लावण्या शाह की रचनाएँ

पकी पकी फ़सल

पकी पकी फसल लहराए ओढ़े पीली सरसों की चुनरिया
तेरे खेत में मक्का-बाजरा, मेरे, गेहूँ की बालियाँ
गाँव-गाँव घूम रही टोलियाँ, होलिका-दहन तैयारी
किसी की खाट, किसी का पाट, किसीली के हाथ लकड़ियाँ!

नीला, पीला, हरा, जामुनी, नारंगी, लाल रंग सजा है
प्रकृति ने करवट बदली है, टेसू सा रंग खिला है!
दरी-दरी कूक रही है, हूक उठाती, कारी-कारी कोयलिया
किसलय के चिकने पात छिप, झाँक रही, शर्मीली गोरैय्या

मंद सुगंध पुरवा से मिल कर परिमल पाँव पसारे
आमरा मंजरी ऊँची टेहनी से, फागुन की तान, सुनावे!
“पीहू पीहू कहाँ मेरे पिय?” पपीहा बैन पुकारे
गोरी की, प्रेम-अगन, नयनां जल पी, ज्वाला बन देखावे।

“हे विधाता! क्यों भेज्यो फागुन?” बिरहा जिया अकुलाए
“पिया बिनु कैसे होरी? कैसी आए ये ऋत अलबेली?”
फागुन फगुनाया, हँस पड़ी कमलिनी पोखर में
हाथ बढ़ा कर उसे तोड़ कर चढ़ा दिया शिव पूजन में!

“माँगूँ तुमसे भोले बाबा! मेरे पिया मुझे लौटा दो!
दिया फागुन का वर तो शंभू! प्रियतम भी लौटा दो!”
नेत्र मूँद कर नई दुल्हनिया, मंदिर में दीप जलावे
बिछुड़ पिय की माला जपती, मन ही मन, मंद-मंद मुस्कावे!

भोर भई, तकते पिय का पथ 

भोर भई , तकते पिय का पथ
आये ना मेरे प्रियतम आली
भोर भई !
चन्द्र किरण ने झूला झुलाया
सपनों की माला का हार पहनाया
ओ मेरे प्रियतम मैं डाली – डाली
झूली अकेली सावन में निराली
कान्हा बिन ज्यों राधे अकेली,
लाज से काँपे थर थर चमेली
भोर भई , तकते पिय का पथ
आये ना मेरे प्रियतम आली
भोर भई !
प्यार का दीवला, प्रीत की बाती,
दोनों जले पिया सारी राती
बिखरे थे कितने अम्बर पे तारे,
उनकों गिने, नयनों ने हमारे
फिर भी ना मन को चन पड़े रे
कितने अकेले हम हैं खड़े
भोर भई , तकते पिय का पथ
आये ना मेरे प्रियतम आली
भोर भई !

वह मैं हूँ

तुलसी के बिरवे के पास, रखा एक जलता दिया
जल रहा जो अकम्पित, मंद मंद, नित नया
बिरवा जतन से उगा जो तुलसी क्यारे मध्य सजीला
नैवैध्य जल से अभिसिक्त प्रतिदिन, वह मैं हूँ
सांध्य छाया में सुरभित, थमी थमी सी बाट
और घर तक आता वह परिचित सा लघु पथ
जहां विश्राम लेते सभी परींदे, प्राणी, स्वजन
गृह में आराम पाते, वह भी तो मैं ही हूँ न

पदचाप, शांत संयत, निश्वास गहरा बिखरा हुआ
कैद रह गया आँगन में जो, सब के चले जाने के बाद
हल्दी, नमक, धान के कण जो सहजता मौन हो कर
जो उलट्त्ता आंच पर, पकाता रोटियों को, धान को
थपकी दिलाकर जो सुलाता भोले अबोध शिशु को
प्यार से चूमता माथा, हथेली, बारम्बार वो मैं हूँ
रसोई घर दुवारी पास पडौस नाते रिश्तों का पुलिन्दा
जो बांधती, पोसती प्रतिदिन वह, बस मैं एक माँ हूँ !

अबोध का बोध पाठ 

हैं छोटे छोटे हाथ मेरे,

छोटे छोटे पाँव।

नन्हीं नन्हीं आँखे मेरी

नन्हें नन्हें कान।

फिर भी हरदम चलता हूँ

हाथों से करता काम।

रोज देखता सुंदर सपना

सुनता सुंदर गान।

अब हमारी सुनो प्रार्थना

तुम भी बच्चे बन जाओ।

छोड़ो झगड़े और लड़ाई

अच्छे बच्चे बन जाओ।

यादें

घर से जितनी दूरी तन की,
उतना समीप रहा मेरा मन,
धूप ~ छाँव का खेल जिँदगी
क्या वसँत , क्या सावन!
नेत्र मूँद कर कभी दिख जाते,
वही मिट्टी के घर आँगन,
वही पिता की पुण्य ~ छवि,
सजल नयन पढ्ते रामायण !
अम्मा के लिपटे हाथ आटे से,
फिर सोँधी रोटी की खुशबु,
बहनोँ का वह निश्छल हँसना
साथ साथ, रातोँ को जगना !
वे शैशव के दिन थे न्यारे,
आसमान पर कितने तारे!
कितनी परियाँ रोज उतरतीँ,
मेरे सपनोँ मेँ आ आ कर मिलतीँ.
” क्या भूलूँ, क्या याद करूँ ? ”
मेरे घर को या अपने बचपन को ?
कितनी दूर घर का अब रस्ता,
कौन वहाँ मेरा अब रस्ता तकता ?
अपने अनुभव की इस पुड़िया को,
रक्खा है सहेज, सुन ओ मेरी ,गुड़िया !

संक्रमण : गुलमोहर के फूल

जेठ के ताप से झुलस झुलस कर ,
पेड ने उँडेल दिया जब अपना मन,
तब सैँकडो खिल उठे, हरी डाल पे,
लाल चटक गुलमोहर के फूल !

सँजो दिये टहनी पे अनगिनती,
मादक नव रूप ~ रँग, सँग
भर भर दे रहे हमे उमँग,
लाल लाल, गुलमोहर के फूल !

आकाश तक फैल गई लाली,
हुई सिँदुरी साँझ, मतवाली
बहती पवन सँग आन गिरे
माटी पे,गुलमोहर के फूल !

हर क्रिया घटती ना अकारण,
नवोन्मेष सरल व्याकरण
सीखाती प्रक्रुति दे उदाहरण
युँ ही खिलते,गुलमोहर के फूल !

अहम ब्रह्मास्मि

असीम अनन्त, व्योम, यही तो मेरी छत है!
समाहित तत्त्व सारे, निर्गुण का स्थायी आवास
हरी भरी धरती, विस्तरित, चतुर्दिक-
यही तो है बिछौना, जो देता मुझे विश्राम!
हर दिशा मेरा आवरण, पवन आभूषण-
हर घर मेरा जहाँ, पथ मुड़ जाता स्वतः मेरा,
पथिक हूँ, हर डग की पदचाप-
विकल मेरा हर श्वास, तुमसे, आश्रय माँगता!

युति

जैसी नदिया की धारा
ढूँढे अपना, किनारा,
जैसे तूफ़ानी सागर मे,
माँझी, पाये किनारा,
जैसे बरखा की बदली,
जैसे फ़ूलों पे तितली,
सलोने पिया, मोरे
सांवरिया,
वैसे मगन, मै और तुम

लिपटी जैसे बेला की बेल,
ऊँचे घने पीपल को घेर,
जैसे तारों भरी रात,
चमक रही चंदा के साथ,
मेरे आंगन मे चांदनी,
करे चमेली से ये बात,
सलोने पिया, मोरे
सांवरिया,
भयले मगन, मै और तुम

सौगात 

जिस दिन से चला था मैँ,
व्रुन्दावन की सघन घनी
कुँज ~ गलियोँ से ,
राधे, सुनो, तुम मेरी मुरलिया
फिर , ना बजी !
किसी ने तान वँशी की
फिर ना सुनी !
वँशी की तान सुरीली,
तुम सी ही सुकुमार
सुमधुर, कली सी ,
मेरे अँतर मे,
घुली – मिली सी,
निज प्राणोँ के कम्पन सी
अधर रस से पली पली सी !
तुम ने रथ रोका — अहा ! राधिके !
धूल भरी ब्रज की सीमा पर ,
अश्रु रहित नयनोँ मे थी
पीडा कितनी सदियोँ की !
सागर के मन्थन से
निपजी , भाव माधुरी
सोँप दिये सारे बीते क्षण
वह मधु – चँद्र – रजनी,
यमुना जल कण , सजनी !
भाव सुकोमल सारे अपने
भूत भव के सारे वे सपने
नीर छ्लकते हलके हलके
सावन की बूँदोँ का प्यासा
अँतर मन चातक पछतता
स्वाति बूँद तुम अँबर पर
गिरी सीप मेँ, मोती बन!
मुक्ता बन मुस्कातीँ अविरल
सागर मँथन सा मथता मन
बरसता जल जैसे अम्बर से
मिल जाता द्रिग अँचल पर !
सौँप चला उपहार प्रणय का
मेरी मुरलिया, मेरा मन!
तुम पथ पर निस्पँन्द खडी,
तुम्हे देखता रहा मौन शशि
मेरी आराध्या, प्राणप्रिये,
मन मोहन मैँ, तुम मेरी सखी !
आज चला व्रुँदावन से —
नही सजेगी मुरली कर पे —
अब सुदर्शन चक्र होगा? हाथोँ पे
मोर पँख की भेँट तुम्हारी,
सदा रहेगी मेरे मस्तक पे!

सपनों का संसार

अन्तर मनसे उपजी मधुर रागिनीयों सा,
होता है दम्पतियों का सुभग संसार ,
परस्पर, प्रीत, सदा सत्कार, हो साकार,
कुल वैभव से सिंचित, सुसंस्कार !
तब होता नहीँ, दूषित जीवन का,
कोई भी, लघु – गुरु, व्यवहार…

नहीं उठती दारुण व्यथा हृदय में,
बँधते हैं प्राणो से तब प्राण !
कौन देता नाम शिशु को?
कौन भरता सौरभ भंडार?
कौन सीखलाता रीत जगत की?
कौन पढाता दुर्गम ये पाठ?

माता और पिता दोनों हैँ,
एक यान के दो आधार,
जिससे चलता रहता है,
जीवन का ये कारोबार !
सभी व्यवस्था पूर्ण रही तो,
स्वर्ग ना होगा क्या सँसार?

ये धरती है इंसानों की,
नहीँ दिव्य, सारे उपचार!
एक दिया,सौ दीप जलाये,
प्रण लो, करो,आज,पुकार!
बदलेंगें हम, बदलेगा जग,
नहीं रहेंगे, हम लाचार!
कोरी बातों से नहीं सजेगा,
ये अपने सपनों का संसार

उच्चैश्रेवा

समुद्र मंथन से निकले थे तुम
पँख फड़फडा़,उड़ चले स्वर्ग की ओर…
हे,श्वेत अश्व,नुकीले नैन नक्श लिये,
विध्युत तरँगो पर विराजित चिर किशोर!
मखमली श्वेत व्याल, सिहर कर उडे…
श्वेत चँवर सी पूँछ, हवा मेँ फहराते …
लाँघ कर प्राची दिश का ओर छोर !
उच्चैश्रवा: तुम उड़ चले स्वर्ग की ओर !
इन्द्र सारथि मातलि,चकित हो,
देख रहे अपलक,नभ की ओर,
स्वर्ग-गंगा, मंदाकिनी, में कूद पडे़,
बिखराते,स्वर्ण-जल की हिलोर!
उच्चैश्रवा: तेज-पुंज, उड़ चले स्वर्ग की ओर!
दसों दिशा हुईँ उद्भभासित रश्मि से,
नँदनवन, झिलमिलाया उगा स्वर्ण भोर !
प्राची दिश मेँ, तुरँग का ,रह गया शोर!

अब भी दीख जाते हो तुम, नभ पर,
तारक समूह मेँ स्थिर खडे,अटल,
साधक हो वरदानदायी विजयी हो
आकाश गंगा के तारों से लिपे पुते,
रत्न जटीत,उद्दात, विचरते चहुँ ओर!
उच्चैश्रवा: तुम उड चले स्वर्ग की ओर!

श्वेत श्याम

रात दिवस, श्वेत श्याम,
एक उज्ज्वल, दूजा घन तमस
बीच मेँ फैला इन्द्रधनुष,
उजागर, किरणों का चक्र,
एक सूर्य के आगमन पर,
उसके जाते सब अन्तर्ध्यान!
तमस , जडता का फैलता साम्राज्य !
चन्द्र दीप, काले काले आसमाँ पर,
तारोँ नक्षत्रों की टिमटिमाहट,
सृष्टि के पहले, ये कुछ नहीं था –
सब कुछ ढँका था एक अँधेरे मेँ,
स्वर्ण गर्भ, सर्व व्यापी, एक ब्रह्म
अणु अणु मेँ विभाजित, शक्ति-पुंज !
मानव, दानव, देवता, यक्ष, किन्नर,
जल थल नभ के अनगिनत प्राणी,
सजीव निर्जीव, पार्थिव अपार्थिव
ब्रह्माण्ड बँट गया कण क़ण मेँ जब,
प्रतिपादीत सृष्टि ढली संस्कृति में तब !

बीती रात का सपना

बीती रात का सपना, छिपा ही रह जाये,
तो वो, सपना, सपना नहीं रहता है!
पायलिया के घुँघरू, ना बाजें तो,
फिर,पायल पायल कहाँ रहती है?
बिन पँखों की उडान आखिरी हद तक,
साँस रोक कर देखे वो दिवा-स्वप्न भी,
पल भर मेँ लगाये पाँख, पखेरु से उड़,
ना जाने कब, ओझल हो जाते हैँ !
मन का क्या है? सारा आकाश कम है
भावों का उठना, हर लहर लहर पर,
शशि की तम पर पड़ती, आभा है !

रुपहली रातो में खिलती कलियाँ जो,
भाव विभोर, स्निग्धता लिये उर मेँ,
कोमल किसलय के आलिंगन को,
रोक सहज निज प्रणयन उन्मन से
वीत राग उषा का लिये सजातीँ,
पल पल में, खिलती उपवन मेँ !
मैं, मन के नयनो से उन्हेँ देखती,
राग अहीरो के सुनती, मधुवन मेँ,
वन ज्योत्सना, मनोकामिनी बनी,
गहराते संवेदन, उर, प्रतिक्षण मेँ !

सुर राग ताल लय के बँधन जो,
फैल रहे हैँ, चार याम, ज्योति कण से,
फिर उठा सुराही पात्र, पिलाये हाला,
कोई आकर, सूने जीवन पथ मेँ !

यह अमृत धार बहे, रसधार, यूँ ही,
कहती मैं यह जग जादू घर है !
रात दिवा के द्युती मण्डल की,
यह अक्षुण्ण अमित सीमा रेखा है

२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)२०:२७, १ दिसम्बर २००७ (UTC)208.102.209.199 [(नरगिस/लावण्या शाह]] नरगिस * लहरा कर, सरसरा कर , झीने झीने पर्दो ने, तेरे, नर्म गालोँ को जब आहिस्ता से छुआ होगा मेरे दिल की धडकनोँ मेँ तेरी आवाज को पाया होगा ना होशो ~ हवास मेरे, ना जजबोँ पे काबु रहा होगा मेरी रुह ने, रोशनी मेँ तेरा जब, दीदार किया होगा ! तेरे आफताब से चेहरे की उस जादुगरी से बँध कर, चुपके से, बहती हवा ने,भी, इजहार किया होगा फैल कर, पर्दोँ से लिपटी मेरी बाहोँ ने फिर् ,तेरे,मासुम से चेहरे को, अपने आगोश मेँ, लिया होगा ..तेरी आँखोँ मेँ बसे, महके हुए, सुरमे की कसम! उसकी ठँडक मेँ बसे, तेरे, इश्को~ रहम ने, मेरे जजबातोँ को, अपने पास बुलाया होगा एक हठीली लट जो गिरी थी गालोँ पे, उनसे उलझ कर मैँने कुछ सुकुन पाया होगा

तु कहाँ है? तेरी तस्वीर से ये पुछता हूँ मैँ. .आई है मेरी रुह, तुझसे मिलने, तेरे वीरानोँ मैँ बता दे राज, आज अपनी इस कहानी का, रोती रही नरगिस क्यूँ अपनी बेनुरी पे सदा ? चमन मेँ पैदा हुआ, सुखन्वर, यदा ~ कदा !!

दोपहर के अलसाये पल 

तुम्हारी समंदर-सी गहरी आँखोँ में,
फेंकता पतवार मैं, उनींदी दोपहरी मेँ –
उन जलते क्षणोँ में, मेरा ऐकाकीपन
और घना होकर, जल उठता है – डूबते माँझी की तरह –
लाल दहकती निशानियाँ, तुम्हारी खोई आँखोँ में,
जैसे दीप-स्तंभ के समीप, मंडराता जल !

मेरे दूर के सजन, तुम ने अँधेरा ही रखा
तुम्हारे हावभावों में उभरा यातनों का किनारा –
अलसाई दोपहरी में, मैं, फिर उदास जाल फेंकता हूँ –
उस दरिया में, जो तुम्हारे नैया से नयनोँ में कैद है !

रात के पँछी, पहले उगे तारों को, चोंच मारते हैँ –
और वे, मेरी आत्मा की ही तरहा, और दहक उठते हैँ !
रात, अपनी परछाईं की ग़्होडी पर रसवार दौडती है,
अपनी नीली फुनगी के रेशम – सी लकीरों को छोडती हुई !

बुझते चिरागोँ से उठता धुँआ
कह गया .. अफसाने, रात के
कि इन गलियोँ मेँ कोई ..
आ कर,… चला गया था ..
रात भी रुकने लगी थी,
सुन के मेरी दास्ताँ
चाँद भी थमने लगा था
देख कर दिल का धुँआ
बात वीराने मे की थी,
लजा कर दी थी सदा
आप भी आये नही थे,
दिल हुआ था आशनाँ ..

रात की बातोँ का कोई गम नहीँ
दिल तो है प्यासा, कहेँ क्या ,
आप से, …अब .. .हम भी तो
हैँ हम नहीँ !

समय! धीरे धीरे चल

समय ! धीरे धीरे चल !

कितने हैं बाकी काम अभी,
कुछ तुझको भी है ध्यान ?
सब तुझसे बंध कर चलते हैं
उन्हें भी याद कर , नादान!
ओ समय ! धीरे धीरे चल !

जो बिछडे साथी हैं उनका भी
कर लिहाज धर बाँह सभी,
भूखे, प्यासे मानव दल का,
बनना होगा विश्वास अभी –
ओ समय ! धीरे धीरे चल!

ना व्यर्थ गँवाना अपने को,
शोर शराबे भरी गलियों में,
जहाँ सिर्फ,खुमारी, रंगरेली हो,
क्या उनसे ही हो बात सभी ?
ओ समय ! धीरे धीरे चल !

तेरे लिये, जलाये आशा दीप,
राह तकें राजा रंक, यही रीत!
तज पुरानी गाथाओं के इतिहास,
रच आज कोई नव शौर्यगान!
ओ समय ! धीरे धीरे चल!

इस पृथ्वी पट पर तू है,
भूत, भविष्य, का ज्ञाता,
सँवार रे, नये बरस को,
हो सुखमय, ये जग सारा!
ओ समय ! धीरे धीरे चल !

जीवंत प्रकृति

खिले कँवल से, लदे ताल पर,
मँडराता मधुकर~ मधु का लोभी.
गुँजित पुरवाई, बहती प्रतिक्षण
चपल लहर, हँस, सँग ~ सँग,
हो, ली !
एक बदलीने झुक कर पूछा,
“ओ, मधुकर, तू ,
गुनगुन क्या गाये?
“छपक छप –
मार कुलाँचे,मछलियाँ,
कँवल पत्र मेँ,
छिप छिप जायेँ !
“हँसा मधुप, रस का वो लोभी,
बोला,
” कर दो, छाया,बदली रानी !
मैँ भी छिप जाऊँ,
कँवल जाल मेँ,
प्यासे पर कर दो ये, मेहरबानी !”
” रे धूर्त भ्रमर,
तू,रस का लोभी —
फूल फूल मँडराता निस दिन,
माँग रहा क्योँ मुझसे , छाया ?
गरज रहे घन –
ना मैँ तेरी सहेली!”

टप, टप, बूँदोँ ने
बाग ताल, उपवन पर,
तृण पर, बन पर,
धरती के कण क़ण पर,
अमृत रस बरसाया –
निज कोष लुटाया !

अब लो, बरखा आई,
हरितमा छाई !
आज कँवल मेँ कैद
मकरँद की, सुन लो
प्रणय ~ पाश मेँ बँधकर,
हो गई, सगाई !!

चित्र -वीथी

शाम को आने का वादा,
इस दिल को तसल्ली दे
गया,
आने का कह कर तुमने,
हमे सुकूँ कितना दिया!

अमलतास के पीले झूमर
भर गये, आँगन हमारा,
साँझ की दीप बाती
जली,
रोशन हो गया हर
किनारा !

पाँव पडे जब दहलीज पर-
हवा ने आकर, हमको
सँवारा,
आँगन से, बगिया तक,
पात पात, मुस्कुराया !

बिँदीया को सजाती
उँगलियोँ ने,
काजल नयनोँ मेँ
बिखेरा,
इत्र की शीशी से फिर
ले बूँद,
हम ने उन्हे, गले से
लगाया !

घर से भीतर जाने का
रस्ता,
लाँघ कर, जो भी है,
जाता ,
या आता ! खडी रहती जो,
हमेशा, वो दहलीज है!

हर कोई चाहता है 

हर कोई चाहता है,
हो मेरा एक नन्हा आशियाँ
काम मेरे पास हो,
घर पर मेरे अधिकार हो,
पर, यही, मेरा और तेरा ,
क्योँ बन जाता, सरहदों में बँटा,
शत्रुता का, कटु व्यवहार?

रोटी की भूख, इन्सानों को,
चलाती है,
रात दिन के फेर में पर,
चक्रव्यूह कैसे , फँसाते हैँ ,
सबको, मृत्यु के पाश में ?

लोभ, लालच, स्वार्थ वृत्त्ति,
अनहद,धन व मद का
नहीँ रहता कोई सँतुलन!
मैं ही सच , मेरा धर्म ही सच!
सारे धर्म, वे सारे, गलत हैं !

क्यों सोचता, ऐसा है आदमी ??
भूल कर, अपने से बडा सच!!

मनोमन्थन है अब अनिवार्य,
सत्य का सामना, करो नर,
उठो बन कर नई आग,
जागो, बुलाता तुम्हें, विहान,
है जो,आया अब समर का!

रात्रि का अंतिम प्रहर

रात्रि का अंतिम प्रहर था
भोर आगमन अभी शेष था
थी सुप्त ज्योति आकाश में
अंतिम तारक प्रकाश में !
थे जीव पृथ्वी पे निरापद
निमग्न गहन निद्रा अंक में
नहीं कोई स्वर सृत कहीं
आकाश पे, अवकाश था।
गहन तिमिर आच्छादित
प्रच्छन मौन गुफा में सत्य ,
प्रकृति के सजल नयन में
अनुत्तरित यक्ष प्रश्न सा !

प्रेम मूर्ति

मैं तुम्हें कैसे प्यार करती हूँ
कितना प्यार करती हूँ
सोंचती रहती हूँ खोकर
रह जाती हूँ – बस

गुदड़ी का लाल

मैं अध जागा अध सोया क्यों हूँ ?
मैं अब भी भूखा प्यासा क्यों हूँ ?
क्या भारत मेरा देश नहीं है ?
क्या मैं भारत का लाल नहीं हूँ ?
क्यों तन पर चिथड़े हैं मेरे ?
क्यों मन मेरा रीता उदास है ?
क्यों ईश्वर मुझसे छिपा हुआ है ?
क्यों जीवन बोझ बना हुआ है ?
आँखें मेरी सोएं तो कैसे ?
और वे रोएं भी तो कैसे ?
क्या हासिल होगा रोने से ?
दुःख जड़ गहरे पानी पैठा है !
क्या मैं भारत का बाल नहीं ?
क्या मैं भी तेरा लाल नहीं ?
क्यों सौभाग्य मेरे भाल नहीं ?
क्यों प्रश्न चिह्न है जीवन मेरा ?
बड़े आदमी बनने का सपना
खुली आँखों से देख रहा हूँ !
माता अब मेरे अश्रू पोंछ ले
क्या मैं गुड़दी का लाल नहीं ?

कृष्ण गीत

बृज मण्डल में कनक घंटियां
खनक रहीं गोधूली में
धूल उड़ रही चहुं दिशा में
बृज में गोरज बेला है।

डाल झुक गई कदंब की
गूंज उठा स्वर वंशी का
झूल रहे हैं‚ नवतरु पल्लव
लहराते यमुना जल पर।

दिगदिगन्त से सूर्य-रश्मियाँ
लौट पड़ी हैं कुछ थकी हुई
बाट जोहती मन मोहन की
स्वयं राधिका‚ खड़ी हुई।

आँगन है जसुमति मैया का
नन्द गाँव है मन भावन
किशना के घर आने से
लगता कितना प्यारा मोहन।

बृज की माटी तू पावन है‚
बृज की रज तू चंदन है।
जहाँ श्याम के युगल चरण का
पत्र-पत्र पर अभिनन्दन है।

Share