वली ‘उज़लत’ की रचनाएँ

आज दिल बे-क़रार है मेरा

आज दिल बे-क़रार है मेरा
किस के पहलू में यार है मेरा

क्यूँ न उश्शाक़ पर होऊँ मंसूर
जूँ सिपंद आह दार है मेरा

बे-क़रार उस का हूँगा हश्र में भी
यही उस से क़रार है मेरा

रंग-ए-ज़र्द और सरिश्क-ए-सुर्ख़ तो देख
क्या ख़िज़ाँ में बहार है मेरा

मेरे क़ातिल के कफ़ हिनाई नहीं
मुश्त-ए-ख़ूँ याद-गार है मेरा

खोल कर क़ब्र देख मश्क़-ए-जुनूँ
के कफ़न तार तार है मेरा

आते जाते मगर तू ठुकरावे
तेरे दर पर मज़ार है मेरा

आँख मूँदे है मेरी ख़ाक से भी
यहाँ तक उस को ग़ुबार है मेरा

जीते रहो क्यूँ हुए रक़ीब के हार
यही सीने में ख़ार है मेरा

तेरे कूचे के सग की पा-बोसी
बाइस-ए-इफ़्तिख़ार है मेरा

बंदा-ए-यार ‘उज़लत’-ए-मरहूम
नक़्श लौह-ए-मज़ार है मेरा

बहार आई ब-तंग आया दिल-ए-वहशत

बहार आई ब-तंग आया दिल-ए-वहशत पनाह अपना
करूँ क्या है यही चाक-ए-गिरेबाँ दस्त-गाह अपना

टपकती जो तरह सुम्बुल से होवे पै-ब-पै शबनम
हमारे हाल पर रोने लगा अब दूद-ए-आह अपना

मेरा दिल लेते ही कर चश्म-पोशी मुझ से मुँह फेरा
नज़र आता नहीं कुछ मुझ को दिल-बर से निबाह अपना

सितम से दी तसल्ली इस कमाँ-अबरू के क़ुर्बां हूँ
रग-ए-जाँ कर दिया दिल को मेरे तीर-ए-निगाह अपना

तू हरजाई न हो घट जाएगा जूँ ज़र-अय्यारों में
ये ‘उज़लत’ बन्दा अपना फ़िदवी अपना ख़ैर-ख़्वाह अपना

ग़ैर आह सर्द नहीं दाग़ों के जाने का इलाज

ग़ैर आह सर्द नहीं दाग़ों के जाने का इलाज
जुज़ सबा क्या है चराग़ों के बुझाने का इलाज

दिल-शिकस्तों की दवा ग़ैर अज़ गुदाज़-ए-इश्क़ नहीं
है गलाना टूटे शीशों के बनाने का इलाज

जौर से नादिम हो लब का काटना क़ातिल का है
दिल के ज़ख़्मों को मेरे बख़िया दिलाने का इलाज

है उस की ज़ुल्फ़ से नित पंजा-ए-अदू

है उस की ज़ुल्फ़ से नित पंजा-ए-अदू गुस्ताख़
मेरा ग़ुबार वो दामन से है कभू गुस्ताख़

धुवाँ निकालूँ में हुक़्क़े का ख़ून जाम पियूँ
तेरे हैं लब से दोनों मेरे रू-ब-रू गुस्ताख़

पला है पानी से पर सर चढ़ा है पानी के
नदी के सात है कम-ज़र्फ़ी से कदू गुस्ताख़

सतावे है दिल-ए-ख़ूनी को हर्फ़-ए-नासेह यूँ
के जैसे ज़ख़्म से होवे है गुल की बू गुस्ताख़

हँसी से ग़ुँचा का दिल सुब्ह तोड़े है ‘उज़लत’
तू डर जो तुझ से कोई होवे ख़ंदा-रू गुस्ताख़

जूँ गुल अज़-बसके जुनूँ है मेरा सामान के 

जूँ गुल अज़-बसके जुनूँ है मेरा सामान के सात
चाक करता हूँ मैं सीने को गिरेबान के सात

चश्म-ए-तर हैं मेरी सहरा है जुनूँ की ममनूँ
रब्त है रोने कूँ मेरे उसी दामान के सात

बे-ख़ुदी का है मज़ा शोर-ए-असीरी से मुझे
रंग उड़े है मेरा ज़ंजीर की अफ़ग़ान के सात

जूँ बघूला हूँ मैं मिन्नत-कश-ए-सहरा-गर्दी
ज़िंदगानी है मेरी सैर-ए-बयाबान के सात

‘उज़लत’ इस बाग़ में लाला सा हूँ मैं दर्द नसीब
दिल-ए-ज़ख़्मी से ऊगा दाग़ नमक-दान के सात

ख़त ने आ कर की है शायद रहम फ़रमाने 

ख़त ने आ कर की है शायद रहम फ़रमाने की अर्ज़
तब तो अब सुनता है हँस कर मुझ से दीवाने की अर्ज़

शाम-ए-ग़ुर्बत हम से मजरूहों की है फ़रियाद-रस
ज़ुल्फ़ की छाती फटी है सुनते ही शाने की अर्ज़

बोसा-ए-लाल-ए-बुताँ जो ले सो हो बे-आबरू
इतनी ही ख़िदमत में मस्तूँ की है पैमाने की अर्ज़

गोश-ए-गुल में सब फफूले पड़ गए शबनम के हाथ
आग थी बुलबुल की फ़रियादों के अफ़साने की अर्ज़

फ़स्ल-ए-गुल आते ही ‘उज़लत’ दिल ज़बान-ए-आह से
मेरी ख़िदमत में करे है दश्त में जाने की अर्ज़

माह-ए-कामिल हो मुक़ाबिल यार के रू 

माह-ए-कामिल हो मुक़ाबिल यार के रू से चे ख़ुश
ख़म हो दम मारे हिलाल उस तेग़-ए-अब्रू से चे ख़ुश

एक झलक भी यार की शोख़ी की तुझ में नहीं ऐ बर्क़
तिसपे हम-सर हो तो उस की तुंदी-ए-ख़ू से चे ख़ुश

उस की जौलाँ की हवा से गई है बर्बाद और उस पर
मुद्दई है निकहत-गुल यार की बू से चे ख़ुश

आँख में हिरनों की ख़ाक-अफ़गन है उस की गर्द-राह
तिसपे गर्दन-कश हैं पी के चश्म-ए-जादू से चे ख़ुश

गरचे सुम्बुल है ऐ उज़लत तीरा-बख़्त और दाग़-ए-रश्क
पेच-ओ-ख़म खा कर है सरकश पी के गेसू से चे ख़ुश

न शोख़ियों से करे हैं वो चश्म-ए-गुल-गूँ

न शोख़ियों से करे हैं वो चश्म-ए-गुल-गूँ रक़्स
के ऊन के पीने से करता है वहाँ मेरा ख़ूँ रक़्स

न पेच-ओ-ताब-ए-हवा से है आब में गिर्दाब
के मेरे अश्क के आगे करे है जैजूँ रक़्स

तवाफ़-ए-सोख़्ता इश्क़ देख ले ऐ शम्मा
करे है जलने से आगे पतंग-ए-मफ़्तूँ रक़्स

करे है शोला-ए-शम्मा सेहर सा लब पे मेरे
ऐ आफ़ताब-लक़ा ख़ुश हो जान-ए-महज़ूँ रक़्स

मिसाल-ए-क़िबला-नुमा फ़ख़्र फ़िक्र-ए-उज़लत से
करे है मिस्रा-ए-रौशन के बीच मज़मूँ रक़्स

नंग नहीं मुझ को तड़पने से सँभल जाने का

नंग नहीं मुझ को तड़पने से सँभल जाने का
डर है उस ख़ंजर-ए-मिज़गाँ के फिसल जाने का

नब्ज़-ए-ज़ंजीर के हिलने से छूटे है आशिक़
बुल-हवस कहवे हुआ शौक़ निकल जाने का

गर-चे वो रश्क-ए-चमन मुझ से है बाग़ी लेकिन
आतिश-ए-गुल से है ख़ौफ़ उस के कुम्हल जाने का

तल्ख़ लगता है उसे शहर की बस्ती का सुवाद
ज़ौक़ है जिस को बयाबाँ के निकल जाने का

जूँ सबा ख़ानक़हों में जो कभू जाता हूँ
क़सद है ग़ुँचा अमामों के कुचल जाने का

तीरा-बख़्तों को करे है नाला-ए-ग़मगीं ख़राब 

तीरा-बख़्तों को करे है नाला-ए-ग़मगीं ख़राब
जिस तरह हो जा सबा से काकुल-ए-मुश्कीं ख़राब

जूँ नसीम-ए-सुब्ह ग़ुंचे गुल के सब बर्बाद दे
सर्द-महरी से बुतों की हैं दिल-ए-रंगीं ख़राब

बे-दिमाग़ी मत कर ऐ ज़ालिम के जूँ मौज ओ हबाब
दिल मेरा कर दे है पल में अब्रू-ए-पुर-चीं ख़राब

जूँ जले है शम्मा का मुश्त ज़र और तस्बीह अश्क
जिस तरह सरकश का है दुनिया ख़राब और दीं ख़राब

था बना ‘उज़लत’ वो फ़ौलाद-ए-दिल-ए-परवेज़ से
तब तो तीशे ने किया यूँ ख़ाना-ए-शीरीं ख़राब

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