लता सिन्हा ‘ज्योतिर्मय’ की रचनाएँ

रुद्राणी

मेरे महादेव तू है मुझमें
तभी मैं तुझसे ज्योतिर्मय हूँ
तू चक्षु मध्य आबद्ध मेरे
हुए ज्योतिर्मय, मैं शिवमय हूँ…

आसक्त हृदय यह रुद्र तेरा
रुद्राक्ष वरण कर जान लिया
जो शिव तू है, मैं शक्ति हूँ
रुद्राणी स्वयं को मान लिया…

लौकिकता लुप्त हुई तन से
लगी प्रेम लगन, मगन मन है
किया निराकार स्वीकार मुझे
अद्भुत अनुभव यह अनुपम है…

यहाँ पार्थिवकता का भाव नहीं
अद्वैत-आत्म का संगम है
अनुभूति अनंत अद्वितीय है
आत्मिक आनंद विहंगम् है…

शैय्या शेष की त्याग

अहो……….. !
अहो देव……… ! हे हरि, विशेष
ओ… चक्रपाणी… तू जाग-जाग
यहाँ डूब रही मानवता छल-जल
अब शैय्या-शेष की त्याग-त्याग।

अब कब तक तू….. यूँ मौन रहेगा?
संकटग्रस्त मनुज, चहुँ लगी आग,
क्यूँ क्षीरसागर सोया तू अब तक?
अब योग-निद्रा से….. जाग……. जाग…!

अब शैय्या शेष की त्याग त्याग…
विध्वंस मचा… मानव, बना दानव
हुआ अंबर तक गुंजित… द्वेष-राग।
अब अवतरित हो… नरसिंह रूप
तू भी करवट ले शेषनाग।
अब योग निद्रा से… जाग… जाग!

तू….. चक्रधारी…… तू ……. वासुदेव
हे, श्यामवर्ण……. गोकुल चिराग,
कर अट्टास…… ले विराट रूप
हों भस्म असुर…… सभी क्रोध आग!
अब शैय्या शेष की……. त्याग त्याग… !

हुए चीर हरण नित… द्रौपद पुत्री
दुःशासन के, फिर… बढ़े हाथ
अब कण-कण में… कौरव बसते
चल पांचजन्य का अब कर तू नाद।
अब शैय्या शेष की… त्याग, त्याग…।

जो छल से वीहर वन में जानकी
छली गई… लंकेश हाथ
अब दसकंधर हर कदम खड़ा
कर भय लक्ष्मण रेखा के व्याप्त
अब शैय्या शेष की, त्याग… त्याग!

हिरणाक्ष्य नहीं अब… एक धरा पर
किये खंडित जिसका मध्य-भाग
अधिकृत हुई, अब दानव से धरती
हो अवतरित ज्योर्तिमय महाभाग
अब शैय्या-शेष की, त्याग… त्याग…!

बेजान बुत

भाग-1
वह बुत-सी पड़ी
नितांत चेहरे की हंसी
कोई छीन ले गया था कहीं…..
सौम्य, मगर भयाक्रांत
आँखों में विसर्जित विष
जिसे पीकर भी
नहीं निगल पाई वेदना
टपकती रिसती लहू सी
गर्म संवेदना….

सर्द सफेद…
बदन की सिलवटों में
दरिंदगी के पंजों के निशान
मानो बर्फ की
कोमल कार्पेट पर
अभी-अभी भेड़िए ने
फाड़ डाला हो नन्हें
खरगोश को
चटकते लहू के
धब्बे-सा दागदार
कोमलांगी का अंग-प्रत्यंग
चिथड़ों में संभालती
अपना वजूद।

सफेदपोश समाज में
जिसकी बेचारगी ने
उसे बना दिया है
और भी लजीज
उन भूखे भेड़ियों की
नजर में
जो चादर ताने
शराफ़त का
रहते हमारे बीच….
उफ्फ्…. कैसे रेंग पाएगी
इस सामाजिक दलदल में
जोंक……. जो इन्हीं नमी में
मुँह दबाए…

दुबके हैं नितांत
अवसर की तलाश में
जो बिना आभास के
समा जाएंगे जेहन में
चूस लेंगे पोर पोर……
ओहहह….. जख्मों को चाटते
हर टीस में गोते लगाते….
रग-रग को खखोड़ते…
हड्डी तक…
निगल जाने को आतुर
कैसे बचा पाएगी वजूद…..??

भाग-2
वह बचा लेगी….!!
निश्चित ही बचा लेगी
अपना वजूद…
दरिंदगी के निशां नोंचकर
अपना भविष्य सोचकर
कायरों को…
बीच बाजार में लाकर
उसके नपुंसकता की
धज्जियां उड़ा कर
उस भेड़िये के लिए…
शेरनी बनकर
जिंदा गोश्त के लिए…
टपकते लाड़ वाले जीभ को
जड़ से खींचकर…..

भूखी आँखों के गड्ढों में
अपनी एड़ियां धंसाकर….
तब करेगी वह… तांडव
रुद्र, प्रचण्ड रूपधारण कर
समाज को अब
देवी की तरफ नज़र
उठाने वाले दुष्कर्मी
चंड-मुंड के लिए
वही संहारक रूप में अवतरित होना
आवश्यक है….
नितांत आवश्यक…
कोई दया नहीं
सिर्फ क्रोध…
वही क्रोध….
चामुण्डे… वही क्रोध…!

बूँदों की आस 

फटती धरा की पीर से
धरती का मन भी रो पड़ा
ऐ गगन तू तान ले घन
अब चुनर मेघों भरा।

मेरी छटपटाती आत्मा
तरसी है बूँदों को अभी,
इस लपलपाती धूप में
मृण, रेत बनती जा रही।

बंजर न बन जाए कहीं
जो कोख थी खुशियाँ भरी
कृषक के संताप सुन,
कर दे तू बूँदों की झरी।

ऐ गगन तू मीत है
हूँ बंदिनी मैं तो तेरी,
मैं जीव की जननी सही
दायित्व पर तेरी बड़ी।

वृष्टि से तू तृप्ति देकर
खेतों को अब सींच दे,
उठे लहलहाते यह फसल
भरे ताल, नदियाँ, पोखरी।

हे गंगे 

हे गंगे… हर हर गंगे
तेरी शक्ति को पहचान लिया
तू जीवन दायिनी हिन्द की है
अब तो जग ने भी मान लिया

संबंध स्वर्ग से धरती का
केवल तुझसे ही बनता है
तेरे बाबुल का घर है अंबर
ममता का हमसे रिश्ता है

हठ से जपतप कर भगीरथ ने
जन जीवन का कल्याण किया
जल कंचन कल-कल हो अविरल
शिव जटापाश सम्मान लिया।

मोक्ष दायिनी, पाप नाशिनी
ये औषधियुक्त तेरे जल हैं
एक डुबकी से हुए निर्विकार
जनजन गंगे संग निर्मल है।

जो दूषित करते अब गंगा
अपराधी उनको मान लिया
पाप धर्म की बात नहीं
अब दोषी का संज्ञान लिया….

हे गंगे… हर हर गंगे
तेरी शक्ति को पहचान लिया
तू जीवन दायिनी हिन्द की है
अब तो जग ने भी मान लिया
हर हर गंगे….

हिमालय 

अटल अडिग दृढ़निश्चयी
शिखर श्रृंग हिमखंड
नित भृकुटी भेदता भारती
उत्पाती राष्ट्र उद्दंड…

प्रबल प्रखर प्रिय पौरुषता
निज प्रीत का दे सौगंध
तेरी भारती तुझे पुकारती
कर दंडित ले भुजद्दंद…

हुई खंडित भारत की भूमि
फंस राजनीति के जंग
वही… कोख जना कुपात्र करे
नित कोटि-कोटि षडयंत्र…

उठ जाग हिमालय तय कर दे
निर्धारित कर दे दंड
आतंकित करता जो भूतल
उसे दिखला क्रोध प्रचंड…

साक्षात रहा है तू साक्षी
वह बंटवारे का दंश
वही पीर कचोटे अंतर्मन
हिय प्रतिपल अंतर्द्वंद…

अद्भूत संबल, है रक्षक तू
सिखलादे पाठ प्रबंध
सदैव क्षमा भी कायरता
कर मर्दन धृष्ट घमंड…

दोषी कौन 

उठो-उठो अब तो जागो
खुद को झकझोर के पूछो न
क्या दोषी केवल वो ही है
जो सत्तारुढ़ हैं, बोलो न?

थी ’’राजतंत्र‘‘ की मर्यादा
तब राम प्रजा के मान धरे
अब ’’प्रजातंत्र‘‘ की साख कहाँ
हम जन-जन कौड़ी में बिखरे…!

खो दिये धैर्य और धर्म सभी
मानवता घुटने टेक रही
हुआ राजनीति का चीरहरण
नैतिकता छाती पीट रही…

माँ भारती क्या तू ध्वज में छिपी
या छिपी है किसी रसातल में…?
आ देख-देख कई द्रोही छिपे
तेरे तीन रंग के आँचल में….

चरमरा उठा है सिंहासन
इस चार धर्म की पाया पर
कई विषैले कील ठोक दिए
राम-रहीम की काया पर…

अब न धर्म के रखवाले
न देशभक्ति के भाव रहे
वो सिंहासन के सौदागर
वही चाहे, न सद्भाव रहे…

कब तक धर्मों के नाम मिटें
बनकर कठपुतली डोलो ना
अब आत्म जागृति जोत जला
ज्योतिर्मय नेत्र तो खोलो ना…

शहादत की शान

ये जवान जो मरते हैं नित
भारत की सीमा पर
पर विलाप न करती बेवा,
क्या न गुजरे माँ पर…?

मान तिरंगे का रखती,
बलिदान व्यर्थ न जाता
गर सपूत जो सौ होते
न्यौछावर करती माता…

धन्य हुआ कोख जननी का
पुत्र का धर्म निभाया
उसे भारती तुल्य किया
जब काम हिन्द के आया…

तेरे अलबेले बाँकेपन पे
माँ बलिहारी जाती थी
देशभक्ति का देख समर्पण
मन में इतराती थी..

एक जाँबाज का बेटा है तू
पितृ-श्रृण चुकाना
सीने पर गोली खा लेना पर
पीठ न कभी दिखाना…

ओढ़ तिरंगे का चादर जब
परमवीर पद पाओ
बलिदानी के पथ जाकर
ज्योतिर्मय दीप जलाओ…

अमृत बेला

जीवन की अमृत बेला में
क्यूं न स्वर्णिम सा भोर लिखा…?
थे मन उपवन शतदल सुगंध
क्यूं न भ्रमर-गुंज अतिशोर मिला…?

तृप्ति की मृदुल सरोवर में नित
दिप्त कँवलदल क्यूं न खिले…?
फिर स्वतः श्वेत हंसा जल से
मुँह मोती भर क्यूं न निकले…?

था विह्वल जीवन गरल बना
कर मंथन अमृत क्यूं न मिला…
जिज्ञासु मन की ज्ञान पिपासा
क्षुब्त हुई हल न निकला…

व्यथित पथिक, पर लक्ष्य अटल
थे मार्ग कठिन, संग धैर्य चला
कई दुर्गम पथ थे जीवन में, पर
सोच कभी क्या पग फिसला…?

संकल्प सुनिश्चित थे लेकिन
निज आत्मबल ही निर्बल निकला
जब ज्ञान चक्षु से धुंध हटा
’ज्योतिर्मय‘ मार्ग प्रशस्त मिला…

कलम के सिपाही

बड़ी थी ललक करूँ देश की
सेवा निरंतर हो लगन,
एक सैन्यपुत्री हो के भी
थामा है शस्त्रों में कलम…

भले प्राण छोड़े देह लेकिन
प्रण कभी होगा न भंग,
लेकर कलम सा शस्त्र और
निष्पक्षता लेखन के संग…

इन सत्ता की गलियारों में
देखी सिसकती भारती
आँखें मिली, मुझसे कहा
तुझे लेखनी धिक्कारती…

मैंने शपथ ली है तिरंगे की
विपुल जन ज्ञान हो
योद्धा बनूं लेकर कलम
जनजागृति संधान हो…

चल क्रांति की ज्योति जला दूं
धुंध के पट खोल दूं
कर राह ज्योतिर्मय कलम से
हिन्द की जय बोल दूं…

प्रहरी

उठ जाग हिमालय… पौरुषता
तेरी कहाँ खो गई है…?
ललकार रही तुझे हिन्द तेरी
तू कैसा प्रहरी है…?
अरे तू कैसा प्रहरी है…?

सौगंध लिया कैलाश का था
तू हिन्द की रक्षा करे सदा
फिर तेरे इस भाल दिखे
क्यूँ चिन्ता गहरी है…
अरे तू कैसा प्रहरी है…?

ऐ गिरिवर तुझ सा श्रेष्ठ नहीं
इस धरती पर कोई और कहीं
तेरे उन्नत शिखर पे शत्रु की
क्यूँ नजरें ठहरी हैं…
अरे तू कैसा प्रहरी है…?

कोई छीन गया है दिव्य मुकुट
कैलाश की आस भी रही टूट
उस मानसरोवर के हंसा की
चिंता गहरी है…
अरे तू कैसा प्रहरी है..?

तेरे आलिंगन गंगा अविरल
बन जाती मिल औषधीय जल
बारुद से हो रही खनिज विषैली
विपत्ति घनेरी है…
अरे तू कैसा प्रहरी है…?

हुंकार लगा… फुफकार दे तू
नरसिंहा का अवतार ले तू
हो प्रकट धीर, शत्रु को चीर
ज्योतिर्मय, कह रही है…
अरे तू कैसा प्रहरी है…?

वो भविष्य था 

जो गुजर गया…
वो कभी भविष्य था,
पर… क्या वर्तमान तुमने जिया..?
यही वर्तमान तो सत्य है,
शाश्वत भी…
न भूत, न ही भविष्य…
सत्कर्म ही उत्कृष्ट है
वह ब्रह्मांड भी कहाँ रिक्त है…
यह अस्तित्व भी तो उसी से है,
है विज्ञान अनंत आकाश का
जो समझ गया, विशिष्ट है
जो समझा ही नहीं, निकृष्ट है…
जीव साधना कोई कला नहीं
केवल दैहिक रचनातंत्र है,
सिहारने जो मस्तिष्क तेरा
वही नश्वर को देता मंत्र है
गति समय का मूल तंत्र है,
ब्रह्मांड यह… अनंत है… अनंत है…

यक्ष प्रश्न, आखिर क्यूँ 

आखिर क्यूँ…?
कोई तो कारण होगा
शिव ने सती का त्याग किया…!
आखिर कोई तो कारण होगा
सीता…. किसी के कहने मात्र से
गर्भवती होते हुए भी
त्यागी गई…
आखिर क्यँू…
कृष्ण ने राधा रानी के
प्रेम का बहिष्कार किया…?
आखिर कौन सी असमर्थता थी
जिसने कृष्ण के पाँव बांध दिए…?
जो अनेकानेक वैवाहिक बंधन में
बंधने से कहीं चूके नहीं
और राधा के आँसूओं से
उनका हृदय पिघला तक नहीं
वह कौन सी लीला थी
जिसमें प्रेम तो था
परन्तु पीड़ा की अनुभूति नहीं…?
क्या जग कल्याण में
राधा, सीता और सती का
कल्याण निहित नहीं..?
क्या देवियाँ…
इसलिए दोषयुक्त साबित हुईं
कि उन्हें देव तुल्य पुरुष से
न केवल प्रेम…
अपितु प्रेमाशक्ति थी
हृदय से मनमीत के लिए
भावयुक्त भक्ति थी…?
हे देव,.. मेरे महादेव…
कुछ तो बोलो…!
आज एक नारी
जो पुरुष प्रधान परिवेश में
बना दी गई है बेचारी…
वो आवाज उठा रही है…
उस विसंगतियों के विरुद्ध
जिसे देवाधिपतियों ने ही
दे दी थी मान्यता
वंचित कर दिया था उन्हें
उन अधिकारों से
जिसके अधीन होकर
वह कर सकती थी, आत्मरक्षा…
परन्तु यह कैसा उदाहरण
जो कर रहा नारी की
कोमल भावनाओं का हनन
हे स्वामी…
तुम अंतर्यामी होकर भी
न समझ पाए…!
परित्यक्ता के हृदय की वह पीड़ा
जिसे व्यक्त करने हेतु
कोई शब्द… अब तक…
सरस्वती ने भी नहीं रचे…
वह हृदय की वेदना…
बहिष्कृत आँखों के आँसू…
परित्यक्त अधरों की, अकुलाहट…
और विह्वल हृदय की, छटपटाहट
जिसे पढ़ पाना ही नहीं
व्यक्त कर पाना भी है, असंभव…
पर तुम कर सकते थे संभव…!
एक बार आकर
राधे को हृदय से लगाकर
जिस भरी सभा में
सीते का वरण किया
उसी सभागार में
जानकी का पक्षधर बनकर
अग्नि के फेरे संग
ऊंगली थामे, अग्नि परीक्षा देकर
सती को, पुनः बाम अंग आरुढ़ कर
पर तुम्हें हुआ पश्चाताप…
जानकी के… धरती में समाने के बाद
सती की स्व-आहुति और
राधा रानी के विलीन हो जाने के बाद
क्या महादेवी होना… स्वआहुति है…?
वह नारी स्वरूपा
क्या हर बार ही मृत्युदंश झेलेगी…?
शिव को… देवी के दोष बताने होंगे
परित्यक्त हृदय की पीड़ा समझनी होगी
यह दंश आखिर क्यूँ…??
सदैव… महादेवी अभिशापित क्यूँ…?
क्या दोषयुक्त ही है नारी…?
अगर राम पुरुषोत्तम थे
तो वास्तविकता का त्याग कर
सोने की सीता क्यूँ…?
धरती में समाते ही
फिर वह विलाप क्यूँ…?
जब त्याग ही दिया था… राधे को…
तो फिर हृदय में स्थान क्यूँ…?
जब स्थापित थी हृदय में
तो फिर यह परित्याग क्यूँ…?
आखिर क्यूँ…?
अगर शिव निष्ठुर थे तो
सती के शव को ढोया क्यूँ…?
अगर वह वैरागी, अनुरागी नहीं
तो फिर यह संवेदनाएँ क्यूँ…??
इस यक्ष प्रश्न के उत्तर
देने ही होंगे, उन देवों को…!
महादेव को… देवी की अंतः वेदना
समझनी ही होगी
उन्होंने अनेदेखी की है
सती की पीड़ा…
उन्हें अनुभव करना ही होगा…
हृदय का वह ताप
जिसमें सती झुलसती रही…!
परित्याग की वह वेदना…
जिसमें जानकी…
प्रतिपल व्याकुल होती रही…।
विरह में राधा…
विह्वल हो रोती रही…!
क्योंकि हर बार दोषी… देवी नहीं,
अबकी दोषी… स्वयं… महादेव हैं हाँ…
’’मेरे महादेव‘‘…

अंतः वेदना 

दीवार गिरा मन-मंदिर की
कैसे तपकर रह लेते हो…?
यूं विरह वेदना घुट-घुटकर
क्यूँ चुपके से पी लेते हो…?

संवेदनहीन या चक्षुदोष
या पुरुष अहम की वेदी है
यदि अश्रु-बूंद न हवन किए
स्व-आहुति ले लेती है…!

क्या विह्वल तेरे भाव नहीं
होते, या पहरा पाते हैं…?
आजीवन कारावास लिए
क्या पत्थर फूल खिलाते हैं…?

दीप्त ताप में तपकर भी
पाषाण चटकते देखा है
क्यूँ हार मांस के पुतले ने
चटकाई भाग्य की रेखा है…?

पुरुष कफन में लिपटा नित
क्यूँ अपनी चिता सजाता है?
मन चंदन भरी पचाठी पर
स्वयं मुखाग्नि दे जाता है।

माना कि शापित है जीवन
पर मन-मंदिर न ढहने दे
जो बंद लौह के द्वार हृदय
दे खोल, अश्रु को बहने दे…

कोई नर-नारी में भेद नहीं
मन कोमल ही तो पाया है
किस भाव हृदय दीवार घिरा
कर धराशाई, सब माया है।

बहुमूल्य मिला है एक जीवन
कल, कब और किसने देखा है?
अनभिज्ञ शांत ज्योतिर्मय है
शिव-स्नेह ही जीवन रेखा है…

गीता में गोविन्द 

अशांत भाव पार्थ के, संग्राम थे कुटुम्ब से
भीष्म कुरुक्षेत्र में नेतृत्व डटे कर रहे।

अर्जुन के करुण भाव से, थे पांव लड़खड़ा रहे
प्रत्यंचा न चढ़ाए, पार्थ युद्ध से मुकर रहे।

ज्ञान गीता के दिये जब पार्थ को गोविन्द ने
अज्ञानता के धुंध जब छटे, उजाले कर रहे

नारी हृदय के द्वेषभाव, ही पतन को ले चले,
सत्यवती के सभी, संतान शूली चढ़ रहे।

प्रतिबद्धता थी रही, भीष्म के संकल्प की
राजगद्दी से बंधे, नेतृत्व ही तो कर रहे।

पांचजन्य के नाद से, उद्धोष युद्ध हो गए
कुरुवंश के वंशावली आपस में लड़े, मर रहे।

चाल चौसर के चले, षडयंत्रकारी शकुनि ने,
निर्वस्त्र करते कुलवधू, सभा में धर्म खो रहे

अश्वत्थामा या शिखंडी, घटोत्कच या बरबरी,
दांव अभिमन्यु लगे, मोहरे थे सारे बन रहे।

अधर्म शर्त से लदे, कुरुवंश वृक्ष थे बढ़े
वो पांडु पुत्र पांचों थे जो, धर्म हेतु लड़ रहे।

कौरव ने कपट भाव से, वर्चस्व स्थापित किए
पुत्र मोह में घिरे, धृतराष्ट्र तक न डर रहे।

प्रकट हुए विराट रूप चक्रधारी वासुदेव
अब मोह भंग पार्थ के, टंकार गांडीव कर रहे।

धर्म युद्ध मध्य कृष्ण, पार्थ के ही साथ थे
हनुमंत ध्वज को साथ ले सारथी वो बन रहे।

जब जब जघन्य पाप से बेकल हुई है भारती
अवतार देवता के, दुष्ट दानवों को तर रहे।

अनुराग-बैराग

हृदय के कोमल कोपल की
खिली पंखु़िड़यां प्रीत पुष्पित
मन स्नेह शील संयम संचति
अनुराग विशेष स्व-आत्महित…

प्रेम पुष्प निज गंध संग
पर अनुरागी अलि प्रीत रंग
आलिंगन अधरों का चुंबन
मनुहार, गूढ़-रहस्य दर्शन…

संपूर्ण सृजन सृष्टिगत क्रम
लौकिक प्रेम परिपूर्ण समर्पण
किंचित रीत, प्रणय बंधन
दैनिक व दैहिक आकर्षण….

यदि प्रीत रहे वंचित बंधन
न प्रेमाधार कथित यौवन
तभी पार्थिवता से परे दिखे
अद्भुत ’’अद्वैत-आत्म-संगम‘‘…
मन शांत प्रीत ज्योतिर्मय संग…

मेरी काशी

अनुभूति विशेषतः हृदय रही
यह शिव नगरी मेरी ठहरी
हूँ उस औढर की प्रियतमा
जो इस नगरी का है प्रहरी

कण-कण से है रिश्ता मेरा
अब शिव ने मुझे पुकारा है
रही ज्योतिर्मय, शिवमयी सदा
काशी ने पुनः स्वीकारा है….

रही देवों की नगरी काशी
पर विश्वनाथ तो मेरे हैं
अद्भुत हैं अनंत अगोचर हैं
मधुरिम संबंध घनेरे हैं…

शिव शक्ति की संपूर्णता मैं
वहीं पार्वती की कोमलता
जब हवन कुंड में सती हुई
थी रही प्रेम की व्यापकता…

भले अंग-प्रत्यंग विभक्त गिरे
तेरे काँधे जो सुख पाया है
उस मर्म हेतु कोई शब्द नहीं
दर्शन से पृथक् ये माया है…

परित्याग सती को मौन हुआ
तू प्रखर प्रेम अव्यक्त किया
जब आत्म-हनन की बात सुनी
तब विपुल-प्रेम जग व्यक्त किया…!

ऐ विश्वनाथ तेरी काशी
पर घट-घट आधिपत्य मेरा
तू ज्योतिर्लिंग समाहित है
इस ज्योतिर्मय स्वामित्व तेरा…

वक्त

पल-पल, क्षिण-क्षिण कर फिसल रहा है
हाथ से वक्त का धागा रे
ओ मन… अब तू जरा संभल संभल
क्या नींद खुली, क्या जागा रे…?

न वक्त के बढ़ते कदम रुके
न कोई चाल कभी देखे,
इस समय को वश में करने की
कोई लाखों चालाकी सीखे
है वक्त का पहिया घूम रहा
स्वयं ब्रह्म इसी में लागा रे…?

ओ मन… अब तू जरा संभल संभल
क्या नींद खुली, क्या जागा रे…?

कोई राज करे कोई रंक भले
पर एक विधाता की न चले
जो आज गिरा हो गर्दिश में
कल उदयमान हो गगन मिले
वक्त ने हर एक जख्म भरे
मरहम बनकर जब लागा रे…
ओ मन. अब तू, जरा संभल संभल
क्या नींद खुली… क्या जागा रे…?

एक वक्त रहा यहाँ रामराज
वही राम कभी वनवास किए
गांधारी के सौ पुत्र रहे
सब धर्म विरुद्ध ही काज किए
जो फंसा समय के चक्रव्यूह में
अभिमन्यु क्या भागा रे…?
ओ मन… अब तू, जरा संभल संभल
क्या नींद खुली… क्या जागा रे…?

कर नवयुग की स्थापना, चल
युग बदलेगा, निश्चय हो अटल
कई क्रांतिवीर की उपलब्धि
मिली शिलालेख, थी एक पहल
स्वर्णिम अक्षर हो ज्योतिर्मय
टूटे जब श्वास का धागा रे…!
ओ मन. अब तू, जरा संभल संभल
क्या नींद खुली, क्या जागा रे…?

नभ मंडल 

नभ मंडल के विस्तृत आँगन
श्वेत-श्याम घन मचल रहे
उमड़ घुमड़ आकार बदल
नृत्य-पटल-तल फिसल रहे

थिरक रही नव बूँद सृजित
नभ दामिनी स्वर झंकार किए
मृदंग ताल घन गरज-गरज
जल गगरी भर मनुहार किए

छलक-छलक जल बूँद गिरे
तरु पल्लवी सरगम छेड़ रही
फिर टपक-टपक बन बूँद झरी
इठलाती मृदु-जल फेर रही

श्वेत परत जल-घंघरी पहने
फुटक-फुटक करती नर्तन
बन फुहार कण खो जाती
अनवरत करती रहती कीर्तन

अर्द्ध-वृत आकार ले रही
इन्द्रधनुष की अंगराई
सतरंगी रितु छतरी ताने
नृत्य देखने स्वयं आई

रुन्नुक-झुन्नक करती जल पर
झींसी-झींसी बौछार विकल
रिमझिम वर्षा मोह गई मन
मयूरी के भए प्यार सफल…

मैं स्वयं को वार कर

सत्य को स्वीकार कर, परंपरा को प्यार कर
विजय की घोषणा किए, मैं स्वयं का शीश वार कर…

धर्मयुद्ध में खड़ी, अनीतियों से जा लड़ी
निडर बनी डटी रही, गांडिव लिये संभालकर
मैं स्वयं को वार कर…

मुखर कर अपनी चेतना, बिसारे अंतर्वेदना
बस एक लक्ष्य भेदना, मतस्य चक्षु साधकर
मैं स्वयं को वार कर…

न मिथ्य के प्रहार से, परिधि के आधार से
बंधी समय की धार से, माँ भारती से प्यार कर
मैं स्वयं को वार कर….

शुरूआत स्वयं से मैं करूँ, विसंगती से न डरूँ
हरेक चेतना की लौ से, प्रज्जवित मशाल कर
मैं स्वयं को वार कर…

जो सत्तारुढ़ हैं खड़े, बता क्या वश में न तेरे
क्यूँ भ्रष्ट तंत्र से घिरे, तू स्वर्णयुग आधार धर
हाँ स्वयं को वार कर…

हमसे ही ग्राम, देश है, संकल्प यह विशेष है
जन-जागृति उद्देश्य है, ये राष्ट्रहित सवाल पर
हाँ, स्वयं को वार कर…

इस देश का उत्थान हो, जो स्वयं में आत्मज्ञान
हो
एक क्रांति से विहान हो, चल ज्योतिर्मय विचार
कर
हाँ स्वयं को वार कर…

आत्मिक उमंग 

मेरी आत्मशक्ति मुझसे कहती
बांहे पसार ये नभ छू ले,
तेरे पग न हटे धरती से कभी
पर अम्बर से जा मिल ले गले…

है विस्तृत ये ब्रह्मांड अनंत
स्वयं का विस्तार तू कर लेना
भले भूमंडल संकीर्ण दिखे
पर हृदय धरा का हर लेना…

मनु संपोषित महि से ही सदा
बुद्धि संचित यह ज्ञान रहे,
बहुमूल्य पवन जीवन हेतु
जड़ भूमिगत संज्ञान रहे…

इस वसंुधरा से अम्बर तक
ज्योतिर्मय बिम्ब तू बन जाना
नित नव ब्रह्मांड जो सृज रहा
उस ब्रह्म से प्रीत लगा आना…

क्यूँ पार्थिवता में विचर रहा
वही ब्रह्म, पिता परमात्मा है
निज बंधन गूढ़ रहस्यों का
वह अनंत, तू बिन्दू आत्मा है…

है विस्मित ज्ञान, रहस्य नहीं
विस्तृत भौतिक विज्ञान है
कर मूलशक्ति का अवलोकन
खगोलीय उर्जा ही भगवान है…

हे महादेव

देवों के देव, ….. हे महादेव!
सर्वस्व व्याप्त,….. रहते सदैव
ज्योति स्वरूप…… मेरे महादेव!

कण-कण में तू
हर तन में तू
लौकिक जगत
जीवन में तू….
पर इस धरा से भी परे
है अनन्त तू… आकाश तू…

पर है हृदय के पास तू
देवों के देव…. मेरे महादेव!

नीला गगन… तेरा श्याम वर्ण!
दिखे भष्म युक्त तेरा आवरण…
भानू किरण से भी परे
ओंकारयुक्त वातावरण
ब्रह्मांड की उन रिक्ति में
अदृश्य-सा निःस्वास तू
लुप्त तू… आभास तू
पर है मेरा विश्वास तू
देवों के देव…. हे महादेव…!

वो जो शून्य व्यापक क्षेत्र है
तेरा तीसरा वह नेत्र है
हो विलीन अक्षम पिण्ड भी
उसी रिक्त बिंदु सत्य है…

माना विशेष विस्तार तू
अंतःकरण साकार तू
स्वयं योगनिद्रा में घिरे
रूद्र-वीणा की झंकार तू
आदित्य का ओंकार तू
हिय ज्योतिर्मय आधार तू
देवों के देव… हे महादेव….!

चलो दंड निर्धारित करो 

चयनित किया तुझे राज-पद, तू जनता का
अभिमान है
फिर चूक कैसी और कहाँ…. या जानकर अंजान है…?
इन अव्यवस्था को निचोड़ों शर्तों को पारित करो
हिम्मत न हो उद्दंड की, चलो दंड निर्धारित करो…

इन दानवों के गर्दनों की भी चलो अब नाप लो
तब मानेंगे तेरी चौड़ी छाती, पर अभी न शाप लो…

क्यूं शौर्य गाथा हो सुनाते अपने हिन्दुस्तान की
अब तक कटी न हाथ जो है चीर हरती मान की…!

एक तंत्र स्थापित करो, इन्हें टोहकर पहचान लो
माँ भारती इन नन्हीं जानों में छिपी है जान लो…

जिस पटल खुलता गया. केवल नहीं वही भेद है
हर जगह नजरें गड़ा, मिले और कितने छेद हैं…

ये दरिंदे भी तो आखिर हिस्से इसी समाज के
पर डर नहीं है पापियों को जनता की आवाज से…

साम्राज्य स्थापित किए, भय व्याप्त है इनका यहाँ
मंदोदरी की भांति कही, भार्या की सुनता कहाँ…?

ऐ, नर पिशाचों… भय करो मासूम आहों से डरो
कहर ढा देगी, हिलेगी, नींव की… चिंता करो…!

पर अहंकारी, सत्ता की बावत है बातें बोलते
तंत्र में लिप्त भ्रष्टता के, दर-परत-दर खोलते…

उम्मीद पर आँखें टिकी, हर गतिविधि पे ध्यान है
अब मांगता परिवेश परिवर्तन, न तू अंजान है।

दे रही संकेत, ज्योतिर्मय की बातों को गहो
हुंकार जनता चाहती, मुँह खोलकर कुछ तो कहो…

पिंजर

तोड़ के पिंजरा जब एक दिन
नन्हां पंछी उड़ जाएगा,
यह शांत पड़ा होगा पिंजर
तन मिट्टी में मिल जाएगा…

बस वह खुशबू रह जाएंगी
जो सत्कर्मों से पाएगा…
जितना कुछ पाया संजोया
सब यहीं धरा रह जाएगा
तन मिट्टी में मिल जाएगा…

क्या तिनका भी ले गया कोई?
हर एक मनका गिर जाएगा
जो टूट गया पल में बंधन
विधि बांधे न बंध पाएगा…
तन मिट्टी में मिल जाएगा…

है इस पिंजर का कर्ज बड़ा
क्या चुका कभी तू पाएगा…?
स्थापित कर जा कीर्तिमान
जग गीत तुम्हारे गाएगा..
तन मिट्टी में मिल जाएगा…

यदि नाभी तक पहुँच गया
तू ब्रह का भेद बताएगा
सर्वस्व समर्पित कर क्षण में
उस उर्जा से जुड़ जाएगा…
तन मिट्टी में मिल जाएगा…

अमृत-कलश

ये कुंभ है प्रतिमान मेरा,
कुंभ-सा प्रतिदान है
इस माटी से निर्मित हुई
मिलूं माटी अंर्तज्ञान है…
ये कुंभ-सा प्रतिदान है

सर्वप्रथम उद्देश्य हेतु
माटी सम रौंदी गई
आकार लेती चाक चढ़
किसी शिल्पी को सौंपी गई…
मैं माटी सम रौंदी गई।

नर्म और कोमल मृदा मन
शुष्क बन जलता रहा
तपती रही घनी धूप में
परिवेश वश ढ़लता रहा…
ये शुष्क मन जलता रहा

भीषण अनल के ताप जलती
रंग अपना खो चुकी
मटमैली-सी आभा भुलाकर
वर्ण स्वर्णिम हो चुकी..
हां… रंग अपना खो चुकी

उद्देश्य हेतु हर पहल
स्वयं में समाहित कर गरल
हो निर्विकारी शांत मन तो
विष स्वतः बने गंगाजल…
स्वयं में समाहित कर गरल

है बाध्यता प्रतिमान की
निज कुंभ लौकिक ज्ञान की
निश्छल छलकता जाए जल
अनुभूति के प्रतिदान की…
निज कुंभ लौकिक ज्ञान की

माना पिपासा हो प्रबल
सान्निध्यता दे तृप्ति पल
अमृत कलश जो नितांत स्वयंभू,
दीप्त ज्योतिर्मय विरल..
स्वयं शांत कर दे मन विकल…

नियंत्रण

स्नेह गंगा बाँध देकर, क्यूँ किया अवरुद्ध है…?
प्रबल प्रेम प्रवाह के प्रति, क्यूँ खड़ा तू विरुद्ध है…?

है असंभव, हो समाहित… कूप में सागर कहीं?
लाचार है संकल्प और परिवेश से भी क्षुब्ध है…

मूढ़-मति, इतना समझ जब विपुल भाव समाएगा
प्रताड़ना को कर उपेक्षित, स्वयं ख़ड़ा हो जाएगा…

संवेदनाएं वेग से सब कुछ बहा ले जाएंगी
टूटेंगे जब बाँध विह्वल, फिर संभल न पाएगा…

अहो-भाग्य… विरलों में किसी, हिय प्रीत की सरिता बहे
निष्ठुर बना क्यूँ रेतीली, मरुभूमि को दरिया कहे…

जब ताप कुंठा में उबलकर बूँद तक जल जाएगा
अंतःकरण को शांत कर गंगा के तट सुख पाएगा…

कुछ पन्ने रिश्तों के 

कुछ अश्रु बूँद के चिन्ह मिले
जीवन पृष्ठों पर गिरा हुआ
कुछ रिश्तों के पन्ने मोड़ दिए
कुछ पन्नों का रंग उड़ा हुआ।

नहीं भेद बताया मन मेरा
कई मर्म मुड़े पन्नों में छिपे
कुछ तो फटकर खुद बिखर गए
कुछ फटकर भी हैं जुड़ा हुआ
कुछ पन्नों का रंग उड़ा हुआ।

शीर्षक के कुछ अक्षर खोये
कुछ कोर पन्नों के जीर्ण हुए
कुछ एक अंक तो हैं अंकित
यूँ लाल रंग से घिरा हुआ
कुछ पन्नों का रंग उड़ा हुआ।

एक पन्ने पर आकर ठिठके
कुछ रक्त बूँद के धुंध दिखे
उन पिछले पलटे पन्नों में
अबतक गुलाब था पड़ा हुआ
कुछ पन्नों का रंग उड़ा हुआ।

जो अब भी शेष सुरक्षित थे
पुस्तक के अंतिम जिल्द लिए
जीवन-वृतांत तो मेरे थे
एक पन्ना कोरा पड़ा हुआ
कुछ पन्नों का रंग उड़ा हुआ।

आवरण पृष्ठ तस्वीर छपी
तरु लता मध्य आबद्ध मिली
लेकिन ग्रंथ के मूल्यों पर
कई स्याह रंग था गिरा हुआ
कुछ पन्नों का रंग उड़ा हुआ

सोलह शृंगार

कदम पेड़ के ही नीचे,
वो बैठे थे अखियाँ मींचे,
हौले से गोद में सिर रखकर
प्रियतम ने मुझको प्यार किया
फिर चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

घन कुन्तल चेहरे को घेरे
लट सुलझाते अंगुली फेरे,
फिर घिरकर घनी घटाओं ने
केशों का नव विन्यास किया
फिर चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

अधरों को छूते मनमोहन
पल पल मचले मेरा कोमल मन,
पंखुड़ियों ने तत्क्षण खिलकर
लाली होठों पे डार दिया।
फिर चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

वो आँखों में आँखे डाले
मोहे मर्म मिलन का कह डाले
हिरणी की मद भरी अंखियों से
लेकर कजरारी धार दिया।
फिर चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

कानों में झुककर कह डाले
अद्वितीय मन सुन्दरी बाले,
बेला की तरूणिम् कलियों ने
ले कर्णकुंडली डार दिया।
फिर चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

मोहकता अधर पे मुस्काये
हिय स्पन्दन बढ़ता जाए,
अमियाँ की मंजरियों ने मिल
गले में स्वर्णिम हार दिया।
फिर चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

थे कोरी कलाई वो थामे
हौले से हाथों को चूमें,
वैजन्ती के नव पल्लव ने मिल
कंगन का आकार लिया
फिर चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

हौले से आलिंगन हेतू
बाँहों में जब मुझे भर ले तू,
छिपे दूज के चाँद ने बढ़कर
बाजूबँद आकार लिया।
फिर चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

चेहरे पर खुशियाँ तैर रही
गालों पे उँगली फेर रही,
लो सीप समंदर से आकर
मोती की मुंदरी डार गया।
खिली चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

अंग वस्त्र तन लिपटाए
कटिमध्य चुनर रही बलखाए,
हुए मुग्ध कुसुम के बेलों ने
कटिबंध हरित उपहार दिया।
खिली चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

नख से रेतों को खुरंच रही
कदमों की उँगली मचल रही,
कई नन्हीं तारों ने मिलकर
पग पायल नुपुर निखार दिया।
खिली चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

वो आलिंगन ले प्रीत जताते
नाक से नाक को सहलाते,
तब झुरमुठ की जुगनू ने आकर
लौंग सी नथनी डार दिया।
खिली चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

विन्यास केश करते प्रियतम
आनंदित होता कोमल मन
नर्तक मयूर ने पर पसार कर
चूड़ामणि उपहार दिया।
खिली चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।।

जन्मों-जन्मों का है बंधन,
मेरी मांग सजाते मनमोहन,
ले इन्द्रधनुष से लाल रंग
सिर सिंदूरी शृंगार किया।
खिली चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।।

अब हृदय चाँद का ललचाया
बिन्दिया बनने वो स्वयं आया,
मनमीत शशि को चुटकी भर
मेरी ललाट पे साट दिया।
खिली चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

अद्भुत शांत स्वप्न खोई
मैं आलिंगन शिवमय सोई।
प्रीत रंग मेरा अंतर्मन
ज्योतिर्मय आत्म-निखार गया
फिर चाँद की चंचल किरणों ने
मेरा सोलह शृंगार किया।

धरती के दर्द 

संसार के सारगर्भ में जाकर
देखो तो कई राज मिलेंगे।
ढूंढ रहे वीरों के मरघट
तपोभूमि बने आज मिलेंगे।
मातृभूमि तुम सब की गरिमा
गौरव गाथा ताज़ तुम्हारा।
मत बांधो सीमा में धरती
भाव के बिखरे साज़ मिलेंगे।

आपस में मत बाँटो खुद को
तुम सारे मेरे लाल प्रिय हो।
क्यूँ कटते सरहद में बंटकर
एक दूजे के ही बन्धु हो।
मातृभूमि के नाम पे मिटते
वीरों को सम्मान मिलेंगे।
पर सोचो… इस माँ के आँचल
किसके रुधिर से लाल मिलेंगे?

करती विचरण पिण्ड रूप
इहलोक हमारे गर्भ समाए।
जल-थल मिल जब सम दिखते
रेखाओं में कैसे बंध पाए?
विध्वंसक बरसा कर सीने
घायल कर, कब तक साथ चलेंगे?

अंतर्मन जब तड़प उठे
भूचाल के ही हालात मिलेंगे।
संसार के सारगर्भ में जाकर
देखो तो कई राज मिलेंगे।

पुरुषार्थ 

इस धराधाम को देखूँ मैं
फिर देखूँ नील गगन को
इस जीव जगत को देखूँ
फिर देखूँ मैं कण-कण को….

यह मानव जीवन श्रेष्ठ यहाँ
सृष्टि की अनुपम है रचना
अनमोल मिले एक जीवन में
सदा व्यर्थ विचारों से बचना!

मिलती हर सांसे गिनती में
धड़कन न एक उधार मिले
हैं माया के छलते बंधन
इस पार कोई, उस पार मिले…

उद्देश्ययुक्त अद्भुत जीवन
किए आत्मसात परमार्थ रहे
सारथी बन संपूर्ण इंद्र के
जगत हेतु पुरुषार्थ रहे…

तदोपरान्त की उपलब्धि
निश्चय अमिट हो श्रेष्ठ भी हो
कुछ ऋण पार्थिव संबंधों के
कर्त्तव्यनिष्ठ व विशिष्ट भी हो….

पानी का रंग 

जो पानी का रंग भी, गर होता गुलाबी
मछलियाँ समंदर की होती शराबी
ये मोतियाँ रंगीन हो जाती शायद
फिर लहरों के अंदाज़ होते नवाबी।
जो पानी का रंग भी गर होता गुलाबी

तलाबों में कोमल कमल जो भी खिलते
फिर पत्ते कमल के हो जाते गुलाबी
ये ताल तलैया के फिर क्या थे कहने
रहती सीपी नशे में व हंसा शराबी
जो पानी का रंग भी गर होता गुलाबी

ये नहरों के पानी जो खेतों में बहते
लहराते फसल होती क्यारी गुलाबी
ये गेहूँ की बाली सुनहली न होती
ये हरियाली बन जाती सिन्दूरी लाली
जो पानी का रंग भी गर होता गुलाबी

नदियां इतराती फिरती रंगीली लहर में
ये बर्फीली चादर भी होती गुलाबी
घटाएँ भी सावन की रंगीन होती
बरसती ये बूँदे हो जाती गुलाबी
जो पानी का रंग भी गर होता गुलाबी

ये पानी का प्याला भी हाला-सा लगता
हम पीते पिलाते हो जाते शराबी
चमकते पसीने से खिल जाता चेहरा
अंदाज आँसुओं के भी हो जाते रूआबी
जो पानी का रंग भी गर होता गुलाबी

निश्चय 

स्वयं से आरंभ किये होते
निश्चय होती, संशय न था,
जाने किस खोज में भटक रहा
तृष्णावश, तुष्टी लय न था।

यदि मौलिक धर्म के मर्म गहे
वहीं संप्रभुता सिरमौर सजी,
धरती की सीमा है सीमित
और मानवता है सर्वोपरि।

नैतिक मूल्यों का मोल बढ़े
तो सार्वभौम उत्थान भी हो
समृद्ध युक्त जब हो भूतल
स्वर्णिम-सा नवल विहान भी हो….

किसी भाषा के अधीनस्थ न हों
यह लिपि तो बस माध्यम है,
अभिव्यक्त करे जो मनोभाव
तभी विश्व बना इक आँगन है…

इस राजनीति का मर्म भुला
क्यूँ राजधर्म की बात कहे
कर मानवता का वैश्वीकरण
फिर, रंग, धर्म न जात रहे।

क्यूँ क्षेत्रियता में बंटे रहें
मानवीय मूल्य धरोहर है
हो विश्वपटल पर नैतिकता
निर्मल सम मानसरोवर है।

हृदय की लालसा

अस्तित्व स्वयं का भेदती
मैं सूक्ष्मतम यूँ हो गई
दृष्टि से ओझल हुई और
फिर हवा में खो गयी…

प्रीत पीड़ा के हवन में
स्वयं को होम कर दिया
सुगंधयुक्त भस्म बन
लक्ष्य पथ को तय किया…

मेरे हृदय की लालसा
अदृश्य झोका बन बहूं
प्रिये के निःस्वांस जा
नितांत समाहित रहूँ…

हर आती-जाती स्वांस में
मेरा ही स्नेह मर्म हो
उस तप्त हृदय की धरा
नित प्रेमवृष्टी धर्म हो….

जग पाप-ताप से परे
उरज के मध्य ही गहूँ
मैं प्राण, प्रिय की बनी
संग विरह वेदना सहूँ…

मुझसे मिलने को आओ न

जो चले गये तुम जीवन से
अब यादों से भी जाओ न
बेमतलब ही यूँ रह रहकर
ऐसे तो मुझे सताओ न

जो जीते जी न हो संभव
उन तारों को लाऊँ कैसे
आँखों से नींद भी छीन गये
अब सपनों में जाऊँ कैसे?

चुन चुनकर ख्वाब सजाए थे
तुमने ही पलकों के तले
पर आज इजाजत भी न दी
मेरे होठों पर मुस्कान पले

कोई संवेदनाएँ नहीं जीवित
मृतप्राय हो गया रिश्ता है
जो प्रीत की व्याख्या रही कभी
अब वही निरर्थक दिखता है।

चली अपनी अर्थी ले कांधे
सुनो गंगा के तट आओ न
मुखाग्नि तक का वादा था
चलो अंतिम राह दिखाओ न
मुझसे मिलने को आओ न…

मन मंदिर 

मेरे मन मंदिर में श्याम बसे
बने द्वारपाल नारायण हैं,
खड़े सांवरिया नयनों में अड़े
कभी प्रीत न हुआ पलायन है।

मन मधुवन में घनश्याम मगन
संग ज्योतिर्मय प्रभु रमण करें,
हुई बावली सुन मुरली की धुन
गोविंद मिले स्वयं वरण करें।

जो अलख जगा ली श्याम नाम
इस जग की बैरन बन बैठी,
पर दोषी तो यह हृदय रहा
बड़भागिनी नयनन क्यूँ रूठी?

न रूठ सखी, इतरा ले अभी
गोपियन सब टेक लगाएंगी,
भले छलकी थी तू खुशियों से
ले श्याम का नाम सताएंगी।

हिय स्पन्दन तू संभल संभल
न छेड़ मोहे, क्यूँ अधीर बड़ी।
जब सांवरिया मोरे अंग लगें
खो देना संयम मिलन घड़ी।

ऐ चंचल कंगना अब थम ले
सुन धैर्य तनिक तू भी रख ले,
जब सांवरे गलबहियां झूमूं
जी भर के खनकना मिल के गले।

अरि बावली पायल संभव संभल
पग बेहक रहे पर तू न मचल,
प्रभु रास रचें, संग जब नाचूं
तब रूनझुन करना प्रेम पहल।

रेशम की चुनर, सखी सुन तो इधर
लहरा न अभी, तू धीरज धर,
जब आलिंगन मोहे श्याम भरें
तब उड़ जाना कहीं, दूर मगर।

कारी कोयलिया तू गीत सुना
भंवरा भी गुंजन करता जा,
ज्यों रम जाऊँ बंसी धुन,
तू साक्ष्य मिलन का बनता जा।

ऐ तरूवर कुसुम के सुनलो ना
तुम मतवाले बन झूमो ना,
तुझे टेक लिए जब श्याम खड़े
तब पुष्प की वर्षा तुम करना।

मन मयूरा तू छमछम करना
चलो पंख पसारे नाचो ना
रंग ज्योतिर्मय के रंग, तू भी
मेरे मनमोहन का मन हरना।

अहो प्रिय

अंतर्मन प्रीत बहे तेरी
धड़कन में गयो समाय
बसे नयनन में, त्यों रोती नहीं
अंसूअन संग बह न जाय….
छवि अवलोकत दिन जाय…

तन सावन सत श्रंृगार करे
तू भस्म रमा, मन मेरा हरे,
गले रूद्राक्ष, बने प्रणय साक्ष
गति स्पन्दन बढ़ जाय…
छवि अवलोकत दिन जाय….

मन-मधुवन हरश्रृंगार झरे
हिय विह्वल हो मनुहार करे,
मधुर मिलन सुन, हृदय पटल
मन-मयूरा नाचत जाय….
छवि अवलोकत दिन जाय….

मेरे महादेव तेरे चरण मध्य
मेरी आत्म ज्योत जल जाय
हो अंतिम पल आलिंगनबद्ध
उड़ प्राण-पखेरू पाए….
छवि अवलोकत दिन जाय….

तेरे चहूं ओर मेरे स्वप्न पले
वहीं दुनिया सिमटत जाय,
नित नयनों में नवरंग भर दे
मन दर्पण छवि मुसकाय…
छवि अवलोकत दिन जाय….

जल बिन जैसे मीन मरत
ज्योतिर्मय रही बुझाय,
बिन प्रीत तेरे, अहो… देव मेरे
कहीं जिनगी रूठ न जाय…
छवि अवलोकत दिन जाय…

अब जीवन शम्भु निनाद करे
तन मन से सारे प्रमाद हरे
शिवगामिनी भाव ही सुखद भये
स्वयं महादेव मन भाय….
छवि अवलोकत दिन जाय….

मृगतृष्णा

संपूर्णता की तलाश में
तुम भ्रमित न हो कभी,
जीवन की मृगतृष्णा में
स्वयं को ही छलते सभी….

जहाँ द्वेष है वहीं राग है
जहाँ प्रीत है परित्याग है
गर है विपुल अनुराग तो
वहीं प्रस्फुटित वैराग्य है…..

पर निरंतर मार्गदर्शक
स्वयं के क्यूँ बनते नहीं
जीवन की मृगतृष्णा में
स्वयं को ही छलते सभी….

जहाँ प्रीत भी पीड़ा बने
और मित्र भी हन्ता कहीं
हर घर उपेक्षित हो रही
मातृत्व जननी की नहीं…?

स्नेह-शक्ति पूंज ज्योति
क्यूँ सदा बनती नहीं
जीवन की मृगतृष्णा में
स्वयं को ही छलते सभी…

साश्वत सत्य

मैं व्यथित पथिक तुम शीतल छाया
तुम ‘‘ज्योतिर्मय’’, मैं मृण काया
अर्पण तन मन यह जीवन धन,
शिव रस मुझमें सघन समाया।।

आगमनित स्वर्ग से गंग सम
शीतल, चंचल, मन बज मृदंग
अति व्याकुलता….! इस व्यथित मन
बंध जटापाश, शिव से संगम।।

अवलोकित मन, मानव दर्पण
हुई तृप्त क्षुधा पा आलिंगन।
मुक्ति की अविरल धारा में,
हुए शांत, व्यथित पथिक के मन।।

सत्कर्म से संचित ‘‘लता कुँज’’
कोमल, कोपल सम पुष्प पुँज
सद्गुण सुगंध धन हो उपवन,
साश्वत यात्रा संग राम गुँज।।

कर्मण्य भाव से कर्णधार
सम्पदा स्वजन का प्रेम अपार
पर सत्य परम ये जन्म-मरण
अद्वैत से मिल हुए आत्मोद्धार।।

विश्वास 

विपत्तियाँ अनेकों हों
पर हौंसलों का साथ हो
बिखरे हुए हों लाख पर
एक निश्चयी विश्वास हो….

कई खोढ़रें वट वृक्ष में
पर युगों आक्षादित रहे
उन रिक्तियों में उमंग भर
स्वचित्त आह्लादित करे….

कई विसंगतियाँ स्नेह की
अपंग मन करता रहे
पर मनोबल बांह थामे
पीड़ सब हरता रहे….

कई मोतियाँ बिखरी पड़ी
पर स्नेह धागा सख्त हो
प्रतिकूल हों परिवेश भी
पर भाव न विभक्त हो….

यही प्रीत की शक्ति विपुल
यौगिक बने दो प्राण जब
भौतिक तत्वों के विरुद्ध
कसे भावनाएँ कमान तब….

धरती का प्रेम

पश्चिम के नैऋत्य कोण से
धूप झुकी क्यूं झांक रही है….?
श्याम चुनर घन ओढ़े धरती
घूँघट से उसे ताक रही है।

पूछ रही है नभ मंडल में
सिंदूरी आभा क्यूं छाई?
क्या मेरे श्रृंगार हेतु
अंजूरी भर लाली ले आई?

देख घिरे हैं काले बादल
पल में आलिंगन भर लेंगे
गरजेंगे बरसेंगे झम-झम
शीतलता मन में भर देंगे।

तुझको भी जाने की जल्दी
ठहर सखी, बिंदिया तो कर दे
आज अमावस, चाँद मिलेंगे
छिपकर, आँखों में रंग भर दे।

वैसे तो प्रिय नित्य मिले हैं
पर आँगन तारों के झुरमुट
आज घिरी है काली बदरी
हम होंगे बस यमुना के तट।

झींगुरों के होंगे झनझन
भले चकोरी चिल्लाएगी
आज सकारे चाँद मेरे
अब चंद्रधरा तू कहलाएगी।

स्वच्छ भारत 

’’स्वच्छ भारत अभियान‘‘ नहीं
यह प्रगति पथ की सीढ़ी है
देश हमारा स्वच्छ रहे
जागरूक हुई नव-पीढ़ी है

सोच और परिवेश भी बदला
आवश्यक आदत बदले
इस मूलभूत दिनचर्या को
चलो अपनाएं सबसे पहले…

आस पास जब स्वच्छ रहे
तभी स्वस्थ रहेगा ये तनमन
मनमोहक वातावरण रहे
आनंदित गुजरेगा जीवन…

फेंक रहे जो गलि-मुहल्ले
अपने घर का गंद कहीं
उस मलवे के ढेरों से क्या
उठे कोई दुर्गंध नहीं…?

हैं जीवाणु, कई रोगों के
लहराते इन्हीं फिजाओं में
दम भर-भर सांसे हम लेते
इन दूषित हुई हवाओं में….

बीमार अगर जब होंगे
बीमार पड़ेगी बस्ती भी
संपत्ति होती है, सेहत!
फिर… लाख दवा हो सस्ती भी..!

हम स्वच्छ बनाएं घर अपना
हर गली-मुहल्ला निर्मल हो।
घर, शहर, देश सब स्वच्छ रहे
और स्वच्छ हमारा भू-तल हो।।

चेतावनी

एक बात पूछती हूँ तुमसे
ऐ…. बुद्धिजीवी, सुन तो लो
क्यूं धूम्रपान अतिआवश्यक है?
बिन मदिरा जीवन चुन तो लो…!

अति घातक तम्बाकू सेवन
जहाँ स्वास्थ की निश्चित हानि है
फिर सांसों की कीमत देकर
क्या विपदा घर ले जानी है…?

’’स्वास्थ्य ही धन है‘‘ जग जाहिर
किस मानक सेंध लगाते हो
बहुमूल्य मिला बस ’’एक जीवन‘‘
क्यूं अपनी चिता सजाते हो…?

एक फोड़ा-फुंसी हो तन, तो
औषधीय लेप लगा लेते
खुद गटक रहे गुटखा के गुण
विष खाकर भी मुस्काते हो…?

मदिरालय पर, तम्बाकू पर
हर डब्बे पर चेतावनी थी
पर अनदेखी कर दी तुमने
जो पलभर बड़ी सुहावनी थी…

सही खान-पान और रहन-सहन
यदि न हो, तो तुम तय कर लो
दुर्दशा लिखी अंतिम पल में
घिरे घोर कष्ट अति, भय कर लो…

अरे, सुनो सुनो, नादान सुनो
कई जतन लगा जो संजोया
सब हवन चला जाए पल में
यदि स्वास्थ्य का धन तुमने खोया…

आगाह कर रही ’ज्योतिर्मय‘
स्वयं के संहारक तो बनो
आहुति ले लेगी पल में
अति कष्ट के मृत्यु पथ न चुनो…

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