लीना मल्होत्रा की रचनाएँ

तुम्हारे प्रेम में गणित था–1

वह जो प्रेम था
शतरंज की बिसात की तरह बिछा हुआ हमारे बीच
तुमने चले दाँव-पेच
और मैंने बस ये
कि इस खेल में उलझे रहो तुम मेरे साथ

तुम्हारे प्रेम में गणित था
कितनी देर और…?
मेरे गणित में प्रेम था
बस एक और.. दो और…

तुम्हारा प्रेम दैहिक प्रेम था
जो देह के साथ इस जन्म में ख़त्म हो जाएगा
और मेरा एक कल्पना

जो अपने डैने फैलाकर अँधेरी गुफ़ा में मापता रहेगा अज्ञात आकाश,

और नींद में बढ़ेगा अन्तरिक्ष तक
मस्तिष्क की स्मृति में अक्षुण रहेगा मृत्यु के बाद भी
और सूक्ष्म शरीर ढो कर ले जाएगा उसे कई जन्मों तक
मैंने शायद तुमसे सपने में प्रेम किया था

अगले जन्म में
मै तुमसे फिर मिलूँगी
किसी खेल में
या व्यापार में

तब होगा प्रेम का हिसाब
मै गणित सीख लूँगी तब तक

तुम्हारे प्रेम में गणित था–2

वह जो दर्द था हमारे बीच,
रेल की पटरियों की तरह जुदा रहने का
मैंने माना उसे
मोक्ष का द्वार जहाँ अलिप्त होने की पूरी सम्भावनाएँ मौजूद थी
और तुमने
एक समानान्तर जीवन
बस एक दूरी भोगने और जानने के बीच
जिसके पटे बिना सम्भव न था प्रेम

वह जो देह का व्यापार था हमारे बीच
मैंने माना
वह एक उड़न-खटोला था
जादू था
जो तुम्हे मुझ तक और मुझे तुम तक पहुँचा सकता था
तुमने माना लेन-देन
देह एक औज़ार
उस औजार से तराशी हुई एक व्यभिचारिणी मादा
जो
शराबी की तरह धुत हो जाए और
अगली सुबह उसे कुछ याद न रहे
या
एक दोमट मिटटी जो मात्र उपकरण हो एक नई फ़सल उगाने का ।

हँसती हुई लड़कियाँ 

अन्धेरे में हँस रही हैं दो लड़कियाँ
अवसाद को दूर ठेलती
हँस रही हैं लड़कियाँ
अपने हाथ से मुँह को ढके
वे उस हँसी को रोकने की कोशिश कर रही हैं।
मगर हँसी है
कि फिसलती चली आ रही है उनके होंठो से
हाथो की उँगलियों की झीनी दरारों से
जैसे
सीटी में फिसलते चले आते हैं सुर
सन्नाटे में फिसल आता है डर
भूख में फिसल आती है याचना
कविता में जीवन
वैसे ही फिसलती हुई हँसी हँस रही हैं लड़कियाँ
नींद में डूबे पेड़
उनकी हँसी सुन आँखे मलते उठ गए हैं
और फिसलने लगे हैं उनके पीछे
फिसलने लगे हैं पतंगे
मद्धम रोशनी के नाईट बल्ब और सुदूर आसमान में सितारे
फिसलने लगी हैं दिशाएँ
झींगुरो की सन्नाटे को तोडती ध्वनियाँ फिसल रही हैं

फिसल रहा है शराबी का सारा मज़ा
और दिशाओं के क़दमों के नीचे दबे तमाम सूखे पत्ते
अख़बारों की सुर्खियाँ
जो अभी-अभी अख़बारों पर बैठी थीं
फिसलने लगी हैं हँसी के पीछे

मैं इस हँसी को जानती हूँ
एक सदी पहले मैं भी ऐसे ही हँसी थी
तब
बैल के सींग झड़ गए थे पीपल के पत्ते
रानी पागल हो गई थी
और नदी लाल हो गई थी
लड़कियों की हँसी से अक्सर
ऐसी ही हो जाती हैं अनहोनियाँ
फिर भी इस छोटी उम्र में हँसती हैं दो लड़कियाँ
अन्धेरे में
जहाँ वह सोचती हैं उन्हें कोई नहीं देख रहा

लेकिन उनकी हँसी के पीछे एक काफ़िला चल देता है
जो पहले सम्मोहित होता है
और आँखें बन्द किए चलता है पीछे-पीछे
फिर जान जाता है जब रहस्य उनकी हँसी का
तब
समूचा निगल लेता है उस हँसी को
और उसकी एक तस्वीर
समय के हाथ दन्तकथाओं को सौंप देता है
दन्तकथाएँ फिसलन को
धूल की तरह झाड़ कर
हिफ़ाज़त से सम्हाल लेती हैं उस हँसी को

कभी तो

कभी तो कहा होगा तिनके ने नदी से —
ठहरो, सुस्ता ले, दो घडी
धूल ने हवा से — रुको, अलसा लें, एक पल

कभी तो कहा होगा
चिड़िया ने पेड़ से —
मेरे साथ उड़ चलो

चाहा होगा पेड़ का मन उड़ने को
नदी का ठहरने को
हवा ने सोचा होगा रुक कर देखे एक बार

तभी तो
अपने थके पीले पड़े पत्तो को
छोड़ देता है पेड़
कहता उड़ जाओ

हवा दब जाती है धूल के वज़न के नीचे कई बहाने बनाकर
नदी अटकी हुई विराम ले लेती है
किनारों पर ठहरे हुए पानी में तिनकों के साथ

आखिर साथ की चाहना किसे नही होती

और
साथ का अर्थ सिर्फ़ संग होना ही नही .

ये जान लेना है कि
दूसरे का पूरा मन टटोल लेने के बाद मुट्ठी में जो आएगा
उस शून्य में
कितना अस्तित्व बचा होगा
जो खिलखिलाते उत्सव में बदल जाएगा ।

चिड़िया 

महत्वाकाँक्षाओं की चिड़िया
औरत की मुण्डेर पर आ बैठी है
दम साध शिकारी ने तान ली है बन्दूक
निशाने पर है चिड़िया
अगर निशाना चूक गया
तो औरत मरेगी !

कुट्टी

मैंने
टाँग के नीचे से हाथ निकाल
कुट्टी की थी पक्की वाली
अब
अगर पूरा का पूरा
अँगूठा मुँह में डाल घुमा कर कहूँ
अब्बा
तो क्या पहले की तरह मिलोगे ?

ऊब के नीले पहाड़

कितना कुछ है मेरे और तुम्हारे बीच इस ऊब के अलावा
यह ठीक है तुम्हारे छूने से अब मुझे कोई सिहरन नही होती
और एक पलंग पर साथ लेटे हुए भी हम अक्सर एक दूसरे के साथ नही होते
मै चाहती हूँ कि तुम चले जाया करो अपने लम्बे-लम्बे टूरों पर
तुम्हारा जाना मुझे मेरे और क़रीब ले आता है
तुम्हारे लौटने पर मैंने सँवरना भी छोड़ दिया है
तुम्हारी निग़ाहों से नही देखती अब मै ख़द को
यह कितनी अजीब बात है कि ये धीरे-धीरे मरता हुआ रिश्ता
कब पूरी तरह मर जाएगा इसका अहसास भी नही होगा हमें
लेकिन फिर भी
तुम्हारी अनुपस्थिति में जब किसी की बीमारी की ख़बर आती है
तो मुझे तुम्हारे सुन्न पड़ते पैरों की चिंता होने लगती है

कोई नया पल जब मेरी ज़िन्दगी में प्रस्फुटित होता है
तो बहुत दूर से ही पुकार के मै तुम्हे बताना चाहती हूँ
कि आज कुछ ऐसा हुआ है कि मुझे तुम्हारा यहाँ न होना खल रहा है
कि तुम ही हो जिससे बात करते वक़्त मैं नही सोचती की यह बात मुझे कहनी चाहिए या नहीं.

और जब मुझे ज्वर हो आता है
तुम्हारा हर मिनट फ़ोन की घण्टी बजाना और मेरा हाल पूछना
शायद वह ज्वर तुम्हारा ध्यान खींचने का बहाना ही होता था शुरू में
लेकिन अब
इसकी मुझे आदत हो गई है
और मै ढूँढ़ ही नही पाती
वो दवा
जो तुम रात के दो बजे भी घर के किसी कोने से ढूँढ़ के ले आते हो मेरे लिए

और सिर्फ़ तुम ही जानते हो इस पूरी दुनिया में
कि सर्दियों में मेरे पैर सुबह तक ठण्डे ही रहते हैं
कि मुझे बहुत गर्म चाय ही बहुत पसन्द है
कि आइसक्रीम खाने के बाद मै ख़ुद को इतनी कैलरीज खाने के लिए कोसूँगी ज़रूर
कि तुम्हारे ड्राईविंग करते हुए फ़ोन करने से मैं कितना चिढ़ जाती हूँ
कि जब तुम कहते हो बस, अब मै मर रहा हूँ
तो मै रूआँसी नही होती
उल्टा कहती हूँ तुमसे
५० लाख का इंशोरेंस करवा लो ताकि मैं बाक़ी ज़िन्दगी आराम से गुज़ार सकूँ
और फिर कितना हँसते हैं हम दोनों
इस तरह मौत से भी नही डरता ये हमारा रिश्ता
तो फिर ऊब से क्या डरेगा ??

ये हमारे बीच का कम्फ़र्ट-लेवल है न
यह उस ऊब के बाद ही पैदा होता है
क्योंकि
किसी को बहुत समझ लेना भी जानलेवा होता है प्रिय
कितनी ही बाते हम इसलिए नही कर पाते कि हम जानते होते हैं
कि क्या कहोगे तुम इस बात पर
और कैसे पटकूँगी मैं बर्तन जो तुम्हारा बी० पी० बढ़ा देगा
और इस तरह
ख़ामोशी के पहाड़ों को नीला रंगते हुए ही दिन बीत जाता है.
और उस पहाड़ का नुकीला शिखर हमारी नज़रो की छुरियों से डरकर भुरभुराता रहता है

और जब तुम नही होते शहर में
मैं कभी सुबह की चाय नही पीती
और अख़बार भी यूँ ही तह लगा पड़ा रहता है
खाना भी एक समय ही बनाती हूँ
और
और वह नीला रंगा पहाड़ धूसरित रंग में बदल जाता है
फ़ोन पर चित्र नही दिखते इसलिए जब शब्द आवश्यक हो जाते हैं
और तुम
पूछते हो क्या कर रही हो
मैं कहती हूँ
बॉय-फ्रेंड की हंटिंग के लिए जा रही हूँ
और
तुम शुभकामनाएँ देते हो
और कहते हो की इस बार कोई अमीर आदमी ही ढूँढना

ये डार्क ह्यूमर हमारे रिश्ते को कितनी शिद्दत से बचाए रखता है
और इस ऊब में उबल-उबल कर कितना गाढ़ा हो गया है यह हमारा रिश्ता

विगत

वह एक वीरान सड़क थी
उसमे विगत की हँसी के कुछ पद-चिन्ह थे
वह निकली थी घर से
गुम हो जाने के लिए

उसके पास एक झोला था
जिसमें एक ख़ुदकुशी किया हुआ समंदर था
वह उसे बहुत आत्मीय था
वह दर्द को सम्हाल कर रख सकती थी
और रोयेंदार घास की तरह बिछा कर अपनी ज़िन्दगी को मुलायम कर लेती थी

उसने चुनी थी कसक
हालांकि प्रेम उसे उपलब्ध था क्योंकि वह सुन्दर थी
लेकिन उसने चुनी थी कसक और प्रतीक्षा
ताकि वह ख़ुद से प्रेम कर सके
और चुना एक अजनबी शहर
जहाँ सब लोग निर्वासित कर दिए गए थे
और पेड़ों का मेला लगा था

और यहाँ वह कुछ दिन सुकून से जी सकती थी
यहाँ उसे कोई नहीं जानता
कोई यह भी नहीं जानता कि सिजोफ़्रेनिक है वह

और उसके साथ क्या हुआ था
जब उसका बच्चा रोता है तो पता है उसे
कि उसे दूध पिलाना है ।

मैं सहमत नहीं थी..

नदी की लहरो !
मैं नहीं बन पाई मात्र एक लहर
नहीं तिरोहित किया मैंने अपना अस्तित्व नदी में
तुम्हारे जैसा पाणिग्रहण नहीं निभा पाई मैं
इसलिए क्षमा माँगनी है तुमसे ।

वृक्षो ! तुमसे नहीं सीख पाई दाता का जीवन
तुम्हारे फल, छाया और पराग देने के पाठ नहीं उतार पाई जीवन में
मेरी आशाओं के भीगे पटल पर धूमिल पड़ते तुम्हारे सबकों से क्षमा माँगनी है मुझे ।

सूरज को पस्त करके लौटी गुलाबी शामो !
तुम्हें गुमराह करके
अपने डर के काले लबादों में ढक कर तुम्हें काली रातों में बदलने के ज़ुर्म में
क्षमा माँगनी है तुमसे ।

क्षमा माँगनी है कविता के उन ख़ामोश अंतरालों से
जो शब्दों के आधिपत्य में खो गए
उन चुप्पियों से
जो इतिहास के नेपथ्य में खड़ी रहीं बिना दखलंदाज़ी के
उन यायावरी असफलताओं से जिन्होंने समझौते की ज़मीनों पर नहीं बनाए घर ।

उस बेबाक लड़की से क्षमा माँगनी है मुझे जो मुस्कुराते हुए चलती है सड़क पर
जो बेख़ौफ़ उस लड़के की पीठ को राइटिंग पैड बना काग़ज़ रख कर लिख रही है शायद कोई एप्लीकेशन
जो बस में खो गई है अपने प्रेमी की आँखों में
जिसने उँगलियाँ फँसा ली है लड़के की उँगलियों में
ऐसी लड़कियों के साहस से क्षमा माँगनी है मुझे ।

जिनकी निष्ठा बौनी पड़ती रही नैतिकता के सामने
जो आधी औरतें आधी किला बन कर जीती रहीं तमाम उम्र
जिन्हें अर्धांगिनी स्वीकार नहीं कर पाए हम
जिनके पुरुष नहीं बजा पाए उनके नाम की डुगडुगी
उन दूसरी औरतो से क्षमा माँगनी है मुझे ।

मुझे क्षमा माँगनी है
आकाश में उड़ती कतारों के अलग पड़े पंछी से
आकाश का एक कोना उससे छीनने के लिए
उस पर अपना नाम लिखने के लिए
उसके दुःख में अपनी सूखी आँखों के निष्ठुर चरित्र के लिए ।

रौंदे गए अपने ही टुकड़ों से
अनुपयोगी हो चुके रद्दी में बिके सामान से,
छूटे और छोड़े हुए रिश्तों से अपने स्वार्थ के लिए क्षमा माँगनी है मुझे ।

नहीं बन पाई सिर्फ़ एक भार्या, जाया और सिर्फ़ एक प्रेयसी
नहीं कर पाई जीवन में बस एक बार प्यार
इसलिए क्षमा माँगनी है मुझे तुमसे
तुम्हारी मर्यादाओं का तिरस्कार करने के लिए .
घर की देहरी छोड़ते वक़्त तुम्हारी आँखों की घृणा को अनदेखा करने के लिए
तुम्हारे मौन को मौन समझने की भूल करने के लिए
मुझे क्षमा माँगनी है तुमसे !

क्षणिका

एयर-कन्डीशनर की
थोड़ी-सी हवा चुरा के रख दी है
मैंने
तुम्हारी पसंदीदा क़िताबों में

जब
ज्येष्ठ की दुपहरी में
बत्ती गुल हो जाएगी
और
झल्ला कर खोलोगे
तुम क़िताब

तो तुम्हे ठंडी हवा आएगी

आफ़्रा ! तुम्हें शर्म नहीं आती, तुम अकेली रहती हो

आफ़्रा को खींच लाने के सड़क के सारे प्रलोभन जब समाप्त हो गए
तो वह सड़क जो आहटों के लिए एक कान में तब्दील हो चुकी थी
अचानक उठकर आफ़्रा की देहरी पर आ गई है
और द्वार पर दस्तक दे कर पूछती है
क्या तुम्हें किसी की प्रतीक्षा है
नहीं
क्या तुम कहीं जाना चाहती हो
नहीं
क्या कोई आने वाला है
नहीं

आफ़्रा कहती है नहीं
और वह आँखें बन कर चिपक जाती है उसके घर की दीवारों पर
उन पर्दों के बीच लटक जाती है उसकी पगडंडियाँ
जो आफ़्रा की दुनिया को दो भागों में विभाजित करते थे ।

उसकी हैरान दृष्टि भेदती है
आफ़्रा के विचारो के कहीं ध्वस्त तो कही मस्त गाँव को
उसके अवशेषों में ढूँढ़ती है कहानियाँ और मस्ती में अश्लीलता
एक श्रृँखला में पिरोए हुए अलग-अलग सालों से टूट कर गिरे कुछ प्रचंड,
कुछ ख़ामोश लम्हे
वह बटन जो सूरज को बुझा देता है उसकी मर्ज़ी से
और वह अँधेरा जिसे वह घर की सब बाल्टियों, भगौनों और कटोरियों में इकठा करके रखती है

आगन्तुक के आने पर सबके छिपने की जगह नीयत है
लेकिन कोई नहीं भागता
और ढीठपने के साथ देखते है सड़क को घर का सामान बनते हुए ।

सब कुछ अचानक निर्वस्त्र हो गया है ।
और
आफ़्रा सोचती है इन खौलती आँखों से परे अपनी निष्ठा को कहाँ छिपाए

एक प्रतिक्रियाविहीन दाल और रोटी वह अपने इस अनचाहे अतिथि को परोसती है
तभी सड़क उससे पूछती है-
तुम क्यों जीती हो ?

आफ़्रा अचकचाकर कहती है-
सब जीते हैं, क्योंकि जीना पड़ता है
तुम गीत क्यों गाती हो ?
मुझे अच्छा लगता है
तुम्हे पता है तुम्हारे गुनगुनाने की आवाज़ बाहर तक सुनाई पड़ती है ?
आफ़्रा चुप

और तुम लड़की हो
अँधेरे मापती और अकेले गीत गाती लड़की कोई पसंद नहीं करता
कपड़े देखे हैं तुमने अपने

जानती हो लोग तुम्हारे बारे में क्या कहते है कि तुम. ..

इससे पहले कि वह बात पूरी करे आफ़्रा फट पड़ती है
बताती है उसे कि क्या कहते हैं लोग सड़क के बारे में ..

कि सड़क! तुम निम्फ हो और लाखों राहगीर गुज़रे है तुम्हारी राहों से
फिर भी तुम्हे न जाने कितने मुसाफ़िरों का इंतज़ार है.
क्या तुम थोड़ी और दाल लोगी ?

और आफ़्रा कटोरी से अँधेरा उलट कर दाल
और गिलास में भरी मस्ती बहा कर जल प्रस्तुत करती है
और तुम्हारी तो कोई मंज़िल भी नहीं है तो फिर क्यों बिछी रहती हो सड़क
किसके इंतज़ार में ?

वो कमबख्त ढीठ लम्हे, जो तिल-तिल जलने के आदी हो चुके हैं, ठठा कर हँसते हैं
और आफ़्रा को मुबारकबाद देते है
अकेले शहर में रहने वाली लड़की की भाषा को सीखने का जश्न मनाते हैं
सड़क भी आमंत्रित है
लेकिन सड़क लौट जाती है लगभग भागते हुए !

और रद्दी की टोकरी आफ़्रा पहली बार
देहरी के बाहर रख देती है
जिसमे ढेरो चरित्र-सर्टिफिकेट हैं जो उड़ कर आ गए थे उसी सड़क के रास्ते
और जिनका मूल्य है मात्र ५ रूपये किलो ।

यू०पी०एस०सी० के बस-स्टॉप पर बैठी एक लड़की

यू०पी०एस०सी० के बस-स्टॉप पर बैठी एक लड़की
मानो जड़ हो गई है
कोई बस नहीं पकड़ी उसने पिछले तीन घंटे से

या तीन शताब्दियों से
पढ़ने की कोई कोशिश भी नहीं की किसी बस का नम्बर
बस सोचे चली जा रही है
अनंत विस्तार वाली किसी सड़क पर निकल गई है उसकी चेतना
अफ़्रीका के घने जंगलों में शायद खो गई हैं उसकी स्मृतियाँ

कितने ही लोगों की जलती निगाहे उसकी ग्लेशियर बनी दृष्टि से टकरा कर वाष्पीकृत हो गई हैं

हर कोई बस में चढ़ने से पहले पूछना चाहता है उससे
माजरा क्या है
क्यों बैठी हो ऐसे
क्या किसी परीक्षा का परिणाम आ गया है

डर रही हो घर जाने से
पर नहीं
इस उम्र में असफलताएँ नहीं बदलती किसी को बुत में ।

तो क्या वह प्रतीक्षा कर रही है किसी की
क्योंकि एक सन्नाटा उसकी पेशानी पर बैठा हाँफ रहा है
या विदा कह दिया है किसी ने उसको या उसने किसी को

क्योंकि उसकी आँखों के भूगोल में पैबस्त है एक उम्मीद
किसी के लौट आने की
या किसी तक लौट जाने की
उसके हाथ में है एक ख़ामोश मोबाइल
उसमे शायद किसी का संदेसा है जिसने उसके लम्हों को सदियों में बदल दिया है ।

क्योंकि उसकी उँगलियों में बची है अभी तक ऊर्जा
जो धीमे-धीमे सहला रही है मोबाइल की स्क्रीन को
मानो उस दो इंच क्षेत्रफल में ही वह भूल-भुलैय्या दफ़न है
जिसमे कोई खो गया है
और साथ ही वह भी खो गई है उसे ढूँढ़ते हुए…

क्या सोच रही है वह
कोई नहीं जानता
उसकी सोच किले की दीवारों की तरह आकाश तक पसरी है
वह है कि सोचे चली जा रही है

बिना मुस्कुराए
बिना रोए
बेख़बर
बस, सोचे ही चली जा रही है

मैं व्यस्त हूँ 

दिनचर्या के कई इतिहास रचती हूँ मैं
खाना पकाती,
रोटी फुलाती, परचून से सौदा लाती,
बस में दफ़्तर जाती
क्या तुम जानते हो
ठीक उसी समय
फूल कर कुप्पा हुई एक रोटी रतजगा करती है प्रतीक्षा में
बासी होने तक

घर का बुहारा हुआ सबसे सफ़ेदपोश कोना
वसंत के रंग बसाता है पतझड़ आने तक,

वह बस, जिसमे मै अकेली हूँ
और तुम्हे अपने मानस-पटल से निकाल कर बैठा लिया है मैंने बगल वाली सीट पर,
उसी बस में भूल आई हूँ मैं तुम्हें
और मुझे नहीं मालूम कि उस बस का आख़िरी स्टॉप कौनसा है ।

ठीक उसी समय
कल्पनाओं से बेदख़ल हुए वीतरागी पतझड़ के सूखे हुए पत्ते,
दूर तक उड़ते हुए उस बस का पीछा करते है,

विचित्रताओं से भरी हुई इस दुनिया में
जब तुम्हारी खिड़की पर पौ फटती है
और तुम सुबह की पहली चाय पीते हो
तो अख़बार की कोई ख़बर पढ़ कर तुम्हे ऐसा लगता है की इस दुनिया में सब कुछ संभव है
कि
अचानक किसी मोड़ पर तुम मुझसे टकरा भी सकते हो
क्या तुम ज़ोर से रिहर्सल करते हो
अपने प्रश्न की
कैसी हो तुम ?

क्या तुम जानते हो
एक अरसे से बंदी हो तुम मेरे मन में
और साँस लेने के लिए भी तुम्हे मेरी इजाज़त लेनी पड़ती है
और जब कभी
मुझे लगता है कि
तुम इस घुटन में कहीं मर तो नहीं गए
तो मै घबरा कर अचकचा के उठती हूँ
तब मेरे बच्चे मुझे कितनी हैरत से देखते हैं ।

अपने व्यस्ततम क्षणों में
जब मै दिनचर्या के कई इतिहास रचती हूँ
कपड़े धोती हूँ
इस्त्री करती हूँ
बच्चों को स्कूल छोड़ने जाती हूँ
और वह सब उपक्रम करती हूँ
जो हम तब करते हैं
जब करने को कुछ नहीं होता
तब आकाश का चितेरा पूरी मशक्कत करता है
कि
महाशून्य में डोलती यह धरती
कहीं सरक न जाए उसके आगोश से ।

प्यार में धोखा खाई लड़की

प्यार में धोखा खाई किसी भी लड़की की
एक ही उम्र होती है,
उलटे पाँव चलने की उम्र !!
वह
दर्द को
उन के गोले की तरह लपेटती है,
और उससे एक ऐसा स्वेटर बुनना चाहती है
जिससे
धोखे की सिहरन को
रोका जा सके मन तक पहुँचने से !!

शुरू में
वह
धोखे को धोखा
दर्द को दर्द
और
दुनिया को दुनिया
मानने से इनकार करती है
वह मुस्कुराती है

देर तक
उसका विश्वास अटूट रहता है
और उसे लगता है
कि
सरहद के पार खड़े उस बर्फ़ के पहाड़ को
वह अपनी उँगलियों
सिर्फ अपनी उँगलियों की गर्मी से
पिघला सकती है

फिर
टूटता है विश्वास,
दुनिया
टूटती है
लड़की
दिन दिन नहीं रहते,
राते रातें नहीं!

वह
रात के दो बजे नहाती है
और खड़ी रहती है
बालकनी में सुबह होने तक,
किसी को कुछ पता नहीं लगता
सिवाय उस ग्वाले के
जो रोज़ सुबह चार बजे अपनी साइकिल पर निकलता है !

उसका
दृश्य से नाता टूटने लगता है
अब वह चीज़ें देखती है पर कुछ नहीं देखती
शब्द भाषा नहीं ध्वनि मात्र हैं
अब वह चीज़े सुनती है पर कुछ नहीं सुनती
करती है पर कुछ नहीं करती,
वह गूंगी-बहरी-अंधी लड़की,
होने अनहोने से परे
धोखे से भागती नहीं….
धोखे को जीती है !
पर कोई नहीं जानता …
क्योंकि वह मुस्कुराती है

शायद ग्वाला जानता है
शायद रिक्शावाला जानता है
जिसकी रिक्शा में वह
बेमतलब घूमी थी पूरा दिन और कहीं नहीं गई थी
शायद माँ जानती है
कि उसके पास एक गाँठ है
जिसमें धोखा बँधा रखा है

प्यार में धोखा खाई लड़की
शीशा नहीं देखती
सपने भी नहीं
वह डरती है शीशे में दिखने वाली लड़की से
और सपनो में दिखने वाले लड़के से,
उसे दोनों की मुस्कराहट से नफ़रत है

वह नफ़रत करती है
अपने भविष्य से
उन सब आम बातों से
जो
किसी एक के साथ बाँटने से विशेष हो जाती हैं ।

प्यार में धोखा खाई लड़की का भविष्य
होता भी क्या है
अतीत के थैले में पड़ा एक खोटा सिक्का
जिसे
वह
अपनी मर्ज़ी से नहीं
बल्कि वहाँ ख़र्च करती है
जहाँ वह चल जाए ।

वो जो सीता ने नहीं कहा

मैं ये जानती हूँ
मेरे राजा राम
कि
सत्ता और प्रभुता का विष
बहुत मीठा है
जहाँ
ज़िन्दगी की बिछी बिसात पर
तुमने
स्वयं अपने ही मोहरे को पीटा है

और
यह भी जानती हूँ
कि त्याग का दुख
त्यागे जाने की पीड़ा से बहुत बड़ा है
तभी तो
अपने मन के निन्यानवे हिस्सों की आहुति
तुम्हारे कर्त्तव्य के अग्निकुंड में दे दी मैंने ।

मेरे मन के सुकोमल हिस्सों पर खड़ी
इस अडिग अयोध्या में
तुम्हारी मर्यादा तो रह गई मेरे राजा राम
किन्तु
मेरे मन का सौवाँ हिस्सा आज तुमसे यह पूछता है
कि
अधिकार क्या केवल उन्हें मिलते हैं
जिन्हें
छीनना आता है ।

मेरे मन के निन्यानवे हिस्सों को
तुम्हारे दुख में
सहज होकर जीना आता था
किन्तु
मेरे मन का
यह ज़िद्दी, हठी, अबोध सौवाँ हिस्सा
आज
अधिकार से,
मनुहार से,
प्यार से तुमसे यह पूछता है
कि
राजा के इस अभेद्य कवच के भीतर
तुम्हारा एक अपना
नितांत अपना मन भी तो होगा ?

तुम्हारे
उसी मन के भीतर पलने वाला
अपराध-बोध
यदि
एक दिन इतना बड़ा हो जाए
कि
तुम
राज्य, धर्म, और मर्यादा की सब परिभाषाएँ
और अर्थ भूलकर एक दिन मेरे पास मेरी तपोभूमि में
लौट आना चाहो
तो
क्या तुम सिर्फ़ इसलिए नहीं आओगे
कि तुम मुझसे आँख मिलाने का साहस नहीं रखते ?

हर बार
तुम
मेरे प्रति तुम इतने निष्ठुर क्यों हो जाते हो राम !!!

तुम्हार कुल !
तुम्हारी मर्यादा !! और अब
तुम्हारा ही अपराधबोध !!!

तुम्हारा यह स्वार्थ
तुम्हारे पुरुष होने का परिणाम है
या
मेरे स्त्री होने का दंड ??

मैं
यह कभी जान नहीं पाई
इसलिए
आज मेरे मन का यह सौवाँ हिस्सा तुमसे यह पूछता है ।

माँ 

जब मैं
सुई में धागा नहीं डाल पाती
तुम्हारी उँगलियों में चुभी सुइयों का दर्द बींध देता है सीना
जब दीवार पर सीलन उतर आती है
तुम्हारी सब चिंताएँ
मेरी आँखों की नमी में उतर आती हैं माँ ।

जब मेरी बेटी पलटकर उत्तर देती है
ख़ुद से शर्मिंदा हो जाती हूँ मैं I
और
समझ जाती हूँ
कैसा महसूस किया होगा तुमने माँ ।

शाम को चाहती हूँ
हर रोज़ करूँ
गायत्री-मन्त्र का पाठ
और विराम लूँ रुक कर उस जगह
जहाँ रुक कर तुम साँस लेती थीं
कई संकेत,
तुम्हारी कई भंगिमाएँ,
तुम्हारा पर्याय बन जाते हैं माँ –
कई बार जब शाम को बत्ती जलाती हूँ
और प्रणाम करती हूँ उजाले को
तो मुझे लगता है वो मै नहीं, तुम हो माँ ।

मै अपना एक स्पर्श तुम तक पहुँचाना चाहती हूँ ।
अँधेरे में रात को कई बार उठती हूँ
तो सोचती हूँ
माँ से साक्षात्कार हो पाता
बस एक बार
पूछ सकती- कैसी हो माँ ?
तुम नहीं आती
उत्तर चला आता है
“मै ठीक हूँ बेटी अपना ध्यान रखना” ।

आँखे मूँद लेती हूँ
और देखती हूँ उस प्रक्रिया को
जो
मुझे तुम में रूपांतरित कर रही है ।

और तुम्हारे न रहने पर
मै सोचने लगी हूँ तुम बन के
मै बदल रही हूँ तुममे माँ ।
सिर्फ़ स्मृति में नहीं माँ
जीवित हो तुम
मेरे हाव-भाव में
मेरी सोच में
मुझ में ।

ऐसी ख़ुशियों की जब बारात सजी

उस दिन ख़ुशी के मारे
चाँद भी रास्ता भटक गया
और
चाँदनी इठलाते हुए उतर आई
उस आँगन में
जहाँ बरगद ने सौ बरस तपस्या की थी I
कोई आने वाला था…. I

बरगद ख़ुश था उसके हर पत्ते ने दुआ में हाथ उठाए
ख़ूब आशीर्वाद बरसाए
घर के सभी चमकदार बर्तन ख़ुश थे
कोई आने वाला था….I
फिर से मँजेंगे ,
कमरे ख़ुश थे – फिर सँवरेंगे ।
मुंडेरे ख़ुश थीं – ख़ूब सजेंगी
पानी ख़ुश था- कोई पीएगा, नहाएगा
हवा ख़ुश थी- कभी ज़ोर से तो कभी धीरे से बहेगी
दिन, मिनट, घंटे ख़ुश थे – खालीपन ख़त्म हुआ
डिब्बो में रखी दालें, आटा और चावल ख़ुश थे-
नए पकवान पकेंगे
चींटियाँ ख़ुश थीं- ख़ूब खाना बिखरेगा

ऐसी ख़ुशियों की जब बारात सजी
एक सफ़ेद रुई का गोला मेरी गोद में आ गिरा
उस रुई के गोले की दो काली-काली आँखें खुली
और उन्होंने मुझसे पूछा-
“माँ, तुम ख़ुश हो ।”

और
मैंने जाना कि
ख़ुशी क्या होती है ।

मैंने अभी उसे ठीक से प्यार भी नहीं किया
दुलार भी नहीं किया
नज़र का टीका भी नहीं किया
कि
वह सफ़ेद ख़रगोश की तरह
कुलाँचे भरती, भाग गई
छोटा सा बस्ता उठाए, स्कूल ।

उसके लौटने तक एक उम्र बीत गयी
और मैंने जाना
इंतज़ार क्या होता है ।

लड़कियाँ

लड़कियाँ जवान होते ही
खुलने लगती हैं
खिड़कियों की तरह
बाँट दी जाती हैं हिस्सों में
आँखें, मन, ज़ुबानें , देहें , आत्माएँ !

इनकी देहें
बहियों-सी घूमती हैं घर
दर्ज़ करती
दवा, दूध,
बजट और बिस्तर का हिसाब I

इनकी आत्माएँ
तहाकर रख दी जाती हैं
संदूकों में
उत्सव पर पहनाने वाले कपड़ों की तरह I

इनके मन
ऊँचे-ऊँचे पर्वत,
जिस पर
बैठा रहता है,
कोई धुँधलाया हुआ पुरुष
तीखे रंगों वाला झंडा लिए I

इनकी आँखें
बहुत जल्द
कर लेती हैं दृश्यों से समझौता,
देखती हैं
बस उतना
जितना
देखने की इन्हें इजाज़त होती I
पूरी हिफ़ाज़त से रखती हैं
वो सपने
जिनमे दिखने वाले चेहरे
इनकी कोख से जन्मे बच्चों से बिलकुल नहीं मिलते I

इनकी ज़ुबाने
सीख लेती हैं –
मौन की भाषा,
कुल की मर्यादा,
ख़ुशी में रो देने
और
ग़म में मुस्कराने की भाषा,
नहीं पुकारती ये –
वो लफ्ज़,
वो शब्द,
वो नाम
जिनके मायने उन रिश्तों से जुड़ते हैं
जो इनके कोई नहीं लगते

इनकी तक़दीरें
नहीं चुनती रास्ते,
चल पड़ती हैं दूसरों के चुने रास्तों पर,
बुन लेती हैं रिश्ते
चुने हुए रास्तो की छाया से,
कुएँ से,
दूसरों के चुने हुए ठीयों से ,
इनकी तक़दीरे मान जाती हैं-
नहीं ढूँढ़ेंगी
उन मंज़िलों को
जो इनकी अपनी थी I
और
जिन्हें ये उन रास्तों पर छोड़ आई हैं
जो
इनकी नियति के नहीं स्वीकृति के रास्ते थे I

इनकी ज़िंदगियाँ –
ख़र्च करती हैं दिन, घंटे और साल
दूसरों के लिए,
बचा लेती हैं,
बस कुछ पल अपने लिए I
इन्हीं कुछ पलों में
खुलती हैं खिडकियों-सी
हवा धूप, रौशनी के लिए I
और टाँग दी जाती हैं
घर के बाहर नेमप्लेट बनाकर I

इनके वजूद निर्माण करते हैं
आधी दुनिया का
ये –
बनाती हैं
भाई को भाई ,
पिता को पिता,
और
पति को पति,
और रह जाती है सिर्फ़ देहें , आत्माएँ, जुबानें, और आँखे बनकर I
ये
जलती हैं अँगीठियों-सी,
और तनी रहती है
गाढ़े धुएँ की तरह
दोनों घरों के बीच मुस्कुरा कर I
इनके वजूद
होते हैं
वो सवाल
जिनके जवाब उस आधी दुनिया के पास नहीं होते I

ये –
तमाम उम्र समझौते करती हैं
पर मौत से मनवा के छोडती हैं अपनी शर्ते
ये अपने सपने, मंज़िलें, रिश्ते
सब साथ लेकर चलती हैं
इनकी क़ब्र में दफ़न रहते हैं
वो सपने,
वो नाम
वो मंज़िलें
जिन्हें इनकी आँखों ने देखा नहीं
ज़ुबाँ ने पुकारा नहीं
देह ने महसूसा नहीं
ये अपने पूरे वजूद के साथ मरती हैं !

चाँद पर निर्वासन

मोहनजोदड़ो के सार्वजानिक स्नानागार में एक स्त्री स्नान कर रही है
प्रसव के बाद का प्रथम स्नान
सीढ़ियों पर बैठ कर देख रहे हैं ईसा, मुहम्मद, कृष्ण, मूसा और ३३ करोड़ देवी देवता
उसका चेहरा दुर्गा से मिलता है
कोख मरियम से
उसके चेहरे का नूर जिब्राइल जैसा है
उसने जन्म दिया है एक बच्चे को
जिसका चेहरा एडम जैसा, आँखे आदम जैसी, और हाथ मनु जैसे हैं
यह तुम्हारा पुनर्जन्म है हुसैन
तुम आँखों में अनगिनत रंग लिए उतरे हो इस धरती पर
इस बार निर्वासित कर दिए जाने के लिए
चाँद पर

तुम वहाँ जी लोगे
क्योंकि रंग ही तो तुम्हारी आक्सीजन है
और तुम अपने रंगों का निर्माण ख़ुद कर सकते हो
वहाँ बैठे तुम कैसे भी चित्र बना सकते हो

वहाँ की बर्फ़ के नीचे दबे हैं अभी देश काल और धर्म

रस्सी का एक सिरा ईश्वर के हाथ में है हुसैन
और दूसरा धरती पर गिरता है
अभी चाँद ईश्वर कि पहुँच से मुक्त है
और अभी तक धर्मनिरपेक्ष है

वह ढीठौला
ईद में शामिल, दीवाली में नदारद
वह मनचला करवा चौथ पर उतरता है हर स्त्री इंतज़ार में
सुंदरियों पर उसकी आसक्ति तुम्हारी ईर्ष्या का कारण न बन जाए कहीं …

हुसैन
चाँद पर बैठी बुढ़िया ने इतना कपड़ा कात दिया है
कि कबीर जुलाहा
बनाएगा उससे कपड़ा तुम्हारे कैनवास के लिए
और धरती की इस दीर्घा से हम देखेंगे तुम्हारा सबसे शानदार चित्र
और तुम तो जानते हो चाँद को देखना सिर्फ़ हमारी मज़बूरी नही चाहत भी है

तुम्हारा चाँद पर निर्वासन
शुभ हो !
मंगल हो !

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