रियाज़ ख़ैराबादी की रचनाएँ

आईना देखते ही वो दीवाना हो गया

आईना देखते ही वो दीवाना हो गया
देखा किसे कि शम्अ से परवाना हो गया

गुल कर के शम्अ सोए थे हम ना-मुराद आज
रौशन किसी के आने से काशाना हो गया

मुँह चूम लूँ ये किस ने कहा मुझ को देख कर
दीवाना था ही और भी दीवाना हो गया

तोड़ी थी जिस से तौबा किसी ने हज़ार बार
अफ़्सोस नज़्र-ए-तौबा वो पैमाना हो गया

मय तौबा बन के आई थी लब तक ऐ ‘रियाज़’
लबरेज़ अपनी उम्र का पैमाना

कल क़यामत है क़यामत के सिवा क्या होगा

कल क़यामत है क़यामत के सिवा क्या होगा
ऐ मैं कुर्बान वफ़ा वादा-ए-फ़र्दा क्या होगा

हश्र के रोज़ भी क्या ख़ून-ए-तमन्ना होगा
सामने आएँगे या आज भी पर्दा होगा

तू बता दे हमें सदक़े तिरे ऐ शान-ए-करम
हम गुनहगार हैं क्या हश्र हमारा होगा

ऐसी ले दे हुई आ कर कि इलाही तौबा
हम समझते थे कि महशर में तमाशा होगा

पी के आया अरक़-ए-शर्म जबीं पर जो कभी
चेहरे पर बादा-कशो नूर बरसता होगा

शर्म-ए-इस्याँ से नहीं उठती हैं पलकें
हम गुनहगार से क्या हश्र में पर्दा होगा

काबा सुनते हैं कि घर है बड़े दाता का ‘रियाज़’
ज़िंदगी है तो फ़क़ीरों का भी फेरा होगा

हो गया

कोई मुँह चूम लेगा इस नहीं पर

कोई मुँह चूम लेगा इस नहीं पर
शिकन रह जाएगी यूँही जबीं पर

उड़ाए फिरती है उन को जवानी
क़दम पड़ता नहीं उन का ज़मीं पर

धरी रह जाएगी यूँही शब-ए-वस्ल
नहीं लब पर शिकन उन की ज़बीं पर

मुझे है ख़ून का दावा मुझे है
उन्हीं पर दावर-ए-महशर उन्हीं पर

‘रियाज़’ अच्छे मुसलमाँ आप भी हैं
कि दिल आया भी तो काफ़िर हसीं पर

 

जफ़ा में नाम निकालो न आसमाँ की तरह

जफ़ा में नाम निकालो न आसमाँ की तरह
खुलेंगी लाख ज़बानें मिरी ज़बाँ की तरह

ये किस की साया-ए-दीवार ने मुझे पीसा
ये कौन टूट पड़ा मुझ पे आसमाँ की तरह

रह-ए-हयात कटी इस तरह कि उठ उठ कर
मैं बैठ बैठ गया गर्द-ए-कारवाँ की तरह

शरीक-ए-दर्द तो क्या बाइस-ए-अज़ीयत हैं
वो लोग जिन से तअल्लुक़ था जिस्म ओ जाँ की तरह

मुझे शबाब ने मारा बला-ए-जाँ हो कर
बहार आई मिरे बाग़ में ख़िजाँ की तरह

तिरी उठान तरक़्क़ी करे क़यामत की
तिरा शबाब बढ़े उम्र-ए-जावेदाँ की तरह

‘रियाज़’ मौत है इस शर्त से हमें मंज़ूर
ज़मीं सताए न मरने पर आसमाँ की तरह

 

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