वज़ीर आग़ा की रचनाएँ

सितम हवा का अगर तेरे तन को रास नहीं 

सितम हवा का अगर तेरे तन को रास नहीं
कहाँ से लाऊँ वो झोंका जो मेरे पास नहीं

पिघल चुका हूँ तमाज़त[1] में आफ़ताब की मैं
मेरा वजूद भी अब मेरे आस-पास नहीं

मेरे नसीब में कब थी बरहनगी[2] अपनी
मिली वो मुझ को तमन्ना की बे-लिबास नहीं

किधर से उतरे कहाँ आ के तुझसे मिल जाए
अभी नदी के चलन से तू रु-शनास[3] नहीं

खुला पड़ा है समंदर किताब की सूरत
वही पढ़े इसे आकर जो ना-शनास नहीं

लहू के साथ गई तन-बदन की सब चहकार
चुभन सबा में नहीं है कली में बास नहीं

धूप के साथ गया साथ निभाने वाला

धूप के साथ गया, साथ निभाने वाला
अब कहाँ आएगा वो, लौट के आने वाला

रेत पर छोड़ गया, नक़्श हज़ारों अपने
किसी पागल की तरह, नक़्श मिटाने वाला

सब्ज़[1] शाखें कभी, ऐसे तो नहीं चीखतीं हैं
कौन आया है, परिंदों को डराने वाला

आरिज़-ए-शाम[2] की सुर्ख़ी ने, किया फ़ाश उसे
पर्दा-ए-अब्र[3] में था, आग लगाने वाला

सफ़र-ए-शब का तक़ाज़ा है, मेरे साथ रहो
दश्त पुर-हौल है, तूफ़ान है आने वाला

मुझ को दर-पर्दा सुनाता रहा, क़िस्सा अपना
अगले वक़्तों की, हिकायात[4] सुनाने वाला

शबनमी घास, घने फूल, लरज़ती किरणें
कौन आया है, ख़ज़ानों को लुटाने वाला

अब तो आराम करें, सोचती आँखें मेरी
रात का आख़िरी तारा भी है, जाने वाला

दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था 

दिन ढल चुका था और परिंदा सफ़र में था
सारा लहू बदन का रवाँ खिष्ट-ओ-पर में था

हद-ए-उफ़क़ पे शाम थी ख़ेमे में मुंतज़र
आँसू का इक पहाड़-सा हाइल नज़र में था

जाते कहाँ कि रात की बाहें थीं मुश्त-इल
छुपते कहाँ कि सारा जहाँ अपने घर में था

लो वो भी नर्म रेत के टीले में ढल गया
कल तक जो एक कोह -ए-गिराँ रहगुज़र में था

उतरा था वहशी चिड़ियों का लश्कर ज़मीन पर
फिर इक भी नर्म पात न सारे शहर में था

पागल-सी इक सदा किसी उजड़े मकाँ में थी
खिड़की में इक चिराग़ भरी दोपहर में था

उस का बदन था ख़ून की हिद्दत से शोला-फ़िश
सूरज का इक गुलाब-सा तिश्त-ए-सहर में था

लुटा कर हमने पत्तों के ख़ज़ाने

लुटा कर हमने पत्तों के ख़ज़ाने
हवाओं से सुने क़िस्से पुराने

खिलौने बर्फ़ के क्यूं बन गये हैं
तुम्हारी आंख में अश्कों के दाने

चलो अच्छा हुआ बादल तो बरसा
जलाया था बहुत उस बेवफ़ा ने

ये मेरी सोचती आँखे कि जिनमे
गुज़रते ही नहीं गुज़रे ज़माने

बिगड़ना एक पल में उसकी आदत
लगीं सदियां हमें जिसको मनाने

हवा के साथ निकलूंगा सफ़र को
जो दी मुहलत मुझे मेरे ख़ुदा ने

सरे-मिज़गा वो देखो जल उठे हैं
दिये जितने बुझाये थे हवा ने

बारिश हुई तो धुल के सबुकसार हो गए 

बारिश हुई तो धुल के सबुकसार हो गये
आंधी चली तो रेत की दीवार हो गये

रहवारे-शब के साथ चले तो पियादा-पा
वो लोग ख़ुद भी सूरते-रहवार हो गये

सोचा ये था कि हम भी बनाएंगे उसका नक़्श
देखा उसे तो नक़्श-ब-दीवार हो गये

क़दमों के सैले-तुन्द से अब रास्ता बनाओ
नक्शों के सब रिवाज तो बेकार हो गये

लाज़िम नहीं कि तुमसे ही पहुंचे हमें गज़न्द
ख़ुद हम भी अपने दर-पये-आज़ार हो गये

फूटी सहर तो छींटे उड़े दूर-दूर तक
चेहरे तमाम शहर के गुलनार हो गये

सावन का महीना हो

सावन का महीना हो
हर बूंद नगीना हो

क़ूफ़ा हो ज़बां उसकी
दिल मेरा मदीना हो

आवाज़ समंदर हो
और लफ़्ज़ सफ़ीना हो

मौजों के थपेड़े हों
पत्थर मिरा सीना हो

ख़्वाबों में फ़क़त आना
क्यूं उसका करीना हो

आते हो नज़र सब को
कहते हो, दफ़ीना हो

कहने पे भरोसा कर 

कहने पर भरोसा कर
कहने कर के हाथों का
ये सारा तमाशा
दास्तान में
रंग भरने, लफ्ज़ चुनने
मुंहानी किरदार को देह-चाँद करने का ये फन
गजरे के डोरे में बँधे
कच्चे कहने से मोहब्बत के नुमाइश का जतन
ये सहर करे ….सब के सब
पुख़्ता, बहुत पुख़्ता अदाकारे का हिस्सा है
तू इस से देर-गुज़र कर
और काले दियो के चुंगल से
चिड़िया को बचा
फिर देख वो कैसे फ़िज़ा में
चार सू अठखेलियाँ करती चहकती है
वो अपनी ज़िंदगी
खुद आप करती है बसर कैसे
तू देखेगा

कहने पर भरोसा कर

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