रियाज़ लतीफ़ की रचनाएँ

किनारा-दर-किनारा मुस्तक़िल मंजधार है यूँ भी

किनारा-दर-किनारा मुस्तक़िल मंजधार है यूँ भी
मिरे पानी में जो कुछ है वो यूँ पुर-असरार है यूँ भी

बहा जाता हूँ अक्सर दूर लम्हों के हिसारों से
मिरे ठहराओ के आग़ोश में रफ़्तार है यूँ भी

कहाँ ख़लियों के वीरानों में उस को ढूँडने जाएँ
ज़मानों का सिरा मेरे सिरे से पार है यूँ भी

यहाँ से यूँ भी इक तजरीद की सरहद उभरती है
और अपने दरमियाँ अन्फ़ास की दीवार है यूँ भी

हमारे गुम्बदों की गूँज का चेहरा नहीं तो क्या
जो तुझ से कह नहीं सकते पस-ए-इज़हार है यूँ भी

रहा क्या फ़र्क़ अंदर और बाहर में ‘रियाज़’ आख़िर
जो मुझ में खो चुका है मुझ से वो सब पार है यूँ भी

 

किसी बेघर जहाँ का राज़ होना चाहिए था

किसी बेघर जहाँ का राज़ होना चाहिए था
हमें इस दश्‍त में परवाज़ होना चाहिए था

हमारे ख़ून में भी कोई बिछड़ी लहर आई
हवा के हाथ में इक साज़ होना चाहिए था

हमारे ला-मकाँ चेहरे में आईनों के जंगल
हमें इन में तिरा अंदाज़ होना चाहिए था

यहीं पर ख़त्म होनी चाहिए थी एक दुनिया
यहीं से बात का आग़ाज़ होना चाहिए था

‘रियाज़’ अब तुम को खुलना चाहिए था इस वरक़ पर
किसी बे-घर जहाँ का राज़ होना चाहिए था

ख़ला की रूह किस लिए हो मेरे इख़्तियार में

ख़ला की रूह किस लिए हो मेरे इख़्तियार में
उड़ान को तो ज़िक्र तक न था मिरे फ़रार में

कभी तो मंज़रों के इस तिलिस्म से उभर सकूँ
खड़ा हूँ दिल की सतह पर ख़ुद अपने इंतिज़ार में

ये साअतों की भीड़ ने उसे गँवा दिया न हो
रखा था मैं ने एक लम्स वक़्त की दरार में

सफ़र में मरहलों की रस्म भी है अब बुझी बुझी
वही पुरानी गर्द है हर इक नए ग़ुबार में

अबद की सरहदों के पार भी हदों का शोर था
थी पैकरों की दास्ताँ ख़ला के शाहकार में

ये जिस्म क्यूँ ये रूह क्यूँ हयात क्यूँ ‘रियाज़’ क्यूँ
सिफ़र सिफ़र की गूँज है तलाश के मज़ार में

खींच कर ले जाएगा अंजार महवर की तरफ़

खींच कर ले जाएगा अंजार महवर की तरफ़
है बदन का रास्ता बाहर से अंदर की तरफ़

वो भी अपने साँस के सैलाब में है लापता
जो मुझे फैला गया मेरे ही मंज़र की तरफ़

अब ख़लाओं को समेटे हर तरफ़ हों गामज़न
आज है मेरा सफ़र अपने ही पैकर की तरफ़

कोई तो पानी की वीरानी को समझेगा कभी
देखता रहता हूँ अब मैं भी समुंदर की तरफ़

ज़ेहन की क़ब्रों में फिर से सूर गूँजा है ‘रियाज़’
तंगी-ए-इज़हार चल इक और महशर की तरफ़

ख़ुद अपना इंतिज़ार भी

ख़ुद अपना इंतिज़ार भी
हम अपने में क़रार भी

सिफ्ऱ का रेग-ज़ार भी
मगर मिरा दयार भी

लहू मिरा सुकूत भी
जुनूँ का शाहकार भी

सफ़र में मरहला बना
दवाम का हिसार भी

नज़र उठा के कर दिया
ख़ला के दिल पे वार भी

तराशी हम ने रूह जब
उठा था कुछ ग़ुबार भी

गुज़र चुके हैं बार-हा
ख़ुदा के आर-पार भी

‘रियाज़’ मावरा तो हो
कि हो तिरा शुमार भी

गुज़र चुके हैं बदन से आगे नजात का ख़्वाब हम हुए हैं

गुज़र चुके हैं बदन से आगे नजात का ख़्वाब हम हुए हैं
मुहीत साँसों के पार जा कर बहुत ही नायाब हम हुए हैं

किसी ने हम को अता नहीं कि हमारी गर्दिश है अपनी गर्दिश
ख़ुद अपनी मर्ज़ी से इस जहाँ की रगों में गिर्दाब हम हुए हैं

अजीब खोए हुए जहानों की गूँज है अपने गुम्बदों में
न जाने किस की समाअतों के मज़ार का बाब हम हुए हैं

जो हम में मिस्मार हो चुका है उसी से तामीर है हमारी
अदम के पत्थर तराश कर ही अबद की मेहराब हम हुए हैं

तमाम सतहें उलट रही हैं हयात की मौत की ख़ुदा की
जो तेरे दिल से उभर के आते हैं ऐसे सैलाब हम हुए हैं

‘रियाज़’ डर है कहीं न आँखों की कश्‍तियों में छुपे समुंदर
जुमूद टूटा है सारी मौजों का ऐसे बे-ताब हम हुए हैं

 

 

Share