओ

 

वक़्त के इंतिज़ार में वो है

वक़्त के इंतिज़ार में वो है
जुस्तुजू-ए-शिकार में वो है

सीना-ए-राज़दार ही में नहीं
दीदा-ए-आश्कार में वो है

आईना साफ़ हो तो देख उसे
नक़्शा-ए-दिल-फ़िगार में वो है

उस के क़ब्ज़े में काएनात सही
फ़ुक़रा की क़तार में वो है

सर पे दस्तार-ए-फ़ज़ल है लेकिन
जुब्बा-ए-तार-तार में वो है

बे-कराँ ज़हन ओ दिल की है वुसअत
जिस्म-ओ-जाँ के हिसार में वो है

उस की चारों तरफ़ किताबें हैं
हल्क़ा-ए-ग़म-गुसार में वो है

पेश-ए-ज़ालिम सदा-ए-हक़ यानी
नरग़ा-ए-सद-हज़ा में वो है

क़िला-ए-बे-बसर में तुम महफ़ूज़
ख़ुद-कलामी के ग़ार में वो है

ख़ाक तुम पा सकोगे ख़ाक उसे
आब ओ बाद ओ शरार में वो है

लम्हा-हा-ए-सुकूँ में उस की तलाश
साअत-ए-इजि़्तरार में वो है

पैरवी उस की है अबस ‘राही’
ख़ुद ही राह-ए-फ़रार में वो है

 

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