रुचि भल्ला की रचनाएँ

भूरा साँप

जबकि कलकत्ता कभी नहीं गई
फिर भी चली जाती हूँ बेलूर मठ
बेलूर मठ को मैंने देखा नहीं है
छुटपन में पढ़ा था किसी किताब में

जब भी लेती हूँ उसका नाम
थाम लेती हूँ बचपन की उंगली
पाती हूँ खुद को स्मोकिंग वाली गुलाबी फ़्राॅक में
जो सिली थी अम्मा ने प्रीतम सिलाई मशीन से

सात बरस की वह लड़की दौड़ते हुए
इलाहाबाद से चली आती है मेरे पास
जैसे पिता के दफ्तर से लौटने पर
खट्ट से उतर जाती थी घर की सीढ़ियाँ
जा लगती थी पिता के गले से
जैसे महीनों बाद लौटे हों पिता
सात समन्दर पार से

उम्र के चवालीसवें साल में
कस्तूरी की तरह तलाशती है अब
अपने बालों में उस कड़वे तेल की गंध को
जब सात बरस में कहती थी अम्मा से
बंटे सरीखी दो आँखें बाहर निकाल कर
“और कित्ता तेल लगाओगी अम्मा
भिगो देती हो चोटी में बंधे
फीते के मेरे लाल फूल ”

लाल फूलों से याद आता है
दादी कहती थीं तेरी चोटी में दो गुलाब
तेरे गालों में दो टमाटर हैं
बात-बात पर तुनकती लड़ती चिढ़ाती
चालाकी से दादी को लूडो में हराती वह लड़की
अब रोज़ खुद हार जाती है
जीवन के साँप -सीढ़ी वाले खेल में

सौ तक जाते-जाते उसे काट लेता है हर रोज़
निन्यानबे नंबर का भूरा साँप
वह साँप से डर जाती है
डर कर छुप जाना चाहती है
इलाहाबाद वाले घर के आँगन में
जहाँ माँ पिता और दादी बैठा करते थे मंजी पर
देते थे घड़ी-घड़ी मेरे नाम की आवाज़
बहुत सालों से मुझे अब किसी ने
उस तरह से पुकारा नहीं

मैं उस प्रेम की तलाश में
इलाहाबाद के नाम को जपती हूँ
जैसे कोई अल्लाह के प्यार में फेरता है माला
इलाहाबाद को मैं उतना प्यार करती हूँ
जितना शीरीं ने किया था फ़रहाद से
कार्ल मार्क्स ने किया था अपनी जेनी को
कहते हुए –
मैं तुम्हें प्यार करता हूँ मदाम !
उससे भी ज्यादा जितना वेनिस के मूर ने किया था

मैं इलाहाबाद को ऐसे प्यार करती हूँ
जैसे नाज़िम हिकमत कहते हैं प्रेम का स्वाद लेते हुए
प्रेम जैसे रोटी को नमक में भिगो कर खाना हो
मैं नाज़िम हिकमत से मिलना चाहती हूँ
बतलाना चाहती हूँ
कि इस्तानबुल में जैसे गहराती है शाम
उससे भी ज्यादा साँवला रंग होता है
इलाहाबाद का प्रेम में
जब संगम पर फैलती है साँझ की चादर

तुम नहीं जानोगे नाज़िम
तुमने कभी चखा जो नहीं है
इलाहाबाद को मीठे अमरूद की तरह
मेरे दाँत के नीचे आज भी दबा हुया है
अमरूद का मीठा एक बीज
कभी लौटना नाज़िम दुनिया में
मैं दिखलाऊँगी तुम्हें
सात बरस की बच्ची का टूटा हुया वह दूध का दाँत
जिसे आज भी रखा है
मुट्ठी में

प्रेम वहाँ भी मिला

मैं तलाशती रही प्रेम को
कोकिला के कंठ में
चाँद के सीने में
नाज़िम हिकमत की कविता
बटालवी की नज़्म
लैला की आँखों
हीर के फ़सानों में
भगत सिंह के बसंती चोले में
पाश के शहर बरनाला में
संगम के तैरते जल में भी तलाशा
चरणामृत के तुलसी दल में भी खोजा
तोताराम कुम्हार के चाक पर भी मिला प्रेम
हरबती के रोट में भी चखा मैंने प्रेम का स्वाद
जितना मिला प्यास बढ़ती गई
एक उम्र काट दी प्रेम के पीछे
चढ़ाती रही कभी मज़ार पर चादर
मंदिर में भी खोजा पत्थर की मूर्ति में
प्रेम वहाँ भी मिला जबरेश्वर मंदिर के
पिछवाड़े वाली दीवार के सहारे बैठा
पत्थर के सीने से बाहर झाँकता हुया
जहाँ पीपल की नाज़ुक हरी एक टहनी
झूल रही थी पाँच पत्तों के संग
मैंने देखा …..
जहाँ जीवन के साँस लेने की भी संभावना नहीं
वहाँ इत्मीनान से बैठा
मृत्यु को अंगूठा दिखला रहा था
प्रेम

संभाल कर इलाहाबाद ने

 

मक़बूल का मक़बरा कहाँ है

बादलों के पार आसमान के सौवें माले पर
अब भी खड़ा है मक़बूल
रंग रहा है दूसरी कायनात को
मक़बूल कभी मरते नहीं
बूढ़े होते हैं ईश्वर जंग खायी मशीनों की तरह
दयनीय और उबाऊ लगते हैं खड़े
मंदिर की सलाखों के भीतर

जबकि मक़बूल हौसलों के साथ जीते हैं
चोट खाते हैं और जी जाते हैं जीवन
ईश्वर को कोई पत्थर नहीं मारता
न ही देश निकाला देता है
अपना लेते हैं सब पत्थर को
मौन मूर्तियों में ढाल कर
विट्ठल को भी अपना लिया था पंढरपुर ने
आज पंढरपुर विट्ठल की धरती है
धरती तो मक़बूल की भी थी
जिसने लिया था वहाँ जन्म
विट्ठल तो आकर बस गए थे घूमते-घामते
बना लिए थे ठिकाने
जो मैं जानती पंढरपुर मक़बूल की धरती है
मैं विट्ठल के मिलने से पहले
मक़बूल से मिलने जाती
ईश्वर तो फिर भी मिल जाते देर सवेर
मैं मक़बूल को खोजती
मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ने से पहले
मक़बूल के गली कूचे में जाती
जाती उसके घर की छत पर
जहाँ चाहा था उसने
समूची कायनात को रंगना
मैं विट्ठल की मुरली से पहले
मक़बूल की कूची को अधर से लगाती
जो मिलते मक़बूल तो पूछती
जब तक रहेंगे धरती पर घोड़े
तुम लौटते रहोगे न उनसे मिलने

जैसे लौटता है बसंत
जैसे फूटती है सरसों
जैसे लौटता है सरहद से विजयी सेनानी
जैसे निकलता है स्याह अँधेरे को चीरता चाँद
कहती तुम लौट आना अपने देस
आकर बताना विट्ठल को
कि दुनिया के सारे भगवान मिल कर एक होते हैं
पर मक़बूल एक अकेला एक होता है
जिसे पैदा किया था पंढरपुर की धरती ने
जिस पर फ़िदा थे दुनिया के सब रंग
जिसके चले जाने से अब रूठ गई है
तूलिका रंग और कैनवेस
सौवें आसमान से उतर कर तुम आना मक़बूल
जाकर कहना मंदिर में विट्ठल से
जो न होता मक़बूल फ़िदा हुसेन
तो कौन भरता विट्ठल में रंग

येसु! कहाँ हो तुम अब

गोवा चर्च का देश है
इलाहाबाद में भी हैं चौदह गिरजे
अच्छे लगते हैं मुझे गिरजे मोमबत्तियाँ घंटियाँ
मरियम और यीशू से ज्यादा
मैंने चर्च से प्यार किया है
जब प्यार हुआ था चर्च से आठ बरस की थी मैं
अमर अकबर एंथनी पिक्चर के एंथनी से
प्यार हो गया था मुझको
उससे भी ज्यादा चर्च के फादर से
फादर से ज्यादा कन्फेशन बाॅक्स से प्यार कर बैठी थी
धर्मवीर भारती का उपन्यास गुनाहों का देवता तो नहीं पढ़ा था
फिर भी प्यार भरा गुनाह कर लेना चाहती थी
कन्फेशन बाॅक्स में जाकर गुनाह को
कबूल करना चाहती थी
प्यार भरे गुनाह मैं करती रही
कभी नहीं कह सकी फादर से कि अच्छा लगता था
वह हीरोहौंडा वाला मुसमलमान लड़का
कभी बोल नहीं सकी खुल कर कि
अपने से छोटी उम्र के ब्राह्मण उस लड़के की आवाज़ में जादू है
न ही कह सकी कभी धीमे से भी कि वह बंगाली लड़का
जो बहुत बड़ा है मुझसे काॅलेज के बाहर
खत लिये खड़ा रहता है मेरे लिए
हमउम्र वह लड़का जो पढ़ता था कक्षा दो से मेरे साथ
बारहवीं कक्षा में गुलाब रखने लगा था किताबों में
कभी नहीं कह सकी थी दिल की कोई बात फादर से
फादर से तो क्या मदर मेरी से भी नहीं कह सकी मैं
जानते रहे हैं सब कुछ यीशू पर मेरी ही तरह बेबस रहे

मैं पत्थर गिरजे में जाकर कभी अपनी
कभी यीशू की बेबसी देखती रही
प्रज्ञा भी जाती थी आजमगढ़ के एक चर्च में
नन्ही हथेलियों को जोड़ कर घुटने टेक बैठ जाती थी
मैं अब भी लगाती हूँ चर्च के फेरे
गोवा में देखे हैं मैंने तमाम गिरजे
आॅवर लेडी आॅफ़ इमैक्यूलेट कन्सेप्शन
चर्च को भी देखा है
कहीं नहीं दिखा मुझे वह चर्च
जिसके पीछे लगा है वह एक पेड़
जिसके नीचे संजीव कुमार शबाना आज़मी
से मिलना चाहते थे
हाथ थाम कर गाते थे …..
चाँद चुरा कर लाया हूँ तो फिर चल बैठें
चर्च के पीछे ….
मैं ईमानदारी से कबूल करती हूँ खुलेआम
पत्थर गिरजे के बाहर खड़े होकर
मैंने चर्च से ज्यादा एंथनी से प्यार किया है
मोमबत्तियाँ घंटियाँ फादर से प्यार किया है
कन्फेशन बाॅक्स से भी ज्यादा
चर्च के पीछे लगे उस एक पेड़ से किया है
चर्च के देश में जाकर तलाशा है
उस एक चर्च को
मुझे वहाँ गोवा मिला समन्दर सीपियाँ
काजू और मछली मिली
यीशू भी दिखे मरियम भी मिली
सेंट ज़ेवियर भी थे वहाँ
नहीं था तो बस वह एक चर्च
चर्च के देश में

शहरों के बीच दूरियाँ

इलाहाबाद से दूर है दिल्ली
फलटन से बहुत दूर
दिल्ली से भी दूर है दिल्ली
दिल्ली में अब कहाँ रहती है दिल्ली
जैसे मैं नहीं रहती हूँ अब इलाहाबाद में
इलाहाबाद की याद को साथ लिये घूमती हूँ
दिल्ली भी दिल्ली की यादों को लिए घूमती है
तंग गलियों से निकल कर
स्ट्रीट रोड पर आ गई है दिल्ली
क्या तुमने कभी देखा है
आकर इंडिया गेट को ,प्रज्ञा !
अगर तस्वीरों में ही देखा है तो ठीक है
रूबरु देखोगी हकीकत से अलहदा पाओगी
लहराते तिरंगे के नीचे देसी नहीं
विदेशी सभ्यता टहलती है
पुरानी दिल्ली से नई दिल्ली
नई दिल्ली से निकलती चली जा रही है दिल्ली
दिल्ली 6 में तुम्हें मिलेंगे गिने-चुने कबूतर
परांठे वाली गली भी मिल जाएगी
पर परांठे नहीं मिलेंगे
चाँदनी चौक में जैसे अब चाँदनी नहीं मिलती
रोटियों की शक्ल में
सब्जियों से स्टफ़्ड कुछ मिलता तो है
कड़ाही के खौलते तेल में तल जाता है
छन कर सज जाता है
तश्तरी में सब्जी रायते अचार के संग
ढाई सौ रूपए की प्लेट में जो मिलता है
तवे पर सिंकता वह खस्ता परांठा नहीं है
कहने को मैं उसे कचौड़ी भी कह सकती हूँ
अगर नेतराम और सुलाकी
मुझे माफ़ कर सकें
तुम भी मुझे माफ़ कर देना ,दोस्त
जिस दिल्ली को तुम
हिन्दुस्तान का दिल समझती हो
मेरे पास दिल्ली का वह नक्शा नहीं
दिल्ली से बेहतर
तुम कुल्लू का पहाड़ घूम लो
सातारा का पठार
गोवा का समुद्र
कलकत्ते की हुगली
जैसलमेर की रेत देख लो
इलाहाबाद में भी तुम्हें बसंत मिल जाएगा
फरवरी के महीने में
पर दिल्ली में दिल्ली से मिलने की
कोई गारंटी नहीं

 

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