लाला जगदलपुरी की रचनाएँ

सज्जन कितना बदल गया है

दहकन का अहसास कराता, चंदन कितना बदल गया है
मेरा चेहरा मुझे डराता, दरपन कितना बदल गया है ।

आँखों ही आँखों में, सूख गई हरियाली अंतर्मन की;
कौन करे विश्वास कि मेरा, सावन कितना बदल गया है ।

पाँवों के नीचे से खिसक-खिसक जाता सा बात-बात में;
मेरे तुलसी के बिरवे का, आँगन कितना बदल गया है ।

भाग रहे हैं लोग मृत्यु के, पीछे-पीछे बिना बुलाए;
जिजीविषा से अलग-थलग यह, जीवन कितना बदल गया है ।

प्रोत्साहन की नई दिशा में, देख रहा हूँ, सोच रहा हूँ;
दुर्जनता की पीठ ठोंकता, सज्जन कितना बदल गया है ।

बस्ती यहाँ कहाँ पिछडी है

जिसके सिर पर धूप खड़ी है
दुनिया उसकी बहुत बड़ी है ।

ऊपर नीलाकाश परिन्दे,
नीचे धरती बहुत पड़ी है ।

यहाँ कहकहों की जमात में,
व्यथा कथा उखड़ी-उखड़ी है।

जाले यहाँ कलाकृतियाँ हैं,
प्रतिभा यहाँ सिर्फ़ मकड़ी है।

यहाँ सत्य के पक्षधरों की,
सच्चाई पर नज़र कड़ी है।

जिसने सोचा गहराई को,
उसके मस्तक कील गड़ी है ।

और कहाँ तक प्रगति करेगी,
बस्ती यहाँ कहाँ पिछड़ी है ?

कुछ मुक्तक

1.

जो तिमिर के भाल पर उजले नख़त पढ़ते रहे
वे बहादुर संकटों को जीत कर बढ़ते रहे
कंटकों का सामना करते रहे जिसके चरण
ओ बटोही! फूल उसके शीश पर चढ़ते रहे ।

2.

शौर्य के सूरज चमकते आ रहे हैं,
साँझ उनके व्योम पर आती नहीं है
आरती के दीप जलते जा रहे हैं
आँधियों की जीत हो पाती नहीं है ।

3.

सूर्य चमका साँझ की सौगात दे कर बुझ गया
चाँद चमका और काली रात दे कर बुझ गया
किंतु माटी के दिये की देन ही कुछ और है
रात हमने दी जिसे वो प्रात दे कर बुझ गया ।

पुकारा जिन्होंने अरे वे वहम हैं

न तुम हो, न हम हैं
यहाँ भ्रम ही भ्रम हैं ।

दिशाहीन राहें,
भटकते क़दम हैं ।

नहीं कोई ब्रह्मा,
कई क्रूर यम हैं ।

मिले सर्जना को,
ग़लत कार्यक्रम हैं ।

यहाँ श्रेष्ठता में,
पुरस्कृत अधम हैं ।

किसी के भी दुखड़े
किसी से न कम हैं ।

पुकारा जिन्होंने,
अरे, वे वहम हैं ।

प्रश्न ही प्रश्न बियाबान में हैं

हम-तुम इतने उत्थान में हैं
भूमि से परे, आसमान में हैं।

तारे भी उतने क्या होंगे,
दर्द-गम जितने इंसान में हैं।

सोना उगल रही है माटी,
क्योंकि हम सुनहले विहान में हैं।

मोम तो जल जल कर गल जाता,
ठोस जो गुण हैं, पाषाण में हैं।

मौत से जूझ रहे हैं कुछ,
तो कुछ की नज़रें सामान में हैं।

मुर्दों का कमाल तो देखो,
जीवित लोग श्मशान में हैं।

मन में बैठा है कोलाहल,
और हम बैठे सुनसान में हैं।

किसने कितना कैसे चूसा,
प्रश्न ही प्रश्न बियाबन में हैं।

सोचता हूँ, उनका क्या होगा?
मर्द जो अपने ईमान में हैं।

पीड़ा आई पीड़ा के मन

विकल करवटें बदल-बदल कर
भोगा हमने बहुत जागरण,
’गहराई’ चुप बैठे सुनती
’सतह’ सुनाते जीवन-दर्शन ।

देव दनुज के संघर्षों का
हमने यह निष्कर्ष निकाला,
’नीलकण्ठ’ बनते विषपायी
जब-जब होता अमृत-मंथन ।

सफल साधना हुई भगीरथ
नयनों में गंगा लहराई,
साँठ-गाँठ में उलझ गए सुख,
पीड़ा आई पीड़ा के मन ।

ऐसे-ऐसे सन्दर्भों से
जुड़ जुड़ गई सर्जना अपनी,
हृदय कर रहा निन्दा जिनकी
मुँह करता है उनका कीर्तन ।

गूँज रही है बार-बार कुछ
ऐसी आवाज़ें मत पूछो;
नहीं सुनाई देता जिनमें
जीवन का कोई भी लक्षण ।

रीते पात्र रह गये रीते

मचल उठे प्लास्टिक के पुतले,
माटी के सब घरे रह गये।
जब से परवश बनी पात्रता,
चमचों के आसरे रह गये।

करनी को निस्तेज कर दिया,
इतना चालबाज कथनी में;
श्रोता बन बैठा है चिंतन,
मुखरित मुख मसखरे रह गये।

आंगन की व्यापकता का,
ऐसा बटवारा किया वक्त नें;
आंगन अंतर्ध्यान हो गया,
और सिर्फ दायरे रह गये।

लूट लिया जीने की सारी,
सुविधाओं को सामर्थों नें;
सूख गयी खेती गुलाब की,
किंतु ‘कैक्टस’ हरे रह गये।

जाने क्या हो गया अचानक,
परिवर्तन के पाँव कट गये;
’रीते-पात्र’ रह गये रीते,
’भरे पात्र’ सब भरे रह गये।

मनुष्यता पहाड़ ही ढोती

भोर के हंस चुग गए मोती,
बैठ कर तमिस्त्रा कहीं रोती ।

मौत बेवक़्त भला क्यों आती ?
ज़िन्दगी यदि ज़हर नहीं बोती ।

अस्मिता चिंतन की हरने को,
चिंता रात भर नहीं सोती ।

आदमी व्यक्त जब नहीं होता,
चेतना, चेतना नहीं होती ।

वक़्त बदले कि व्यवस्था बदले
मनुष्यता, पहाड़ ही ढोती ।

बिहान

दखा, पाहली बिहान
बेडा जायसे किसान
कुकडा बासली गुलाय
हाक देयसे उजेंर
आँधार हाजली गुलाय
तारा मन चो होली हान
दखा, पाहली बिहान

मछरी, केंचवाँ चाबुन जाय
कोकडा मछरी गीलुन खाय
ढोंडेया धरे मेंडकी के
सोनू दादा जाल पकाय
कोएँर-कोएंर होते खान
दखा, पाहाली बिहान

दसना छूटली पनाय
मिरली मारग मन के पाँय
लेकी गेली पानी घाट
पानी लहरी मारुन जाय
हाजुन गेली रात-मसान
दखा, पाहाली बिहान

[लाला जगदलपुरी की हलबी कविता “बिहान” का हिन्दी अनुवाद] –

देखो, सबेरा हो गया है
किसान, खेत जा रहा है
सब तरफ मुर्गे बोले
सब तरफ ढेकियाँ बजीं
उजेला पुकार रहा है
अंधेरा सब तरफ खो गया है
सितारों की हानि हुई है
देखो, सुबह हुई

मछली, केंचुआ चबा रही है
बगुला, मछली निगल रहा है
ढोंढिया-साँप, मेंडकी पकड रहा है
सोनू दादा जाल फेंक रहा है
चिडियों के चहकते ही
देखो, सबेरा हो गया

बिस्तर कब का छूट गया
रास्तों को पाँव मिल गये
लडकी पनघट चली गयी
पानी में लहरें उठ रही हैं
चुडैल रात नहीं रही
देखो, सुबह हो गयी

जिजीविषा सुईयाँ चुभो गयी 

पीर हृदय की युवा हो गयी,
कोहरे में हर दिशा खो गयी।

ऐसी वायु चली मधुवंती,
संवेदनशीलता सो गयी।

चिथडों पर पैबंद टाँकते,
जिजीविषा सुईयां चुभो गयी।

शब्द ब्रम्ह की चाटुकारिता,
अर्थों की अर्थियाँ ढो गयी।

मान गये चुप्पी का लोहा,
मन को अपने में समो गयी।

गयी सुबह कुछ ऐसे लौटी,
सूरज की लुटिया डुबो गयी।

धूप के दुख ने किया उसको नमन

दर्द ने भोगे नहीं जिस दिन नयन,
मिल गया उस दिन हृदय को गीत धन ।

जब अँधेरा पी चुके सूरजमुखी,
तब दिखाई दी उन्हें पहली किरन ।

नींद टूटी जिस सपन की शक्ति से,
चेतना के घर मिली उसको दुल्हन ।

फूल जब चुभ गए, तो मन को लगा,
है बडी विश्वस्त काँटों की चुभन ।

देखते ही बनी बिजली की चमक,
जब घटाओं से घिरा उसका गगन ।

छाँह के अहसान से जो बच गया,
धूप के दुख नें किया उसको नमन ।

जीवन का संग्राम जंगली

इस धरती के राम जंगली,
इसके नमन-प्रणाम जंगली ।

कुडई, कुंद, झुईं सम्मोहक,
वन-फूलों के नाम जंगली ।

वन्याओं-सी वन छायाएँ,
हलवाहे-सा घाम जंगली ।

भरमाते चाँदी के खरहे,
स्वर्ण-मृगों के चाम जंगली ।

यहाँ प्रभात ‘पुष्पधंवा’-सा,
मीनाक्षी-सी शाम जंगली ।

शकुंतला-सी प्रीति घोटुली,
दुष्यंती आयाम जंगली ।

दिशाहीन, अंधी आस्था के,
जीवन का संग्राम जंगली ।

रोशनी कहाँ तुझसे हट कर ओरे मन 

छूट गये वनपाखी, रात के बसेरे
जाल धर निकल पड़े, मगन मन मछेरे

पानी में संत चुप खड़े उजले-उजले,
कौन सुनेगा मछली व्यर्थ किसे टेरे

कानों से टकराती सिसकियाँ नदी की,
पुरवा जब बहती है रोज़ मुँह-अँधेरे

रोशनी कहाँ तुझसे हट कर ओ रे मन
ना चंदा के घर, ना सूरज के डेरे

जुड़े ही नहीं ज़िद्दी, किसी वंदना में,
कैसे समझाऊँ मैं हाथों को मेरे

धूप में छाँव लुटा दूँ तो चलूँ 

और कुछ दर्द चुरा लूँ, तो चलूँ,
आँसुओं को समझा लूँ, तो चलूँ ।

दर्द बे-ठौर हो गए हैं जो
उन्हें हृदय में बसा लूँ, तो चलूँ ।

गुलाब की सुगंध-सा बह कर,
भोर का मन महका दूँ, तो चलूँ ।

ठहरो, किरनों की गठरी को,
ठीक से सिर पे उठा लूँ, तो चलूँ ।

ज़िन्दगी यह तपती दोपहरी,
धूप में छाँव लुटा दूँ, तो चलूँ ।

जिसे डुबा न सके साँझ कोई,
ऐसा इक सूर्य उगा लूँ, तो चलूँ ।

काट रहे हैं फीते लोग

उन्मन हैं मनचीते लोग,
वर्तमान के बीते लोग ।

भीतर-भीतर मर-मर कर,
बाहर-बाहर जीते लोग ।

निराधार ख़ून देख कर
घूँट ख़ून के पीते लोग ।

और उधर जलसों की धूम
काट रहे हैं फीते लोग ।

भाव-शून्य शब्दों का कोश,
बाँट रहे हैं रीते लोग ।

त्रासदी के गुरगो संभलो तुम 

साँसों की गलियो, संभलो तुम,
आशा की कलियो, संभलो तुम !

बगिया में नीरस फूल तथा
कैक्टस हैं अलियो, संभलो तुम !

उन्हें रिझाया कोलाहल ने,
स्नेह की अंजलियो, संभलो तुम !

बुझा न दे तुम्हें कहीं आँसू
रोशनी के टुकडो, संभलो तुम !

सहानुभूतियों को पहिचानो
त्रासदी के गुरगो, संभलो तुम !

कर दिया है तिमिर ने दुर्बल बहुत

अल्प-जीवी पुष्प इतना कर गया,
सूर्य को शबनम पिला कर झर गया ।

साथ मेरे सिर्फ़ सन्नाटा रहा,
चाँद सिरहाने किरन जब धर गया ।

कर दिया है तिमिर ने दुर्बल बहुत,
मन अभागा रौशनी से डर गया ।

लहलहाई ज़िन्दगी की क्यारियाँ,
किंतु सोने का हिरण सब चर गया ।

हृदय तड़पा तो छलक आए नयन,
स्नेह सारा हृदय हेतु निथर गया ।

क्या करे कोई सुराही क्या करे,
यदि किसी के कण्ठ में विष सर गया ।

नई सुबह की सुधि में

नींद के गाँव एक सपन जागा,
प्रतिध्वनित सूनापन जागा ।

गंध पी-पी रजनीगंधा की,
मदिर-मदिर मधुर पवन जागा ।

कुटीर सोया खुर्राटों में,
परंतु निर्दयी भवन जागा ।

स्वयं परिचित नहीं स्वयं से ही,
अविस्मरणीय विस्मरण जागा ।

रात भर नई सुबह की सुधि में,
दीपक बार कर गगन जागा ।

सूरज दादा 

सूरज दादा, चमको तुम।

नया सवेरा लाते रोज,
उजियाला फैलाते रोज,
जहाँ कहीं भी रहते लोग,
रखते सबको तुम्हीं निरोग,
अच्छे लगते हमको तुम।
सूरज दादा, चमको तुम।

आसमान में रहते हो,
सबकी बाँहें गहते हो,
रोज समय पर आते हो,
रोज समय पर जाते हो,
रोज भगाते तम को तुम।
सूरज दादा, चमको तुम।

परहित में तप करते हो,
नहीं किसी से डरते हो,
तुम स्वभाव से बड़े प्रखर,
कहती गरमी की दोपहर,
नहला देते श्रम को तुम।
सूरज दादा, चमको तुम।

प्लास्टिक के फूल

शोभा छिटकाते हैं, प्लास्टिक के फूल।
आँखों को भाते हैं, प्लास्टिक के फूल।।

रूप-रंग मिले, मगर, रस नहीं मिला।
कहाँ महमहाते हैं, प्लास्टिक के फूल।।

तितली को, भौंरे को, मधुमक्खी को।
बुला नहीं पाते हैं, प्लास्टिक के फूल।।

बगिया में फूल खिले, और झर गए।
सदा खिलखिलाते हैं, प्लास्टिक के फूल।।

कहाँ है, समर्पण का भाव किसी में।
पास-पास आते हैं प्लास्टिक के फूल।।

छू देखो, पाँखुरी नहीं कोई कोमल।
दूर से सुहाते हैं, प्लास्टिक के फूल।।

छत्तीसगढ़ी रचनाएँ

दाँव गवाँ गे

गाँव-गाँव म गाँव गवाँ गे
खोजत-खोजत पाँव गवाँ गे।
अइसन लहँकिस घाम भितरहा
छाँव-छाँव म छाँव गवाँ गे।
अइसन चाल चलिस सकुनी हर
धरमराज के दाँव गवाँ गे।
झोप-झोप म झोप बाढ़ गे
कुरिया-कुरिया ठाँव गवाँ गे।
जब ले मूड़ चढ़े अगास हे
माँ भुइयाँ के नाँव गवाँ गे।

जहर नइये 

कहूँ सिरतोन के कदर नइये
लबरा ला कखरो डर नइये।
कुआँ बने हे जब ले जिनगी
पानी तो हवे, लहर नइये।
एमा का कसूर दरपन के
देखइया जब सुघ्घर नइये।
बिहान मड़ियावत काहाँ चलिस
बूता ला कुछू फिकर नइये।
देंवता मन अमरित पी डारिन
हमर पिये बर जहर नइये।

पता नइये

कखरो बिजहा ईमान के पता नइये
कखरो सोनहा बिहान के पता नइये।
घर-घर घपटे हे अँधियारी भैया गा
सुरुज हवे, किरन-बान के पता नइये।
पोथी पढ़इया-सुनइया पढ़थयँ-सुनथयँ
जिनगी जिये बर गियान के पता नइये।
करिस मसागत अउ खेती ला उजराइस
किसान के घर धन-धान के पता नइये।

अभागिन भुइयाँ

तैं हर झन खिसिया, मोर अभागिन भुइयाँ
निचट लहुटही दिन तोर अभागिन भुइयाँ।
मुँह जर जाही अँधियारी परलोकहिन के
मन ले माँग ले अँजोर अभागिन भुइयाँ।
पहाड़-कस रतिहा बैरी गरुआगे हे
बन जा तहूँ अब कठोर अभागिन भुइयाँ।
कखरो मन ला नइ टोरे तैं बनिहारिन
अपनो मन ला झन टोर अभागिन भुइयाँ।
आ गे हवे नवाँ जुग बदले के बेरा
नवाँ बिहान ला अगोर अभागिन भुइयाँ।

फुटहा दरपन

हरियर छइहाँ हर उदुप ले हरन हो गे
तपत, जरत-भूँजात पाँव के मरन हो गे।
घपटे रहि जाथे दिन-दिन भर अँधियारी
अँजोर के जब ले डामरीकरन हो गे।
कुकुर मन भूकत हवें खुसी के मारे
मनखे मनखे के अक्कट दुसमन हो गे।
जउन गिरिस जतके, ओतके उठिस ओ हर
अपत, कुलच्छन के पाँव तरी धन हो गे।
करिन करइया मन अइसन पथराव करिन
मन के दरपन हर फुटहा दरपन हो गे।
का करे साँप धरे मेचकी-अस जिनगी हर
निचट भिंभोरा-कस मनखे के तन हो गे।

मनखे मर गे

दाना-दाना बर लुलुवावत मनखे मर गे
खीर-सोंहारी खावत-खावत मनखे मर गे।
का ला कहिबे, का ला सुनबे, का ला गुनबे
पर धन ला बइठे पगुरावत मनखे मर गे।
पीवत-खावत अउ मेछरावत मनखे मर गे
धारन रोवत अउर करलावत मनखे मर गे।
नइये कहूँ गरिबहा के कोनो मनराखन
गुन-हगरा मन के गुन गावत मनखे मर गे

का कहिबे? 

मन रोवत हे मुँह गावत हे का कहिबे
गदहा घलो कका लागत हे का कहिबे?
अब्बड़ अगियाए लागिस छइहाँ बैरी
लहँकत घाम ह सितरावत हे का कहिबे?
खोर-खोर म कुकुर भूकिस रे भइया
घर म बघवा नरियावत हे का कहिबे?
छोंरिस बैरी मया-दया के रद्दा ला
सेवा ला पीवत-खावत हे का कहिबे?
चर डारे हे बखरी भर ईमान ला
कतका खातिस पगुरावत हे का कहिबे?
सावन-भादों बारों मास गरिबहा के
लकड़ी-कस मन गुँगुवावत हे का कहिबे?

धन-पसु

पेट सिकन्दर हो गे हे
मौसम अजगर हो गे हे।
निच्चट सुक्खा पर गे घर
आँखी पनियर हो गे हे।
हँसी-खुसी के रद्दा बर
बटमारी घर हो गे हे।
मया-दया के अचरा के
जिनगी दूबर हो गे हे।
दुसमन तो दुसमन होथे
मितान के डर हो गे हे।
पसु-धन के चारा चर के
धन-पसु हरियर हो गे हे।
बाढ़िस खेती भाँठा के
आसा बंजर हो गे हे।

मया धन

मितान हम-तुम लकठा जातेन
दुख-सुख बाँट के जुड़ा जातेन।
दिन भर किंजर-बूल के संगी
एक खोंधरा मा बने आ जातेन।
जुच्छा मा भरे-भरे लगतिस
गुरतुर गोठ के धन पा जातेन।
मनखे के आतिस काम बने
अइसन मया-धन कमा जातेन।
गाँव के, भुइयां के, माटी के
बिजहा-धान-कस गँवा जातेन।

रतिहा

पहाड़-कस गरू हवय अँधियारी रतिहा
टोनही बन गे हे एक कुआँरी रतिहा।
बने रद्दा ह बने नइ लागय मनखे ला
कोनो ला नइ दय कोनो चिन्हारी रतिहा।
भिम-अँधियार के गुन गावत हे गुनवंतिन
अँजोर के करथय बहुंते चारी रतिहा।
अँगठी फोरथे दुखाही ह चच्चर ले
सरापथे दिन ला, देथय गारी रतिहा।
अब्बड़ रोवत हें खोर-खोर कुकुर मन
निचट जनावत हे असगुन भारी रतिहा।
नइ मिलय नींद के कहूँ आरो बसती मा
अइसन धमकाथे नयन-दुआरी रतिहा।
कहूँ सिरोतन के कदर नइये सँगवारी
अइसन फरकाथे गोठ लबारी रतिहा।
कतको करवाथे अलिन-गलिन बटमारी
बेधड़क भोगे बर महल-अटारी रतिहा।
झटकुन बासो रे कुकरा हो सुरुज बर
करिया मुँह तब करही ए कारी रतिहा।

बरखा आथे

(1)
खेती ल हुसियार बनाय बर
भुइयाँ म बरसा आथे |
जिनगी ल ओसार बनाय बर
भुइयाँ म बरखा आथे |
सोन बनाय बर माटी ल
सपना ल सिरतोन बनाय बर,
आँसू ल बनिहार बनाय बर
भुइयाँ म बरखा आथे |

(2)
बाजत रहिथे झिमिर-झिमिर
रोज चिकारा अस बरखा के |
बाजत रहिथे घड़-घड़-घड़
रोज नंगारा अस बरखा के |
खुसियाली के चिट्ठी लेके
बादर दुरिहा-दुरिहा जाथे,
करिया-करिया बादर ल
समझव हलकारा अस बरखा के |

(3)
जोत जोगनी के तारा अस
जुग-जुग बरथे अँधियारी म |
आसा, मन के, बिजली बन के
चम-चम करथे अँधियारी म |
मेचका मन के आरो मिलथे
कपस-कपस जाथे लइका हर,
हवा बही कस कभू उदुप ले
कहूँ खुसरथे अँधियारी म |

(4)
कहूँ तोरइ, तूमा, रमकेलिया
झूलत होवे बखरी म |
कहूँ करेला – कुंदरु अउ रखिया
फूलत होवे बखरी म |
कहूँ जरी ह लामे होही,
बरबट्टी ह ओरमे होही,
खुस होक लइका-पिचका मन
बूलत होही बखरी म |

(5)
अतका पानी दे तैं, जतका
जिनगी के बिस्वास माँगथे |
अतका पानी दे तैं, जतका
अन लछमी ह साँस माँगथे |
मोर देस के गाँव-गाँव ल
अतका पानी दे तैं बरखा,
जतका पानी पनिहारिन ल
तरिया तीर पियास माँगथे |

ग़ज़ल दूठिन

मां भुइयाँ के, नाँव गवाँगे,

गाँव-गाँव में गाँव गवाँ गे,
खोजत खोजत पाँव गवाँ गे।

अइसन लहंकिस घास भितरहा,
छाँव छाँव में छाँव गवाँ गे।

अइसन चाल चलिस सकुनी हर,
धरमराज के दाँव गवाँ गे।

झोप-झोप में झोप बाढ़गे,
कुरिया-कुरिया ठाँव गवाँ गे।

जब ले मूड चढ़े अगास हे,
माँ भुइयाँ के नाँव गवाँ गे।

2.
खेत-खार में, भूख अकर गे

बनी करइया भूखन मरगे,
ब्लैक करिस तेखर घर भरगे।

करम फाट गे, जऊंहर होगे,
खेत-खार में भूख अकर गे।

मन के मयाँ नदागे भइया,
पेट, पीठ के गांव अमरगे।

नाँव बुतागे हे अंजोर के,
सबों डहर आँधियार समहरगे।

पहुना बन के जउने आइस,
घर में जइसे नाँग खुसरगे।

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