रियाज़ मजीद की रचनाएँ

 

आँच आएगी न अंदर की ज़बाँ तक ऐ दिल

आँच आएगी न अंदर की ज़बाँ तक ऐ दिल
कितनी देर और मिरी जान कहाँ तक ऐ दिल

हद ज़ियादा से ज़ियादा की कोई तो होगी
और इस हिर्स का फैलाव कहाँ तक ऐ दिल

तजरबा तजरबा आज़ाद रग-ओ-पै में रहा
कितनी अफ़्सुर्दगी है दहर से जाँ तक ऐ दिल

महक उड़ जाएगी तफ़्हीम के लब खुलने से
सहर इबलाग़ का है ज़ब्त-ए-बयाँ तक ऐ दिल

अक्स ओ आईने की सूरत है हमारा रिश्ता
हूँ तिरे साथ तू मेरा है जहाँ तक ऐ दिल

हैरत-आसार अजब ख़्वाब लिए बैठा हूँ
शायद आ जाए कोई मेरी दुकाँा तक ऐ दिल

शोर से अहल-ए-ख़बर के है ‘रियाज़’ आज़ुर्दा
कोई ले जाए उसे बे-ख़बराँ तक ऐ दिल

बजा है हम ज़रूरत से ज़ियादा चाहते हैं

बजा है हम ज़रूरत से ज़ियादा चाहते हैं
मगर ये देख सब कुछ बे-इरादा चाहते हैं

बहुत दिल-तंग हैं गुंजाइश-ए-मौजूद से हम
रह-ए-इम्काँ कुशादा से कुशादा चाहते हैं

पुरानी है नुमू-आसार है फिर भी ये मिट्टी
बदन से और अभी कुछ इस्तिफ़ादा चाहते हैं

सवार आते नहीं हैं लौट कर जिन घाटियों से
सफ़र इस खोंट का इक पा-प्यादा चाहते हैं

बहुत बे-ज़ार हैं अशराफ़िया की रहबरी से
कोई इंसान कोई ख़ाक-ज़ादा चाहते ळैं

कोई इज़हार-आमादा है दिल की धड़कनों में
हम उस के वास्ते इक लहन-ए-सादा चाहते हैं

जो हो मक़्बूल उस की बारगाह-ए-हक़-अदा में
वो इक लम्हा

हम फ़लक के आदमी थे साकिनान-ए-क़र्या-ए-महताब थे

हम फ़लक के आदमी थे साकिनान-ए-क़र्या-ए-महताब थे
हम तिरे हाथों में कैसे आ गए हम तो बड़े नायाब थे

वक़्त ने हम को अगर पत्थर बना डाला है तो हम क्या करें
याद हैं वो दिन भी हम को हम भी जब मेहर-ओ-वफ़ा का बाब थे

ज़र लुटाते गुज़रे मौसम आने वाली रौशनी लाती रूतें
चंद यादें चंद उम्मीदें हमारी ज़ीस्त के असबाब थे

ख़्वाब और ताबीर हैं दो इंतिहाओं पर हमें ये इल्म था
हम जिए जाते थे फिर भी अपने क्या फ़ौलाद के आसाब थे

हो सकी हैं कब ख़यालों की हम-आहंगी की ज़ामिन क़ुर्बतें
एक ही बिस्तर पे सोने वालों के भी अपने अपने ख़्वाब थे

जो ‘रियाज़’ आता था हम को याद वो इक क़र्या-ए-सरसब्ज़ था
चंद रौशन ताक़ थे कुछ नूर में डूबे हुए मेहराब थे

‘रियाज़’ आधे से आधा चाहते हैं

 

जो सैल-ए-दर्द उठा था वो जान छोड़ गया

जो सैल-ए-दर्द उठा था वो जान छोड़ गया
मगर वजूद पे अपना निशान छोड़ गया

हर एक चीज़ में ख़ुशबू है उस के होने की
अजब निशानियाँ वो मेहमान छोड़ गया

न साथ रहने का वादा अगर किया पूरा
ज़मीं का साथ अगर आसमान छोड़ गया

ज़रा सी देर को बैठा झुका गया शाख़ें
परिंदा पेड़ में अपनी थकान छोड़ गया

वो वाक़िआ मिरा किरदार उभरता था जिस में
कहानी-कार उसी का बयान छोड़ गया

सिमटती फैलती तन्हाई सोते जागते दर्द
वो अपने और मिरे दरमियान छोड़ गया

बहुत अज़ीज़ थी नींद उस को सुब्ह-ए-काज़िब की
सो उस को सोते हुए कारवान छोड़ गया

रहा ‘रियाज़’ अंधेरों में नौहा करने को
वो आँखें नोचने वाला ज़बान छोड़ गया

मुसाफ़ित के तहय्युर से कट के कब आए

मुसाफ़ित के तहय्युर से कट के कब आए
जो चौथी सम्त को निकले पलट के कब आए

अब अपने अक्स को पहचानना भी मुश्किल है
हम अपने आप में हैरत से हट के कब आए

इक इंतिशार था घर में भी घर से बाहर भी
सँवर के निकले थे किस दिन सिमट के कब आए

हम ऐसे ख़ल्वतियों से मुकालमे को ये लोग
जहान भर की सदाओं से अट के कब आए

ये गुफ़्तुगू तो है रद्द-ए-अमल तिरी चुप का
जो कह रहे हैं ये हम घर से रट के कब आए

जब अपने आप में मसरूफ़ हो गया वो बहुत
हम उस की सम्त ज़माने से कट के कब आए

‘रियाज़’ ध्यान हम-आग़ोश आइने से रहा
ख़याल उस के तसव्वुर से हट के कब आए

 

निशान क़ाफ़ला-दर-क़ाफ़ला रहेगा मिरा

निशान क़ाफ़ला-दर-क़ाफ़ला रहेगा मिरा
जहाँ है गर्द-ए-सफ़र सिलसिला रहेगा मिरा

मुझे न तू ने मिरी ज़िंदगी गुज़ारने दी
ज़माने तुझ से हमेशा गिला रहेगा मिरा

सियह दिलों में सितारों की फ़स्ल उगाने को
हुनर चराग़ की लौ से मिला रहेगा मिरा

उजड़ते वक़्त से बर्बाद होती दुनिया से
तिरे सबब से तअल्लुक़ दिला रहेगा मिरा

न गुफ़्तूगू से ये लर्ज़िश गुमाँ की जाएगी
अगर असास का पत्थर हिला रहेगा मिरा

ये सोच कर कभी अक्स उस किरन का उतर था
इस आईना में सदा दिल खिला रहेगा मिरा

‘रियाज़’ चुप से बढ़े और दुख ज़रूरत के
मुझे था ज़ोम ये घाव सिला रहेगा मिरा

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