वर्तिका नन्दा की रचनाएँ

अश्क में भी हँसी है-1

लगता है
दिल का एक टुकड़ा
रानीखेत के उस बड़े मैदान के पास
पेड़ की छाँव के नीचे ही रह गया
उस टुकड़े ने प्यार देखा था
उसे वहीं रहने दो
वो कम से कम सुखी तो है

अश्क में भी हँसी है-2

पानी में जिस दिन किश्ती चली थी
तुम तब साथ थे
तब डूबते-डूबते भी लगा था
पानी क्या बिगाड़ लेगा

अश्क में भी हँसी है-3

फ़लासिफ़ा सिर्फ़ इतना ही है कि
असीम नफ़रत
असीम पीड़ा
या असीम प्रेम से
निकलती है
गोली, ग़ाली या फिर
कविता

एक अदद इंतज़ार /

सपने बेचने का मौसम आ गया है।

रंग-बिरंगे पैकेज में
हाट में सजाए जाएँगे- बेहतर रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई के सपने।

सपनों की हाँक होगी मनभावन
नाचेंगें ट्रकों पर मदमस्त हुए
कुछ फिल्मी सितारे भी
रटेंगे डायलाग और कभी भूल भी जाएँगे
किस पार्टी का करना है महिमा गान।

जनता भी डोलेगी
कभी इस पंडाल कभी उस
माइक पकड़े दिखेगें उनमें कई जोकर से
जो झूठ बोलेगें सच की तरह

और जब होगा चुनाव
अंग्रेज़दां भारतीय उस दिन
देख रहे होंगे फिल्म
या कर रहे होंगे लंदन में शापिंग
युवा खेलेंगे क्रिकेट
और हाशिए वाले लगेंगे लाइनों में
हाथी, लालटेन, पंजे या कमल
लंबी भीड़ में से किसी एक को चुनने।

वो दिन होगा मन्नत का
जन्नत जाने के सपनों का
दल वालों को मिलेंगे पाप-पुण्य के फल।

उस दिन मंदिर-मस्जिद की तमाम दीवारें ढह जाएँगी
चश्मे की धूल हो जाएगी खुद साफ़
झुकेगा सिर इबादत में
दिल में उठेगी आस
कि एक बार – बस एक बार और
कुर्सी किसी तरह आ जाए पास।

सच तो है।

अगली पीढ़ियों के लिए आरामतलबी का सर्टिफिकेट
इतनी आसानी से तो नहीं मिल सकता।

रचनाकाल : ३ नवंबर २००८

एक था चंचल

चंचल –
यही नाम था उसका
जब दिल्ली में बम फटा तो
उसने अपने कंधों को खून भरे कराहते लोगों को
उठाने में लगा दिया
बाहें उस लड़की को बचाने को मचल उठीं
जो अभी-अभी हरी चूड़ियां खरीद कर
दुकान से बाहर आई थी।

चंचल भागा
एक-एक को उठा सरकारी अस्पताल की तरफ।

वो हांफ गया।

पत्नी का फोन आया इस बीच –
कि ठीक तो हो
वो बोला – हां आज जी रहा हूं
दूसरों को बचाते हुए
सुनाई दे रही है
जिंदगी की धड़कन
इसलिए बात न करो
बस, जज्बातों के लिए बहने दो।

वो खुद खून से लथपथ था।

तभी कैमरे आए
पुलिस भी।

सायरनों के बीच
कोई लपका
चंचल को उठाने
वो बदहवास जो दिखता था!

लेकिन वो बोला- वो ठीक है
जिंदगी अभी उसके करीब है।

चंचल कुछ घंटे यही करता रहा
उसके पास उसके कंधे थे
और अपना हाथ था जगन्नाथ

एक कैमरे ने खींची उसकी तस्वीर
(और छापी भी अगले दिन)
लेकिन चंचल रहा बेपरवाह।

जब उसके हिस्से का काम खत्म हुआ
वो चल निकला।

अब उसने वो खाली-बिखरी जगह
मीडिया, पुलिस और नेताओं के लिए छोड़ दी।

३ नवंबर २००८

प्रेम

मुमकिन है बहुत कुछ
आसमान से चिपके तारे अपने गिरेबां में सजा लेना
शब्दों की तिजोरी को लबालब भर लेना

देखो तो इंद्रधनुष में ही इतने रंग आज भर आए
और तुम लगे सोचने
ये इंद्रधनुष को आज क्या हो गया!

सुर मिले इतने कि पूछा खुद से
ये नए सुरों की बारात यकायक कहां से फुदक आई?

भीनी धूप से भर आई रजाई
मन की रूई में खिल गए झम-झम फूल

प्रियतम,
यह सब संभव है, विज्ञान से नहीं,
प्रेम में आंखें खुली हों या मुंदी
जो प्रेम करता है

क्योंकि कविता भी बदलती है

बचपन में कविता लिखी
तो ऐसा उल्लास छलका
कि कागजों के बाहर आ गया।

यौवन की कविता
बिना शब्दों के भी
सब बुदबुदाती गई ।

उम्र के आखिरी पड़ाव में
मौन शून्यता के दरम्यान
मन की चपलता
कालीन के नीचे सिमट आई।

अब उस पर कविता लिखती औरत के पांव हैं
बुवाइयों भरे।

गजब है

बात में दहशत
बे-बात में भी दहशत
कुछ हो शहर में
तो भी
कुछ न हो तो भी

चैन न दिन में
न रैन में

मौसम गुनगुनाए तो भी
बरसाए तो भी
शहनाई हो तो भी
न हो तो भी
हंसी आए मस्त तो भी
बेहंसी में भी

गजब ही है भाई
न्यूजरूम !

नेलपालिश

जब भी सपने बुनने की धुन में होती हूं
गाती हूं अपने लिखे गीत
अपने कानों के लिए
तो लगाने लगती हूं जाने-अनजाने अपने नाखूनों पर नेलपालिश।

एक-एक नाखून पर लाल रंग की पालिश
जब झर-झर थिरकने लगती है
मैं और मेरा मन-दोनों
रंगों से लहलहा उठते हैं।

इसलिए मुझसे
मेरे होठों की अठखेलियों का हक
भले ही लूटने की कोशिश कर लो
लेकिन नेलपालिश चिपकाने का
निजी हक
मुझसे मत छीनना।
नाखूनों पर चिपके ये रंग
मेरे अश्कों को
जरा इंद्रधनुषी बना देते हैं और
मुझे भी लगने लगती है
जिंदगी जीने लायक।

तुम नहीं समझोगे
ये नाखून मुझे चट्टानी होना सिखाते हैं।
इनके अंदर की गुलाबी त्वचा
मन की रूई को जैसे समेटे रखती है।

ये लाल-गुलाबी नेलपालिश की शीशियां
मेरे बचपन की सखी थीं
अब छूटते यौवन का प्रमाण।

ड्रैसिंग टेबल पर करीने से लगी ये शीशियां
मुझे सपनों के ब्रश को
अपने सीने के कैनवास पर फिराने में मदद करती हैं।
ये मेरा उड़नखटोला हैं।
मुझे इनसे खेलने दो।

पत्रकार होने से क्या होता है?
मन को भाती तो
नेलपालिश की महक ही है,
माइक की खुरदराहट नहीं।

सच यही है 

बेटा पैदा होता है
ताउम्र रहता है बेटा ही।

बेटी पैदा होती है
और कुछ ही दिनों में
बन जाती है बेटा।

फिर ताउम्र वह रहती है
बेटी भी-बेटा भी।

पीएम की बेटी

पीएम की बेटी ने
किताब लिखी है।
वो जो पिछली गली में रहती है
उसने खोल ली है अब सूट सिलने की दुकान
और वो जो रोज बस में मिलती है
उसने जेएनयू में एमफिल में पा लिया है एडमिशन।
पिता हलवाई हैं और
उनकी आंखों में अब खिल आई है चमक।

बेटियां गढ़ती ही हैं।
पथरीली पगडंडियां
उन्हे भटकने कहां देंगीं!
पांव में किसी ब्रांड का जूता होगा
तभी तो मचाएंगीं हंगामा बेवजह।
बिना जूतों के चलने वाली ये लड़कियां
अपने फटे दुपट्टे कब सी लेती हैं
और कब पी लेती हैं
दर्द का जहर
खबर नहीं होती।

ये लड़कियां बड़ी आगे चली जाती हैं।

ये लड़कियां चाहे पीएम की हों
या पूरनचंद हलवाई की
ये खिलती ही तब हैं
जब जमाना इन्हे कूड़ेदान के पास फेंक आता है
ये शगुन है
कि आने वाली है गुड न्यूज।

टीवी एंकर और वो भी तुम

किसने कहा था तुमसे कि
पंजाब के गांव में पैदा हो
साहित्य में एम ए करो
सूट पहनो
और नाक में गवेली सी नथ भी लगा लो

बाल इतने लंबे रखो कि माथा छिप ही जाए
और आंखें बस यूं ही बात-बिन बात भरी-भरी सी जाएं।

किसने कहा था दिल्ली के छोटे से मोहल्ले में रहो
और आडिशन देने बस में बैठी चली आओ
किसने कहा था
बिना परफ्यूम लगाए बास के कमरे में धड़ाधड़ पहुंच जाओ
किसने कहा था
हिंदी में पूछे जा रहे सवालों के जबाव हिंदी में ही दो
किसने कहा था कि ये बताओ कि
तुम्हारे पास कंप्यूटर नहीं है
किसने कहा था बोल दो कि
पिताजी रिटायर हो चुके हैं और घर पर अभी मेहनती बहनें और एक निकम्मा भाई है
क्यों कहा तुमने कि
तुम दिन की शिफ्ट ही करना चाहती हो
क्यों कहा कि
तुम अच्छे संस्कारों में विश्वास करती हो
क्यों कहा कि तुम
‘ सामाजिक सरोकारों ‘ पर कुछ काम करना चाहती हो

अब कह ही दिया है तुमने यह सब
तो सुन लो
तुम नहीं बन सकती एंकर।

तुम कहीं और ही तलाशो नौकरी
किसी कस्बे में
या फिर पंजाब के उसी गांव में
जहां तुम पैदा हुई थी।

ये खबरों की दुनिया है
यहां जो बिकता है, वही दिखता है
और अब टीवी पर गांव नहीं बिकता
इसलिए तुम ढूंढो अपना ठोर
कहीं और।

फिर मैं क्यों बोलूं

शहर के लोग अब कम बोलते हैं
वे दिखते हैं बसों-ट्रेनों में लटके हुए
कार चलाते
दफ्तर आते-जाते हुए
पर वे बोलते नहीं।

न तो समय होता है बोलने का
न ताकत
न बोलने-बतियाने का कोई खास सामान।

राजनीति और अपराध पर भी
अब बहुत बातें नहीं होतीं।

शहर के लोग शायद अब थकने लगे हैं
या फिर जानने लगे हैं
ऐसे शब्दों का क्या भरोसा
जो उड़कर नहीं जाते सियासत तक।

इसलिए शहर के लोग अब तब बोलेंगें
जब पांच साल होंगे पूरे
तब तक बोलना
बोलना नहीं
अपने अंदर के सच को काटना ही होगा।

बस यूं ही

पानी बरसता है बाहर
अंदर सूखा लगता है
बाहर सूखा
तो अंदर भीगा
हवा चलती है
मन चंचल
कुछ ज्यादा बेचैन हो उठता है।
सियासत होती है
अंदर बगावत हो जाती है
दिक्कत फितरत में है
या बाहर ही कुछ चटक गया है।
(2)
रब से जब भी मिलने गए
हाथ जोड़े
फरमाइश की फेहरिस्त थमा दी
कुछ यूं जैसे
आटे चावल की लिस्ट हो।

मोल भाव भी किया वैसे ही
कि पहली नहीं है
तो दूसरी ही दे दो
नहीं तो तीसरी।
जो दो रहे हो, वो जरा अतिरिक्त देना
और मुझसे लेने के वक्त रखना एहतियात।

रब के यहां डिस्काउंट नहीं लगता
नहीं मिलती सेल की खबर
पर जमीन के दुकानदार तब भी कर ही डालते हैं
अपनी दुकानदारी।

औरत

सड़क किनारे खड़ी औरत
कभी अकेली नहीं होती
उसका साया होती है मज़बूरी
आँचल के दुख
मन में छिपे बहुत से रहस्य

औरत अकेली होकर भी
कहीं अकेली नहीं होती

सींचे हुए परिवार की यादें
सूखे बहुत से पत्ते
छीने गए सुख
छीली गई आत्मा

सब कुछ होता है
ठगी गई औरत के साथ

औरत के पास
अपने बहुत से सच होते हैं
उसके नमक होते शरीर में घुले हुए

किसी से संवाद नहीं होता
समय के आगे थकी इस औरत का

सहारे की तलाश में
मरूस्थल में मटकी लिए चलती यह औरत
साँस भी डर कर लेती है
फिर भी

ज़रूरत के तमाम पलों में
अपनी होती है

एक मामूली औरत

आँखों के छोर से
पता भी नहीं चलता
कब आँसू टपक आता है और तुम कहते हो
मैं सपने देखूँ ।

तुम देख आए तारे ज़मी पे
तो तुम्हें लगा कि सपने
यूँ ही संगीत की थिरकनों के साथ उग आते हैं ।

नहीं, ऐसे नहीं उगते सपने ।

मैं औरत हूँ
अकेली हूँ
पत्रकार हूँ ।

मैं दुनिया भर के सामने फौलादी हो सकती हूँ
पर अपने कमरे के शीशे के सामने
मेरा जो सच है,
वह सिर्फ मुझे ही दिखता है
और उसी सच में, सच कहूँ,
सपने कहीं नहीं होते ।

तुमसे बरसों मैनें यही माँगा था
मुझे औरत बनाना, आँसू नहीं
तब मैं कहाँ जानती थी
दोनों एक ही हैं ।

बस, अब मुझे मत कहो
कि मैं देखूँ सपने
मैं अकेली ही ठीक हूँ
अधूरी, हवा-सी भटकती ।

पर तुम यह सब नहीं समझोगे
समझ भी नहीं सकते
क्योंकि तुम औरत नहीं हो
तुमने औरत के गर्म आँसू की छलक
अपनी हथेली पर रखी ही कहाँ ?

अब रहने दो
रहने दो कुछ भी कहना
बस मुझे ख़ुद में छलकने दो
और अधूरा ही रहने दो ।

वह पेड़

लोकाट को वो पेड़
पठानकोट के बंगले के सामने वाले हिस्से में
एक महिला चौकीदार की तरह तैनात रहता था।

फल रसीला
मोटे पत्तों से ढका।

तब घर के बाहर गोलियां चला करती थीं
पंजाब सुलग रहा था
कर्फ्यू की खबर सुबह के नाश्ते के साथ आती थी
कर्फ्यू अभी चार दिन और चलेगा
ये रात के खाने का पहला कौर होता था।

बचपन के तमाम दिन
उसी आतंक की कंपन में गुजरे
नहीं जानते थे कि कल अपनी मुट्ठी में आएगा भी या नहीं
मालूम सिर्फ ये था कि
बस यही पल, जो अभी सांसों के साथ सरक रहा है,
अपना है।

लेकिन लोकाट के उस पेड़ को कोई डर नहीं था
गिलहरी उस पर खरगोश की तरह अठखेलियां करती
चिड़िया अपनी बात कहती
मैं स्कूल से आती तो
लोकाट के उस पेड़ के साथ छोटा सा संवाद भी हो जाता।

पंजाब में अब गोलियों की आवाज चुप है
तब जबकि बचपन के दिन भी गुजर गए
लेकिन आज भी जब-तब याद आते हैं
कर्फ्यू के वे अनचाहे बिन-बुलाए डरे दिन
और लोकाट का वह मीठा पेड़।

ख़ुशामदीद

पी०एम० की बेटी ने
क़िताब लिखी है
वो जो पिछली गली में रहती है
उसने खोल ली है अब सूट सिलने की दुकान
और वो जो रोज़ बस में मिलती है
उसने जे०एन०यू० में एम०फ़िल० में पा लिया है एडमीशन।
पिता हलवाई हैं और
उनकी आँखों में अब खिल आई है चमक

बेटियाँ गढ़ती ही हैं।
पथरीली पगडंडियाँ
उन्हें भटकने कहाँ देंगी!
पाँव में किसी ब्रांड का जूता होगा
तभी तो मचाएंगी हंगामा बेवज़ह।

बिना जूतों के चलने वाली ये लड़कियाँ
अपने फटे दुपट्टे कब सी लेती हैं
और कब पी लेती हैं
दर्द का ज़हर
ख़बर नहीं होती।

ये लड़कियाँ बड़ी आगे चली जाती हैं।

ये लड़कियाँ चाहे पी०एम० की हों
या पूरचन्द हलवाई की
ये खिलती ही तब हैं
जब ज़माना इन्हें कूड़ेदान के पास फेंक आता है
ये शगुन है
कि आने वाली है गुड न्यूज़।

बहूरानी

बड़े घर की बहू को कार से उतरते देखा
और फिर देखीं अपनी
पाँव की बिवाइयाँ
फटी जुराब से ढकी हुईं
एक बात तो मिलती थी फिर भी उन दोनों में-
दोनों की आँखों के पोर गीले थे

पैदाइश 

फ़लसफ़ा सिर्फ़ इतना ही है कि
असीम नफ़रत
असीम पीड़ा या
असीम प्रेम से
निकलती है
गोली, ग़ाली या फिर
कविता

गज़ब है

बात में दहशत
बेबात में भी दहशत
कुछ भी हो शहर में, तो भी
कुछ न हो तो भी
चैन न दिन में
न रैन में।

मौसम गुनगुनाए तो भी
बरसाए तो भी
शहनाई हो तो भी
न हो तो भी
हँसी आए मस्त तो भी
बेहँसी में भी

गज़ब ही है भाई
न्यूज़रूम

बलात्कार

लड़की का बलात्कार हुआ था
मीडिया पूछ रही थी
कैसा लग रहा है उसे
जिस युवक ने किया था
शादी का वादा
वो उसके घर का रास्ता
अब खोज नहीं पाता
अब है फिर पास वही माँ

सहारा देने की ताक़त पुरूष में कहाँ
इस ताक़त के कैप्सूल अभी बने नहीं

मैं-मैं और मैं- यानी एक पत्रकार

कसाईगिरी

तुम और हम एक ही काम करते हैं
तुम सामान की हाँक लगाते हो
हम ख़बर की ।
तुम पुरानी बासी सब्ज़ी को नया बताकर
रूपए वसूलते हो
हम बेकार को ‘खास’ बताकर टी०आर०पी० बटोरते हैं
लेकिन तुममें और हममें कुछ फ़र्क भी है।

तुम्हारी रेहड़ी से खरीदी बासी सब्ज़ी
कुकर पर चढ़कर जब बाहर आती है
तो किसी की ज़िंदगी में बड़ा तूफ़ान नहीं आता।

तुम जब बाज़ार में चलते हो
तो ख़ुद को अदना-सा दुकानदार समझते हो
तुम सोचते हो कि
रेहड़ी हो या हट्टी
तुम हो जनता ही
बस तुम्हारे पास एक दुकानदारी है
और औरों के पास सामान खऱीदने की कुव्वत।

तुम हमारी तरह फूल कर नहीं चलते
तुम्हें नहीं गुमान कि
तुम्हारी दुकान से ही मनमोहन सिंह या आडवाणी के घर
सब्ज़ी जाती है
लेकिन हमें गुमान है कि
हमारी वजह से ही चलती है
जनसत्ता और राजसत्ता।

हम मानते हैं
हम सबसे अलहदा हैं
खास और विशिष्ट हैं।

पर एक फ़र्क हममें और तुममें ज़रा बड़ा है
तुम कसाई नहीं हो
और हम पेशे के पहले चरण में ही
उतर आए हैं कसाईगिरी पर।

मैं और मेरे टीचर 

परी- यही नाम है उसका
बस एक झलक पाते ही मन में बारिश की फुहार हो जाती है।

परी कुछ नहीं मांगती
हमारी तरह मांग के कटोरे लेकर फिरना शायद उसकी फितरत ही नहीं।

परी पिंजरे के निचले हिस्से में सोती है
राजा ऊपरी हिस्से में झूले पर

राजा सोकर उठता है
परी को हौले अपने पाँव से ठोकर देता है, उसे जगाता है
जतलाता है कि ये मर्दाना अधिकार की बात तो वह भी जानता है !

लेकिन परी और राजा जब गाड़ी की अगली सीट पर बैठते हैं
तो अठखेलियाँ खाते पिंजरे में डर जाते हैं
एक ही झूले पर बैठकर लग जाते हैं – एक-दूसरे के गले
संकट में साथ के मायने दोनों जानते हैं।

लेकिन ताज्जुब
घर में दिनभर अकेले अपने पिंजरे में बंद दोनों जाने क्या सोचते हैं!

मैनें उनके पिंजरे के नीचे नरम घास का बिछौना बना दिया है
उन्हें यह मखमली कुदरती बिछौना बहुत पसंद भी आया है

परी मेरी बेटी नहीं है
राजा दामाद नहीं है
लेकिन मैनें मन ही में करा दी है उनकी शादी।
अकेले नहीं रखना चाहती थी मैं परी को
जानती हूँ अकेली को निगल लेती है दुनिया।

दोनों इंसान नहीं हैं
लेकिन फिर भी हैं तो दो फुदकते जीव
दोनों तो बस आँखों की पलकों में बस गए हैं।

आप चाहें तो उन्हें तोता कह सकते हैं
आपकी आँखों को वे तोते ही दिखेंगें
लेकिन मेरे लिए तो वो मेरे सपनों का उड़नखटोला हैं
मेरे अपने पंख हैं
उनके पास मेरी बात सुनने का वक़्त है
और मन भी!

मेरे लिए वो एक परी है
और पिंजरे के ऊपरी झूले में बैठकर अपनी चोंच से परी को सहलाने वाला एक राजा।

नहीं – मुझे अभी उन्हें आकाश में नहीं छोड़ना।
ये मेरे कमरे में ही फुदकेंगें
मेरे आँगन में चहकेंगें
कैसे छोड़ दूँ दो महीने के इन जीवों को बाहर की दुनिया में
हम करेंगे आपस में बातें
पिंजरे के अंदर के जीव और पिंजरे के बाहर के इंसान की

मैं जानती हूँ ये मेरे स्कूल के पहले टीचर हैं और
अभी तो हमारा सफ़र शुरू ही हुआ है।

मीडिया नगरी

किताब में पढ़ लिया
और तुमने मान भी लिया
कि मीडिया सच का आईना है !

तुमने जिल्द पर शायद देखा नहीं
वो किताब तो पिछली सदी में लिखी गई थी
तब से अब तक में ‘सच’ न जाने कितनी पलटियाँ ले चुका
और तुम अभी भी यही मान रही हो
कि मीडिया सच को दिखाता है !

सुनो
नई परिभाषा ये है कि
मीडिया सच पर नहीं
टी०आर०पी० पर टिका है

पर एक सच और है

मीडिया मजबूर है
और जो खुद मजबूर है
वो तुम्हें रास्ता क्या-कैसे दिखाए

हाँ, तुम ठीक कहती हो
हम-तुम दोनों मिलकर एक नए मीडिया की तलाश करते हैं
बोलो, मंगल पर चलें या प्लूटो पर
अब यह तो तुम ही तय करो
लेकिन सुनो
वक़्त गुज़ारने के लिए
ये सपना अच्छा है न!

वो बत्ती, वो रातें

बचपन में
बत्ती चले जाने में भी
गजब का सुख था
हम चारपाई पे बैठे तारे गिनते
एक कोने से उस कोने तक
जहाँ तक जाती नज़र

हर बार गिनती गड़बड़ा जाती
हर बार विश्वास गहरा जाता
अगली बार होगी सही गिनती

बत्ती का न होना
सपनों के लहलहा उठने का समय होता
सपने उछल-मचल आते
बड़े होंगे तो जाने क्या-क्या न करेंगें

बत्ती के गुल होते ही
जुगनू बनाने लगते अपना घेरा
उनकी सरगम सुख भर देती
पापा कहते भर लो जुगनू हथेली में

अम्मा हँस के पूछती
कौन-सी पढ़ी नई कविता
पास से आती घास की ख़ुशबू में
कभी पूस की रात का ख्याल आता
कभी गौरा का

तभी बत्ती आ जाती
उसका आना भी उत्सव बनता
अम्मा कहती
होती है ज़िंदगी भी ऐसी ही
कभी रौशन, कभी अंधेरी
सच में बत्ती का जाना
खुले आसमान में देता था जो संवाद
उसे वो रातें ही समझ सकती हैं
जब होती थी बत्ती गुल।

मंगलसूत्र 

पति को याद नहीं होता
पत्नी का जन्मदिन
उसकी पसंद
कोई नापसंद
उसके खाने का समय
उसकी ख़ुशियाँ
उसके मायके का रास्ता
या यह भी कि शायद कोई रहता भी है
उस घर में

पति को नहीं रहता अहसास यह भी
कि पत्नी को क्यों याद रहता है
उसकी बनियान सूखी या नहीं
सब्जी उसके स्वाद की बनी या नहीं
ज़रूरत तो नहीं कहीं
उसके सर को मालिश की
कहीं थक तो नहीं गया वो बेचारा बहुत ज़्यादा

पत्नी को सब याद रहता है
पति के बॉस का बर्थ-डे और
उनके कुत्तों के नाम
उसकी बहनों के पते और
उन्हें पड़ने वाले काम

पर पति की याद्दाश्त होती है
कमज़ोर ही
आख़िर वो पति जो है

सफ़र में धूप तो होगी, चल सको तो चलो

एकला कोई नहीं चलता
साथ चलते हैं अपने हिस्से के पत्थर
किसी और के दिए पठार
नमक के टीले
जिम्मेदारी से लदे जिद्दी पहाड़
दुखों के गट्ठर

कभी कभी होता ऐसा भी है
साथ चल पड़ते हैं मीठे कुछ ख्याल
किसी के होंठों से फूटती महकती हंसी
सरकती युवा हवा
बारीक लकीर सी कोई खुशी

ये सब आते हैं, कभी भी चले जाते हैं
ठिकाना कभी तय नहीं
खानाबदोशी, बदहवासी, उखड़े कदम
लेकिन इन सबमें टिके रहती है
पैरों के नीचे की जमीन
सर का टुकड़ा आसमान
उखड़ी-संभली सांसें
और एक अदद दिल

एकला कहां, कौन, कैसे

सुर

कोई सुर अंदर ही बजता है कई बार
दीवार से टकराता है
बेसुरा नहीं होता फिर भी

कितनी ही बार छलकता है जमीन पर
पर फैलता नहीं

नदी में फेंक डालने की साजिश भी तो हुई इस सुर के साथ बार-बार
सुर बदला नहीं

सुर में सुख है
सुख में आशा
आशा में सांस का एक अंश
इतना अंश काफी है
मेरे लिए, मेरे अपनों के लिए, तुम्हारे लिए, पूरे के पूरे जमाने के लिए
पर इस सुर को
कभी सहलाया भी है ?
सुर में भी जान है
क्यों भूलते हो बार-बार

चौरासी हजार योनियों के बीच

सहम-सहम कर जीते-जीते
अब जाने का समय आ गया।

डर रहा हमेशा
समय पर कामों के बोझ को निपटा न पाने का
या किसी रिश्ते के उधड़
या बिखर जाने का।

उम्र की सुरंग हमेशा लंबी लगी – डरों के बीच।

थके शरीर पर
यौवन कभी आया ही नहीं
पैदाइश बुढ़ापे के पालने में ही हुई थी जैसे।

डर में निकली सांसें बर्फ थीं
मन निष्क्रिय
पर ताज्जुब
मौत ने जैसे सोख लिया सारा ही डर।

सुरंग के आखिरी हिस्से से
छन कर आती है रौशनी यह
शरीर छूटेगा यहां
आत्मा उगेगी फिर कभी
तब तक
कम-से-कम, तब तक
डर तो नहीं होगा न!

आबूदाना

पता बदल दिया है
नाम
सड़क
मोहल्ला
देश और शहर भी

बदल दिया है चेहरा
उस पर ओढ़े सुखों के नकाब
झूठी तारीफ़ों के पुलिंदों के पुल

दरकते शीशे के बचे टुकड़े
उधड़े हुए सच

छुअन के पल भी बदल दिए हैं
संसद के चौबारे में दबे रहस्यों की आवाज़ें भी
खंडहर हुई इमारतों में दबे प्रेम के तमाम क़िस्सों पर
मलमली कपड़ों की अर्थी बिछा देने के बाद
चाँद के नीचे बैठने का अजीब सुख है

सुख से संवाद
चाँद से शह
तितली से फुदक माँग कर
एक कोने में दुबक
अतीत की मटमैली पगडंडी पर
अकेले चलना हो
तो कहना मत, ख़ुद से भी

ख़ामोश रास्तों पर ज़रूरी होता है ख़ुद से भी बच कर चलना

पुश्तैनी मकान

सड़क किनारे खड़ी औरत
कभी अकेले नहीं होती
उसका साया होती है मजबूरी
आंचल के दुख
मन में छिपे बहुत से रहस्य

औरत अकेली होकर भी
कहीं अकेली नहीं होती

सींचे हुए परिवार की यादें
सूखे बहुत से पत्ते
छीने गए सुख
छीली गई आत्मा

सब कुछ होता है
ठगी गई औरत के साथ

औरत के पास
अपने बहुत से सच होते हैं
उसके नमक होते शरीर में घुले हुए

किसी से संवाद नहीं होता
समय के आगे थकी इस औरत का

सहारे की तलाश में
मरूस्थल में मटकी लिए चलती यह औरत
साँस भी डर कर लेती है
फिर भी
ज़रूरत के तमाम पलों में
अपनी होती है

अश्क में भी हँसी है-1

लगता है
दिल का एक टुकड़ा
रानीखेत के उस बड़े मैदान के पास
पेड़ की छाँव के नीचे ही रह गया
उस टुकड़े ने प्यार देखा था
उसे वहीं रहने दो
वो कम से कम सुखी तो है

अश्क में भी हँसी है-2

पानी में जिस दिन किश्ती चली थी
तुम तब साथ थे
तब डूबते-डूबते भी लगा था
पानी क्या बिगाड़ लेगा

अश्क में भी हँसी है-3

फ़लासिफ़ा सिर्फ़ इतना ही है कि
असीम नफ़रत
असीम पीड़ा
या असीम प्रेम से
निकलती है
गोली, ग़ाली या फिर
कविता

एक अदद इंतज़ार /

सपने बेचने का मौसम आ गया है।

रंग-बिरंगे पैकेज में
हाट में सजाए जाएँगे- बेहतर रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई के सपने।

सपनों की हाँक होगी मनभावन
नाचेंगें ट्रकों पर मदमस्त हुए
कुछ फिल्मी सितारे भी
रटेंगे डायलाग और कभी भूल भी जाएँगे
किस पार्टी का करना है महिमा गान।

जनता भी डोलेगी
कभी इस पंडाल कभी उस
माइक पकड़े दिखेगें उनमें कई जोकर से
जो झूठ बोलेगें सच की तरह

और जब होगा चुनाव
अंग्रेज़दां भारतीय उस दिन
देख रहे होंगे फिल्म
या कर रहे होंगे लंदन में शापिंग
युवा खेलेंगे क्रिकेट
और हाशिए वाले लगेंगे लाइनों में
हाथी, लालटेन, पंजे या कमल
लंबी भीड़ में से किसी एक को चुनने।

वो दिन होगा मन्नत का
जन्नत जाने के सपनों का
दल वालों को मिलेंगे पाप-पुण्य के फल।

उस दिन मंदिर-मस्जिद की तमाम दीवारें ढह जाएँगी
चश्मे की धूल हो जाएगी खुद साफ़
झुकेगा सिर इबादत में
दिल में उठेगी आस
कि एक बार – बस एक बार और
कुर्सी किसी तरह आ जाए पास।

सच तो है।

अगली पीढ़ियों के लिए आरामतलबी का सर्टिफिकेट
इतनी आसानी से तो नहीं मिल सकता।

रचनाकाल : ३ नवंबर २००८

एक था चंचल

चंचल –
यही नाम था उसका
जब दिल्ली में बम फटा तो
उसने अपने कंधों को खून भरे कराहते लोगों को
उठाने में लगा दिया
बाहें उस लड़की को बचाने को मचल उठीं
जो अभी-अभी हरी चूड़ियां खरीद कर
दुकान से बाहर आई थी।

चंचल भागा
एक-एक को उठा सरकारी अस्पताल की तरफ।

वो हांफ गया।

पत्नी का फोन आया इस बीच –
कि ठीक तो हो
वो बोला – हां आज जी रहा हूं
दूसरों को बचाते हुए
सुनाई दे रही है
जिंदगी की धड़कन
इसलिए बात न करो
बस, जज्बातों के लिए बहने दो।

वो खुद खून से लथपथ था।

तभी कैमरे आए
पुलिस भी।

सायरनों के बीच
कोई लपका
चंचल को उठाने
वो बदहवास जो दिखता था!

लेकिन वो बोला- वो ठीक है
जिंदगी अभी उसके करीब है।

चंचल कुछ घंटे यही करता रहा
उसके पास उसके कंधे थे
और अपना हाथ था जगन्नाथ

एक कैमरे ने खींची उसकी तस्वीर
(और छापी भी अगले दिन)
लेकिन चंचल रहा बेपरवाह।

जब उसके हिस्से का काम खत्म हुआ
वो चल निकला।

अब उसने वो खाली-बिखरी जगह
मीडिया, पुलिस और नेताओं के लिए छोड़ दी।

३ नवंबर २००८

प्रेम

मुमकिन है बहुत कुछ
आसमान से चिपके तारे अपने गिरेबां में सजा लेना
शब्दों की तिजोरी को लबालब भर लेना

देखो तो इंद्रधनुष में ही इतने रंग आज भर आए
और तुम लगे सोचने
ये इंद्रधनुष को आज क्या हो गया!

सुर मिले इतने कि पूछा खुद से
ये नए सुरों की बारात यकायक कहां से फुदक आई?

भीनी धूप से भर आई रजाई
मन की रूई में खिल गए झम-झम फूल

प्रियतम,
यह सब संभव है, विज्ञान से नहीं,
प्रेम में आंखें खुली हों या मुंदी
जो प्रेम करता है

क्योंकि कविता भी बदलती है

बचपन में कविता लिखी
तो ऐसा उल्लास छलका
कि कागजों के बाहर आ गया।

यौवन की कविता
बिना शब्दों के भी
सब बुदबुदाती गई ।

उम्र के आखिरी पड़ाव में
मौन शून्यता के दरम्यान
मन की चपलता
कालीन के नीचे सिमट आई।

अब उस पर कविता लिखती औरत के पांव हैं
बुवाइयों भरे।

गजब है

बात में दहशत
बे-बात में भी दहशत
कुछ हो शहर में
तो भी
कुछ न हो तो भी

चैन न दिन में
न रैन में

मौसम गुनगुनाए तो भी
बरसाए तो भी
शहनाई हो तो भी
न हो तो भी
हंसी आए मस्त तो भी
बेहंसी में भी

गजब ही है भाई
न्यूजरूम !

नेलपालिश

जब भी सपने बुनने की धुन में होती हूं
गाती हूं अपने लिखे गीत
अपने कानों के लिए
तो लगाने लगती हूं जाने-अनजाने अपने नाखूनों पर नेलपालिश।

एक-एक नाखून पर लाल रंग की पालिश
जब झर-झर थिरकने लगती है
मैं और मेरा मन-दोनों
रंगों से लहलहा उठते हैं।

इसलिए मुझसे
मेरे होठों की अठखेलियों का हक
भले ही लूटने की कोशिश कर लो
लेकिन नेलपालिश चिपकाने का
निजी हक
मुझसे मत छीनना।
नाखूनों पर चिपके ये रंग
मेरे अश्कों को
जरा इंद्रधनुषी बना देते हैं और
मुझे भी लगने लगती है
जिंदगी जीने लायक।

तुम नहीं समझोगे
ये नाखून मुझे चट्टानी होना सिखाते हैं।
इनके अंदर की गुलाबी त्वचा
मन की रूई को जैसे समेटे रखती है।

ये लाल-गुलाबी नेलपालिश की शीशियां
मेरे बचपन की सखी थीं
अब छूटते यौवन का प्रमाण।

ड्रैसिंग टेबल पर करीने से लगी ये शीशियां
मुझे सपनों के ब्रश को
अपने सीने के कैनवास पर फिराने में मदद करती हैं।
ये मेरा उड़नखटोला हैं।
मुझे इनसे खेलने दो।

पत्रकार होने से क्या होता है?
मन को भाती तो
नेलपालिश की महक ही है,
माइक की खुरदराहट नहीं।

सच यही है 

बेटा पैदा होता है
ताउम्र रहता है बेटा ही।

बेटी पैदा होती है
और कुछ ही दिनों में
बन जाती है बेटा।

फिर ताउम्र वह रहती है
बेटी भी-बेटा भी।

पीएम की बेटी

पीएम की बेटी ने
किताब लिखी है।
वो जो पिछली गली में रहती है
उसने खोल ली है अब सूट सिलने की दुकान
और वो जो रोज बस में मिलती है
उसने जेएनयू में एमफिल में पा लिया है एडमिशन।
पिता हलवाई हैं और
उनकी आंखों में अब खिल आई है चमक।

बेटियां गढ़ती ही हैं।
पथरीली पगडंडियां
उन्हे भटकने कहां देंगीं!
पांव में किसी ब्रांड का जूता होगा
तभी तो मचाएंगीं हंगामा बेवजह।
बिना जूतों के चलने वाली ये लड़कियां
अपने फटे दुपट्टे कब सी लेती हैं
और कब पी लेती हैं
दर्द का जहर
खबर नहीं होती।

ये लड़कियां बड़ी आगे चली जाती हैं।

ये लड़कियां चाहे पीएम की हों
या पूरनचंद हलवाई की
ये खिलती ही तब हैं
जब जमाना इन्हे कूड़ेदान के पास फेंक आता है
ये शगुन है
कि आने वाली है गुड न्यूज।

टीवी एंकर और वो भी तुम

किसने कहा था तुमसे कि
पंजाब के गांव में पैदा हो
साहित्य में एम ए करो
सूट पहनो
और नाक में गवेली सी नथ भी लगा लो

बाल इतने लंबे रखो कि माथा छिप ही जाए
और आंखें बस यूं ही बात-बिन बात भरी-भरी सी जाएं।

किसने कहा था दिल्ली के छोटे से मोहल्ले में रहो
और आडिशन देने बस में बैठी चली आओ
किसने कहा था
बिना परफ्यूम लगाए बास के कमरे में धड़ाधड़ पहुंच जाओ
किसने कहा था
हिंदी में पूछे जा रहे सवालों के जबाव हिंदी में ही दो
किसने कहा था कि ये बताओ कि
तुम्हारे पास कंप्यूटर नहीं है
किसने कहा था बोल दो कि
पिताजी रिटायर हो चुके हैं और घर पर अभी मेहनती बहनें और एक निकम्मा भाई है
क्यों कहा तुमने कि
तुम दिन की शिफ्ट ही करना चाहती हो
क्यों कहा कि
तुम अच्छे संस्कारों में विश्वास करती हो
क्यों कहा कि तुम
‘ सामाजिक सरोकारों ‘ पर कुछ काम करना चाहती हो

अब कह ही दिया है तुमने यह सब
तो सुन लो
तुम नहीं बन सकती एंकर।

तुम कहीं और ही तलाशो नौकरी
किसी कस्बे में
या फिर पंजाब के उसी गांव में
जहां तुम पैदा हुई थी।

ये खबरों की दुनिया है
यहां जो बिकता है, वही दिखता है
और अब टीवी पर गांव नहीं बिकता
इसलिए तुम ढूंढो अपना ठोर
कहीं और।

फिर मैं क्यों बोलूं

शहर के लोग अब कम बोलते हैं
वे दिखते हैं बसों-ट्रेनों में लटके हुए
कार चलाते
दफ्तर आते-जाते हुए
पर वे बोलते नहीं।

न तो समय होता है बोलने का
न ताकत
न बोलने-बतियाने का कोई खास सामान।

राजनीति और अपराध पर भी
अब बहुत बातें नहीं होतीं।

शहर के लोग शायद अब थकने लगे हैं
या फिर जानने लगे हैं
ऐसे शब्दों का क्या भरोसा
जो उड़कर नहीं जाते सियासत तक।

इसलिए शहर के लोग अब तब बोलेंगें
जब पांच साल होंगे पूरे
तब तक बोलना
बोलना नहीं
अपने अंदर के सच को काटना ही होगा।

बस यूं ही

पानी बरसता है बाहर
अंदर सूखा लगता है
बाहर सूखा
तो अंदर भीगा
हवा चलती है
मन चंचल
कुछ ज्यादा बेचैन हो उठता है।
सियासत होती है
अंदर बगावत हो जाती है
दिक्कत फितरत में है
या बाहर ही कुछ चटक गया है।
(2)
रब से जब भी मिलने गए
हाथ जोड़े
फरमाइश की फेहरिस्त थमा दी
कुछ यूं जैसे
आटे चावल की लिस्ट हो।

मोल भाव भी किया वैसे ही
कि पहली नहीं है
तो दूसरी ही दे दो
नहीं तो तीसरी।
जो दो रहे हो, वो जरा अतिरिक्त देना
और मुझसे लेने के वक्त रखना एहतियात।

रब के यहां डिस्काउंट नहीं लगता
नहीं मिलती सेल की खबर
पर जमीन के दुकानदार तब भी कर ही डालते हैं
अपनी दुकानदारी।

औरत

सड़क किनारे खड़ी औरत
कभी अकेली नहीं होती
उसका साया होती है मज़बूरी
आँचल के दुख
मन में छिपे बहुत से रहस्य

औरत अकेली होकर भी
कहीं अकेली नहीं होती

सींचे हुए परिवार की यादें
सूखे बहुत से पत्ते
छीने गए सुख
छीली गई आत्मा

सब कुछ होता है
ठगी गई औरत के साथ

औरत के पास
अपने बहुत से सच होते हैं
उसके नमक होते शरीर में घुले हुए

किसी से संवाद नहीं होता
समय के आगे थकी इस औरत का

सहारे की तलाश में
मरूस्थल में मटकी लिए चलती यह औरत
साँस भी डर कर लेती है
फिर भी

ज़रूरत के तमाम पलों में
अपनी होती है

एक मामूली औरत

आँखों के छोर से
पता भी नहीं चलता
कब आँसू टपक आता है और तुम कहते हो
मैं सपने देखूँ ।

तुम देख आए तारे ज़मी पे
तो तुम्हें लगा कि सपने
यूँ ही संगीत की थिरकनों के साथ उग आते हैं ।

नहीं, ऐसे नहीं उगते सपने ।

मैं औरत हूँ
अकेली हूँ
पत्रकार हूँ ।

मैं दुनिया भर के सामने फौलादी हो सकती हूँ
पर अपने कमरे के शीशे के सामने
मेरा जो सच है,
वह सिर्फ मुझे ही दिखता है
और उसी सच में, सच कहूँ,
सपने कहीं नहीं होते ।

तुमसे बरसों मैनें यही माँगा था
मुझे औरत बनाना, आँसू नहीं
तब मैं कहाँ जानती थी
दोनों एक ही हैं ।

बस, अब मुझे मत कहो
कि मैं देखूँ सपने
मैं अकेली ही ठीक हूँ
अधूरी, हवा-सी भटकती ।

पर तुम यह सब नहीं समझोगे
समझ भी नहीं सकते
क्योंकि तुम औरत नहीं हो
तुमने औरत के गर्म आँसू की छलक
अपनी हथेली पर रखी ही कहाँ ?

अब रहने दो
रहने दो कुछ भी कहना
बस मुझे ख़ुद में छलकने दो
और अधूरा ही रहने दो ।

वह पेड़

लोकाट को वो पेड़
पठानकोट के बंगले के सामने वाले हिस्से में
एक महिला चौकीदार की तरह तैनात रहता था।

फल रसीला
मोटे पत्तों से ढका।

तब घर के बाहर गोलियां चला करती थीं
पंजाब सुलग रहा था
कर्फ्यू की खबर सुबह के नाश्ते के साथ आती थी
कर्फ्यू अभी चार दिन और चलेगा
ये रात के खाने का पहला कौर होता था।

बचपन के तमाम दिन
उसी आतंक की कंपन में गुजरे
नहीं जानते थे कि कल अपनी मुट्ठी में आएगा भी या नहीं
मालूम सिर्फ ये था कि
बस यही पल, जो अभी सांसों के साथ सरक रहा है,
अपना है।

लेकिन लोकाट के उस पेड़ को कोई डर नहीं था
गिलहरी उस पर खरगोश की तरह अठखेलियां करती
चिड़िया अपनी बात कहती
मैं स्कूल से आती तो
लोकाट के उस पेड़ के साथ छोटा सा संवाद भी हो जाता।

पंजाब में अब गोलियों की आवाज चुप है
तब जबकि बचपन के दिन भी गुजर गए
लेकिन आज भी जब-तब याद आते हैं
कर्फ्यू के वे अनचाहे बिन-बुलाए डरे दिन
और लोकाट का वह मीठा पेड़।

ख़ुशामदीद

पी०एम० की बेटी ने
क़िताब लिखी है
वो जो पिछली गली में रहती है
उसने खोल ली है अब सूट सिलने की दुकान
और वो जो रोज़ बस में मिलती है
उसने जे०एन०यू० में एम०फ़िल० में पा लिया है एडमीशन।
पिता हलवाई हैं और
उनकी आँखों में अब खिल आई है चमक

बेटियाँ गढ़ती ही हैं।
पथरीली पगडंडियाँ
उन्हें भटकने कहाँ देंगी!
पाँव में किसी ब्रांड का जूता होगा
तभी तो मचाएंगी हंगामा बेवज़ह।

बिना जूतों के चलने वाली ये लड़कियाँ
अपने फटे दुपट्टे कब सी लेती हैं
और कब पी लेती हैं
दर्द का ज़हर
ख़बर नहीं होती।

ये लड़कियाँ बड़ी आगे चली जाती हैं।

ये लड़कियाँ चाहे पी०एम० की हों
या पूरचन्द हलवाई की
ये खिलती ही तब हैं
जब ज़माना इन्हें कूड़ेदान के पास फेंक आता है
ये शगुन है
कि आने वाली है गुड न्यूज़।

बहूरानी

बड़े घर की बहू को कार से उतरते देखा
और फिर देखीं अपनी
पाँव की बिवाइयाँ
फटी जुराब से ढकी हुईं
एक बात तो मिलती थी फिर भी उन दोनों में-
दोनों की आँखों के पोर गीले थे

पैदाइश 

फ़लसफ़ा सिर्फ़ इतना ही है कि
असीम नफ़रत
असीम पीड़ा या
असीम प्रेम से
निकलती है
गोली, ग़ाली या फिर
कविता

गज़ब है

बात में दहशत
बेबात में भी दहशत
कुछ भी हो शहर में, तो भी
कुछ न हो तो भी
चैन न दिन में
न रैन में।

मौसम गुनगुनाए तो भी
बरसाए तो भी
शहनाई हो तो भी
न हो तो भी
हँसी आए मस्त तो भी
बेहँसी में भी

गज़ब ही है भाई
न्यूज़रूम

बलात्कार

लड़की का बलात्कार हुआ था
मीडिया पूछ रही थी
कैसा लग रहा है उसे
जिस युवक ने किया था
शादी का वादा
वो उसके घर का रास्ता
अब खोज नहीं पाता
अब है फिर पास वही माँ

सहारा देने की ताक़त पुरूष में कहाँ
इस ताक़त के कैप्सूल अभी बने नहीं

मैं-मैं और मैं- यानी एक पत्रकार

कसाईगिरी

तुम और हम एक ही काम करते हैं
तुम सामान की हाँक लगाते हो
हम ख़बर की ।
तुम पुरानी बासी सब्ज़ी को नया बताकर
रूपए वसूलते हो
हम बेकार को ‘खास’ बताकर टी०आर०पी० बटोरते हैं
लेकिन तुममें और हममें कुछ फ़र्क भी है।

तुम्हारी रेहड़ी से खरीदी बासी सब्ज़ी
कुकर पर चढ़कर जब बाहर आती है
तो किसी की ज़िंदगी में बड़ा तूफ़ान नहीं आता।

तुम जब बाज़ार में चलते हो
तो ख़ुद को अदना-सा दुकानदार समझते हो
तुम सोचते हो कि
रेहड़ी हो या हट्टी
तुम हो जनता ही
बस तुम्हारे पास एक दुकानदारी है
और औरों के पास सामान खऱीदने की कुव्वत।

तुम हमारी तरह फूल कर नहीं चलते
तुम्हें नहीं गुमान कि
तुम्हारी दुकान से ही मनमोहन सिंह या आडवाणी के घर
सब्ज़ी जाती है
लेकिन हमें गुमान है कि
हमारी वजह से ही चलती है
जनसत्ता और राजसत्ता।

हम मानते हैं
हम सबसे अलहदा हैं
खास और विशिष्ट हैं।

पर एक फ़र्क हममें और तुममें ज़रा बड़ा है
तुम कसाई नहीं हो
और हम पेशे के पहले चरण में ही
उतर आए हैं कसाईगिरी पर।

मैं और मेरे टीचर 

परी- यही नाम है उसका
बस एक झलक पाते ही मन में बारिश की फुहार हो जाती है।

परी कुछ नहीं मांगती
हमारी तरह मांग के कटोरे लेकर फिरना शायद उसकी फितरत ही नहीं।

परी पिंजरे के निचले हिस्से में सोती है
राजा ऊपरी हिस्से में झूले पर

राजा सोकर उठता है
परी को हौले अपने पाँव से ठोकर देता है, उसे जगाता है
जतलाता है कि ये मर्दाना अधिकार की बात तो वह भी जानता है !

लेकिन परी और राजा जब गाड़ी की अगली सीट पर बैठते हैं
तो अठखेलियाँ खाते पिंजरे में डर जाते हैं
एक ही झूले पर बैठकर लग जाते हैं – एक-दूसरे के गले
संकट में साथ के मायने दोनों जानते हैं।

लेकिन ताज्जुब
घर में दिनभर अकेले अपने पिंजरे में बंद दोनों जाने क्या सोचते हैं!

मैनें उनके पिंजरे के नीचे नरम घास का बिछौना बना दिया है
उन्हें यह मखमली कुदरती बिछौना बहुत पसंद भी आया है

परी मेरी बेटी नहीं है
राजा दामाद नहीं है
लेकिन मैनें मन ही में करा दी है उनकी शादी।
अकेले नहीं रखना चाहती थी मैं परी को
जानती हूँ अकेली को निगल लेती है दुनिया।

दोनों इंसान नहीं हैं
लेकिन फिर भी हैं तो दो फुदकते जीव
दोनों तो बस आँखों की पलकों में बस गए हैं।

आप चाहें तो उन्हें तोता कह सकते हैं
आपकी आँखों को वे तोते ही दिखेंगें
लेकिन मेरे लिए तो वो मेरे सपनों का उड़नखटोला हैं
मेरे अपने पंख हैं
उनके पास मेरी बात सुनने का वक़्त है
और मन भी!

मेरे लिए वो एक परी है
और पिंजरे के ऊपरी झूले में बैठकर अपनी चोंच से परी को सहलाने वाला एक राजा।

नहीं – मुझे अभी उन्हें आकाश में नहीं छोड़ना।
ये मेरे कमरे में ही फुदकेंगें
मेरे आँगन में चहकेंगें
कैसे छोड़ दूँ दो महीने के इन जीवों को बाहर की दुनिया में
हम करेंगे आपस में बातें
पिंजरे के अंदर के जीव और पिंजरे के बाहर के इंसान की

मैं जानती हूँ ये मेरे स्कूल के पहले टीचर हैं और
अभी तो हमारा सफ़र शुरू ही हुआ है।

मीडिया नगरी

किताब में पढ़ लिया
और तुमने मान भी लिया
कि मीडिया सच का आईना है !

तुमने जिल्द पर शायद देखा नहीं
वो किताब तो पिछली सदी में लिखी गई थी
तब से अब तक में ‘सच’ न जाने कितनी पलटियाँ ले चुका
और तुम अभी भी यही मान रही हो
कि मीडिया सच को दिखाता है !

सुनो
नई परिभाषा ये है कि
मीडिया सच पर नहीं
टी०आर०पी० पर टिका है

पर एक सच और है

मीडिया मजबूर है
और जो खुद मजबूर है
वो तुम्हें रास्ता क्या-कैसे दिखाए

हाँ, तुम ठीक कहती हो
हम-तुम दोनों मिलकर एक नए मीडिया की तलाश करते हैं
बोलो, मंगल पर चलें या प्लूटो पर
अब यह तो तुम ही तय करो
लेकिन सुनो
वक़्त गुज़ारने के लिए
ये सपना अच्छा है न!

वो बत्ती, वो रातें

बचपन में
बत्ती चले जाने में भी
गजब का सुख था
हम चारपाई पे बैठे तारे गिनते
एक कोने से उस कोने तक
जहाँ तक जाती नज़र

हर बार गिनती गड़बड़ा जाती
हर बार विश्वास गहरा जाता
अगली बार होगी सही गिनती

बत्ती का न होना
सपनों के लहलहा उठने का समय होता
सपने उछल-मचल आते
बड़े होंगे तो जाने क्या-क्या न करेंगें

बत्ती के गुल होते ही
जुगनू बनाने लगते अपना घेरा
उनकी सरगम सुख भर देती
पापा कहते भर लो जुगनू हथेली में

अम्मा हँस के पूछती
कौन-सी पढ़ी नई कविता
पास से आती घास की ख़ुशबू में
कभी पूस की रात का ख्याल आता
कभी गौरा का

तभी बत्ती आ जाती
उसका आना भी उत्सव बनता
अम्मा कहती
होती है ज़िंदगी भी ऐसी ही
कभी रौशन, कभी अंधेरी
सच में बत्ती का जाना
खुले आसमान में देता था जो संवाद
उसे वो रातें ही समझ सकती हैं
जब होती थी बत्ती गुल।

मंगलसूत्र 

पति को याद नहीं होता
पत्नी का जन्मदिन
उसकी पसंद
कोई नापसंद
उसके खाने का समय
उसकी ख़ुशियाँ
उसके मायके का रास्ता
या यह भी कि शायद कोई रहता भी है
उस घर में

पति को नहीं रहता अहसास यह भी
कि पत्नी को क्यों याद रहता है
उसकी बनियान सूखी या नहीं
सब्जी उसके स्वाद की बनी या नहीं
ज़रूरत तो नहीं कहीं
उसके सर को मालिश की
कहीं थक तो नहीं गया वो बेचारा बहुत ज़्यादा

पत्नी को सब याद रहता है
पति के बॉस का बर्थ-डे और
उनके कुत्तों के नाम
उसकी बहनों के पते और
उन्हें पड़ने वाले काम

पर पति की याद्दाश्त होती है
कमज़ोर ही
आख़िर वो पति जो है

सफ़र में धूप तो होगी, चल सको तो चलो

एकला कोई नहीं चलता
साथ चलते हैं अपने हिस्से के पत्थर
किसी और के दिए पठार
नमक के टीले
जिम्मेदारी से लदे जिद्दी पहाड़
दुखों के गट्ठर

कभी कभी होता ऐसा भी है
साथ चल पड़ते हैं मीठे कुछ ख्याल
किसी के होंठों से फूटती महकती हंसी
सरकती युवा हवा
बारीक लकीर सी कोई खुशी

ये सब आते हैं, कभी भी चले जाते हैं
ठिकाना कभी तय नहीं
खानाबदोशी, बदहवासी, उखड़े कदम
लेकिन इन सबमें टिके रहती है
पैरों के नीचे की जमीन
सर का टुकड़ा आसमान
उखड़ी-संभली सांसें
और एक अदद दिल

एकला कहां, कौन, कैसे

सुर

कोई सुर अंदर ही बजता है कई बार
दीवार से टकराता है
बेसुरा नहीं होता फिर भी

कितनी ही बार छलकता है जमीन पर
पर फैलता नहीं

नदी में फेंक डालने की साजिश भी तो हुई इस सुर के साथ बार-बार
सुर बदला नहीं

सुर में सुख है
सुख में आशा
आशा में सांस का एक अंश
इतना अंश काफी है
मेरे लिए, मेरे अपनों के लिए, तुम्हारे लिए, पूरे के पूरे जमाने के लिए
पर इस सुर को
कभी सहलाया भी है ?
सुर में भी जान है
क्यों भूलते हो बार-बार

चौरासी हजार योनियों के बीच

सहम-सहम कर जीते-जीते
अब जाने का समय आ गया।

डर रहा हमेशा
समय पर कामों के बोझ को निपटा न पाने का
या किसी रिश्ते के उधड़
या बिखर जाने का।

उम्र की सुरंग हमेशा लंबी लगी – डरों के बीच।

थके शरीर पर
यौवन कभी आया ही नहीं
पैदाइश बुढ़ापे के पालने में ही हुई थी जैसे।

डर में निकली सांसें बर्फ थीं
मन निष्क्रिय
पर ताज्जुब
मौत ने जैसे सोख लिया सारा ही डर।

सुरंग के आखिरी हिस्से से
छन कर आती है रौशनी यह
शरीर छूटेगा यहां
आत्मा उगेगी फिर कभी
तब तक
कम-से-कम, तब तक
डर तो नहीं होगा न!

आबूदाना

पता बदल दिया है
नाम
सड़क
मोहल्ला
देश और शहर भी

बदल दिया है चेहरा
उस पर ओढ़े सुखों के नकाब
झूठी तारीफ़ों के पुलिंदों के पुल

दरकते शीशे के बचे टुकड़े
उधड़े हुए सच

छुअन के पल भी बदल दिए हैं
संसद के चौबारे में दबे रहस्यों की आवाज़ें भी
खंडहर हुई इमारतों में दबे प्रेम के तमाम क़िस्सों पर
मलमली कपड़ों की अर्थी बिछा देने के बाद
चाँद के नीचे बैठने का अजीब सुख है

सुख से संवाद
चाँद से शह
तितली से फुदक माँग कर
एक कोने में दुबक
अतीत की मटमैली पगडंडी पर
अकेले चलना हो
तो कहना मत, ख़ुद से भी

ख़ामोश रास्तों पर ज़रूरी होता है ख़ुद से भी बच कर चलना

पुश्तैनी मकान

सड़क किनारे खड़ी औरत
कभी अकेले नहीं होती
उसका साया होती है मजबूरी
आंचल के दुख
मन में छिपे बहुत से रहस्य

औरत अकेली होकर भी
कहीं अकेली नहीं होती

सींचे हुए परिवार की यादें
सूखे बहुत से पत्ते
छीने गए सुख
छीली गई आत्मा

सब कुछ होता है
ठगी गई औरत के साथ

औरत के पास
अपने बहुत से सच होते हैं
उसके नमक होते शरीर में घुले हुए

किसी से संवाद नहीं होता
समय के आगे थकी इस औरत का

सहारे की तलाश में
मरूस्थल में मटकी लिए चलती यह औरत
साँस भी डर कर लेती है
फिर भी
ज़रूरत के तमाम पलों में
अपनी होती है

अश्क में भी हँसी है-1

लगता है
दिल का एक टुकड़ा
रानीखेत के उस बड़े मैदान के पास
पेड़ की छाँव के नीचे ही रह गया
उस टुकड़े ने प्यार देखा था
उसे वहीं रहने दो
वो कम से कम सुखी तो है

अश्क में भी हँसी है-2

पानी में जिस दिन किश्ती चली थी
तुम तब साथ थे
तब डूबते-डूबते भी लगा था
पानी क्या बिगाड़ लेगा

अश्क में भी हँसी है-3

फ़लासिफ़ा सिर्फ़ इतना ही है कि
असीम नफ़रत
असीम पीड़ा
या असीम प्रेम से
निकलती है
गोली, ग़ाली या फिर
कविता

एक अदद इंतज़ार /

सपने बेचने का मौसम आ गया है।

रंग-बिरंगे पैकेज में
हाट में सजाए जाएँगे- बेहतर रोटी, कपड़ा, मकान, पढ़ाई के सपने।

सपनों की हाँक होगी मनभावन
नाचेंगें ट्रकों पर मदमस्त हुए
कुछ फिल्मी सितारे भी
रटेंगे डायलाग और कभी भूल भी जाएँगे
किस पार्टी का करना है महिमा गान।

जनता भी डोलेगी
कभी इस पंडाल कभी उस
माइक पकड़े दिखेगें उनमें कई जोकर से
जो झूठ बोलेगें सच की तरह

और जब होगा चुनाव
अंग्रेज़दां भारतीय उस दिन
देख रहे होंगे फिल्म
या कर रहे होंगे लंदन में शापिंग
युवा खेलेंगे क्रिकेट
और हाशिए वाले लगेंगे लाइनों में
हाथी, लालटेन, पंजे या कमल
लंबी भीड़ में से किसी एक को चुनने।

वो दिन होगा मन्नत का
जन्नत जाने के सपनों का
दल वालों को मिलेंगे पाप-पुण्य के फल।

उस दिन मंदिर-मस्जिद की तमाम दीवारें ढह जाएँगी
चश्मे की धूल हो जाएगी खुद साफ़
झुकेगा सिर इबादत में
दिल में उठेगी आस
कि एक बार – बस एक बार और
कुर्सी किसी तरह आ जाए पास।

सच तो है।

अगली पीढ़ियों के लिए आरामतलबी का सर्टिफिकेट
इतनी आसानी से तो नहीं मिल सकता।

रचनाकाल : ३ नवंबर २००८

एक था चंचल

चंचल –
यही नाम था उसका
जब दिल्ली में बम फटा तो
उसने अपने कंधों को खून भरे कराहते लोगों को
उठाने में लगा दिया
बाहें उस लड़की को बचाने को मचल उठीं
जो अभी-अभी हरी चूड़ियां खरीद कर
दुकान से बाहर आई थी।

चंचल भागा
एक-एक को उठा सरकारी अस्पताल की तरफ।

वो हांफ गया।

पत्नी का फोन आया इस बीच –
कि ठीक तो हो
वो बोला – हां आज जी रहा हूं
दूसरों को बचाते हुए
सुनाई दे रही है
जिंदगी की धड़कन
इसलिए बात न करो
बस, जज्बातों के लिए बहने दो।

वो खुद खून से लथपथ था।

तभी कैमरे आए
पुलिस भी।

सायरनों के बीच
कोई लपका
चंचल को उठाने
वो बदहवास जो दिखता था!

लेकिन वो बोला- वो ठीक है
जिंदगी अभी उसके करीब है।

चंचल कुछ घंटे यही करता रहा
उसके पास उसके कंधे थे
और अपना हाथ था जगन्नाथ

एक कैमरे ने खींची उसकी तस्वीर
(और छापी भी अगले दिन)
लेकिन चंचल रहा बेपरवाह।

जब उसके हिस्से का काम खत्म हुआ
वो चल निकला।

अब उसने वो खाली-बिखरी जगह
मीडिया, पुलिस और नेताओं के लिए छोड़ दी।

३ नवंबर २००८

प्रेम

मुमकिन है बहुत कुछ
आसमान से चिपके तारे अपने गिरेबां में सजा लेना
शब्दों की तिजोरी को लबालब भर लेना

देखो तो इंद्रधनुष में ही इतने रंग आज भर आए
और तुम लगे सोचने
ये इंद्रधनुष को आज क्या हो गया!

सुर मिले इतने कि पूछा खुद से
ये नए सुरों की बारात यकायक कहां से फुदक आई?

भीनी धूप से भर आई रजाई
मन की रूई में खिल गए झम-झम फूल

प्रियतम,
यह सब संभव है, विज्ञान से नहीं,
प्रेम में आंखें खुली हों या मुंदी
जो प्रेम करता है

क्योंकि कविता भी बदलती है

बचपन में कविता लिखी
तो ऐसा उल्लास छलका
कि कागजों के बाहर आ गया।

यौवन की कविता
बिना शब्दों के भी
सब बुदबुदाती गई ।

उम्र के आखिरी पड़ाव में
मौन शून्यता के दरम्यान
मन की चपलता
कालीन के नीचे सिमट आई।

अब उस पर कविता लिखती औरत के पांव हैं
बुवाइयों भरे।

गजब है

बात में दहशत
बे-बात में भी दहशत
कुछ हो शहर में
तो भी
कुछ न हो तो भी

चैन न दिन में
न रैन में

मौसम गुनगुनाए तो भी
बरसाए तो भी
शहनाई हो तो भी
न हो तो भी
हंसी आए मस्त तो भी
बेहंसी में भी

गजब ही है भाई
न्यूजरूम !

नेलपालिश

जब भी सपने बुनने की धुन में होती हूं
गाती हूं अपने लिखे गीत
अपने कानों के लिए
तो लगाने लगती हूं जाने-अनजाने अपने नाखूनों पर नेलपालिश।

एक-एक नाखून पर लाल रंग की पालिश
जब झर-झर थिरकने लगती है
मैं और मेरा मन-दोनों
रंगों से लहलहा उठते हैं।

इसलिए मुझसे
मेरे होठों की अठखेलियों का हक
भले ही लूटने की कोशिश कर लो
लेकिन नेलपालिश चिपकाने का
निजी हक
मुझसे मत छीनना।
नाखूनों पर चिपके ये रंग
मेरे अश्कों को
जरा इंद्रधनुषी बना देते हैं और
मुझे भी लगने लगती है
जिंदगी जीने लायक।

तुम नहीं समझोगे
ये नाखून मुझे चट्टानी होना सिखाते हैं।
इनके अंदर की गुलाबी त्वचा
मन की रूई को जैसे समेटे रखती है।

ये लाल-गुलाबी नेलपालिश की शीशियां
मेरे बचपन की सखी थीं
अब छूटते यौवन का प्रमाण।

ड्रैसिंग टेबल पर करीने से लगी ये शीशियां
मुझे सपनों के ब्रश को
अपने सीने के कैनवास पर फिराने में मदद करती हैं।
ये मेरा उड़नखटोला हैं।
मुझे इनसे खेलने दो।

पत्रकार होने से क्या होता है?
मन को भाती तो
नेलपालिश की महक ही है,
माइक की खुरदराहट नहीं।

सच यही है 

बेटा पैदा होता है
ताउम्र रहता है बेटा ही।

बेटी पैदा होती है
और कुछ ही दिनों में
बन जाती है बेटा।

फिर ताउम्र वह रहती है
बेटी भी-बेटा भी।

पीएम की बेटी

पीएम की बेटी ने
किताब लिखी है।
वो जो पिछली गली में रहती है
उसने खोल ली है अब सूट सिलने की दुकान
और वो जो रोज बस में मिलती है
उसने जेएनयू में एमफिल में पा लिया है एडमिशन।
पिता हलवाई हैं और
उनकी आंखों में अब खिल आई है चमक।

बेटियां गढ़ती ही हैं।
पथरीली पगडंडियां
उन्हे भटकने कहां देंगीं!
पांव में किसी ब्रांड का जूता होगा
तभी तो मचाएंगीं हंगामा बेवजह।
बिना जूतों के चलने वाली ये लड़कियां
अपने फटे दुपट्टे कब सी लेती हैं
और कब पी लेती हैं
दर्द का जहर
खबर नहीं होती।

ये लड़कियां बड़ी आगे चली जाती हैं।

ये लड़कियां चाहे पीएम की हों
या पूरनचंद हलवाई की
ये खिलती ही तब हैं
जब जमाना इन्हे कूड़ेदान के पास फेंक आता है
ये शगुन है
कि आने वाली है गुड न्यूज।

टीवी एंकर और वो भी तुम

किसने कहा था तुमसे कि
पंजाब के गांव में पैदा हो
साहित्य में एम ए करो
सूट पहनो
और नाक में गवेली सी नथ भी लगा लो

बाल इतने लंबे रखो कि माथा छिप ही जाए
और आंखें बस यूं ही बात-बिन बात भरी-भरी सी जाएं।

किसने कहा था दिल्ली के छोटे से मोहल्ले में रहो
और आडिशन देने बस में बैठी चली आओ
किसने कहा था
बिना परफ्यूम लगाए बास के कमरे में धड़ाधड़ पहुंच जाओ
किसने कहा था
हिंदी में पूछे जा रहे सवालों के जबाव हिंदी में ही दो
किसने कहा था कि ये बताओ कि
तुम्हारे पास कंप्यूटर नहीं है
किसने कहा था बोल दो कि
पिताजी रिटायर हो चुके हैं और घर पर अभी मेहनती बहनें और एक निकम्मा भाई है
क्यों कहा तुमने कि
तुम दिन की शिफ्ट ही करना चाहती हो
क्यों कहा कि
तुम अच्छे संस्कारों में विश्वास करती हो
क्यों कहा कि तुम
‘ सामाजिक सरोकारों ‘ पर कुछ काम करना चाहती हो

अब कह ही दिया है तुमने यह सब
तो सुन लो
तुम नहीं बन सकती एंकर।

तुम कहीं और ही तलाशो नौकरी
किसी कस्बे में
या फिर पंजाब के उसी गांव में
जहां तुम पैदा हुई थी।

ये खबरों की दुनिया है
यहां जो बिकता है, वही दिखता है
और अब टीवी पर गांव नहीं बिकता
इसलिए तुम ढूंढो अपना ठोर
कहीं और।

फिर मैं क्यों बोलूं

शहर के लोग अब कम बोलते हैं
वे दिखते हैं बसों-ट्रेनों में लटके हुए
कार चलाते
दफ्तर आते-जाते हुए
पर वे बोलते नहीं।

न तो समय होता है बोलने का
न ताकत
न बोलने-बतियाने का कोई खास सामान।

राजनीति और अपराध पर भी
अब बहुत बातें नहीं होतीं।

शहर के लोग शायद अब थकने लगे हैं
या फिर जानने लगे हैं
ऐसे शब्दों का क्या भरोसा
जो उड़कर नहीं जाते सियासत तक।

इसलिए शहर के लोग अब तब बोलेंगें
जब पांच साल होंगे पूरे
तब तक बोलना
बोलना नहीं
अपने अंदर के सच को काटना ही होगा।

बस यूं ही

पानी बरसता है बाहर
अंदर सूखा लगता है
बाहर सूखा
तो अंदर भीगा
हवा चलती है
मन चंचल
कुछ ज्यादा बेचैन हो उठता है।
सियासत होती है
अंदर बगावत हो जाती है
दिक्कत फितरत में है
या बाहर ही कुछ चटक गया है।
(2)
रब से जब भी मिलने गए
हाथ जोड़े
फरमाइश की फेहरिस्त थमा दी
कुछ यूं जैसे
आटे चावल की लिस्ट हो।

मोल भाव भी किया वैसे ही
कि पहली नहीं है
तो दूसरी ही दे दो
नहीं तो तीसरी।
जो दो रहे हो, वो जरा अतिरिक्त देना
और मुझसे लेने के वक्त रखना एहतियात।

रब के यहां डिस्काउंट नहीं लगता
नहीं मिलती सेल की खबर
पर जमीन के दुकानदार तब भी कर ही डालते हैं
अपनी दुकानदारी।

औरत

सड़क किनारे खड़ी औरत
कभी अकेली नहीं होती
उसका साया होती है मज़बूरी
आँचल के दुख
मन में छिपे बहुत से रहस्य

औरत अकेली होकर भी
कहीं अकेली नहीं होती

सींचे हुए परिवार की यादें
सूखे बहुत से पत्ते
छीने गए सुख
छीली गई आत्मा

सब कुछ होता है
ठगी गई औरत के साथ

औरत के पास
अपने बहुत से सच होते हैं
उसके नमक होते शरीर में घुले हुए

किसी से संवाद नहीं होता
समय के आगे थकी इस औरत का

सहारे की तलाश में
मरूस्थल में मटकी लिए चलती यह औरत
साँस भी डर कर लेती है
फिर भी

ज़रूरत के तमाम पलों में
अपनी होती है

एक मामूली औरत

आँखों के छोर से
पता भी नहीं चलता
कब आँसू टपक आता है और तुम कहते हो
मैं सपने देखूँ ।

तुम देख आए तारे ज़मी पे
तो तुम्हें लगा कि सपने
यूँ ही संगीत की थिरकनों के साथ उग आते हैं ।

नहीं, ऐसे नहीं उगते सपने ।

मैं औरत हूँ
अकेली हूँ
पत्रकार हूँ ।

मैं दुनिया भर के सामने फौलादी हो सकती हूँ
पर अपने कमरे के शीशे के सामने
मेरा जो सच है,
वह सिर्फ मुझे ही दिखता है
और उसी सच में, सच कहूँ,
सपने कहीं नहीं होते ।

तुमसे बरसों मैनें यही माँगा था
मुझे औरत बनाना, आँसू नहीं
तब मैं कहाँ जानती थी
दोनों एक ही हैं ।

बस, अब मुझे मत कहो
कि मैं देखूँ सपने
मैं अकेली ही ठीक हूँ
अधूरी, हवा-सी भटकती ।

पर तुम यह सब नहीं समझोगे
समझ भी नहीं सकते
क्योंकि तुम औरत नहीं हो
तुमने औरत के गर्म आँसू की छलक
अपनी हथेली पर रखी ही कहाँ ?

अब रहने दो
रहने दो कुछ भी कहना
बस मुझे ख़ुद में छलकने दो
और अधूरा ही रहने दो ।

वह पेड़

लोकाट को वो पेड़
पठानकोट के बंगले के सामने वाले हिस्से में
एक महिला चौकीदार की तरह तैनात रहता था।

फल रसीला
मोटे पत्तों से ढका।

तब घर के बाहर गोलियां चला करती थीं
पंजाब सुलग रहा था
कर्फ्यू की खबर सुबह के नाश्ते के साथ आती थी
कर्फ्यू अभी चार दिन और चलेगा
ये रात के खाने का पहला कौर होता था।

बचपन के तमाम दिन
उसी आतंक की कंपन में गुजरे
नहीं जानते थे कि कल अपनी मुट्ठी में आएगा भी या नहीं
मालूम सिर्फ ये था कि
बस यही पल, जो अभी सांसों के साथ सरक रहा है,
अपना है।

लेकिन लोकाट के उस पेड़ को कोई डर नहीं था
गिलहरी उस पर खरगोश की तरह अठखेलियां करती
चिड़िया अपनी बात कहती
मैं स्कूल से आती तो
लोकाट के उस पेड़ के साथ छोटा सा संवाद भी हो जाता।

पंजाब में अब गोलियों की आवाज चुप है
तब जबकि बचपन के दिन भी गुजर गए
लेकिन आज भी जब-तब याद आते हैं
कर्फ्यू के वे अनचाहे बिन-बुलाए डरे दिन
और लोकाट का वह मीठा पेड़।

ख़ुशामदीद

पी०एम० की बेटी ने
क़िताब लिखी है
वो जो पिछली गली में रहती है
उसने खोल ली है अब सूट सिलने की दुकान
और वो जो रोज़ बस में मिलती है
उसने जे०एन०यू० में एम०फ़िल० में पा लिया है एडमीशन।
पिता हलवाई हैं और
उनकी आँखों में अब खिल आई है चमक

बेटियाँ गढ़ती ही हैं।
पथरीली पगडंडियाँ
उन्हें भटकने कहाँ देंगी!
पाँव में किसी ब्रांड का जूता होगा
तभी तो मचाएंगी हंगामा बेवज़ह।

बिना जूतों के चलने वाली ये लड़कियाँ
अपने फटे दुपट्टे कब सी लेती हैं
और कब पी लेती हैं
दर्द का ज़हर
ख़बर नहीं होती।

ये लड़कियाँ बड़ी आगे चली जाती हैं।

ये लड़कियाँ चाहे पी०एम० की हों
या पूरचन्द हलवाई की
ये खिलती ही तब हैं
जब ज़माना इन्हें कूड़ेदान के पास फेंक आता है
ये शगुन है
कि आने वाली है गुड न्यूज़।

बहूरानी

बड़े घर की बहू को कार से उतरते देखा
और फिर देखीं अपनी
पाँव की बिवाइयाँ
फटी जुराब से ढकी हुईं
एक बात तो मिलती थी फिर भी उन दोनों में-
दोनों की आँखों के पोर गीले थे

पैदाइश 

फ़लसफ़ा सिर्फ़ इतना ही है कि
असीम नफ़रत
असीम पीड़ा या
असीम प्रेम से
निकलती है
गोली, ग़ाली या फिर
कविता

गज़ब है

बात में दहशत
बेबात में भी दहशत
कुछ भी हो शहर में, तो भी
कुछ न हो तो भी
चैन न दिन में
न रैन में।

मौसम गुनगुनाए तो भी
बरसाए तो भी
शहनाई हो तो भी
न हो तो भी
हँसी आए मस्त तो भी
बेहँसी में भी

गज़ब ही है भाई
न्यूज़रूम

बलात्कार

लड़की का बलात्कार हुआ था
मीडिया पूछ रही थी
कैसा लग रहा है उसे
जिस युवक ने किया था
शादी का वादा
वो उसके घर का रास्ता
अब खोज नहीं पाता
अब है फिर पास वही माँ

सहारा देने की ताक़त पुरूष में कहाँ
इस ताक़त के कैप्सूल अभी बने नहीं

मैं-मैं और मैं- यानी एक पत्रकार

कसाईगिरी

तुम और हम एक ही काम करते हैं
तुम सामान की हाँक लगाते हो
हम ख़बर की ।
तुम पुरानी बासी सब्ज़ी को नया बताकर
रूपए वसूलते हो
हम बेकार को ‘खास’ बताकर टी०आर०पी० बटोरते हैं
लेकिन तुममें और हममें कुछ फ़र्क भी है।

तुम्हारी रेहड़ी से खरीदी बासी सब्ज़ी
कुकर पर चढ़कर जब बाहर आती है
तो किसी की ज़िंदगी में बड़ा तूफ़ान नहीं आता।

तुम जब बाज़ार में चलते हो
तो ख़ुद को अदना-सा दुकानदार समझते हो
तुम सोचते हो कि
रेहड़ी हो या हट्टी
तुम हो जनता ही
बस तुम्हारे पास एक दुकानदारी है
और औरों के पास सामान खऱीदने की कुव्वत।

तुम हमारी तरह फूल कर नहीं चलते
तुम्हें नहीं गुमान कि
तुम्हारी दुकान से ही मनमोहन सिंह या आडवाणी के घर
सब्ज़ी जाती है
लेकिन हमें गुमान है कि
हमारी वजह से ही चलती है
जनसत्ता और राजसत्ता।

हम मानते हैं
हम सबसे अलहदा हैं
खास और विशिष्ट हैं।

पर एक फ़र्क हममें और तुममें ज़रा बड़ा है
तुम कसाई नहीं हो
और हम पेशे के पहले चरण में ही
उतर आए हैं कसाईगिरी पर।

मैं और मेरे टीचर 

परी- यही नाम है उसका
बस एक झलक पाते ही मन में बारिश की फुहार हो जाती है।

परी कुछ नहीं मांगती
हमारी तरह मांग के कटोरे लेकर फिरना शायद उसकी फितरत ही नहीं।

परी पिंजरे के निचले हिस्से में सोती है
राजा ऊपरी हिस्से में झूले पर

राजा सोकर उठता है
परी को हौले अपने पाँव से ठोकर देता है, उसे जगाता है
जतलाता है कि ये मर्दाना अधिकार की बात तो वह भी जानता है !

लेकिन परी और राजा जब गाड़ी की अगली सीट पर बैठते हैं
तो अठखेलियाँ खाते पिंजरे में डर जाते हैं
एक ही झूले पर बैठकर लग जाते हैं – एक-दूसरे के गले
संकट में साथ के मायने दोनों जानते हैं।

लेकिन ताज्जुब
घर में दिनभर अकेले अपने पिंजरे में बंद दोनों जाने क्या सोचते हैं!

मैनें उनके पिंजरे के नीचे नरम घास का बिछौना बना दिया है
उन्हें यह मखमली कुदरती बिछौना बहुत पसंद भी आया है

परी मेरी बेटी नहीं है
राजा दामाद नहीं है
लेकिन मैनें मन ही में करा दी है उनकी शादी।
अकेले नहीं रखना चाहती थी मैं परी को
जानती हूँ अकेली को निगल लेती है दुनिया।

दोनों इंसान नहीं हैं
लेकिन फिर भी हैं तो दो फुदकते जीव
दोनों तो बस आँखों की पलकों में बस गए हैं।

आप चाहें तो उन्हें तोता कह सकते हैं
आपकी आँखों को वे तोते ही दिखेंगें
लेकिन मेरे लिए तो वो मेरे सपनों का उड़नखटोला हैं
मेरे अपने पंख हैं
उनके पास मेरी बात सुनने का वक़्त है
और मन भी!

मेरे लिए वो एक परी है
और पिंजरे के ऊपरी झूले में बैठकर अपनी चोंच से परी को सहलाने वाला एक राजा।

नहीं – मुझे अभी उन्हें आकाश में नहीं छोड़ना।
ये मेरे कमरे में ही फुदकेंगें
मेरे आँगन में चहकेंगें
कैसे छोड़ दूँ दो महीने के इन जीवों को बाहर की दुनिया में
हम करेंगे आपस में बातें
पिंजरे के अंदर के जीव और पिंजरे के बाहर के इंसान की

मैं जानती हूँ ये मेरे स्कूल के पहले टीचर हैं और
अभी तो हमारा सफ़र शुरू ही हुआ है।

मीडिया नगरी

किताब में पढ़ लिया
और तुमने मान भी लिया
कि मीडिया सच का आईना है !

तुमने जिल्द पर शायद देखा नहीं
वो किताब तो पिछली सदी में लिखी गई थी
तब से अब तक में ‘सच’ न जाने कितनी पलटियाँ ले चुका
और तुम अभी भी यही मान रही हो
कि मीडिया सच को दिखाता है !

सुनो
नई परिभाषा ये है कि
मीडिया सच पर नहीं
टी०आर०पी० पर टिका है

पर एक सच और है

मीडिया मजबूर है
और जो खुद मजबूर है
वो तुम्हें रास्ता क्या-कैसे दिखाए

हाँ, तुम ठीक कहती हो
हम-तुम दोनों मिलकर एक नए मीडिया की तलाश करते हैं
बोलो, मंगल पर चलें या प्लूटो पर
अब यह तो तुम ही तय करो
लेकिन सुनो
वक़्त गुज़ारने के लिए
ये सपना अच्छा है न!

वो बत्ती, वो रातें

बचपन में
बत्ती चले जाने में भी
गजब का सुख था
हम चारपाई पे बैठे तारे गिनते
एक कोने से उस कोने तक
जहाँ तक जाती नज़र

हर बार गिनती गड़बड़ा जाती
हर बार विश्वास गहरा जाता
अगली बार होगी सही गिनती

बत्ती का न होना
सपनों के लहलहा उठने का समय होता
सपने उछल-मचल आते
बड़े होंगे तो जाने क्या-क्या न करेंगें

बत्ती के गुल होते ही
जुगनू बनाने लगते अपना घेरा
उनकी सरगम सुख भर देती
पापा कहते भर लो जुगनू हथेली में

अम्मा हँस के पूछती
कौन-सी पढ़ी नई कविता
पास से आती घास की ख़ुशबू में
कभी पूस की रात का ख्याल आता
कभी गौरा का

तभी बत्ती आ जाती
उसका आना भी उत्सव बनता
अम्मा कहती
होती है ज़िंदगी भी ऐसी ही
कभी रौशन, कभी अंधेरी
सच में बत्ती का जाना
खुले आसमान में देता था जो संवाद
उसे वो रातें ही समझ सकती हैं
जब होती थी बत्ती गुल।

मंगलसूत्र 

पति को याद नहीं होता
पत्नी का जन्मदिन
उसकी पसंद
कोई नापसंद
उसके खाने का समय
उसकी ख़ुशियाँ
उसके मायके का रास्ता
या यह भी कि शायद कोई रहता भी है
उस घर में

पति को नहीं रहता अहसास यह भी
कि पत्नी को क्यों याद रहता है
उसकी बनियान सूखी या नहीं
सब्जी उसके स्वाद की बनी या नहीं
ज़रूरत तो नहीं कहीं
उसके सर को मालिश की
कहीं थक तो नहीं गया वो बेचारा बहुत ज़्यादा

पत्नी को सब याद रहता है
पति के बॉस का बर्थ-डे और
उनके कुत्तों के नाम
उसकी बहनों के पते और
उन्हें पड़ने वाले काम

पर पति की याद्दाश्त होती है
कमज़ोर ही
आख़िर वो पति जो है

सफ़र में धूप तो होगी, चल सको तो चलो

एकला कोई नहीं चलता
साथ चलते हैं अपने हिस्से के पत्थर
किसी और के दिए पठार
नमक के टीले
जिम्मेदारी से लदे जिद्दी पहाड़
दुखों के गट्ठर

कभी कभी होता ऐसा भी है
साथ चल पड़ते हैं मीठे कुछ ख्याल
किसी के होंठों से फूटती महकती हंसी
सरकती युवा हवा
बारीक लकीर सी कोई खुशी

ये सब आते हैं, कभी भी चले जाते हैं
ठिकाना कभी तय नहीं
खानाबदोशी, बदहवासी, उखड़े कदम
लेकिन इन सबमें टिके रहती है
पैरों के नीचे की जमीन
सर का टुकड़ा आसमान
उखड़ी-संभली सांसें
और एक अदद दिल

एकला कहां, कौन, कैसे

सुर

कोई सुर अंदर ही बजता है कई बार
दीवार से टकराता है
बेसुरा नहीं होता फिर भी

कितनी ही बार छलकता है जमीन पर
पर फैलता नहीं

नदी में फेंक डालने की साजिश भी तो हुई इस सुर के साथ बार-बार
सुर बदला नहीं

सुर में सुख है
सुख में आशा
आशा में सांस का एक अंश
इतना अंश काफी है
मेरे लिए, मेरे अपनों के लिए, तुम्हारे लिए, पूरे के पूरे जमाने के लिए
पर इस सुर को
कभी सहलाया भी है ?
सुर में भी जान है
क्यों भूलते हो बार-बार

चौरासी हजार योनियों के बीच

सहम-सहम कर जीते-जीते
अब जाने का समय आ गया।

डर रहा हमेशा
समय पर कामों के बोझ को निपटा न पाने का
या किसी रिश्ते के उधड़
या बिखर जाने का।

उम्र की सुरंग हमेशा लंबी लगी – डरों के बीच।

थके शरीर पर
यौवन कभी आया ही नहीं
पैदाइश बुढ़ापे के पालने में ही हुई थी जैसे।

डर में निकली सांसें बर्फ थीं
मन निष्क्रिय
पर ताज्जुब
मौत ने जैसे सोख लिया सारा ही डर।

सुरंग के आखिरी हिस्से से
छन कर आती है रौशनी यह
शरीर छूटेगा यहां
आत्मा उगेगी फिर कभी
तब तक
कम-से-कम, तब तक
डर तो नहीं होगा न!

आबूदाना

पता बदल दिया है
नाम
सड़क
मोहल्ला
देश और शहर भी

बदल दिया है चेहरा
उस पर ओढ़े सुखों के नकाब
झूठी तारीफ़ों के पुलिंदों के पुल

दरकते शीशे के बचे टुकड़े
उधड़े हुए सच

छुअन के पल भी बदल दिए हैं
संसद के चौबारे में दबे रहस्यों की आवाज़ें भी
खंडहर हुई इमारतों में दबे प्रेम के तमाम क़िस्सों पर
मलमली कपड़ों की अर्थी बिछा देने के बाद
चाँद के नीचे बैठने का अजीब सुख है

सुख से संवाद
चाँद से शह
तितली से फुदक माँग कर
एक कोने में दुबक
अतीत की मटमैली पगडंडी पर
अकेले चलना हो
तो कहना मत, ख़ुद से भी

ख़ामोश रास्तों पर ज़रूरी होता है ख़ुद से भी बच कर चलना

पुश्तैनी मकान

सड़क किनारे खड़ी औरत
कभी अकेले नहीं होती
उसका साया होती है मजबूरी
आंचल के दुख
मन में छिपे बहुत से रहस्य

औरत अकेली होकर भी
कहीं अकेली नहीं होती

सींचे हुए परिवार की यादें
सूखे बहुत से पत्ते
छीने गए सुख
छीली गई आत्मा

सब कुछ होता है
ठगी गई औरत के साथ

औरत के पास
अपने बहुत से सच होते हैं
उसके नमक होते शरीर में घुले हुए

किसी से संवाद नहीं होता
समय के आगे थकी इस औरत का

सहारे की तलाश में
मरूस्थल में मटकी लिए चलती यह औरत
साँस भी डर कर लेती है
फिर भी
ज़रूरत के तमाम पलों में
अपनी होती है

आह ओढ़नी

ओढ़नी में रंग थे, रस थे, बहक थी
ओढ़नी सरकी
ज़िस्म को छूती
ज़िस्म को लगा कोई अपना छूकर पार गया है
ओढ़नी का राग, वाद्य, संस्कार, अनुराग
सब युवती का शृंगार

ओढ़नी की लचक सहलाती सी
भरती भ्रमों पर भ्रम
देती युवती को अपरिमित संसार
यहाँ से वहां उड़ जाने के लिए।

दोनों का मौन
आने वाले मौसम
दफ्न होते बचपन के बीच का पुल है

ओढ़नी दुनिया से आगे की क़िताब है
कौन पढ़े इसकी इबारत
ओढ़नी की रौशनाई
उसकी चुप्पी में छुपी शहनाई
उसकी सच्चाई
युवती के बचे चंद दिनों की
हौले से की भरपाई
ओढ़नी की सरकन अल्हड़ युवती ही समझती है
उसकी सरहदें, उसके इशारे, उसकी आहें
पर ओढ़नी का भ्रम टूटने में भला कहाँ लगती है कोई देरी

सच 

कचनार की डाल पर
इसी मौसम में तो खिलते थे फूल
उस रंग का नाम
क़िताब में कहीं लिखा नहीं था
उस डाल पर एक झूला था
उस झूले में सपने थे
आसमान को छू लेने के
उस झूले में आस थी
किसी प्रेमी के आने की
उस झूले में बेताबी थी
आँचल में समाने की
पर उस झूले में सच तो था नहीं

झूले ने नहीं बताया
लड़की के सपने नहीं होते
नहीं होने चाहिए
उसे प्रेम नहीं मिलता
नहीं मिलना चाहिए
क़िताबी है यह और बेमानी भी

झूले ने कहाँ बताया
ज़िंदगी में अपमान होगा
और प्रताड़ना भी
देहरी के उस पार जाते ही
पति के हाथों, बेटों के हाथों

जहाँ छूटी अम्मा की देहरी
जामुन की तरह पिस जाएगी
यह फूलों की फ्रॉक
आइस्क्रीम खाने की तमन्ना
मचलने के मज़े
कोयल की कूक
तब बचेगी सिर्फ़
मन की हूक
और याद आएँगे
कचनार के झूले
किसी फ़िल्मी कहानी की तरह

कौन हूँ मैं 

इस बार नहीं डालना
आम का अचार
नहीं ख़रीदनी बर्नियाँ
नहीं डालना धूप में
एक-एक सामान

नहीं धोने ख़ुद सर्दी के कपड़े
शिकाकाई में डाल कर

न ही करनी है चिंता
नीम के पत्ते
ट्रंक के कोनों में सरके या नहीं

इस बार नींबू का शरबत भी
नहीं बनाना घर पर
कि ख़ुश हों ननदें-देवरानियाँ
और माँगें कुछ बोतलें
अपने लाडले बेटों के लिए

नहीं ख़रीदनी इस बार
गार्डन की सेल से
ढेर-सी साड़ियाँ
जो आएँ काम
साल भर दूसरों को देने में

इस साल कुछ अलग करना है
नया करना है
इस बार जन्म लेना है
पहली बार सलीक़े से
इस बार जमा करना है सामान
सिर्फ़ अपनी ख़ुशी का
थोड़ी मुस्कान
थोड़ा सुकून
थोड़ी नज़रअंदाज़ी और
थोड़ी चुहल
लेकिन यही प्रण तो पिछले साल भी किया था न

कहानी रोज़ की

रसोई में
रोज़ तीनों पहर पकते रहें पकवान
नियत समय पर टिक जाएँ मेज़ पर
इसकी मशक़्क़त में
चढ़ानी पड़ती है
अपनी डिग्रियों की बलि

जूते पॉलिश हों
आँगन धुल जाए
बादशाह और नवाबज़ादों के घर लौटने से पहले
सब कुछ सरक जाए अपनी जगह पर
मुस्कुराते, इतराते, कुछ ऐसे कि जैसे
न हुआ हो कुछ भी दिन भर के मेले में
जैसे बटन के दबाते
सब सिमट आएँ हों
आहिस्ता से अपनी-अपनी जगह
इसके लिए देनी पड़ती है
अपनी ख़ुशियों की आहुति

सर्दी आने से पहले
दुरुस्त हो जाएँ हीटर
बाहर उछल आएँ रजाई-कंबल
बनने लगें गोभी-शलगम के अचार
गाजर के हलवे
इसके लिए माँग की ..सिंदूर की रेखा
खींच लेनी पड़ती है थोड़ी और

बारिश में टपकती छत से
गीले न हों फर्श
रख दी जाए बालटी, टपकन से पहले ही
शाम ढलने से पहले आलू के पकौड़ों की ख़ुशबू
पड़ोसी अफ़सरों के घर पहँच जाए
इसके लिए ठप्प करना पड़ता है अपने सपनों का ब्लॉग

इस पर भी सर्द मौसमों के लिहाफ़ों
गर्मी में ए०सी० के हिचकोलों के बीच
बिस्तरों पर चढ़े
क्षितिज के पार की
औरतों के अधिकार की बात करते
न तो शहंशाह मुस्कुराते हैं, न नवाबज़ादे
इसके लिए
आँखों के नीचे
रखना पड़ता है
एक अदद तकिया भी

एक मामूली औरत

आँख़ों के छोर से
पता भी नहीं चलता
कब आँसू टपक जाते हैं
और तुम कहते हो
मैं सपने देखूँ

तुम देख आए तारे ज़मी पे
तो तुम्हें लगा कि सपने
यों ही संगीत की थिरकनों के साथ उग आते हैं
और यहाँ सब कुछ मिलता है एक के साथ एक फ़्री

नहीं, ऐसे नहीं उगते सपने

मैं औरत हूँ
अकेली हूँ
पत्रकार हूँ

मैं दुनिया भर के सामने फौलादी हो सकती हूँ
पर अपने कमरे के शीशे के सामने
मेरा जो सच है
वह सिर्फ़ मुझे ही दिखता है
और उस सच में, सच कहूँ
सपने कहीं नहीं होते

तुमसे बरसों से मैनें यही माँगा था
मुझे औरत बनाना, आँसू नहीं
तब मैं कहां जानती थी
दोनों एक ही हैं

बस, अब मुझे मत कहो
कि मैं देखूँ सपने
मैं अकेली ही ठीक हूँ
अधूरी, हवा सी भटकती

पर तुम यह सब नहीं समझोगे
समझ भी नहीं सकते
क्योंकि तुम औरत नहीं हो
तुमने औरत के गर्म आँसू की छलक
अपनी हथेली पर रखी ही कहाँ ?

अधूरी कविता

थके पांवों में भी होती है ताकत
देवदारों में चलते हुए
ये पांव
झाड़ियों के बीच में से राह बना लेते हैं
गर
भरोसा हो
सुबह के होने का
सांसों में हो कोई स्मृति चिह्न
मन में संस्कार
और उम्मीदों की चिड़िया
जिंदा है अगर
तो जहाज के पंछी को
खूंटे में कौन टांग सकता है भला?

वामा से वामा तक

आंसू बहुत से थे
कुछ आंखों से बाहर
कुछ पलकों के छोर पर चिपके
और कुछ दिल में ही

सालों से अंदर मन को नम कर रहे थे

आज सभी को बाहर बुला ही लिया
आंसू सहमे
उनके अपने डर थे
अपनी सीमाएं
पर आज आदेश मेरा था
गुलामी उनकी

हां, आमंत्रण था मेरा ही
जानती हूं अटपटा सा

पर आंसुओं ने मन रखा
तोड़ा न मुझे तुम्हारी तरह
वे समझते थे मुझे
और मैं उन्हें एक साथी की तरह

आज इन्हें हथेली पर रखा
बहुत देर तक देखा
लगा
एक पूरी नदी उछल कर मुझे डुबो देगी
पर मुझे डर न था
मारे जाने की सदियों की धमकियों के बीच
मन ठहरा था आज

तो देखे आंसू बहुत देर तक मैंने
फिर पी लिया

मटमैला, कसैला, उदास, चुप, हैरान स्वाद था
मेरे अपने ही आंसुओं का

आज की तारीख
इनकी मौत है
पर इनकी बरसी नहीं मनेगी
कृपया न भेजें मुझे कोई शोक संदेश।

जैसे कुछ जिंदगियां कभी सोतीं नहीं

कुछ शहर कभी नहीं सोते
जैसे कुछ जिंदगियां कभी सोतीं नहीं|
जैसे सड़कें जागती हैं तमाम ऊंघती हुई रातों में भी

कुछ सपने भी कभी सोते नहीं
वे चलते हैं
अपने बनाए पैरों से
बिना घुंघरूओं के छनकते हैं वो
भरते हैं कितने ही आंगन
कुछ सुबहें भी कभी अंत नहीं होतीं
आंतरिक सुख के खिले फूलदान में
मुरझाती नहीं वहां कोई किरण

इतनी जिंदा सच्चाइयों के बीच
खुद को पाना जिंदा, अंकुरित, सलामत
कोई मजाक है क्या

शायद यही हो वो 

आकाश के फाहे निस्पंद
ऊनी स्वेटर बुनती चोटियों के बीच में से गुजरते हुए
कभी रोक पाए इनकी उड़ान क्या।

समय मौन था
सोचता
सृष्टि क्यों, कैसे, किस पार जाने के लिए रची ब्रह्मा ने

आत्माएं चोगा बदलतीं
आसमान की तरफ भगभगातीं प्रतिपल
शरीरों के दाह संस्कार
पानी में तैरते बचे आंसुओं के बीच
इतना बड़ा अंतर

निर्माण, विनाश, फिर निर्माण की तमाम प्रक्रियाओं में
समय की बांसुरी बजती रही सतत
वो सूक्ष्म-सा दो पैरों का जीव
इतनी क्षणभंगुर जमीन पर भी
गर्वित हो चलता कितना अज्ञानी

ज्ञान-अज्ञान, वैराग-अनुराग की सीमाओं से उठ पाना ही है
शायद
जीवन का सार

सबसे ताकतवर होता है…

मेरे सपने अपनी जमीन ढूंढ़ ही लेते हैं
बारिश की नमी
सूखे की तपी
रेतीले मन
और बाहरी थपेड़ों के बावजूद

खाली पेट होने पर भी
सपने मेरा साया नहीं छोड़ते
चांद के बादलों से लिपट जाने
सूरज के माथे पर बल आने
अपनों के गुस्साने
आवाज के भर्राने पर भी
ये सपने अपना पता-ठिकाना नहीं बदलते

सपनों की पंखुड़ी
किसी के भारी बूटों से कुचलती नहीं
हंटर से छिलती नहीं
बेरुखी से मिटती नहीं

सपनों का ओज
उदासी में घुलता नहीं
टूट कर बिखरता नहीं
अतीत की रौशनियों की याद में
पीला पड़ता नहीं

क्योंकि वे सपने ही क्या
गर वो छिटक जाएं
मौसमों के उड़नखटोलों से
क्या हो सकता है
इतना निजी, इतना मधुर, इतना प्यारा
सपनों की ओढ़नी
सपनों की बिछावन
सपनों की पाजेब
सपनों का घूंघट
सपनों की गगरी

काश!, कि तुम होते आज पास पास
तो एक सुर में कहते
सबसे खतरनाक होता है
सपनों का मर जाना
और मैं कहती
सबसे ताकतवर होता है
सपनों का खिल-मिल जाना
हिम्मती हो जाना
फौलादी बन जाना
कवच हो जाना
हथेलियों की लकीरों को
आलिंगन में भर लेना कुछ इस तरह कि
सपने बस अपने ही हो जाएं
कि सपने
अपनों से भी ज्यादा अपने हो जाएं

हां, सबसे ताकतवर होता है
सपनों का खिल-मिल जाना

सौभाग्यवती भव 

इबादत के लिए हाथ उठाए
सर पर ताना दुपट्टा भी
पर हाथ आधे खाली थे तब भी
बची जगह पर
औरत ने अपनी उम्मीद भर दी
जगह फिर भी बाकी थी
औरत ने उसमें थोड़ा कंपन रखा
मन की सीलन, टूटे कांच
और फिर
आसमान के एक टुकड़े को भर लिया
मेहंदी की खुशबू भी भाग कर कहीं से भर आई उनमें
चूड़ियां भी अपनी खनक के अंश सौंप आईं हथेली में

सी दिए सारे जज्बात एक साथ
उसके हाथ इस समय भरपूर थे

अब प्रार्थना लबों पर थी
ताकत हाथों में
क्या मांगती वो

खट्टा-मीठा

मीठा खाने का मन था आज भी
कुछ खट्टे का भी
अंगूर सा उछलता रहा मन
नमकीन की तड़प भी अजनबी थी
शाम होते-होते
थाल मे नीम के कसौरे थे
कुनबे को परोसने के बाद
स्त्री के हिस्से यही सच आता है

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