वंदना केंगरानी की रचनाएँ

प्यार पर बहुत हो चुकी कविताएँ 

प्यार पर बहुत हो चुकी कविताएँ
पिता की फटी बिवाइयों पर
अभी तक नहीं लिखी कविताएँ
जो रिश्ता ढूँढ़ते-ढूँढ़ते टूटने पर कसकते हैं

नहीं पढ़ी गई कविताएँ
बेटी के चेहरों की रेखाओं पर
जो- उभर आती है अपने आप असमय ही

मुझे लगता है
अब इन रेखाओं की गहराइयों पर कविताएँ लिखूँ
प्यार पर बहुत हो चुकी कविताएँ !

महाकाव्य

मैं महाकाव्य लिख रही हूँ
सैंडिल पर पालिश करते हुए
नहाते हुए
बस पकड़ते हुए
बॉस की डाँट खाते हुए
रोज़ शाम दिन—भर की थकान
मिटाने का बेवजह उपक्रम करते
चाय पीते
तुम्हें याद करते हुए
महाकाव्य लिख रही हूँ !

साम्य

घर में
औरत होने का मतलब होता है
गर्म-गर्म सोंधी रोटी

औरत और रोटी की सुगंध में
कितना साम्य होता है
पहली बार जाना !

इन दिनों

वह समय और था
जब लोग प्यार में
जान हार जाया करते थे

ससी-पुन्नु, हीर-राँझा
सोहनी-महिवाल, लैला-मजनूँ
कोई और थे
जो चले गए अपने समय के साथ

यह नई सदी है
दस्तूर नए हैं
यहाँ प्यार
मतलब हँसना
मस्ती करना और भूल जाना
अभी किससे मिले थे

ज़िंदगी
कितनी कारोबारी हो गई है इन दिनों !

विश्वास 

मुझे मालूम है
तुम उल्लू बना रहे हो मुझे

उल्लू बनने में
एक फ़ायदा है
विश्वास बचा रहता है

मैं भी
इस समय
विश्वास बचाने की कोशिश में लगी हुई हूँ
क्या ग़लत कर रही हूँ !

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