वंदना गुप्ता की रचनाएँ

क्योंकि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते 

अब सिर्फ
लिखने के लिए
नहीं लिखना चाहती
थक चुकी हूँ
वो ही शब्दों के उलटफेर से
भावनाओं के टकराव से
मनोभावों का क्या है
रोज बदलते हैं
और एक नयी
परिभाषा गठित करते हैं
मगर लगता है
सब निरर्थक, रसहीन, उद्देश्यहीन-सा
कोई कीड़ा रेंग रहा है
अंतस में चिकोटी भर रहा है
जो चाह रहा है
अपनी परिधि से बाहर आना
निकलना चाहता है
नाली के व्यास से बाहर
बनाना चाहता है
एक अलग मकां अपना
जिसमे
सिर्फ शब्दों के अलंकार ना हों
जिसमे सिर्फ़
एकरसता ना हो
जिसमे हो एक नया उद्घोष
जिसमे हो एक नया सूर्योदय
अपने प्रभामंडल के साथ
अपनी आभा बिखेरता
और अपने लिए खुद
अपनी धरती चुनता हुआ
जिस पर रख सकूँ मैं अपने पैर
नहीं हो जिसकी जमीन पर कोई फिसलन
हो तो बस एक
आकाश से भी विस्तृत
मेरा अपना आकाश
जिसके हर सफे पर लिखी इबारत मील का पत्थर बन जाये
और मेरी धरा का रंग गुलाबी हो जाये

कोई तो कारण होगा
खामोश मर्तबान में मची इस उथल पुथल का
ज़रूरी तो नहीं अचार खट्टा ही बने
शायद
अब वक्त आ गया है देग बदलने का…
यूँ तो धमनियों में लहू बहता ही रहेगा
और जीवन भी चलता रहेगा
मगर
अन्दर बैठी सत्ता ने बगावत कर दी है
क्योंकि तख्ता पलट यूँ ही नहीं हुआ करते…

ये मौन के ज्वालामुखी किस टंकार के इंतज़ार में हैं

छिज रही हूँ अन्दर ही अन्दर
कोई चीरे और बताये
कुछ बचा भी है या भुरभुरा चुकी है
अस्थि, मॉस-मज्जा के साथ
जज़्बात, संवेदनाएँ, अहसास के साथ… रूह भी

देखो न फर्क ही नहीं पड़ रहा
चारों तरफ शोर है
संवेदनाएँ हैं, जज़्बात हैं, आन्दोलन हैं
हक़ की लड़ाई है
और एक मैं हूँ
जिस पर असर ही नहीं हो रहा
फिर चाहे बच्ची से बलात्कार हुआ हो
या नारी की अस्मिता का सवाल हो
या सरबजीत मर गया हो
या न्याय के नाम पर अन्याय का आन्दोलन हो
या देश हाहाकार कर रहा हो
मेरा अन्तस्थ सूखे ठूंठ-सा मौन खड़ा है

शायद जान गयी हूँ
कुछ नहीं होने वाला
कुछ नहीं बदलने वाला
क्योंकि
ये तस्वीर तो रोज का सच है
जिसे रोज अख़बार के पन्ने-सा पलटते हैं हम
और फिर अगली खबर के आने तक उसे भूल जाते हैं
कमजोर याददाश्त की कमजोर इंसान जो हूँ मैं
इसलिए मृत संवेदनाओं की लाश को ढोती मैं
जिंदा भी हूँ या नहीं… इसी पशोपेश में उलझी हूँ

तभी एक उद्घोषणा होती है:
फिर भी कुछ है
जो सुलग रहा है
मगर फ़ट नहीं रहा

बस तभी से इसी सोच में हूँ
ये मौन के ज्वालामुखी किस टंकार के इंतज़ार में हैं?

होती है ‘लाइफ़ आफ़्टर डैथ’ भी

सुना था
लाइफ़ आफ़्टर डैथ के बारे में
मगर आज रु-ब-रु हो गया… … … तुम्हारे जाने के बाद
ज़िन्दगी जैसे मज़ाक
और मौत जैसे उसकी खिलखिलाती आवाज़
गूँज रही है अब भी कानों में
भेद रही है परदों को
अट्टहास की प्रतिध्वनि
और मैं सोच में हूँ
क्या बदला ज़िन्दगी में मेरी
और तुम्हारी… जब तुम नहीं हो कहीं नहीं
फिर भी आस पास हो मेरे
मेरे ख्यालों में ख्याल बनकर
तब आया समझ इस वाक्य का अर्थ
होती है “लाइफ़ आफ़्टर डैथ” भी… … अगर कोई समझे तो!

लेखन के संक्रमण काल में

लेखन के संक्रमण काल में
मैं और मेरा लेखन
क्या चिरस्थायी रह पायेगा
क्या अपना वजूद बचा पायेगा
क्या एक इतिहास रच पायेगा
प्रश्नों के अथाह सागर में डूबता उतराता
कभी भंवर में तो कभी किनारे पर
कभी लक्ष्यहीन तो कभी मंज़िल की तरफ़
आगे बढता हिचकोले खाता
एक अजब कशमकश की
उथल पुथल में फ़ंसे मुसाफ़िर-सा
आकाश की ओर निहारता है
तो कभी अथाह जलराशि में
अपने निशाँ ढूँढता है
जबकि मुकाम की सरहद पर
खुद से ही जंग जारी है
नहीं… ये तो नहीं है वह देश
नहीं… ये तो नहीं है वह दरवेश
जहाँ सज़दा करने को सिर झुकाया था
और फिर आगे बढने लगती है नौका
ना जाने कहाँ है सीमा
कौन-सी है मंज़िल
अवरोधों के बीच डगमगाती कश्ती जूझती है
अपनी बनायी हर लक्ष्मणरेखा से
पार करते-करते
खुद से लडते-लडते
फिर भी नहीं पाती कोई आधार
सोच के किनारे पर खडी
देखती है
सागर में मछलियों की बाढ को
और सोचती है
क्या लेखन के संक्रमण काल से
खुद को बचाकर
रच पायेगी एक इतिहास
जिसके झरोखों पर कोई पर्दा नहीं होगा
कोई बदसलूकी का धब्बा नहीं होगा
जहाँ ना कोई रहीम ना कोई खुदा होगा
बस होगा तो सिर्फ़ और सिर्फ़
ऐतिहासिक दस्तावेज़ अपनी मौजूदगी का
मगर… क्या ये संभव होगा
संक्रमण काल में फ़ैलती संक्रामकता से खुद को बचाकर रखना?

भविष्य अनिश्चित है
और आशा की सूंई पर
चाहतों की कसीदाकारी पूरी ही हो… ज़रूरी तो नहीं
यूँ भी भरी सर्दी में
अलाव कितने जला लो
अन्दर की आग का होना ज़रूरी है… शीत के प्रकोप से बचने के लिये
तो क्या… यही है प्रासंगिकता
भीतरी और बाहरी खोल पर फ़ैली संक्रामकता की?

क्राँति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं 

जिसने भी लीक से हटकर लिखा
परम्पराओं मान्यताओं को तोडा
पहले तो उसका दोहन ही हुआ
हर पग पर वह तिरस्कृत ही हुआ
उसके दृष्टिकोण को ना कभी समझा गया
नहीं जानना चाहा क्यूँ वह ऐसा करता है
क्यूँ नहीं मानता वह किसी अनदेखे वजूद को
क्यूँ करता है वह विद्रोह
परम्पराओं का धार्मिक ग्रंथों का या सामाजिक मान्यताओं का

कौन-सा कीड़ा कुलबुला रहा है उसके ज़ेहन में
किस बिच्छू के दंश से वह पीड़ित है
कौन-सी सामाजिक कुरीति से वह त्रस्त है
किस आडम्बर ने उसका व्यक्तित्व बदला
किस ढोंग ने उसे प्रतिकार को विवश किया
यूँ ही कोई नहीं उठाता तलवार हाथ में
यूँ नहीं करता कोई वार किसी पर
यूँ ही नहीं चलती कलम किसी के विरोध में
यूँ ही प्रतिशोध नहीं सुलगता किसी भी ह्रदय में
ये समाज में रीतियों के नाम पर
होते ढकोसलों ने ही उसे बनाया विद्रोही
आखिर कब तक मूक दर्शक बन
भावनाओं का बलात्कार होने दे

आखिर कब तक नहीं वह खोखली वर्जनाओं को तोड़े
जिसे देखा नहीं, जिसे जाना नहीं
कैसे उसके अस्तित्व को स्वीकारे
और यदि स्वीकार भी ले
तो क्या ज़रूरी है जैसा कहा गया है वैसा मान भी ले
उसे अपने विवेक की तराजू पर ना तोले
कैसे रूढ़िवादी कुरीतियों के नाम पर
समाज को, उसके अंगों को होम होने दे
किसी को तो जागना होगा
किसी को तो विष पीना होगा
यूँ ही कोई शंकर नहीं बनता

किसी को तो कलम उठानी होगी
फिर चाहे वार तलवार से भी गहरा क्यूँ ना हो
समय की मांग बनना होगा
हर वर्जना को बदलना होगा
आज के परिवेश को समझना होगा
चाहे इसके लिए उसे
खुद को ही क्यूँ ना भस्मीभूत करना पड़े
क्यूँ ना विद्रोह की आग लगानी पड़े
क्यूँ ना एक बीज बोना पड़े
जन चेतना, जन जाग्रति का
ताकि आने वाली पीढियाँ ना
रूढ़ियों का शिकार बने

बेशक आज उसके शब्दों को
कोई ना समझे
बेशक आज ना उसे कोई मान मिले
क्यूँकि जानता है वो
जाने के बाद ही दुनिया याद करती है
और उसके लिखे के
अपने-अपने अर्थ गढ़ती है
नयी-नयी समीक्षाएँ होती हैं
नए दृष्टिकोण उभरते हैं
क्राँति के बीज यूँ ही नहीं पोषित होते हैं
मिटकर ही इतिहास बना करते हैं

अंकुरण की संभावना हर बीज में होती है

लगता है मुझे
कभी-कभी डरना चाहिये
क्योंकि डर में एक
गुंजाइश छुपी होती है
सारे पासे पलटने की…

डर का कीडा अपनी
कुलबुलाहट से
सारी दिशाओं में
देखने को मज़बूर कर देता है
फिर कोई भी पैंतरा
कोई भी चेतावनी
कोई भी सब्ज़बाग
सामने वाले का काम नहीं आता
क्योंकि
डर पैदा कर देता है
एक सजगता
एक विचार बोध
एक युक्तिपूर्ण तर्कसंगत दिशा
जो कभी-कभी
डर से आगे जीत है
का संदेश दे जाती है
हौसलों में परवाज़ भर जाती है

डर डर के जीना नही
बल्कि डर को हथियार बनाकर
तलवार बनाकर
सजगता की धार पर चलना ही
डर के प्रति आशंकित सोच को बदलता है
और एक नयी दिशा देता है
कि
एक अंश तक डर भी हौसलों को बुलन्दी देता है
क्योंकि
अंकुरण की संभावना हर बीज में होती है
बशर्ते उसका सही उपयोग हो
फिर चाहे डर रूपी रावण हो या डर से आँख मिलाते राम
जीत तो सिर्फ़ सत्य की होती है
और हर सत्य हर डर से परे होता है

क्योंकि
डर की परछाईं तले
तब सजगता से युक्तिपूर्ण दिशा में विचारबोध होता है
और रास्ता निर्बाध तय होता है…
अब डर को कौन कैसे प्रयोग करता है
ये तो प्रयोग करने वाले की क्षमता पर निर्भर करता है…

बच्चे तो बस हो जाते हैं

वो कहते हैं अब के बच्चों में
संवेदना नहीं पनपती
प्रेम प्यार के बीज ना पल्लवित होते हैं
बेहद प्रैक्टिकल होते जा रहे हैं
ना मान आदर सम्मान करते हैं
अब तो आँख की शर्म भी भूलते जा रहे हैं
आपस में यूँ लड़ते झगड़ते हैं
मानो खून के प्यासे हों
ना देश से प्यार ना समाज से और ना अपनों से
सिर्फ अपने लिए जिए जा रहे हैं
मान मर्यादाओं को भूले जा रहे हैं
मगर इसके कारण ना खोजे जा रहे हैं
क्यों आज की पीढ़ी में अभाव पाया जाता है
क्यों नहीं उनके चेहरों पर
मुस्कान का भाव पाया जाता है
क्यों नहीं मुख से आत्मीयता टपकती है
कारण खोजने होंगे
क्योंकि
ये सब पूर्व पीढ़ियों की ही तो देन है
गहन अध्ययन करना होगा
आत्मशोधन करना होगा

प्रेम का न कहीं कोई भाव होता है
सिर्फ स्त्री और पुरुष
दो प्राणियों से निर्मित
जग संचालित होता है
गर गौर करोगे तो पाओगे
प्रकृति के रहस्य भी जान जाओगे
प्रकृति का फूल खिला होता है
एक रूप रंग गुण से भरा होता है
क्योंकि वहाँ मोहब्बत का संचार होता है
जो दिया मोहब्बत से दिया
जो लिया मोहब्बत से लिया
तो क्यों न वहाँ मोहब्बत का संचार हुआ
उस रूप पर ज्ञानी, अज्ञान, कुटिल, खल, कामी सभी मोहित होते हैं
पर फिर भी न हम कोई सीख लेते हैं
सिर्फ आत्म संतुष्टि के लिए ही जीवन जीते हैं

स्त्री पुरुष दो भिन्न प्रकृति
तत्वतः जब एक होती हैं
तो सिर्फ़ रतिक्रीड़ा का ही आनंद लेती हैं
वहाँ ना ये भाव होता है
ना इक दूजे की सहमति होती है
फिर मोहब्बत तो उन क्षणों में
बेमानी लफ्ज़ बन रह जाती है
क्योंकि सिर्फ़ शरीरों का खिलवाड़ होता है
वहाँ तो आत्म संतुष्टि का ही भाव उच्च आकार लेता है
जब स्वार्थ सिद्धि ही कारक बनेगी
तो कैसे न गाज गिरेगी
सिर्फ आत्म संतुष्टि के लिए जब सम्भोग होगा
तो ऐसे ही बच्चों का जन्म होगा
वहाँ बच्चे तो बस हो जाते हैं

स्त्री से कब पूछा जाता है
वहाँ तो बीज बस रोंपा जाता है
उसकी चाहत पर अंकुश रख
अपनी चाहतों को थोपा जाता है
ऐसे में जैसा बीज पड़ेगा
फसल तो वैसी ही उगेगी
प्यार मोहब्बत संवेदन विहीन पीढ़ी ही जन्म लेगी

क्षणिक आवेगों में
क्षणिक सुखों के वेगों में
बच्चे तो बस हो जाते हैं
और अपने किये की तोहमत भी
हम उन्हीं पर लगाते हैं

क्योंकि
उपयुक्त वातावरण के बिना तो
ना कहीं कोई फूल खिलता है
उसे भी हवा, पानी और ताप
के साथ प्रकृति का
निस्वार्थ स्नेह मिलता है
तभी वह अपनी आभा से
नयनाभिराम दृश्य उपलब्ध कराता है
फिर कैसे वैसा ही
आत्मीय सम्बन्ध बनाये बिना
मानवीय संवेदनाओं का जन्म हो सकता है
जब सुनियोजित तरीके से विचार जायेगा
और गर्भधारण से पहले
इक दूजे की सहमति, प्यार और समर्पण
को आकार मिलेगा
उस दिन मोहब्बत
प्रकृति और पुरुष-सी जीवन में उतरेगी
इक दूजे को मान देगी
नयी पीढ़ी के जन्म में
मोहब्बत के अंकुरण भरेगी
तभी संवेदनाएँ जन्म लेगीं
तभी मोहब्बत का पौधा लहलहाएगा
और हर चेहरे पर
खिला कँवल मुस्कराएगा
फिर न कभी ये कहा जायेगा
बच्चे तो बस हो जाते हैं
बच्चे तो बस हो जाते हैं…

सोच की रोटी पर फफ़ूँद लगने से पहले

हाथ में कलम हो और
सोच के ताबूत में
सिर्फ़ कीलें ही कीलें गडी हों
तो कैसे खोली जा सकती है
ज़िन्दा लाश की आँख पर पडी पट्टी की गिरहें
चाहे कंगन कितने ही क्यों ना खनकते हों
सोच के गलियारों में पहनने वाले हाथ ही
आज नहीं मिला करते
और “जंगल में मोर नाचा किसने देखा”
कहावत यूँ चरितार्थ होती है
मानो स्वंयवर के लिये दुल्हन खुद प्रस्तुत हो
मगर राजसभा मनुष्य विहीन हो
या रंगशाला में नर्तकी नृत्य को आतुर हो
मगर कद्रदान का ही अभाव हो

विडंबना की सूक्तियाँ मानो
कोई फ़कीर उच्चरित कर रहा हो
समय रहते बोध करा रहा हो
मगर हमने तो जैसे हाथ में माला पकडी हो
मनके फ़ेरने की धुन में कुछ सुनना
शास्त्राज्ञा का उल्लंघन लगता हो
अजब सोच की गगरी हो
जो सिर्फ़ कंकर पत्थरों से भरी हो
मगर पानी के अभाव में
ना किसी कौवे की प्यास बुझती हो
और कहीं कौवा प्यासा ही ना उड जाये
उससे पहले बरसनी ही चाहिए बरखा की पहली बूँद
मेरी सोच की मज़ार पर
ऐतिहासिक घटना के घटित होने से पहले
लिखी जानी चाहिए कोई इबारत
सोच की रोटी पर फ़फ़ूँद लगने से पहले
बदलनी ही चाहिए तस्वीर इस बार

कुंठित सोच
कुँठित मानसिकता
कुंठित पीढी को जन्म दे
उससे पहले
सोच की कन्दराओँ को
करना होगा रौशन
ज्ञान का दीप जलाकर
खुद का अन्वेषण कर के

ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम 

ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम
मैं राख का अंतिम श्वास बन जाती… जो तुम होते
मैं मुखाग्नि का अंतिम कर्म बन जाती… जो तुम होते
मैं कच्चे घड़े संग चेनाब पार कर जाती… जो तुम होते
ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

जो तुम होते… एक श्वास धरोहर बन जाती
जो तुम होते… एक कर्म की मुक्ति हो जाती
जो तुम होते… एक मोहब्बत परवान चढ़ जाती
ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

हो सकता ऐसा मुमकिन… गर हम होते
ऋतु बसंत भी मदमाती… गर हम होते
एक दीपशिखा जल जाती… गर हम होते
ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

अश्रुबिंदु ना कभी ढलकाते… जो प्रियतम होते
विरह अगन ना कभी सताती… जो प्रियतम होते
इश्क की ना दास्ताँ बन पाती… जो प्रियतम होते
ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

ना तुम होते ना हम होते… ये सृष्टि किस पर मदमाती
ना तुम होते ना हम होते… ये प्यास अधूरी रह जाती
ना तुम होते ना हम होते… तो प्रेम में अपूर्णता रह जाती
ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

अच्छा हुआ जो ना मिले कभी… खोजत्व पूर्ण हो जाता
अच्छा हुआ जो ना मिले कभी… निजत्व पूर्ण हो जाता
अच्छा हुआ जो ना मिले कभी… शिवत्व पूर्ण हो जाता
ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

अधूरी प्यास, अधूरा तर्पण, अधूरा जीवन… ज़रूरी था
जीवन की इकाइयों दहाइयों में अधूरापन… ज़रूरी था
प्रेम का अपूर्ण ज्ञान, अपूर्ण आधार… ज़रूरी था
ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

अपूर्णता में सम्पूर्णता का आधार ही तो
व्याकुलता को पोषित करता है… सत्य था, है, रहेगा
जन्म जन्म की प्यास का अधूरापन ही तो
घूँट भरने को लालायित करता है… सत्य था, है, रहेगा
मिलन पर विरह का स्वाद ही तो
ह्रदय रुपी जिह्वा को आनंदित करता है…सत्य था, है, रहेगा
ओह! मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतम

प्रेम,अध्यात्म और जीवन दर्शन

प्रेम
यौगिक प्रक्रिया
जो व्यक्त हो
तो ब्रह्मांड बन जाये
अव्यक्त रहे तो
निराकार हो जाये
देह से जुडे प्रेम के अनुबंध
प्रेम के वास्तविक स्वरूप नहीं
साकार रूप तभी शाश्वत है
जब निराकार में भी व्याप्त है
होने और ना होने के
बीच के अबूझे पलों में भी
प्रेम देह धारण करने का मोहताज़ ना हो
बस प्रकृति का संगीत बन
नि: संग बह रहा हो
असीम अनन्त
अजस्र धारा बनकर
बंसी का नाद बनकर
अपने निराकार को साकार करता
तो कभी साकार, निराकार में समेटता
मगर उसके होने और ना होने पर
ना कोई फ़र्क पडता
एक दिव्य नाद जो
सतत बज रहा हो
तब प्रेम दिव्यता धारण कर
अध्यात्म की ओर उन्मुख होता है
तब प्रेम में अध्यात्मिकता का समावेश होता है
जब प्रेम देह के अनुवाद से परे
आत्मिक तरंगों पर बहता है
तब आध्यात्मिक रूप धारण करता है

अध्यात्म क्या है?
अपने आत्म तत्व को पहचानना
खुद को जानना
और प्रेम स्वंय को पह्चानने
और जानने की पहली सीढी
और जब स्वंय का अध्ययन
करने की ओर कदम बढते हैं
तब प्रेम और अध्यात्म मिलकर
जीवन दर्शन कराते हैं
आत्म बोध कराते हैं

दर्शन क्या है?
जो दिख रहा है खुली आँखों से
या उससे भी परे कुछ है
जो अदृश्य है
और उस अदृश्य को ही
दृश्यमान करने की प्रक्रिया
ही जीवन दर्शन है

अदृश्य क्या है?
अस्तित्व… ……
किसका?
मेरा या प्रेम का या दोनो का
या समाहित हैं दोनो एक ही रूप में
जैसे दूध में मक्खन है
मगर बिना मथे
अपना स्वरूप नहीं पाता
क्या वैसे ही?
प्रेम—एक नदी
मैं—उसका पथ
दोनो एक दूसरे के पूरक ही तो हुये ना
और जब दोनो ने
एक दूजे को समाहित किया
तब जाकर एक का दूजे में लोप हुआ
और सिर्फ़ प्रेम ही प्रेम का दिग्दर्शन हुआ
तब जाकर आत्मदर्शन हुआ………मैं क्या हूँ और मैं क्या था?

मैं कोई विरक्त तत्व नहीं
मैं कोई अलौकिक क्रिया नहीं
मैं वह हूँ
जिसके अणु परमाणु बिखरे हैं
प्रकृति के विभापटल पर
विद्यमान हैं सारे ब्रह्मांड में
सब मुझमें ही तो समाहित है
और सब में मैं ही तो विराजमान हूँ
कौन किससे पृथक
कौन किससे जुदा
आकलन की वस्तु नहीं ये ज्ञान हो जाना
फिर उस अहसास को सिर्फ़ महसूसना
और फिर उसमें विचरण करना ही तो
आत्मबोध है्……जीवन दर्शन है
जहाँ प्रेम की सीढी पर पाँव रखते ही
अध्यात्मिक उन्नति के द्वार खुलने लगते हैं
और विचारबोध होते ही
ज्ञानबोध होते ही
जीवन दर्शन हो जाता है
आत्म तत्व का
अवलोकन हो जाता है
फिर प्रेम, जीवन और अध्यात्म
अलग नहीं
स्व-स्वरूप ही नज़र आता है

भिन्नता की दृष्टि तो भेदबुद्धि की निकृष्ट सीढी है…

तो प्रश्न उठता है फिर पैदा ही क्यों किया वो बीज

जग नियंता
नियंत्रित किये है
सारी सृष्टि
मगर “मैं” अनियंत्रित है
अस्फुट है
बेचैन है
खानाबदोश ज़िन्दगी आखिर
कब तक जी सकता है

हाँ… “मैं” वह ही
जिसका अंकुर
सृष्टि के गर्भ में ही उपजा था
और बह रहा है तब से निरंतर
अपने साथ काम, क्रोध और लोभ की आंधियाँ लेकर
और देखता है जहाँ भी उपजाऊँ भूमि
बीज रोपित कर देता है
जो वटवृक्ष बन पीढियाँ तबाह कर देता है
युगों को अभिशापित कर देता है
और आने वाली पीढियाँ
उसे ढोने को मजबूर हो जाती हैं
क्योंकि “मैं” रुपी
चाहे रावण हो या कंस या दुर्योधन
हमेशा युगों पर प्रश्नचिन्ह छोड़ गया
जिसकी सलीब आज भी
सदियों से ढोती पीढियाँ
उठाने को मजबूर हैं
क्योंकि नहीं मिल रहा उन्हें
अपने प्रश्नों का सही उत्तर
नहीं हुई ऐसी खोज जो कारण
की जड़ तक जा सके
बस लकीर के फकीर बने
सवालों को गूंगा किये
हम एक अंधी दौड़ में चल रहे हैं
और कोई यदि सवाल करे
तो उसे ही पागल घोषित कर रहे हैं
ऐसे में “मैं” तो पोषित होना ही है
क्योंकि उसके पोषक तत्त्व तो यही हैं
क्या “मैं” को ज़मींदोज़ करने के लिए
हर बार प्रलय ज़रूरी है?

ये “मैं” की परिपाटी बदलने के लिए
क्या उसकी टहनी के साथ
दूसरी शाखा नहीं जोड़ी जा सकती
जो “हम” के फूलों से पल्लवित हो
और सृष्टि कर्ता का सर्जन सफल हो
या ये उसकी सरंचना का वह छेद है
जिसे वह स्वयं नहीं भरना चाहता
क्योंकि
मदारी के खेल में बन्दर को तो सिर्फ़ उसके इशारों पर नाचना होता है
जो ये नहीं सोच पाता
क्या असर पड़ेगा इसका द्रष्टा पर
फिर सुना है
सृजनकर्ता को नहीं पसंद
“मैं” का अंकुर
तो प्रश्न उठता है फिर पैदा ही क्यों किया वह बीज?

सम्भोग से समाधि तक

संभोग
एक शब्द
या एक स्थिति
या कोई मंतव्य
विचारणीय है…

सम + भोग
समान भोग हो जहाँ
अर्थात
बराबरी के स्तर पर उपयोग करना
अर्थात दो का होना
और फिर
समान स्तर पर समाहित होना
समान रूप से मिलन होना
भाव की समानीकृत अवस्था का होना
वो ही तो सम्भोग का सही अर्थ हुआ
फिर चाहे सृष्टि हो
वस्तु हो, मानव हो या दृष्टि हो
जहाँ भी दो का मिलन
वो ही सम्भोग की अवस्था हुयी

समाधि
सम + धी (बुद्धि)
समान हो जाये जहाँ बुद्धि
बुद्धि में कोई भेद न रहे
कोई दोष दृष्टि न हो
निर्विकारता का भाव जहाँ स्थित हो
बुद्धि शून्य में स्थित हो जाये
आस पास की घटित घटनाओं से उन्मुख हो जाये
अपना-पराया
मेरा-तेरा, राग-द्वेष
अहंता, ममता का
जहाँ निर्लेप हो
एक चित्त
एक मन
एक बुद्धि का जहाँ
स्तर समान हो
वो ही तो है समाधि की अवस्था

सम्भोग से समाधि कहना
कितना आसान है
जिसे सबने जाना सिर्फ़
स्त्री पुरुष
या प्रकृति और पुरुष के सन्दर्भ में ही
उससे इतर
न देखना चाहा न जानना
गहन अर्थों की दीवारों को
भेदने के लिए ज़रूरी नहीं
शस्त्रों का ही प्रयोग किया जाए
कभी कभी कुछ शास्त्राध्ययन
भी ज़रूरी हो जाता है
कभी कभी कुछ अपने अन्दर
झांकना भी ज़रूरी हो जाता है
क्योंकि किवाड़ हमेशा अन्दर की ओर ही खुलते हैं
बशर्ते खोलने का प्रयास किया जाए

जब जीव का परमात्मा से मिलन हो जाये
या जब अपनी खोज संपूर्ण हो जाए
जहाँ मैं का लोप हो जाए
जब आत्मरति से परमात्म रति की ओर मुड जाए
या कहिये
जीव रुपी बीज को
उचित खाद पानी रुपी
परमात्म तत्व मिल जाए
और दोनों का मिलन हो जाए
वो ही तो सम्भोग है
वो ही तो मिलन है
और फिर उस मिलन से
जो सुगन्धित पुष्प खिले
और अपनी महक से
वातावरण को सुवासित कर जाए
या कहिये
जब सम्भोग अर्थात मिलन हो जाये
तब मैं और तू का ना भान रहे
एक अनिर्वचनीय सुख में तल्लीन हो जाए
आत्म तत्व को भी भूल जाए
बस आनंद के सागर में सराबोर हो जाए
वो ही तो समाधि की स्थिति है
जीव और ब्रह्म का सम्भोग से समाधि तक का
तात्विक अर्थ तो
यही है
यही है
यही है

काया के माया रुपी वस्त्र को हटाना
आत्मा का आत्मा से मिलन
एकीकृत होकर
काया को विस्मृत करने की प्रक्रिया
और अपनी दृष्टि का विलास, विस्तार ही तो
वास्तविक सम्भोग से समाधि तक की अवस्था है
मगर आम जन तो
अर्थ का अनर्थ करता है
बस स्त्री और पुरुष
या प्रकृति और पुरुष की दृष्टि से ही
सम्भोग और समाधि को देखता है
जबकि दृष्टि के बदलते
बदलती सृष्टि ही
सम्भोग से समाधि की अवस्था है

ब्रह्म और जीव का परस्पर मिलन
और आनंद के महासागर में
स्वयं का लोप कर देना ही
सम्भोग से समाधि की अवस्था है
गर देह के गणित से ऊपर उठ सको
तो करना प्रयास
सम्भोग से समाधि की अवस्था तक पहुंचने का
तन के साथ मन का मोक्ष
यही है
यही है
यही है

जब धर्म जाति, मैं, स्त्री पुरुष
या आत्म तत्व का भान मिट जाएगा
सिर्फ आनंद ही आनंद रह जायेगा
वो ही सम्भोग से समाधि की अवस्था हुयी

जीव रुपी यमुना का
ब्रह्म रुपी गंगा के साथ
सम्भोग उर्फ़ संगम होने पर
सरस्वती में लय हो जाना ही
आनंद या समाधि है
और यही
जीव, ब्रह्म और आनंद की
त्रिवेणी का संगम ही तो
शीतलता है
मुक्ति है
मोक्ष है

सम्भोग से समाधि तक के
अर्थ बहुत गहन हैं
सूक्ष्म हैं
मगर हम मानव
ना उन अर्थों को समझ पाते हैं
और सम्भोग को सिर्फ़
वासनात्मक दृष्टि से ही देखते हैं
जबकि सम्भोग तो
वो उच्च स्तरीय अवस्था है
जहाँ ना वासना का प्रवेश हो सकता है
गर कभी खंगालोगे ग्रंथों को
सुनोगे ऋषियों मुनियों की वाणी को
करोगे तर्क वितर्क
तभी तो जानोगे इन लफ़्ज़ों के वास्तविक अर्थ
यूँ ही गुरुकुल या पाठशालाएँ नहीं हुआ करतीं
गहन प्रश्नो को बूझने के लिए
सूत्र लगाये जाते हैं जैसे
वैसे ही गहन अर्थों को समझने के लिए
जीवन की पाठशाला में आध्यात्मिक प्रवेश ज़रूरी होता है
तभी तो सूत्र का सही प्रतिपादन होता है
और मुक्ति का द्वार खुलता है
यूँ ही नहीं सम्भोग से समाधि तक कहना आसान होता है

दोस्ती, प्रेम और सेक्स 

दोस्ती अलग है
प्रेम अलग है
सैक्स अलग है
किसी ने कहा मुझे
क्या कर सकती हो व्याख्या?
बता सकती हो
क्या हैं इनके अस्तित्व?
क्या ये हैं समाये इक दूजे में
या हैं इनके भिन्न अस्तित्व?

दो विपरीत लिंगी
दोस्ती हो या प्रेम
हमेशा कसौटी पर ही
खड़ा पाया जाता है
क्यूँ समझ नहीं आ पाता है
दोस्ती का जज्बा नेमत खुदा की
जिसको नवाज़ा है होगा कोई बाशिंदा
जहान से अलग खुदा के नज़दीक
यूँ ही तो खुदा को उस पर नहीं प्यार आया है
मगर विपरीत लिंगी दोस्ती
पर ही क्यूँ आक्षेप लगाया है
क्यूँ नहीं किसी को समझ आया है
हर दोस्ती की बुनियाद सैक्स नहीं होती
इमारत इतनी कमजोर नहीं होती
महज़ शारीरिक आकर्षण
और स्त्री पुरुष का संग ही क्यूँ ये दर्शाता है
यहाँ तो सिर्फ़ इनका शारीरिक नाता है
देह से इतर भी सम्बन्ध होते हैं
जो प्रेम से भी गहरे होते हैं
फिर चाहे हो कृष्ण
सखी तो एक ही बन पाई थी
पांचाली ने भी तो दोस्ती कृष्ण संग निभाई थी
पर वहाँ प्रेम दिव्यता पा गया था
दोस्ती की रस्में निभा गया था

प्रेम की डोर बड़ी कच्ची होती है
इसमें ना कोई कड़ी होती है
अदृश्य तरंगों पर ह्रदय तरंगित होते हैं
बिन देखे, बिन मिले बिन जाने भी
भाव स्खलित होते हैं
प्रेम में स्त्री पुरुष कब चिन्हित होते हैं
वहाँ तो आत्माओं के ही मिलन होते हैं
फिर कैसे भेद करूँ
स्त्री पुरुष को अलग करूँ
फिर चाहे गोपी भाव में समाहित हो
जहाँ कृष्ण गोपी बन जाता हो
या गोपी कृष्ण बन जाती हो
पर प्रेम की थाह ना कोई पाता हो
प्रेम तो ह्रदय की वीथियों
पर लिखा अनवरत नाता है
जिसकी गहराइयों में जिस्म से परे सिर्फ़
आत्मिक मिलन ही हो पाता है
जो हर किसी को ना आता है
और वह प्रेम को भी
शरीरों के मिलन से ही तोल पाता है
मगर अपनी जड़ सोच से
ना मुक्त हो पाता है
सिर्फ स्त्री पुरुष रूप में ही
परिभाषित किया जाता है
मगर कभी उसकी दिव्यता को ना जान जाता है
तभी प्रेम कभी भी अपना मुकाम ना पा पाता है
इक बार स्त्री पुरुष भेद से बाहर आओ
खुद को प्रेम के सागर में डुबा जाओ
तो शायद तुम भी प्रेमग्रंथ लिख जाओ

दो विपरीत लिंगी मिलन
महज सम्भोग को ही दर्शाता है
सिर्फ देह से शुरू होकर
देह तक ही सिमट जाता है
कभी देह से इतर ना इक दूजे का जान पाता है
और बीच राह में ही बँधन चटकता जाता है
जब तक ना आपसी सौहार्द हो
तब तक कैसे ढाई अक्षर का आधार हो
सम्भोग का कैसे शृंगार हो
जब तक ना मित्रमय वातावरण का विचार हो
जब तक ना प्रेम के बीज का रोपण हो
कैसे कहो तो सम्भोग हो
सम्भोग मात्र क्रिया नहीं
जीवन दर्शन समाया है
सम्भोग से भी अध्यात्म तक मार्ग बताया है
पर वहाँ देह से इतर ही सम्बन्ध बन पाया है
सिर्फ कुछ पलों का सामीप्य ही ना दीवार बने
मानस के मन का मजबूत आधार बने
जहाँ एक दूजे में ही
प्रेमी, सखा, आत्मीय, ईश्वरीयतत्व
सबका दर्शन हो जाए
तन से परे मन का मिलन हो जाये
तो सम्भोग पूर्णता पा जाये
तभी शायद विपरीत लिंगी होना
सिर्फ एक रूप रह जायेगा
सम्भोग में भी दोस्ती और प्रेम का आधार नज़र आएगा
और संपूर्ण दिव्यता को मानव पा जायेगा

यूँ तो दोस्ती, प्रेम और सैक्स
तीनो अपने मानदंडों पर खरे उतरते हैं
पर इनके अस्तित्व भी
इक दूजे में ही समाहित होते हैं
जहाँ बिना दोस्ती के प्रेम ना जगह पाता है
और बिना प्रेम और दोस्ती के
सम्भोग का कारण ना उचित नज़र आता है
फिर कैसे इन्हें अलग करूँ
अलग होते हुए भी इनके अस्तित्व
इक दूजे बिन ना पूर्णता पाते हैं
हाँ… अलग अस्तित्व तभी सम्पूर्णता पाते हैं
जब इक दूजे में सिमट जाते हैं
मगर वहाँ वासनात्मक राग ना बहता है
सिर्फ अनुराग ही अनुराग होता है
सर्वस्व समर्पण जहाँ होता है
वो ही प्रेम हो या दोस्ती या सैक्स
सभी का आधार होता है
शायद वहीं दिव्यता का भान होता है

मेरे फुफकारने भर से

मेरे फुफकारने भर से
उतर गए तुम्हारी
तहजीबों के अंतर्वस्त्र
सोचो
यदि डंक मार दिया होता तो?

स्त्री
सिर्फ प्रतिमानों की कठपुतली नहीं
एक बित्ते या अंगुल भर नाप नहीं
कोई खामोश चीत्कार नहीं
जिसे सुनने के तुम
सदियों से आदि रहे
अब ये समझने का मौसम आ गया है
इसलिए
पहन लो सारे कवच सुरक्षा के
क्योंकि
आ गया है उसे भी भेदना तुम्हारे अहम् की मर्म परतों को ओ पुरुष!

मैं नर… तुम मादा

1
मैं नर तुम मादा
तुम मादा मैं नर
फिर चाहे
मानव हो या दानव
पशु हो या पक्षी
पुरुष हो या प्रकृति
हम सब पर लागू होता
शाश्वत सिद्धांत हैं
जननी के लिए
जनक का होना जरूरी है
या जनक बनने के लिए
जननी का होना लाजिमी है
बिना सिद्धांत का पालन किये
किसी प्रमेय का हल नहीं निकाला जा सकता
सो लागू है हम पर भी
2
तुम … एक बहु उपयोगी हथियार सी
मेरी मनोकामनाओं के
बीजों को पोषित करतीं
गर अट्टहास को आतुर हो तो
समझना होगा तुम्हें
कल भी आज भी और भविष्य में भी
तुम्हें अट्टहास लगाने को वजह मैं ही दूँगा
मगर कितना और किस मात्रा में और कहाँ लगाना है
ये मैं ही बताऊँगा
चिन्हित करूंगा मार्ग
दूँगा दिशानिर्देश
तब उन्मुक्त उड़ान का अट्टहास लगाने की
तुम्हारी प्रक्रिया सार्थक होगी

3
क्योंकि
तुम मादा हो
नहीं है तुम्हें अधिकार
प्रमेय के नियम बदलने का
मगर मुझ पर भी लागू हो वो नियम, जरूरी नहीं
तुम सिर्फ एक इकाई हो एक ऐसा कोष्ठक
जिसे अपनी सुविधानुसार
कहीं भी जोड़ा जा सकता है
और जब कभी तुम्हें अहसास हो
अपने वजूद की निरर्थकता का
शोषित होने का
तब आसान होगा मेरे लिए
सारे नियमो को ताक पर रखकर
तुम्हारी मर्यादा की धज्जियाँ उड़ाने का
तुम्हें लक्ष्य पाने को आतुर
भटकती आत्मा कहने का
क्योंकि प्रयोग की दृष्टि से तो
हम एक दूसरे के बिना अधूरे ही हैं
और तुम्हारा उत्कर्ष
मेरे निष्कर्षों का सदा ही मोहताज रहा है
इसलिए
बौद्धिक कहो, मानसिक कहो,शारीरिक या वाचिक
शब्दों की गरिमा कहीं भंग न हो जाए
सोच, नहीं कहना चाहता तुम्हें कुछ भी
मगर तुम समझ ही गयी हो मेरा मंतव्य
4
हाँ, नर हूँ मैं
और तुम मादा
इस अंतर को याद रखना तुम्हारी नियति है
वरना
कुछ शाख से टूटे हुए पत्तों को
हवाएं कहाँ ले जाती हैं,पता भी नहीं चलता
मगर वृक्ष पहले भी
था, है और रहेगा
ये आत्म प्रवंचना नहीं है
ये वो सत्य है जिसे तुम
जानती हो
मानती हो
स्वीकारती हो
मगर फिर भी देखती हो
खुद को देह से परे … एक अस्तित्व
मादा होना ही एक प्रश्नचिन्ह है
फिर देह से परे एक अस्तित्व खोजना तो तुम्हारी वो भूल है
मानो तपते सूरज पर
कोई चाँद की रोटियां सेंक रहा हो
मगर पेट भी न भर रहा हो
5
ओ मेरे पिंजरे की मैना
मेरे हाथों की कठपुतली
तुम्हारी सारी डोरें
सारे दरवाज़े
सारे झरोखे
मेरे अहम् के गाढे किले से बंधे हैं
जहाँ मैं जानता हूँ
कब और कितनी छूट देनी है
कब डोर खींचनी है
और कब प्रयोग करके तोड़ देनी है
ख्याति के वटवृक्ष हेतु
तुम्हारी बलि अनिवार्य है
क्योंकि
तुम मेरे खेल का वो पांसा हो
जिसमे चौसर की बिसात पर
दोनों तरफ से खिलाडी मैं ही हूँ
और खुद की जीत की खातिर
पांसों को कैसे पलटना है, जानता हूँ
क्योंकि
मैं वो शकुनि हूँ
जो अपने उद्देश्यपूर्ति के लिए
चाहे कितनी ही पीढियां तबाह हो जायें
महाभारत कराये बिना कुछ नहीं देता
गर हो तुम में दम
गर हो तुम में अर्जुन और कृष्ण सा सारथि
तभी करना कोशिश
वर्ना तो कितनी ही सभ्यताएं नेस्तनाबूद होती रहीं
मगर मेरा अस्तित्व
ना कभी ख़त्म हुआ
और ना ही ख़ारिज
6
बेशक तुम्हारा होना भी जरूरी रहा
मगर सिर्फ ढाल बनकर
तलवार बनकर नहीं
इसलिए याद रखना हमेशा प्रमेय का सिद्धांत
मैं नर हूँ
और तुम मादा
जिसमे नहीं है माद्दा
बिना मेरे साथ की बैसाखी के
हिमालय को फतह करना
वर्ना आज तुम यूँ ना शोषित होतीं
वर्ना आज तुम्हारी अस्मिता के
यूँ ना परखच्चे उड़े होते
वर्ना आज तुम्हारी ही इज्जत
हर गली, कूचों और गलियारों में
यूँ ना शोषित होती
फिर चाहे वो घर हो, समाज या साहित्य

और जन्म रहा है एक पुरुष

मर चुकी है इक स्त्री मुझमें शायद
और जन्म रहा है एक पुरुष
मेरी सोच की अतिवादी शिला पर
दस्तकों को द्वार नही मिल रहे
फिर भी खटखटाहट का शोर
अपनी कम्पायमान ध्वनि से प्रतिध्वनित हो रहा है

स्त्री होने के लिए जरूरी है
सर झुकाने की अदा
बिना नाजो नखरे के मशीनवत जीने का हुनर
पुरुष के रहमोकरम पर जीने, मुस्कुराने का हुनर
और अब ये संभव नहीं दिख रहा
होने लगी है शून्य भावों से, संवेदनाओं से
होने लगी है वक्त के मुताबिक प्रैक्टिकल
सिर्फ़ भावों की डोलियों में ही सवार नहीं होती अब दुल्हन
करने लगी है वो भी प्रतिकार सब्ज़बागों का
गढने लगी है एक नया शाहकार
लिखने लगी है एक इबारत पुरुष के बनाये शिलास्तम्भ पर
तो मिटने लगी है उसमें से एक स्त्री कहीं ना कहीं
इसलिये नहीं होती अब उद्वेलित मौसमों के बदलने से

पुरुषवादी प्रकृति की उधारी नहीं ली है
आत्मसात किया है खुद में
आगे बढने और चुनौतियों को झेलने के लिये
एक अपने हौसलों के पर्वत को स्थापित करने के लिये
जिनमें अब नहीं होते उत्खनन
जिनके सपाट चौडे सीनों पर उग सकते हैं देवदार,चीड और कैल भी
बस स्थापत्य कला के नमूने भर हैं
स्त्री की मौत पर उसकी अस्थियाँ रोंपी हैं पर्वत की नींव में
ताकि उगायी जा सके श्रृंखला वनस्पतियों की
जो औषधि बन कर सकें उपचार जडवादी सोच का
यूँ ही नहीं हुयी है एक स्त्री की मौत

कितने ही सरोकारों से जुडना है अभी
कितनी ही फ़ेहरिस्तों को बदलना है अभी
टांगना है एक सितारा अपने नाम का भी आसमाँ में
तभी तो स्त्री के अन्दर का शोर दफ़न हो रहा है
उगल रही है उगलदानों मे काँधों पर उठाये बोझों को
और जन्म रही है स्त्री में पुरुषवादी सोच
ले रही है आकार एक और सिंधु घाटी की सभ्यता

अब द्वार मिलें ना मिलें
दस्तक हो ना हो
ध्वनि है तो जरूर पहुँचेगी कानों तक

ये कैसा वजूद है मेरा

1
गिलौरी दाँत में दबाये
जाने कैसे कह जाती हो तुम
वो जो कहा तो जाता है
मगर औचित्य कुछ नहीं होता उसका
क्योंकि बचता है जो
वो तो दबा होता है दाँत में

2
तुम्हारी ख़ामोशी के स्तम्भों पर पढता हूँ ताबीरें
जो कहीं भी लेखनीबद्ध नहीं होतीं
फिर भी वक्त के सशक्त हस्ताक्षर सी
दिखती हैं ख़ामोशी की सलवटों में

3
जो बचता है तुम्हारा अनकहा तुम्हारे पास
जाने क्यों
वो ही डंक मारा करता है अक्सर
मेरी खोजी प्रवृत्ति के वीरान शहरों को

4
सुलगती लकड़ियों की आँच
कभी दिखी भी तो नहीं देखनी चाही
और आज ढूँढता हूँ राख में चिंगारी
ये एक अदद कोशिश के शहतीर अक्सर
चुभा करते हैं साँसों में मेरी
फिर भी ज़िंदा हूँ यही अचरज है

5
तुम और तुम्हारा
वो कुचला मसला नेस्तनाबूद किया
एक अदद ख्वाबों का शहर
जाने क्यों उसी में
भ्रमण कर खोजना चाहता हूँ
भग्नावशेषों में कारण
जबकि जानता हूँ और मानता भी हूँ
कारण हूँ सिर्फ मैं
किसे भ्रमित कर रहा हूँ?

6
सुनो
तुम चुप ही रहना
तुम्हारा बोलना अखरेगा मुझे
तुम जानती हो
मेरे अहम् की तुष्टि के लिए
आह! कितनी आसानी से मान लिया तुमने
और आज यही विषबाण
मेरे लहू में घुस विषैला बना रहा है मुझे
और मैं खुरच खुरच कर निकाल रहा हूँ
दरो दीवार से लहू के निशाँ
मगर रक्तबीज से बढे जा रहे हैं
एक अहम् की तुष्टि की ये कीमत तो नहीं चाही थी
मगर पाला पड़ी फसलों में फूल नहीं उगा करते

7
ये तुम्हारा गुणगान नहीं
खुद को हितैषी सिद्ध करने की मंशा नहीं
बस हाथ में तलवार लेकर
ऊंगलियों से धार बनाने की कवायद भर है
जो तुम जानती हो
महज पागल का प्रलाप भर है
कभी यूं भी धारें बना करती हैं
जोखिम उठाने की क्षमता मुझमे नहीं
जाने क्यों फिर भी
क्या सिद्ध करना चाहता हूँ नहीं जानता

8
अंतिम पड़ाव पर ही
जाने क्यों अंतिम अरदासें हुआ करती हैं
उम्र तो एक रेगिस्तान में ही गुजरा करती है पानी की तलाश में
पता नहीं क्यों
उम्र भर की तलाश और नमी का स्रोता
अंतिम पड़ाव के ही शगल हुआ करते हैं
जहाँ मीठे पानी के चश्मे तो जरूर होते हैं
मगर प्यास के शहरों में पाले पड़े होते हैं
और तुम्हारी प्यास के शहर का पानी बनना
शायद ये भी मेरी एक ज़िद हुआ करती है
जहाँ दूर दूर तक कहीं रेत में ना नमी बची होती है

9
इश्क तो तुमने किया होता है
मैंने तो महज पासों को नया रूप दिया होता है
इश्क के इल्म की दीवारों पर
खुद को अंकित करने का
ये भी मेरा एक तहलकादायी प्रकरण हुआ करता है

10
क्योंकि
जानता हूँ खुद को
बस तुम्हें जानने के भ्रमों को
अपनी सहजता का प्रमाण बना
खुद के आईने साफ किया करता हूँ
जबकि चेहरा खुद का ही नज़र आता है
एक चतुर चालाक शिकारी सा
ये कैसा ध्रुवसन्धि काल है
जहाँ अब जरूरत नहीं
वहीँ अज़ान दिया करता हूँ
उत्तरकाण्ड लिखने का कोई औचित्य भी जरूरी होता है
और मेरे पास नहीं है कोई औचित्य
ना आरम्भ का ना अंत का
जाने क्यों फिर भी
किस निगाह से शर्मसार हुआ करता हूँ
जो ढकोसलों के शहरों में हथियार बन फिरा करता हूँ
जबकि
प्रयासों की घाटियों में सिर्फ और सिर्फ झाड़ खंखाड़ ही समाये होते हैं

11
तुम तरंगिनी सी
दस्तक नहीं देतीं
फिर भी दस्तक होती है
मगर
मेरे शहरों की दीवारें अभेद्य हैं
इसलिए
सुनकर भी न सुनने की आदत से मजबूर हूँ

ये कैसा वजूद है मेरा
आकलन कितना ही करूँ
परिणाम हमेशा अपने ही पक्ष में दिया करता हूँ

अभी अध्ययन का विषय है ये 

लिंग कोई हो
स्त्री या पुरुष
भावनायें, चाहतें
एक सी ही प्रबल होती हैं
और प्यास भी चातक सी
जो किसी पानी से बुझती ही नहीं
सिवाय अपने प्रेमी के
और घूम जाते हैं
ना जाने कितने ब्रह्मांड एक ही जीवन में
अधूरी हसरत को पूर्ण करने की चाह में
मगर प्यास ज्यों की त्यों कायम
सागर सामने मगर फिर भी प्यासे
साथी है साथ मगर फिर भी एक दूरी
क्योंकि
साथी से रिश्ता देह से शुरु होता है
मुखर कभी हो ही नहीं पाता
स्वाभाविक छाया प्रदान करता रिश्ता
कभी जान ही नहीं पाता उस उत्कंठा को
जो पनप रही होती है
छोटे – छोटे पादप बन उसकी छाँव में
मगर नहीं मिल पाता उसे सम्पूर्ण पोषण
चाहे कितनी ही आर्द्रता हो
या कितनी ही हवा
ताप भी जरूरी है परिपक्वता के लिये
बस कुम्हलाने लगता है पादप
मगर यदि
उस छायादार तरु के नीचे से
उसे हटाकर यदि साथ में रोंप दिया जाये
और उसका साथ भी ना बिछडे
तो एक नवजीवन पाता है
उमगता है, उल्लसित होता है
अपना एक मुकाम कायम करता है
सिर्फ़ स्नेह की तपिश पाकर
जहाँ पहले सब कुछ था
और नही थी तो सिर्फ़
तपिश स्नेह की
हाँ वो स्नेह, वो प्रेम, वो राग
जहाँ शारीरिक राग से परे
एक आत्मिक राग था
जहाँ प्रेम के राग के साथ
देहात्मक राग भी था

क्योंकि
जहाँ प्रेम होता है वहाँ शरीर नहीं होते
आत्मिक रिश्ता अराधना, उपासना बन रूह मे उतर जाता है
जीवन में नव संचार भरता है
क्योंकि
चाहिये होता है एक साथ ऐसा
जहाँ प्रेम का उच्छवास हो
जहाँ प्रेम की स्वरलहरियाँ मनोहारी नृत्य करती होँ
और कुम्हलायी शाखाओं को
प्रेमरस का अमृत भिगोता हो
तो कैसे ना अनुभूति का आकाश विस्तृत होगा
कैसे ना मन आँगन प्रफ़ुल्लित होगा
क्योंकि
जीवन कोरा कागज़ भी नहीं
जिसका हर सफ़ा सफ़ेद ही रह जाये
भरना होता है उसमें भी प्रेम का गुलाबी रंग
और ये तभी संभव है जब
आत्मिक राग गाते पंछी की उडान स्वतंत्र हो

और जहाँ शरीर होते हैं वहाँ प्रेम नहीं होता
दैहिक रिश्ता नित्य कर्म सा बन जाता है
क्योंकि
कोरे भावों के सहारे भी जीवन यापन संभव नहीं
जरूरी होता है ज़िन्दगी में यथार्थ के धरातल पर चलना
भावना से ऊँचा कर्तव्य होता है
इसलिये जरूरी है
दैहिक रिश्ते को आत्मिक प्रेम के लबरेज़ रिश्ते से विलग रखना
क्योंकि
गर दोनों इसी चाह मे जुट जायेंगे तो
सृष्टि कैसे निरन्तरता पायेगी
इसलिये प्रवाह जरूरी है
देहात्मक रिश्ते का अपनी दिशा में
और आत्मिक रिश्ते का अपनी दिशा में
और मानव मन इसी चाह मे भटकता ढूँढता फ़िरता है
किसी एक रूप मे दोनो चाहतें
जो संभव नहीं जीवन के दृष्टिकोण से

वैसे भी प्रेम कभी दैहिक नहीं हो सकता
और वासना कभी पवित्र नहीं हो सकती
इसलिये दैहिक रिश्ता कभी प्रेमजनित नही हो सकता
हो सकता है तो वो सिर्फ़ आदान – प्रदान का माध्यम
या कर्तव्य कर्म को निभाती एक मर्यादित डोर

इसलिये चाहिये होता है
एक समानान्तर रिश्ता देह के साथ नेह का भी
चाहिये होता है
एक प्रेमपुँज जिसकी ज्योति से आप्लावित हो
जीवन की लौ जगमगा उठती है
मगर ऐसे रिश्ते स्वीकार्य कब होते हैं?
कैसे संभव है दो रिश्तों का समानान्तर चलना?
दैहिक रिश्ते जीवन यापन का मात्र साधन होते हैं
और आत्मिक रिश्ते ज़िन्दगी का दर्शन, अध्ययन, मनन और चिन्तन होते हैं

क्या स्वीकारेगा ये समाज समानान्तर रिश्ता
स्त्री हो या पुरुष दोनो का, दोनों के लिये?
अभी अध्ययन का विषय है ये

जाने कितनी बार तलाक लिया

जाने कितनी बार तलाक लिया
और फिर
जाने कितनी बार समझौते की बैसाखी पकड़ी
अपने अहम को खाद पानी न देकर
बस निर्झर नीर सी बही
युद्ध के सिपाही सी
मुस्तैद हो बस खुद से ही एक युद्ध करती रही
ये जानते हुए
हारे हुए युद्ध की धराशायी योद्धा है वो
आखिर किसलिए?
किसलिए हर बार
हर दांव को
आखिरी दांव कह खुद को ठगती रही
कौन जानना चाहता है
किसे फुर्सत है
बस एक बंधी बंधाई दिनचर्या
और बिस्तर एक नित्यकर्म की सलीब
इससे इतर कौन करे आकलन?
आखिर क्या अलग करती हो तुम
वो भी तो जाने
कितनी परेशानियों से लड़ता झगड़ता है
आखिर किसलिए
कभी सोचना इस पर भी
वो भी तो एक सपना संजोता है
अपने सुखमय घर का
आखिर किसलिए
सबके लिए
फिर एकतरफा युद्ध क्यों?
क्या वो किसी योद्धा से कम होता है
जो सारी गोलियां दाग दी जाती हैं उसके सीने में
आम ज़िन्दगी का आम आदमी तो कभी
जान ही नहीं पाता
रोटी पानी की चिंता से इतर भी होती है कोई ज़िन्दगी
जैसे तुम एक दिन में लेती हो ३६ बार तलाक
और डाल देती हो सारे हथियार समर्पण के
सिर्फ परिवार के लिए
तो बताओ भला
दोनों में से कौन है जो
ज़िंदगी की जदोजहद से हो परे
मन के तलाक रेत के महल से जाने कब धराशायी हो जाते हैं
जब भी दोनों अपने अहम के कोटरों से बाहर निकलते हैं
आम आदमी हैं, आम ज़िन्दगी है, आम ही रिश्तों की धनक है
यहाँ टूटता कुछ नहीं है ज़िन्दगी के टूटने तक
बस बाहरी आवरण कुछ पलों को
ढांप लेते हैं हकीकतों के लिबास
तलाक लेने की परम्परा नहीं होती अपने यहाँ
ये तो वक्ती फितूर कहो या उबलता लावा या निकलती भड़ास
तारी कर देती है मदिरा का नशा
दिल दिमाग और आँखों से बहते अश्कों पर
वरना
न तुम न वो कभी छाँट पाओगे एक-दूजे में से खुद को
अहसासों के चश्मों में बहुत पानी बचा होता है
फिर चाहे कितना ही सूरज का ताप बढ़ता रहे
शुष्क करने की कूवत उसमे भी कहाँ होती है रिसते नेह के पानी को

क्योंकि अपराधी हो तुम

जो स्त्रियाँ हो जाती हैं ॠतुस्त्राव से मुक्त
पहुंच जाती हैं मीनोपॉज की श्रेणी में
फ़तवों से नवाज़े जाने की हो जाती हैं हकदार

एक स्त्री में स्त्रीत्व होता है सिर्फ
ॠतुस्त्राव से मीनोपॉज तक
यही है उसके स्त्रीत्व की कसौटी
जान लो आज की परिभाषा

नहीं रहता जिनमे स्त्रीत्व जरूरी हो जाता है
उन्हें स्त्री की श्रेणी से बाहर निकालना
अब तुम नहीं हो हकदार समाजिक सुरक्षा की
नहीं है तुम्हारा कोई औचित्य
इच्छा अनिच्छा या इज्जत
नहीं रहता कोई मोल
बन जाती हो बाकायदा महज संभोग की वो वस्तु
जिसे नहीं चीत्कार का अधिकार
फिर कैसे कहती हो
ओ मीनोपॉज से मुक्त स्त्री
हो गया तुम्हारा बलात्कार?

आज के प्रगतिवादी युग में
तुम्हें भी बदलना होगा
नए मापदंडों पर खरा उतारना होगा
स्वीकारनी होगी अपनी स्थिति
स्वयंभू हैं हम
हमारी तालिबानी पाठशाला के
जहाँ फतवों पर चला करती हैं
अब न्याय की भी देवियाँ

क्योंकि
अपराधी हो तुम स्त्री होने की
उससे इतर
न तुम पहले थीं
न हो
न आगे होंगी
फिर चाहे बदल जाएँ
कितने ही युग
नहीं बदला करतीं मानसिकताएँ

स्त्रीत्व की कसौटी
फतवों की मोहताजग़ी
बस यही है
आज की दानवता का आखिरी परिशिष्ट

ज़रा सी बची औरत

नहीं बचाना हरा रंग
जो बोने पर उगे
फिर वही फसल
नहीं बचाना गुलाबी रंग
जो फिर एक बार
प्रेम की आंच पर तपे
एक एक कर
करना है हर रंग को निष्कासित
सारा खेल ही रंगों का तो है
और इस बार
रंगहीन बनाना है आसमां
जो तुम्हारी बनायीं लकीरों को काट सके
और कोशिश के पायदान चढ़ती गयी
मगर फिर भी
हर नकार की प्रतिध्वनि में भी जाने कैसे हर बार जरा सी बचती रही औरत
ओ खुद को उसका भाग्यविधाता बताने वाले
भविष्य बचाने को
ये जरा सी बची औरत का बीज गर संभाल सको तो संभाल लेना
भविष्य सुना है अनिश्चित हुआ करता है

ये औरतें

कहाँ ढूँढ रहे हो?
क्या कहा?
चूल्हे चौके की खिंचती हुई निवाड़ में
देहलियों के लीपने में
जहाँ लीप देती हैं वजूद की स्याहियां भी
और मुस्कुराकर उतार देती हैं जीने के कर्ज
दीवारों से झड़ते पलस्तर में
जिसकी कभी तुरपाई नहीं हो सकती
सिलबट्टे के शोर में
जहाँ पिस जाती हैं महीनता से
और करती हैं सुवासित तुम्हारा तन और मन
दाल के तडके में
जहाँ छौंक संग छुंक जाती हैं खुद भी
आटे के चोकर सा छीजने में
या फिर दबी सहमी घुटी दीवारों में
या उम्र के तहखानों में
जहाँ कैद की जाती हैं आवाजें
या फिर जिंदा कब्रिस्तानों में
जहाँ रेत दी जाती हैं
मूक बधिरों की भी गर्दनें बिना किसी गुनाह के
नहीं, अब नहीं मिलेंगी ये सिर्फ वहां
तुम्हारी सोच की चाबी जहाँ रूकती है
वहीँ से खोले हैं इन्होने ताले बिना चाबियों के
तौलिये सी नहीं होतीं इस्तेमाल अब
कपड़ों को पछीटने तक नहीं सिमटी है
अब इस मशाल की लौ
रूप रंग देह के शिथिल संदेश रुपी बदरा छाने तक ही
नहीं नाचते अब मन के मोर
नहीं मिलेंगी अब
गुनगुनी धूप की चोली में बंधी
बसंती बयार की उलझी लटों में अटकी
तीलियों से बन चुकी हैं तितलियाँ
और भर ली है उड़ान

खेत खलिहान से लेकर
अन्तरिक्ष के पायदान तक
मिलेगा उनका एक मुकम्मल जहान
जहाँ वो बीज रही हैं नयी सभ्यता
तुम्हारी सोच से इतर
रख कर तुम्हारी कुंठाओं पर पाँव
उन्होंने खुद खोदा है कुआँ
और बुझाया है
युगों से सुलगती प्यास का दावानल
यूँ ही नहीं पकडे हैं पहचान के प्रपत्र हाथ में
एक लम्बी लड़ाई थी और है अभी बाकि भी
मगर अब मत खोजना उन्हें सिर्फ
अपनी सोच के चारागाहों में ही
जहाँ बिना हथकड़ी बेड़ियों के भी
उम्रकैद गुजारने को मजबूर थीं
मुस्तैद हैं
सीमा प्रहरी सी अब
ये चाय की चुस्कियों संग
खेल कर रम्मी
नहीं करतीं अब जीवन भंग
क्योंकि जान गयी हैं
सिर्फ झाड बुहार तक ही नहीं है जीवन
धू धू कर जल धुआँ बन उड़ने से बेहतर है
कपूर बन करें सुवासित कण कण
बोलो, कहाँ कहाँ देखना चाहोगे?
या बता सकते हो
धरती से आकाश तक
कहाँ नहीं फहरा रहा इनका परचम
फिर कैसे चाहते हो
बांधकर देखना आँख पर पट्टी
अब नहीं मिलेंगी ये तुम्हें
तुम्हारी मनचाही
रूह को सुकूँ पहुंचाती सिसकती दरारों में
अब मिलेंगी ये तुम्हें
घर और बाहर की चौसर पर
अट्टहासों के समवेत स्वरों में
अपनी हर मर्यादा के साथ
अब मिलेंगी ये तुम्हें
हर उस जगह
जो हो तुम्हारी सोच से परे
जो सभ्यता और संस्कृति को बचाते हुए
भेद विभेद से परे
बना रही है एक समानांतर संसार
बस यही है
आज की खुद मुख़्तार आधुनिक औरत की मुकम्मल पहचान
ये औरतें
जो अपना पता जानती हैं
और अपने चेहरे और धड से भी हैं परिचित
भीड़ का हिस्सा नहीं
जो भटकने का हो खतरा

शताब्दियों की नींद टूट चुकी है आज

वैश्या, कुल्टा और छिनाल

शौक़ीन हूँ मैं
तुम्हारे दिए संबोधनों
वैश्या, कुल्टा और छिनाल की

तुम्हारे उद्बोधनों का
जलता कोयला रखकर जीभ पर
बजाते हुए ताली
मुस्कुराती हूँ जब खिलखिलाकर
खुल जाते हैं सारे पत्ते
तुम्हारी तहजीब के
और हो जाते हो तुम
निर्वस्त्र

बात न जीत की है न हार की
यहाँ कोई बाजी नहीं लगी
न ही शर्त है बदी
बस
तुम्हारा तमतमाता ध्वस्त चेहरा
गवाह है
तोड़ दी हैं स्त्री ने
तुम्हारी बनायी कुंठित मीनारें

तुम्हारी छटपटाहट
बिलौटे सी जब हुंकारती है
स्त्री हो जाती है आज़ाद
और उठाकर रख देती है एक पाँव
आसमा के सीने पर
छोड़ने को छाप इस बार
बनकर बामन नापने को तीनों लोक
कि
फिर न हो सके
किसी भी युग में
किसी भी काल में
स्त्री फिर से बेबस, मूक, निरीह

अंत में
सोचती हूँ बता ही दूँ
तुम्हें एक सत्य
कि
तुम्हारे दिए उद्बोधन ही बने हैं नींव
मेरी स्वतंत्रता के

मेरे पास प्रेम नारंगी था और देह बैंजनी

लगता है कभी कभी
बदल गयी हूँ मैं
मेरे अन्दर की औरत
उंहूंकुछ और मत समझना
हकीकत के आइनों में नज़र नहीं आयेंगे जवाब
और जो लिखा होगा
वो पढ़ नहीं पाओगे तुम
अब जरूरी तो नहीं न हर लिपि की जानकारी तुम्हें होना
कोई कायदे कभी पढ़े ही नहीं हमने
न अब कोई हल नहीं
उतरती धूप में नहीं सुलगा करती धरती
तुम पिछवाड़े की सांझ से मत करना अब कोई प्रयत्न
बदलने के नियमों को ताक पर रख दिया गया
देह की देह से रगड़ तक ही जहाँ रिश्ता रहा
वहां ये तो होना ही था
क्योंकि
प्रेम अंकुआने के मौसमों में देह गौण हुआ करती है
मेरे पास प्रेम नारंगी था और देह बैंजनी
जाने रंग का कमाल हुआ
या रंग ही बदल गया नहीं जानती
मगर
और बदलाव की इन्तेहा देख
देह तक ही सिमट चुकी हूँ आज मैं भी तेरी ही तरह!

मैं नीली हँसी नहीं हँसती

मैं नीली हँसी नहीं हँसती
कहा था तुमने एक दिन
बस उसी दिन से
खोज रही हूँ नीला समंदर
नीला बादल, नीला सूरज
नीला चाँद, नीला दिल
हाँ नीला दिल
जिसके चारों तरफ बना हो
तुम्हारा वायुमंडल सफ़ेद आभा लिए नहीं
सफेदी निकाल दी है मैंने
अब अपने जीवन से
चुन लिया है हर स्याह रंग
जब से तुम्हारी चाहत की नीली
चादर को ओढा है मैंने
देखो तो सही
लहू का रंग भी नीला हो गया है मेरा
शिराएँ भी सहम जाती हैं लाल रंग देखकर
कितना जज़्ब किया है न मैंने रंग को
बस नहीं मिली तो सिर्फ एक चीज
जिसके तुम ख्वाहिशमंद थे
कहा करते थे एक बार तो नीली हँसी हँस दो
देखो नीले गुलाब मुझे बहुत पसंद हैं
और मैं तब से खड़ी हूँ
झील के मुहाने पर
गुलाबों को उगाने के लिए
नीली हँसी के गुलाब
एक अरसा हुआ
नीले गुलाब उगे ही नहीं
लगता है
तेरी चाहत के ताजमहल को बनाने के बाद
खुद के हाथ खुद ही काटने होंगे
क्यूंकि
सुना है नील की खेती के बाद जमीन बंजर हो जाती है

आ मेरी चाहत 


मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ
तुझे ख्वाबों के
सुनहले तारों से
सजा दूँ
तेरी मांग में
सुरमई शाम का
टीका लगा दूँ
तुझे दिल के
हसीन अरमानों की
चुनरी उढा दूँ
अंखियों में तेरी
ज़ज्बातों का
काजल लगा दूँ
माथे पर तेरे
दिल में मचलते लहू की
बिंदिया सजा दूँ
अधरों पर तेरे
भोर की लाली
लगा दूँ
सिर पर तेरे
प्रीत का
घूंघट उढा दूँ

मेरी चाहत
तुझे दुल्हन बना दूँ

मेरे पैर नही भीगे… देखो तो 

मेरे पैर नही भीगे
देखो तो
उतरे थे हम दोनों ही
पानी के अथाह सागर में
सुनोजानते हो ऐसा क्यों हुआ?

नहीं ना नहीं जान सकते तुम
क्योंकि
तुम्हें मिला मोहब्बत का अथाह सागर
तुम जो डूबे तो
आज तक नहीं उभरे
देखो कैसे अठखेलियाँ कर रही हैं
तुम्हारी ज़ुल्फ़ें
कैसे आँखों मे तुम्हारी
वक्त ठहर गया है
कैसे बिना नशा किये भी
तुम लडखडा रहे हो
मोहब्बत की सुरा पीकर
और देखोइधर मुझे
उतरे तो दोनों साथ ही थे
उस अथाह पानी के सागर मे
मगर मुझे मिली रेत की दलदल
जिसमें धंसती तो गयी
मगर बाहर ना आ सकी
जो अपने पैरों पर मोहब्बत का आलता लगा पाती
और कह पाती
देखो मेरे पैर भी गीले हैं भीगना जानते हैं
हर पायल मे झंकार का होना जरूरी तो नहीं
सिमटने के लिये अन्तस का खोल ही काफ़ी है
सुना है
नक्काशीदार पाँव का चलन फिर से शुरु हो गया है
शायद तभी
मेरे पैर नही भीगे देखो तो!

इबादत के पन्ने लफ़्ज़ों के मोहताज नहीं होते

सुनो
तुम लिख रही हो ना ख़त
मेरे नाम जानता हूँ
देखो न स्याही की कुछ बूँदें
मेरे पन्नों पर छलछला आयी हैं

सुनो
देखो मत लिखना विरहावली
वो तो बिना कहे ही
मैंने भी है पढ़ी

और देखो
मत लिखना प्रेमनामा
उसके हर लफ्ज़ की रूह में
मेरी साँसें ही तो साँस ले रही हैं
फिर किसके लिए लिखोगी
और क्या लिखोगी
बताओ तो सही

क्यूँ लफ़्ज़ों को बर्बाद करती हो
क्यूँ उनमे कभी दर्द की
तो कभी उमंगों की टीसें भरती हो
मोहब्बत के सफरनामे पर
हस्ताक्षरों की जरूरत नहीं होती
ये दस्तावेज तो बिना जिल्दों के भी
अभिलेखागार में सुरक्षित रहते हैं
और शब्दों की बयानी की मोहताज़
कब हुई है मोहब्बत
ये तो तुम जानती ही हो
फिर क्यूँ हवाओं के पन्नों पर
संदेशे लिखती हो

न न नहीं लिखना है हमें
नहीं है अब हमारे पहलू में जगह
किसी भी वादी में बरसते सावन की
या बर्फ की सफ़ेद चादर में ढके
हमारे अल्फाज़ नहीं है मोहताज़
पायल की झंकारों के
किसी गीत या ग़ज़ल की अदायगी के

बिन बादल होती बरसात में भीगना
बिन हवा के सांसों में घुलना
बिन नीर के प्यास का बुझना
और अलाव पर नंगे पैर चलकर भी
घनी छाँव सा सुख महसूसना
बताओ तो ज़रा
जो मोहब्बत की इन राहों के मुसाफिर हों
उन्हें कब जरूरत होती है
संदेशों के आवागमन की
कब जरूरत होती है
उन्हें पन्नों पर उकेरने की
क्यूँकि वो जानते हैं

इबादत के पन्ने लफ़्ज़ों के मोहताज नहीं होते

रोज मोहब्बत की छाँव नहीं होती 

कुछ ज्यादा तो नही चाहा मैने
न आस्मां के सितारे चाहे
न समन्दर से गहरा प्यार
न मोहब्बत के ताजमहल चाहे
न ख्वाबों की इबादतगाह
न तुझसे तेरा अक्स ही माँगा
न तुझसे तेरी चाहत ही
फिर भी खफ़ा है ज़माना

जो सिर्फ़ इक लम्हे को
कैद करना चाहा
नज़रों के कैदखाने मे
पलकों के कपाट मे
बंद करना चाहा
आँसुओं के ताले लगा
लम्हे को जीना चाहा

आँसुओ की सलवटों मे
सैलाब कहाँ छुपे होते हैं
वो तो खुद लम्हों की
खताओं मे दफ़न होते हैं
फिर किस खता से पूछूँ
उसकी डगर का पता
यहाँ तो अलसाये से दरख्तों पर भी
उदासियों वीरानियों का शोर है
फिर हर वजूद को मिलें
मोहब्बत के मयखाने
ऐसा कहाँ होता है

शायद तभी कुछ वजूदों पर
रोज मोहब्बत की छाँव नहीं होती

रूहों को जिस्म रोज कहाँ मिलते हैं

तुम्हारी सदायें
क्यूँ इतना कराह रही हैं
क्यूँ तुम्हें करार नहीं आ रहा है
सब जानती हूँ
मुझ तक पहुँच रही हैं
तुम्हारी चीखें
तुम्हारा दर्द
तुम्हारी बेचैनी
तुम्हारी पीड़ा
सब सुन रही हूँ मैं

जानते हो
जब मंदिर में
घंटा बजता है
उसमे मुझे तुम्हारा
चीखता हुआ दर्द
आवाज़ देता है
जब भी सावन में
बिजली कड़कती है
उसमे मुझे
तुम्हारी धराशायी
होती आशाएं
दिखाई देती हैं
कैसे तुम्हारे
आस के फूल पर
बिजली गिरती है
और तुम
लहूलुहान होते हो
सब जानती हूँ मैं

तुम्हारी पीड़ा का
दिग्दर्शन करती हूँ
जब भी किसी
रेगिस्तान को
तपते देखती हूँ
कैसे एक – एक बूँद को
तुम तड़पते हो
मोहब्बत की
कैसे साँस तुम्हारी उखड्ती है
जब मोहब्बत की
बयार रुकने लगती है
कैसे होंठ पपड़ा जाते हैं
जब मोहब्बत को
ज़िन्दा जलते देखते हो
सब जानती हूँ मैं
मगर क्या करूँ
प्रियतम
तुम तो जानते हो न
मेरी मजबूरियाँ
अब कैसे सितारों
की ओढनी ओढूँ
अब कैसे तेरे आँगन
में तुलसी बन महकूँ
अब कैसे फिर वो
रूप धरूँ जिसमे
तू कुछ पल जी सके
मोहब्बत को पी सके
जानते हो न
रूहों को जिस्म रोज कहाँ मिलते हैं

पपड़ाए अधरों की बोझिल प्यास

सुनो!!
कहाँ हो?
मेरी सोच के जंगलों में
देखो तो सही
कितने खरपतवार उग आये हैं

कभी तुमने ही तो
इश्क के घंटे बजाये थे
पहाड़ों के दालानों में
सुनो ज़रा
गूंजती है आज भी टंकार
प्रतिध्वनित होकर

श्वांस की साँय -साँय करती ध्वनि
सौ मील प्रतिघंटा की रफ़्तार से
चलने वाली वेगवती हवाओं को भी
प्रतिस्पर्धा दे रही है

दिशाओं ने भी छोड़ दिया है
चतुष्कोण या अष्ट कोण बनाना
मन की दसों दिशाओं से उठती
हुआं – हुआं की आवाजें
सियारों की चीखों को भी
शर्मसार कर रही हैं

क्या अब तक नहीं पहुँची
मेरी रूह के टूटते तारे की आवाज़ तुम तक?

उफ़ सिर्फ एक बार आवाज़ दो
साँस थमने से पहले
जान निकलने से पहले
धडकनों के रुकने से पहले
(पपड़ाए अधरों की बोझिल प्यास फ़ना होने से पहले)

ये इश्क के चबूतरों पर बाजरे के दाने हमेशा बिखरते क्यों हैं प्रेमियों के चुगने से पहले जानां!!

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