वली दक्कनी की रचनाएँ

याद करना हर घडी़ उस यार का

याद करना हर घड़ी उस यार का
है वज़ीफ़ा मुझ दिल-ए-बीमार का

आरज़ू-ए-चश्मा-ए-कौसर नहीं
तिश्नालब हूँ शर्बत-ए-दीदार का

आकबत क्या होवेगा मालूम नहीं
दिल हुआ है मुब्तिला दिलदार का

क्या कहे तारीफ़ दिल है बेनज़ीर
हर्फ़ हर्फ़ उस मख़्ज़न-ए-इसरार का

गर हुआ है तालिब-ए-आज़ादगी
बन्द मत हो सुब्बा-ओ-ज़ुन्नार का

मस्नद-ए-गुल मन्ज़िल-ए-शबनम हुई
देख रुत्बा दीदा-ए-बेदार का

ऐ “वली” हो ना स्रिजन पर निसार
मुद्द’आ है चश्म-ए-गौहर बार का

दिल को लगती है

दिल को लगती है दिलरुबा की अदा
जी में बसती है खुश-अदा की अदा

गर्चे सब ख़ूबरू हैं ख़ूब वले
क़त्ल करती है मीरज़ा की अदा

हर्फ़-ए-बेजा बजा है गर बोलूँ
दुश्मन-ए-होश है पिया की अदा

नक़्श-ए-दीवार क्यूँ न हो आशिक़
हैरत-अफ़ज़ा है बेवफ़ा की अदा

गुल हुये ग़र्क आब-ए-शबनम में
देख उस साहिब-ए-हया की अदा

ऐ “वली” दर्द-ए-सर की दारू है
मुझको उस संदली क़बा की अदा

फ़िराके-गुजरात

गुजरात के फिराके सों है खा़र-खा़र दिल।
बेताब है सूनेमन आतिलबहार दिल।।

मरहम नहीं है इसके जखम़का जहाँमने।
शम्शेरे-हिज्र सों जो हुआ है फिगा़र दिल।।

अव्वल सों था ज़ईफ़ यह पाबस्ता सोज़ में।
ज्यों बात है अग्निके उपर बेकरार दिल।।

इस सैरके नशे सों अवल तर दिमाग था।
आखिऱकुँ इस फिराक़ में खींचा खुमार दिल।।

मेरे सुनेमें आके चमन देख इश्क का।
है जोशे-खँ सों तनमें मेरे लालाजार दिल।।

हासिल किया हूँ जगमें सराया शिकस्तगो।
देखा है मुझ शकीबे हों सुब्हेबहार दिल।।

हिजरत सों दोस्ताँके हुआ जी मेरा गुजर।
इश्रत के पैरहन कुँ दिया तार-तार दिल।।

हर आशना की याद की गर्मीसों तनमने।
हरदममें बेक़रार है मिस्ले-शरार दिल।।

सब आशिक़ाँ हजूर अछे पाक सुर्खऱू।
अपना अपस लहूसों किया है फ़िगार दिल।।

हासिल हुआ है मुजकूँ समर मुज शिकस्त सों।
पाया है चाक-चाक़ हो शकले-अनार दिल।।

अफसोस है तमाम कि आखिऱकुँ दोस्ताँ।
इस मैक़दे सों उसके चला सुध बिसार दिल।।

लेकिन हजार शुक्र वली हक़के फैज़ सों।
फिर उसके देखनेका है उम्मेदवार दिल।।

शब्दार्थ
(फिराक: वियोग, खा़र-खा़र : काँटा-काँटा, बेताब: अधीर, सूनेमन: शून्य, आतिलबहार: आग बरसता)
(शम्शेरे-हिज्र: वियोग के खड्ग, फिगा़र: घायल)
(ज़ईफ़: निर्बल, पाबस्ता: पादनिगड़ित, सोज़: जलन)
(खुमार:मदालसता)
(जोशे-खँ: खून के उबाल)
(हासिल: प्राप्त, सराया: सिर से पैर तक, शिकस्तगी: परास्तता, शकीबे: सन्तोष, सुब्हेबहार: वसंत की सुबह)
(इशरत: प्रमोद, पैरहन: परिधान)
(आशना: मित्र, तनमने: शरीर में, बेक़रार: अधीर, मिस्ले-शरार: अंगारे की तरह)
(आशिक़ाँ: प्रेमी, सुर्खऱू: भाग्यशाली)
(समर: फल, मुज शिकस्त: मेरी हार, चाक-चाक़: टुकड़े-टुकड़े, शकले-अनार: अनार-जैसी)
(आखिऱकुँ: अंत में, मैक़दे: मद्यशाला)
(फ़ैज़: सत्य/भगवान की दया)

आहिस्ता आहिस्ता 

सजन तुम सुख सेती खोलो नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता।
कि ज्यों गुल से निकसता है गुलाब आहिस्ता आहिस्ता।।

हजारों लाख खू़वाँ में सजन मेरा चले यूँ कर।
सितारों में चले ज्यों माहताब आहिस्ता आहिस्ता।।

सलोने साँवरे पीतम तेरे मोती की झलकाँ ने।
किया अवदे-पुरैय्या को खऱाब आहिस्ता आहिस्ता।।

शब्दार्थ
(गुल: गुलाब का फूल, खू़वाँ: प्रेमिकाओं, माहताब: चाँद, अवदे-पुरैय्या: तारों का समूह)

रूह बख़्शी है काम तुझ लब का

रूह बख़्शी है काम तुझ लब का

दम—ए—ईसा है नाम तुझ लब का

हुस्न के ख़िज़्र ने किया लबरेज़

आब—ए—हैवाँ सूँ जाम तुझ लब का

मन्तक़—ओ—हिकमत—ओ—मआनी पर

मुश्तमल है कलाम तुझ लब का

रग़—ए—याक़ूत के क़लम से लिखें

ख़त परस्ताँ पयाम तुझ लब का

सब्ज़ा—ओ—बर्ग—ओ—लाला रखते हैं

शौक़ दिल में दवाम तुझ लब का

ग़र्क़—ए—शक्कर हुए हैं काम—ओ—ज़बान

जब लिया हूँ मैं नाम तुझ लब का

है वली की ज़बाँ को लज़्ज़त बख़्श

ज़िक्र हर सुब्ह—ओ—शाम तुझ लब का

देखना हर सुब्ह तुझ रुख़सार का

देखना हर सुब्ह तुझ रुख़सार का

है मुताला मत्ला—ए—अनवार का

बुलबुल—ओ—परवाना करना दिल के तईं

काम है तुझ चेह्रा—ए—गुलनार का

सुब्ह तेरा दरस पाया था सनम

शौक़—ए—दिल मुह्ताज है तकरार का

माह के सीने ऊपर अय शम्अ रू !

दाग़ है तुझ हुस्न की झलकार का

दिल को देता है हमारे पेच—ओ—ताब

पेच तेरे तुर्रा—ओ—तर्रार का

जो सुनिया तेरे दहन सूँ यक बचन

भेद पाया नुस्ख़ा—ए—इसरार का

चाहता है इस जहाँ में गर बहिश्त

जा तमाशा देख उस रुख़सार का

अय वली ! क्यों सुन सके नासेह की बात

जो दिवाना है परी रुख़सार का

तुझ लब की सिफ़्त लाल—ए—बदख़्शाँ सूँ कहूँगा

तुझ लब की सिफ़्त लाल—ए—बदख़्शाँ सूँ कहूँगा

जादू हैं तेरे नैन ग़ज़ालाँ सूँ कहूँगा

दी बाद शाही हक़ ने तुझे हुस्न नगर की

यूँ किश्वर—ए—ईराँ में सुलेमाँ सूँ कहूँगा

तारीफ़ तेरे क़द की अलिफ़वार—ए—सदी जिन

जा सर्व—ओ—गुलिस्ताँ को ख़ुश इल्हाँ सूँ कहूँगा

मुझ पर न करो ज़ुल्म तुम अय लैला—ओ—ख़ूबाँ

मजनूँ हूँ तेरे ग़म को बियाबाँ सों सूँ कहूँगा

देखा हूँ तुझे ख़्वाब में अय माया—ए—ख़ूबी

इस ख़्वाब को जा यूसुफ़—ए—किन्आँ सूँ कहूँगा

जलता हूँ शब—ओ—रोज़ तेरे ग़म में अय सजन !

यह सोज़ तेरा मश्अल—ए—सोज़ाँ सूँ कहूँगा

ज़ख़्मी किया है मुझे तेरी पलकों की अनी ने

यह ज़ख्म तेरा ख़ंजर—ए—भालाँ सूँ कहूँगा

यक नुक़्ता तेरे सफ़्हा—ए—रुख़ पर नहीं बे—जा !

इस मुख को तेरे सफ़्हा—ओ—क़ुरआँ सूँ कहूँगा

बे—सब्र न हो अय वली ! इस दर्द सूँ हरगिज़

जलता हूँ तेरे दर्द में दरमाँ सूँ कहूँगा

किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम

किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता—अहिस्ता

के आतिश गुल को करती है गुलाब आहिस्ता—आहिस्ता

वफ़ादारी ने दिलबर की बुझाया आतिश—ए—गुल कूँ

के गर्मी दफ़्अ करता है गुलाब आहिस्ता—आहिस्ता

अजब कुछ लुत्फ़ रक्खा है शब—ए—ख़िल्वत में गुलरू सूँ

ख़िताब आहिस्ता—आहिस्ता जवाब आहिस्ता आहिस्ता

मेरे दिल कूँ किया बेख़ुद तेरी अखियाँ ने आख़िर कूँ

के ज्यूँ बेहोश करती है शराब आहिस्ता—आहिस्ता

हुआ तुझ इश्क़ सूँ अय आतशीं रू दिल मेरा पानी

के ज्यूँ गलता है आतिश सूँ गुलाब आहिस्ता—आहिस्ता

अदा—ए—नाज़ सूँ आता है वोह रौशन—जबीं घर सूँ

के ज्यूँ मशरिक़ से निकले आफ़ताब आहिस्ता—आहिस्ता

‘वली’ ! मुझ दिल में आता है ख़्याल—ए—यार बे—परवाह

कि ज्यूँ अँखियन में आता है ख़्वाब आहिस्ता—आहिस्ता

अयाँ है हर तरफ़ आलम में

अयाँ है हर तरफ़ आलम में हुस्न—ए—बे—हिजाब उसका

बग़ैर अज़ दीदा—ए—हैराँ नहीं जग में निक़ाब उसका

हुआ है मुझ पे शम्अ—ए—बज़्म—ए—यकरंगी सूँ यूँ रौशन

के हर ज़र्रे ऊपर ताबाँ है दायम आफ़ताब उसका

करे है उशाक़ कूँ ज्यूँ सूरत—ए—दीवार—ए—हैरत सूँ

अगर परदे सूँ वा होवे जमाल—ए—बेहिजाब उसका

सजन ने यक नज़र देखा निगाह—ए—मस्त सूँ जिसकूँ

ख़राबात—ए—दो आलम में सदा है वोह ख़राब उसका

मेरा दिल पाक है अज़ बस, ’वली’ ! जंग—ए—कदूरत सूँ

हुआ ज्यूँ जौहर—ए—आईना मख़्फ़ी पेच—ओ—ताब उसका

गफ़लत में वक़्त अपना न खो होशियार हो

गफ़लत में वक़्त अपना न खो होशियार हो, होशियार हो

कब लग रहेगा ख़्वाब में, बेदार हो, बेदार हो

गर देखना है मुद्दआ उस शाहिद—ए—मआनी का रू

ज़ाहिर परस्ताँ सूँ सदा,बेज़ार हो, बेज़ार हो

ज्यों छ्तर दाग़—ए—इश्क़ कूँ रख सर पर अपने अव्वलाँ

तब फ़ौज—ए—अहल—ए—दर्द का सरदार हो, सरदार हो

वो नौ बहार—ए—आशिक़ाँ, है ज्यूँ सहर जग में अयाँ

अय दीदा वक़्त—ए—ख़्वाब नईं बेदार हो, बेदार हो

मतला का मिसरा अय वली, विर्द—ए—ज़बाँ कर रात —दिन

गफ़लत में वक़्त अपना न खो, होशियार हो, होशियार हो

मुद्दत हुई सजन ने दिखाया नहीं जमाल

मुद्दत हुई सजन ने दिखाया नहीं जमाल

दिखला अपस के क़द कूँ किया नईं मुझे निहाल

यक बार देख मुझ तरफ़ अय ईद—ए— आशिक़ाँ

तुझ अब्रुआँ की याद सूँ लाग़िर हूँ ज्यूँ हिलाल

वोह दिल के था जो सोखता—ए—आतिश—ए—फ़िराक़

पहुँचा है जा के रुख़ कूँ सनम के बरंग—ए—ख़ाल

मुम्किन नहीं कि बदर हूँ नुक़्साँ सूँ आशना

लावे अगर ख्याल में तुझ हुस्न का कमाल

गर मुज़्तरिब है है आशिक़—ए—बेदिल अजब नहीं

वहशी हुए हैं तेरी अँखाँ देख कर ग़ज़ाल

फ़ैज़—ए—नसीम—ए—मेह्र—ओ—वफ़ा सूँ जहान में

गुलज़ार तुझ बहार का है अब तलक बहाल

खोया है गुलरुख़ाँ ने रऊनत सूँ आब—ओ—रंग

गर्दन—कशी है शम्अ की गरदन ऊपर वबाल

उसकूँ हासिल क्योंकर होए जग में

उसकूँ हासिल क्योंकर होए जग में फ़राग़—ए—ज़िन्दगी

गर्दिश—ए—अफ़लाक है जिस कूँ अयाग—ए—ज़िन्दगी

अय अज़ीज़ाँ सैर—ए—गुल्शन है गुल—ए—दाग—ए—अलम

सुहबत—ए—अहबाब है मआनी में बाग़—ए—ज़िन्दगी

लब हैं तेरे फ़िलहक़ीक़त चश्म—ए—आब—ए—हयात

ख़िज़्र—ए—ख़त ने उस सूँ पाया है सुराग़—ए—ज़िन्दगी

जब सूँ देखा नईं नज़र भर काकुल—ए—मुश्कीं—ए—यार

तबसे ज्यूँ सुम्बले—ए—परीशाँ है दिमाग़—ए—ज़िन्दगी

आसमाँ मेरी नज़र में कूबा—ए—तारीक है

गर न देखूँ तुझ कूँ अय चश्म—ए—चराग़—ए—ज़िन्दगी

लाला—ए—ख़ूनीं कफ़न के हाल से ज़ाहिर हुआ

बस्तगी है ख़ाल सूँ खूबाँ के दाग़—ए—ज़िन्दगी

क्यूँ न होवे अय ‘वली’! रौशन शब—ए—क़दर—ए—हयात

है निगाह—ए—गर्म—ए—गुलरू याँ चराग़—ए—ज़िन्दगी

जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे

जिसे इश्क़ का तीर कारी लगे

उसे ज़िन्दगी क्यूँ न भारी लगे

न छोड़े महब्बत दम—ए—मर्ग लग

जिसे यार—ए—जानीं सूँ यारी लगे

न होए उसे जग में हरगिज़ क़रार

जिसे इश्क़ की बेक़रारी लगे

हर इक वक़्त मुझ आशिक़—ए—पाक कूँ

पियारे तेरी बात प्यारी लगे

‘वली’ कूँ कहे तू अगर एक बचन

रक़ीबाँ के दिल में कटारी लगे

शग़्ल बेहतर है इश्क़ बाज़ी का

शग़्ल* बेहतर है इश्क़ बाज़ी का——काम
क्या हक़ीक़ी* व क्या मजाज़ी* का—–असली, नक़ली

हर ज़ुबाँ पर है मिस्ले-शाना मदाम
ज़िक्र तुझ ज़ुल्फ़ की दराज़ी का

होश के हाथ में इनाँ* न रही——–लगाम
जब सूँ देखा सवार ताज़ी* का—— अरबी

गर नहीं राज़-ए-इश्क़ से आगाह
फ़ख़्र बेजा है फ़ख़्र-ए-राज़ी का

ऎ वली सर्व क़द कूँ देखूँगा
वक़्त आया है सरफ़राज़ी*——सर ऊँचा करने का

मुफ़लिसी सब बहार खोती है

मुफ़लिसी सब बहार खोती है
मर्द का ऎतबार खोती है

क्योंके हासिल हो मुझको जमईय्यत*———सुकून, क़रार
ज़ुल्फ़ तेरी क़रार खोती है

हर सहर* शोख़ की निगह की शराब———सुबह, सवेरे
मुझ अंखाँ का ख़ुमार खोती है

क्योंके मिलना सनम का तर्क* करूँ———छोड़ना
दिलबरी इख़्तियार खोती है

ऎ वली आब* उस परीरू* की—चमक, परी जैसे मुखड़े वाली
मुझ सिने का ग़ुबार खोती है

दिल कूँ तुझ बाज बे-क़रारी है

दिल कूँ तुझ बाज बे-क़रारी है
चश्म का काम अश्क-बारी है

शब-ए-फ़ुर्क़त में मोनिस ओ हम-दम
बे-क़रारों कूँ आह ओ ज़ारी है

ऐ अज़ीज़ाँ मुझे नहीं बर्दाश्त
संग-दिल का फ़िराक़ भारी है

फ़ैज़ सूँ तुझ फ़िराक़ के साजन
चश्म-ए-गिर्यां का काम जारी है

फ़ौक़ियत ले गया हूँ बुलबुल सूँ
गरचे मंसब में दो-हज़ारी है

इश्क़-बाज़ों के हक़ में क़ातिल की
हर निगह ख़ंजर ओ कटारी है

आतिश-ए-हिज्र-ए-लाला-रू सूँ ‘वली’
दाग़ सीने में याद-गारी है

इश्क़ में सब्र ओ रज़ा दरकार है 

इश्क़ में सब्र ओ रज़ा दरकार है
फ़िक्र-ए-असबाब-ए-वफ़ा दरकार है

चाक करने जामा-ए-सब्र-ओ-क़रार
दिल-बर-ए-रंगीं क़बा दरकार है

हर सनम तस्ख़ीर-ए-दिल क्यूँकर सके
दिल-रुबाई कूँ अदा दरकार है

ज़ुल्फ़ कूँ वा कर के शाह-ए-इश्क़ कूँ
साया-ए-बाल-ए-हुमा दरकार है

रख क़दम मुझ दीदा-ए-ख़ूँ-बार पर
गर तुझे रंग-ए-हिना दरकार है

देख उस की चश्म-ए-शहला कूँ अगर
नर्गिस-ए-बाग़-ए-हया दरकार है

अज़्म उस के वस्ल का है ऐ ‘वली’
लेकिन इमदाद-ए-ख़ुदा दरकार है

जब सनम कूँ ख़याल-ए-बाग़ हुआ

जब सनम कूँ ख़याल-ए-बाग़ हुआ
तालिब-ए-नश्शा-ए-फ़राग़ हुआ

फ़ौज-ए-उश्शाक़ देख हर जानिब
नाज़नीं साहिब-ए-दिमाग़ हुआ

रश्क सूँ तुझ लबाँ की सुर्ख़ी पर
जिगर-ए-लाला दाग़-दाग़ हुआ

दिल-ए-उश्शाक़ क्यूँ न हो रौशन
जब ख़याल-ए-सनम चराग़ हुआ

ऐ ‘वली’ गुल-बदन कूँ बाग़ में देख
दिल-ए-सद-चाक बाग़-बाग़ हुआ

मैं आशिक़ी में तब सूँ अफ़साना हो रहा हूँ

मैं आशिक़ी में तब सूँ अफ़साना हो रहा हूँ
तेरी निगह का जब सूँ दीवाना हो रहा हूँ

ऐ आशना करम सूँ यक बार आ दरस दे
तुझ बाज सब जहाँ सूँ बे-गाना हो रहा हूँ

बाताँ लगन की मत पूछ ऐ शम्मा-ए-बज़्म-ए-ख़ूबी
मुद्दत से तुझ झलक का परवाना हो रहा हूँ

शायद वो गंज-ए-ख़ूबी आवे किसी तरफ़ सूँ
इस वास्ते सरापा वीराना हो रहा हूँ

सौदा-ए-ज़ुल्फ़-ए-ख़ूबाँ रखता हूँ दिल में दाइम
ज़ंजीर-ए-आशिक़ी का दीवाना हो रहा हूँ

बर-जा है गर सुनूँ नईं नासेह तेरी नसीहत
मैं जाम-ए-इश्क़ पी कर मस्ताना हो रहा हूँ

किस सूँ ‘वली’ आपस का अहवाल जा कहूँ मैं
सर ता क़दम मैं ग़म सूँ ग़म-ख़ाना हो रहा हूँ

सजन टुक नाज़ सूँ मुझ पास आ आहिस्ता आहिस्ता 

सजन टुक नाज़ सूँ मुझ पास आ आहिस्ता आहिस्ता
छुपी बातें अपस दिल की सुना आहिस्ता आहिस्ता

ग़रज़ गोयाँ की बाताँ कूँ न ला ख़ातिर मनीं हरगिज़
सजन इस बात कूँ ख़ातिर में ला आहिस्ता आहिस्ता

हर इक की बात सुनने पर तवज्जो मत कर ऐ ज़ालिम
रक़ीबाँ इस सीं होवेंगे जुदा आहिस्ता आहिस्ता

मुबादा मोहतसिब बद-मस्त सुन कर तान में आवे
तम्बूरा आह का ऐ दिल बजा आहिस्ता आहिस्ता

‘वली’ हरगिज़ अपस के दिल कूँ सीने में न रख ग़मगीं
कि बर लावेगा मतलब कूँ ख़ुदा आहिस्ता आहिस्ता

गिर्यां हैं अब्र-ए-चश्‍म मेरी अश्‍क बार देख

गिर्यां हैं अब्र-ए-चश्‍म मेरी अश्‍क बार देख
है बर्क़ बेक़रार, मुझे बेक़रार देख

फि़रदौस देखने की अगर आबरू है तुझ
ऐ ज्‍यू पी के मुख के चमन की बहार देख

हैरत का रंग लेके लिखे शक्‍ल-ए-बेख़ुदी
तेरे अदा-ओ-नाज़ को मा’नी निगार देख

वो दिल कि तुझ दतन के ख़यालाँ सूँ चाक था
लाया हूँ तेरी नज्र बहा-ए-अनार देख

ऐ शहसवार तू जो चला है रक़ीब पास
सीने में आशिक़ाँ के उठा है ग़ुबार देख

तेरी निगाह ख़ातिर-ए-नाज़ुक पे बार है
ऐ बुलहवस न पी की तरफ़ बार-बार देख

तुझ इश्‍क़ में हुआ है जिगर ख़ून-ओ-दाग़दार
दिल में ‘वली’ के बैठ के ओ लाला ज़ार देख

तुझ मुख की झलक देख गई जोत चंदर सूँ 

तुझ मुख की झलक देख गई जोत चँदर सूँ
तुझ मुख पे अरक़ देख गई आब गुहर सूँ

शर्मिंदा हो तुझ मुख के दिखे बाद सिकंदर
बिलफ़र्ज़ बनावे अगर आईना क़मर सूँ

तुझ ज़ुल्‍फ़ में जो दिल कि गया उसकूँ ख़लासी
नई सुब्‍ह-ए-क़यामत तलक इस शब के सफ़र सूँ

हर चंद कि वहशत है तुझ अँखियाँ सिती ज़ाहिर
सद शुक्र कि तुझ दाग़ कूँ अल्‍फ़त है जिगर सूँ

अशरफ़ का यो मिसरा ‘वली’ मुजको गुमाँ है
उल्‍फ़त है दिल-ओ-जाँ कूँ मिरे पेमनगर सूँ

देखे सूँ तुझ लबाँ के उपर रंग-ए-पान आज

देखे सूँ तुझ लबाँ के उपर रंग-ए-पान आज
चूना हुए हैं लाला रूख़ाँ के पिरान आज

निकला है बेहिजाब हो बाज़ार की तरफ़
हर बुलहवस की गर्म हुई है दुकान आज

तेरे नयन की तेग़ सूँ ज़ाहिर है रंग-ए-ख़ून
किस कूँ किया है क़त्‍ल ऐ बांके पठान आज

आखि़र कूँ रफ्त़ा-रफ्त़ा दिल-ए-ख़ाकसार ने
तेरी गली में जाके किया है मकान आज

कल ख़त ज़बान-ए-हाल सूँ आकर करेगा उज्र
आशिक़ सूँ क्‍या हुआ जो किया तूने मान आज

तेरी भवाँ कूँ देख के कहते हैं आशिक़ाँ
है शाह जिसके नाम चढ़ी है कमान आज

गंगा रवाँ किया हूँ अपस के नयन सिती
आ रे समन शिताब है रोज़-ए-नहान आज

क्‍यूँ दायरे सूँ ज़ुहरा जबीं के निकल सकूँ
यक तान में लिया है मिरे दिल कूँ तान आज

मेरे सुख़न कूँ गुलशन-ए-मा’नी का बोझ गुल
आशिक़ हुए हैं बुलबुल-ए-रंगी बयान आज

जोधा जगत के क्‍यूँ न डरें तुझ सूँ ऐ सनम
तर्कश में तुझ नयन के हैं अर्जुन के बान आज

जानाँ कूँ बस कि ख़ौफ़-ए-रकीबाँ है दिल मनीं
होता है जान बूझ हमन सूँ अजान आज

क्‍यूँ कर रखूँ मैं दिल कूँ ‘वली’ अपने खेंचकर
नईं दस्‍त-ए-अख्ति़यार में मेरे इनान आज

न समझो ख़ुद-ब-ख़ुद दिल बेख़बर है

न समझो ख़ुद-ब-ख़ुद दिल बेख़बर है
निगह में उस परी रू की असर है

अझूँ लग मुख दिखाया नहीं अपस का
सजन मुझ हाल सूँ क्‍या बेख़बर है

मुरव्‍वत तर्क मत कर ऐ परीरू
मुरव्‍वत में मुरव्‍वत मा’तबर है

तेरे क़द के तमाशे का हूँ तालिब
कि राह-ए-रास्‍त बाज़ी बेख़तर है

तिरी तारीफ़ करते हैं मलायक
सना तेरी कहाँ हद्द-ए-बशर है

बयान-ए-अहल-ए-मा’नी है मुतव्‍वल
अगरचे हस्‍बेज़ाहिर मुख़्तसर है

‘वली’ मुझ रंग कूँ देखे नज़र भर
अगर वो दिलरुबा मुश्‍ताक़-ए-ज़र है

मूसा अगर जो देखे तुझ नूर का तमाशा

मूसा अगर जो देखे तुझ नूर का तमाशा
उसकूँ पहाड़ हूवे फिर तूर का तमाशा

ऐ रश्‍क-ए-बाग़-ए-जन्‍नत तुझ पर नज़र किए सूँ
रि़ज्‍वाँ को होवे दोज़ख़ फिर हूर का तमाशा

रोज़-ए-सियाह उसके होंटों से जल्‍वागर है
तुझ ज़ुल्‍फ़ में जो देखा दैजूर का तमाशा

कसरत के फूलबन में जाते नहीं हैं आरिफ़
बस है मोहद्दाँ को मंसूर का तमाशा

है जिस सूँ यादगारी वो जल्‍वागर है दायम
तू चीं में देख जाकर फ़ग़फ़ूर का तमाशा

वो सर बुलंद आलम अज़ बस है मुझ नज़र में
ज्‍यूँ आसमां अयां है मुझ दूर का तमाशा

तुझ इश्‍क़ में वली के अंझो उबल चले हैं
ऐ बहर-ए-हुस्‍न आ देख उस पूर का तमाशा

जो कुई हर रंग में अपने कूँ

जो कुई हर रंग में अपने कूँ शामिल कर नहीं गिनते
हमन सब आक़िलाँ में उस कूँ आक़िल कर नहीं गिनते

मुदर्रिस मदरिसे में गर न बोले दर्स दर्शन का
तो उसकूँ आशिक़ाँ उस्‍ताद-ए-कामिल कर नहीं गिनते

ख़याल-ए-ख़ाम को जो कुई कि धोवे सफ़्ह-ए-दिल सूँ
तसव्‍वुफ़ के मतालिब कूँ वो मुश्किल कर नहीं गिनते

जो बिस्मिल नईं हुआ तेरी नयन की तेग़ सूँ बिस्मिल
शहीदाँ जग के उस बिस्मिल को बिस्मिल कर नहीं गिनते

पिरत के पंथ में जो कुई सफ़र करते हैं रात-ओ- दिन
वो दुनिया कूँ बग़ैर अज़ चाह-ए-बावल कर नहीं गिनते

नहीं जिस दिल में पी की याद की गर्मी की बेताबी
तो वैसे दिल कूँ सादे दिलबराँ दिल कर नहीं गिनते

रहे महरूम तेरी ज़ुल्फ़ के मुहरे सूँ वो दाइम
जो कुई तेरी नयन कूँ ज़हर-ए-क़ातिल कर नहीं गिनते

न पावे वो दुनिया में लज़्ज़त-ए-दीवानगी हरगि़ज
जो तुझ ज़ुल्‍फ़ाँ के हल्‍क़े कूँ सलासिल कर नहीं गिनते

बग़ैर अज़ मारिफ़त सब बात में गर कुई अछे कामिल
‘वली’ सब अहल-इरफ़ाँ उसकूँ कामिल कर नहीं गिनते

ये मेरा रोना कि तेरी हँसी

ये मेरा रोना कि तेरी हँसी
आप बस नईं परबसी परबसी

है कुल आलम में करम मेरे उपर
जुज़ रसी है जुज़ रसी है जुज़ रसी

रात दिन जग में रफ़ीक-ए-बेकसाँ
बेकसी है बेकसी है बेकसी

सुस्‍त होना इश्‍क़ में तेरे सनम!
नाकसी है नाकसी है नाकसी

बाइस-ए-रुस्वाई-ए-आलम ‘वली’
मुफ़लिसी है मुफ़लिसी है मुफ़लिसी

ज़बान-ए-यार है अज़ बस कि 

ज़बान-ए-यार है अज़ बस कि यार-ए-ख़ामोशी
बहार-ए-ख़त में है बर जा बहार-ए-ख़ामोशी

स्‍याही ख़त-ए-शब रंग सूँ मुसव्‍वर-ए-नाज़
लिखा निगार के लब पर निगार-ए-ख़ामोशी

उठा है लश्‍कर-ए-अहल-ए-सुख़न में हैरत सूँ
ग़ुबार-ए-ख़त सूँ सनम के ग़ुबार-ए-ख़ामोशी

ज़हूर-ए-ख़त में किया है हया ने बस कि ज़हूर
यो दिल शिकार हुआ है शिकार-ए-ख़ामोशी

हमेशा लश्‍कर-ए-आफ़ात सूँ रहे महफ़ूज़
नसीब जिसको हुआ है हिसार-ए-ख़ामोशी

ग़ुरूर-ए-ज़र सूँ बजा है सुकूत-ए-बेमा’नी
कि बेसदा है सदा कोहिसार-ए-ख़ामोशी

‘वली’ निगाह कर उस ख़त-ए-सब्‍ज़ रंग कूँ आज
कि तौर-ए-नूर में है सब्‍ज़ा ज़ार-ए-ख़ामोशी

मुश्ताक़ है उश्शाक़ तेरी बाँकी अदा के

मुश्‍ताक़ है उश्‍शाक़ तेरी बाँकी अदा के
ज़ख़्मी है महबाँ तेरी शमशीर-ए-जफ़ा के

हर पेच में चीरे के तिरे लिपटे हैं आशिक़
आलम के दिलाँ बंद हैं तुझ बंद-ए-क़बा के

लरज़ाँ हैं तिरे दस्‍त अगे पंजा-ए-ख़ुर्शीद
तुझ हुस्‍न अगे मात मलायक हैं समा के

तुझ ज़ुल्‍फ़ के हल्‍के में है दिल बंद ‘वली’ का
टुक मेहर करो हाल उपर बे सर-ओ-पा के

तनहा न ‘वली’ जग मिनीं लिखता है तिरे वस्‍फ़
दफ़्तर लिखा आलम ने तिरी मदह-ओ-सना के

जिसको लज़्ज़त है सुख़न के दीद की

जिसको लज़्ज़त है सुख़न के दीद की
उसको ख़ुशवक़्ती है रोज़-ए-ईद की

दिल मिरा मोती हो, तुझ बाली में जा
कान में कहता है बाताँ भेद की

ज़ुल्‍फ़ नईं तुझ मुख पे ऐ दरिया-ए-हुस्‍न
मौज है ये चश्‍म-ए-ख़ुर्शीद की

उसके ख़त-ओ-ख़ाल सूँ पूछो ख़बर
बूझता हिंदू है बाताँ बेद की

तुझ दहन कूँ देख कर बोला ‘वली’
ये कली है गुलशन-ए-उम्‍मीद की

नर्गिस क़लम हुई है सजन तुझ नयन अगे

नर्गिस क़लम हुई है सजन तुझ नयन अगे
शक्‍कर डुबी है आब में तेरे बचन अगे

ग़ुंचे कूँ गुल के आब में आना मुहाल है
तेरे दहन की बात कहूँ गर चमन अगे

डाला है तेरे चीरे ने ग़ुंचे कूँ पेच में
हर गुल है सीना चाक तेरे पैरहन अगे

है तुझ नयन के पास मेरा अजज़ बे असर
ज़ारी न जावे पेश कधी राहज़न अगे

कर हाल पर ‘वली’ के पिया लुत्फ़ सूँ नज़र
लाया है सर नियाज़ सूँ तेरे चरन अगे

उसको हासिल क्यूँ होवे जग में फ़रोग़-ए-ज़िदगी

उसको हासिल क्‍यूँ होवे जग में फ़रोग़-ए-ज़िदगी
गर्दिश-ए-अफ़लाक है जिसकूँ अयाग़-ए- ज़िदगी

ऐ अज़ीज़ाँ सैर-ए-गुलशन है गुल-ए-दाग़-ए-अलम
सुहबत-ए-अहबाब है मा’नी में बाग़-ए- ज़िदगी

लब हैं तेरे फि़लहक़ीक़त चश्‍म-ए-आब-ए-हयात
खि़ज़्र ख़त ने उससूँ पाया है सुराग़-ए- ज़िदगी

जब सूँ देखा नईं नज़र भर काकुल-ए-मुश्‍कीन-ए-यार
तब सूँ ज्‍यूँ संबल परीशाँ है दिमाग़-ए- ज़िदगी

आसमाँ मेरी नज़र में काबा-ए-तारीक है
गर न देखूँ तुजकूँ ऐ चश्‍म-ओ-चिराग़-ए- ज़िदगी

लाला-ए-ख़ूनीं कफ़न के हाल सूँ ज़ाहिर हुआ
बस्‍तगी है ख़ाल सूँ ख़ूवाँ के दाग़-ए- ज़िदगी

क्‍यूँ न होवे ऐ ‘वली’ रौशन शब-ए-क़द्र-ए-हयात
है निगाह-ए-गर्म-ए-गुलरूयाँ चिराग़-ए- ज़िदगी

अगर गुलशन तरफ़ वो नो ख़त-ए-रंगीं 

अगर गुलशन तरफ़ वो नो ख़त-ए-रंगीं अदा निकले
गुल-ओ-रेहाँ सूँ रंग-ओ-बू शिताबी पेशवा निकले

खुले हर ग़ुंच-ए-दिल ज्‍यूँ गुल-ए-शादाब शादी सूँ
अगर टुक घर सूँ बाहर वो बहार-ए-दिल कुशा निकले

ग़नीम-ए-ग़म किया है फ़ौज बंदी इश्‍क़ बाराँ पर
बजा है आज वो राजा अगर नोबत बजा निकले

निसार उसके क़दम ऊपर करूँ अंझुवाँ के जौहर सब
अगर करने को दिलजोई वो सर्व-ए-ख़ुश अदा निकले

सनम आए करूँगा नाला-ए-जाँ सोज़ क्‍यूँ ज़ाहिर
मगर उस संग दिल सूँ महरबानी की सदा निकले

रहे मानिंद-ए-लाल-ए-बेबहा शाहाँ के ताज ऊपर
मुहब्‍बत में जो कुई असबाब-ए-ज़ाहिर कूँ बहा निकले

बख़ीली दरस की हरगिज़ न कीजो ऐ परी पैकर
‘वली’ तेरी गली में जबकि मानिंद-ए-गदा निकले।

सरोद-ए-ऐश गावें हम, अगर वो उश्वआ साज़ आवे

सरोद-ए-ऐश गावें हम, अगर वो उश्‍व साज़ आवे
बजा दें तब्‍ल शादी के अगर वो दिलनवाज़ आवे

ख़ुमार-ए-हिज्र ने जिसके दिया है दर्द-ए-सर मुजकूँ
रखूँ नश्‍शा नमन अँखियाँ अगर वो मस्‍त-ए-नाज़ आवे

जुनून-ए-इश्‍क़ में मुजकूँ नहीं ज़ंजीर की हाजत
अगर मेरी ख़बर लेने कूँ वो ज़ुल्‍फ़-ए-दराज़ आवे

अदब के एहतिमाम आगे न पावे बार वाँ हरगिज़
लिए साये की पाबोसी कूँ गर रंज-ए-अयाज़ आवे

अजब नईं गर गुलाँ दौड़ें पकड़ कर सूरत-ए-क़मरी
अदा सूँ जब चमन भीतर वो सर्व-ए-सरफ़राज़ आवे

परस्तिश उसकी मेरे सर पे होवे सर सिती लाजि़म
सनम मेरा रक़ीबाँ के अगर मिलने सूँ बाज़ आवे

‘वली’ उस गौहर-ए-कान-ए-हया की क्‍या कहूँ ख़ूबी
मिरे घर इस तरह आता है ज्‍यूँ सीने में राज़ आवे

जिस वक़्त तबस्सु-म में वो रंगीं दहन आवे 

जिस वक़्त तबस्‍सुम में वो रंगीं दहन आवे
गुलज़ार में ग़ुंचे के दहन पर सुख़न आवे

ताहश्र उठे बू-ए-गुलाब उसके अरक़ सूँ
जिस बरमिनीं यकबार वो गुल पैरहन आवे

साया हो मेरा सब्‍ज़ बरंग-ए-पर-ए-तूती
गर ख़्वाब में वो नो ख़त-ए-शीरीं बचन आवे

खींचे अपस अँखियाँ मिनीं ज्‍यूँ कुहल-ए-जवाहर
उश्‍शाक़ के घर हाथ वो ख़ाक-ए-चमन आवे

यक गुल कूँ अपस हाल में उस वक़्त न पावे
जिस वक़्त चमन बीच वो रश्‍क-ए-चमन आवे

आलम में तेरे होश की तारीफ़ किया हूँ
ऐसा तो न कर काम कि मुझ पर सुख़न आवे

गर हिंद में तुझ ज़ुल्‍फ़ की, काफि़र कूँ ख़बर हो
सुनने कूँ सबक़ कुफ़्र का हर बिरहमन आवे

हरगिज़ सुख़न-ए-सख़्त को लावे न ज़बाँ पर
जिस दहन में यक बार वो नाज़ुक बदन आवे

ताहश्र करे सैर-ए-ख़याबाँ के चमन में
गर गौर पे आशिक़ के वो अमरत बचन आवे

बर जा है अगर जग में ‘वली’ फिर कि दुजे बार
रख शौक़ मिरे शे’र का ‘शौक़ी हसन’ आवे

अगर मुझ कन तू ऐ रश्क‍-ए-चमन होवे

अगर मुझ कन तू ऐ रश्‍क-ए-चमन होवे तो क्‍या होवे
निगह मेरी का तेरा मुख वतन होवे तो क्‍या होवे

सियह रोज़ाँ के मातम की सियाही दफ़्अ करने कूँ
अगर यक निस तू शम्‍मे-अंजुमन होवे तो क्‍या होवे

तेरी बाताँ के सुनने का हमेशा शौक़ है दिल में
अगर यकदम तूँ मुझ सूँ हमसुख़न होवे तो क्‍या होवे

हुआ जो शौक़ में तुझ देखने के ऐ हलाल अबरू
उसे अँखियाँ के पर्दे का कफ़न होवे तो क्‍या होवे

अगर ग़ुंचा नमन इक रात इस हस्‍ती के गुलशन में
‘वली’ मुझ बर में वो गुल पैरहन होवे तो क्‍या होवे

हाफ़िज़े का हुस्न दिखलाया है निस्यानी मुझे

हाफ़िज़े का हुस्‍न दिखलाया है निस्‍यानी मुझे
है कलीद-ए-क़ुफ़्ल-ए-दानिश तर्ज़-ए-नादानी मुझे

मौजज़न है दिल में मेरे हर रयन में पेचोताब
जब सूँ तेरी ज़ुल्‍फ़ ने दी है परीशानी मुझे

क्‍यूँ परीरूयाँ न आवें हुक्‍म में मेरे तमाम
तुझ दहन की याद है मुहर-ए-सुलेमानी मुझे

यक पलक दूजे पलक सूँ नईं हुई है आशना
जब सूँ तेरे हुस्‍न ने बख़्शी है हैरानी मुझे

ऐ ‘वली’ हक़ रफ़ाक़त के अदा करते भी क्‍या
मुस्‍तहक़्क़-ए-मग़फि़रत आलूदा दामानी मुझे

मुदद्त हुई सजन ने किताब नईं लिखी 

मुदद्त हुई सजन ने किताबत नईं लिखी
आने की अपने रम्‍ज़-ओ-किनायत नईं लिखी

मैं अपने दिल की तुझकूँ हिकायत नईं लिखी
तेरी मफ़ार्क़त की शिकायत नईं लिखी

करता हूँ अपने दिल की नमन चाक-चाक उसे
जो आह के क़लम सूँ किताबत नईं लिखी

तस्‍वीर तेरे क़द की मुसव्विर न लिख सके
हरगिज़ किसी ने नाज़ की सूरत नईं लिखी

मारा है इंतिज़ार ने मुझकूँ वले हनोज़
उस बेवफा कूँ दिल की हक़ीक़त नईं लिखी

क्‍यूँ संग-ए-दिल तमाम मुसख़्ख़िर हुए अगर
ताल्अ में मेरे कश्‍फ़-ओ-करामत नईं लिखी

डरता है सादगी सिती मोहन की ऐ ‘वली’
इस ख़ौफ़ सूँ रक़ीब की अत-पत नईं लिखी

मग़ज़ उसका सुबास होता है

मग़ज़ उसका सुबास होता है
गुलबदन के जो पास होता है

आ शिताबी नईं तो जाता हूँ
क्‍या करूँ जी उदास होता है

क्‍यूँकि कपड़े रंगूँ मैं तुज ग़म में
आशिक़ी में लिबास होता है?

तुज जुदाई में नईं अकेला मैं
दर्द-ओ-ग़म आस-पास होता है

ऐ ‘वली’ दिलरुबा के मिलने कूँ
जी में मेरे हुलास होता है

सनम मेरा सुख़न सूँ आशना है 

सनम मेरा सुख़न सूँ आशना है
मुझे फि़क्र-ए-सुख़न करना बजा है

चमन में वस्‍ल के हर जल्‍वए-यार
गुल-ए-रंगीं बहार-ए-मुदद्आ है

न बख्‍श़े क्‍यूँ तेरा ख़त जिंद़गानी
कि मौज-ए-चश्‍मए-आब-ए-बक़ा है

तग़ाफ़ुल ने तिरे ज़ख़्मी किया मुझ
तेरी ये कमनिगाही नीमचा है

नहीं वाँ आब, ग़ैर अज़ आब-ए-ख़ंजर
शहादत गाह-ए-आशिक़ कर्बला है

ग़नीमत बूझ मिलने कूँ ‘वली’ के
निगाह-ए-पाकबाज़ाँ कीमिया है

इश्क़ में जिसकूँ महारत ख़ूब है 

इश्‍क़ में जिसकूँ महारत ख़ूब है
मश्रब-ए-मजनूँ तरफ़ मंसूब है

आशिक़-ए-बेताब सूँ तर्ज़-ए-वफ़ा
ज्‍यूँ अदा मेहबूब की मेहबूब है

इश्‍क़ के मुफ़्ती ने यो फ़त्‍वा दिया
देखना ख़ूबाँ का दर्स-ए-ख़ूब है

लख़्त-ए-दिल पे ख़त लिखा हूँ यार कूँ
दाग़-ए-दिल मुहर-ए-सर-ए-मक्‍तूब है

ग़म्‍ज़-ओ-नाज-ओ-अदा-ए-नाज़नीं
ज़ुल्‍म है, तूफ़ान है, आशोब है

लिख दिया यूसुफ़ ग़ुलामी ख़त तुझे
गरचे नूर-ए-दीदए-याक़ूब है

हर घड़ी पढ़ता है अशआर-ए-‘वली’
जिसकूँ हर्फ़-ए-आशिक़ी मर्ग़ूब है

तेरी ज़ुल्फ़ के पेच में छंद है

तेरी ज़ुल्‍फ़ के पेच में छंद है
कि जिस छंद में चंद दर चंद है

ख़याल-ए-ज़ुलफ़ तुझ रसा का सनम
आशिक़ाँ के दिल का अलीबंद है

बिरह आग तेरा मेरे घर मिनीं
जो बंदा किया बंद दर बंद है

तकल्‍लुम है तुझ लब सूँ यूँ ख़ुशमज़ा
जो बेजा कया शक्‍कर-ओ-क़ंद है

दिवाना किया है ‘वली’ कूँ सदा
तिरी-ज़ुल्‍फ़ में क्‍या सजन! छंद है

जब सूँ बाँधा है ज़ालिम तुझ निगह के तीर सूँ 

जब सूँ बाँधा है ज़ालिम तुझ निगह के तीर सूँ
तब सूँ रम ले रम किया रमने के हर नख़्वीर सूँ

बेहक़ीक़त गर्मजोशी दिल में नईं करती असर
शम्‍अ रौशन क्‍यूँ के होवे शो’ला-ए-तस्‍वीर सूँ

जग में ऐ ख़ुर्शीद रू वो चर्ख़ज़न है ज़र्रावार
जिनने दिल बाँधा है तेरे हुस्‍न-ए-आलमगीर सूँ

ऐ परी तुझ क़द का दीवाना हुआ है जब सूँ सर्व
पायबंद असकूँ किए हैं मौज की ज़जीर सूँ

ख़्वाब में देखा जो तरे सब्‍ज़-ए-ख़त कूँ सनम
सब्‍ज़बख़्तों में हुआ उस ख़्वाब की ताबीर सूँ

जग में नईं अहल-ए-हुनर अपने हुनर सूँ बहरायाब
कोहकन कों फ़ैज़ कब पहुँचा है जू-ए-शीर सूँ

ऐ ‘वली’ पी का दहन है गुंचए-गुलज़ार-ए-हुस्‍न
बू-ए-गुल आती है असकी शोखि़-ए-तक़रीर सूँ

ख़ुदाया मिला साहिब-ए-दर्द कूँ

ख़ुदाया मिला साहिब-ए-दर्द कूँ
कि मेरा कहे दर्द बेदर्द कूँ

करे ग़म सूँ सद बर्ग सदपारा दिल
दिखाऊँ अगर चेहरा-ए-ज़र्द कूँ

हटा बुलहवस तुझ भवाँ देखकर
कहाँ ताब-ए-शमशीर नामर्द कूँ

अगर जल में जल कर कँवल ख़ाक हो
न पहुँचे तिरे पाँव की गर्द कूँ

लिखा तुझ दहन की सिफ़त में ‘वली’
हर एक फ़र्द में जौहर-ए-फ़र्द कूँ

देता नहीं है बार रक़ीब-ए-शरीर कूँ

देता नहीं है बार रक़ीब-ए-शरीर कूँ
शायद कि बूझता है हमारे ज़मीर कूँ

उस नाज़नीं की तब्‍अ गर आबे ख़याल में
बूझूँ सदा-ए-सूर क़लम की सरीर कूँ

बरजा है उसकूँ इश्‍क़ के गोशे मनीं क़रार
जो पेच-ओ-ताब दिल सूँ बिछावे हसीर कूँ

उसके क़दम की ख़ाक में है हश्र की नजात
उश्‍शाक़ के कफ़न में रखो इस अबीर कूँ

मुझको ‘वली’ की तब्‍अ की साफ़ी की है क़सम
देखा नहीं है जग में सजन तुझ नज़ीर कूँ

हरगिज़ तू न ले साथ रक़ीब-ए-दग़ली कूँ

हरगिज़ तू न ले साथ रक़ीब-ए-दग़ली कूँ
मत राह दे खि़लवत मिनीं ऐसे ख़लाली कूँ

तेरे लब-ए-याक़ूत उपर ख़त-ए-ख़फ़ी देख
ख़त्तात-ए-जहाँ नस्‍ख़ किये ख़त-ए-जली कूँ

ऐ ज़ुहरा जबीं किशन तेरे मुख की कली देख
गाता है हर इक सुबह में उठ रामकली कूँ

ऐ महजबीं महर-ए-लक़ा तेरी जबीं पर
करता हूँ हर इक दम मिनीं दम नाद-ए-अली कूँ

मैं दिल कूँ तेरे हाथ दिया रोज़-ए-अज़ल सूँ
मत दिल सूँ बिसार अपने महब्‍बे-अज़ली कूँ

नहीं मंसब-ओ-जागीर नहीं रोज़ वज़ीफ़ा
हर रोज़ तेरा नाम वज़ीफ़ा है ‘वली’ कूँ

हुआ है रश्क चम्पे की कली कूँ

हुआ है रश्‍क चम्‍पे की कली कूँ
नज़र कर तुझ क़बा-ए-संदली कूँ

करे फिऱदौस इस्‍तक़बाल उसका
तसव्‍वुर जो किया तेरी गली कूँ

हमारी आह-ए-आतिश रंग सुनकर
हुई है बेक़रारी बीजली कूँ

तिरे ग़म में दिल-ए-सूराख़-सूराख़
किया पैदा सदा-ए-बाँसली कूँ

दिल-ए-पुर ख़ूँ ने मेरे बाग़ में जा
दिया तालीम-ए-ख़ूँख़्वारी कली कूँ

किया है आब-ए-ख़जलत सूँ सरापा
हर इक मिसरा सूँ मिस्‍त्री की डली कूँ

पड़े सुनकर उछल ज्‍यूँ मिसर-ए-बर्क़
अगर मिसरा लिखूँ ‘नासिर अली’ कूँ

तिरे अशआर ऐसे नहीं ‘फ़राक़ी’
कि जिस पर रश्‍क आवेगा ‘वली’ कूँ

जो कोई समझा नहीं उस मुख के आँचल के मआनी कूँ

जो कोई समझा नहीं उस मुख के आँचल के मआनी कूँ
वो क्‍यूँ बूझे कहो उस शोख़ चंचल के मआनी कूँ

करें गर बहस उस अँखियाँ के जादू की सहर साज़ाँ
न पहुँचे कोई बारीकी में काजल के मआनी कूँ

वो यूसुफ़ कूँ कहे सानी सो उस बेमिस्‍ल का क्‍यूँ कर
दो बीं कर जो कि समझा चश्‍म-ए-अहवल के मआनी कूँ

न निकले बहर-ए-हैरत सूँ जो हुए उस मुख का हमज़ानू
ये बूझे वो जो पहूँचा है सजन जल के मा’नी कूँ

सफ़ाई देख उसके मुख की है बेहोश सर ता पा
यही तहक़ीक समझो ख़्वाब मख़मल के मआनी कूँ

बयाँ ज़ुल्‍फ़-ए-बदीई का है ‘सादुद्दीन’ का मतलब
अझूँ लग तुम नहीं समझे मुतव्वल के मआनी कूँ

‘वली’ उस माह-ए-कामिल की हक़ीक़त जो नहीं समझा
वो हरगिज़ नईं बुझा आलम में अकमल के मआनी कूँ

फि़दा-ए-दिलबर-ए-रंगीं अदा हूँ /

फि़दा-ए-दिलबर-ए-रंगीं अदा हूँ
शहीद-ए-शाहिद-ए-गुल गूँ क़बा हूँ

हर इक मह रू के नहीं मिलने का ज़ौक़
सुख़न के आशाना का आशना हूँ

किया हूँ तर्क नर्गिस का तमाशा
तलबगार-ए-निगार-ए-बाहया हूँ

न कर शमशाद की तारीफ़ मुझ पास
कि मैं उस सर्वक़द का मुब्तिला हूँ

किया मैं अर्ज़ उस ख़ुर्शीदरू सूँ
तू शह-ए-हुस्‍न मैं तेरा गदा हूँ

सदा रखता हूँ शौक़ उसके सुख़न का
हमेशा तिश्‍ना-ए-आब-ए-बक़ा हूँ

क़दम पर उसके रखता हूँ सदा सर
‘वली’ हममशरब-ए-रंग-ए-‍हिना हूँ

रखता हूँ शम्मे-आह सुख़न के फि़राक़ में

रखता हूँ शम्‍मे-आह सुख़न के फि़राक़ में
हाजत नहीं चिराग की मेरे रवाक़ में

आब-ए-हयात-ए-वस्‍ल सूँ सीने के सर्द कर
जलता हूँ रात-देस पिया तुझ फि़राक़ में

सुनकर ख़बर सबा सूँ गरेबाँ कूँ चाक कर
निकले हैं गुल चमन सूँ तेरे इश्तियाक़ में

ऐ दिल अक़ीक-ए-लब के ये आए हैं मुश्‍तरी
मोती न बूझ ज़ुहरा जबीं के बलाक़ में

तेरे सुख़न के ऩग्‍मा-ए-रंगीं कूँ सुन ‘वली’
डूबा अरक़ के बीच ‘इराक़ी’ इराक़ में

हुआ तू ख़ुसरव-ए-आलम सजन! शीरीं मक़ाली में

हुआ तू ख़ुसरव-ए-आलम सजन! शीरीं मक़ाली में
आयाँ हैं बद्र के मा’नी तेरी साहब-कमाली में

जो कैफि़यत सियहमस्‍ती की तुझ अँखियाँ में है ज़ालिम
नहीं वो रंग वो मस्‍ती शराब-ए-पुर्तग़ाली में

तिरी ज़ुल्‍फ़ों के हल्‍कें में है यूँ नक़्श-ए-रूख़-ए-रौशन
कि जैसे हिंद के भीतर लगें दीवे दिवाली में

अगरचे हर सुख़न तेरा है आब-ए-खि़ज़्र सूँ शीरीं
वले ल़ज्‍ज़त निराली है पिया तुझ लब की गली में

कहो उस नूर चश्‍म-ओ-पिस्‍ता लब कूँ आशनाई सूँ
कि ज्‍यूँ बादाम के दो म़ग्‍ज़ होवें यक निहाली में

नज़र में नईं है मर्दों की सलाबत अहल-ए-ज़ीनत की
नहीं देखा कोई रंग-ए-शुजाअत शेर-ए-क़ाली में

‘वली’ के हर सुख़न का वो हुआ है मू-ब-मू ख़्वाहाँ
जो कुई पाया है लज़्ज़त तझ भवाँ के शे’र-ए-हाली में

छुपा हूँ मैं सदा-ए-बांसली में 

छुपा हूँ मैं सदा-ए-बांसली में
कि ता जाऊँ परी रू की गली में

न थी ताक़त मुझे आने की लेकिन
बा ज़ोर-ए-आह पहूँचा तुझ गली में

अयाँ है रंग की शोख़ी सूँ ऐ शोख़
बदन तेरा क़बा-ए-संदली में

जो है तेरे दहन में रंग-ओ-ख़ूबी
कहाँ ये रंग, ये ख़ूबी कली में

किया ज्‍यूँ लफ़्ज में मा’नी सिरीजन
मुक़ाम अपना दिल-ओ-जान-ए-‘वली’ में

सहर पर्दाज़ हैं पिया के नयन

सहर पर्दाज़ हैं पिया के नयन
होश दुश्‍मन हैं ख़ुश अदा के नयन

ऐ दिल उसके अगे सँभाल के जा
तेग़ बरकफ़ हैं मीरज़ा के नयन

दिल हुआ आज मुझ सूँ बेगाना
देख उस रम्‍ज़ आशना के नयन

जग में अपना नज़ीर रखते नहीं
दिलबरी में वो दिलरुबा के नयन

नरगिस्‍ताँ को देखने मत जा
देख उस नरगिसी क़बा के नयन

वो है गुलज़ार-ए-आबरू का गुल
हक़ ने जिसको दिए हया के नयन

ऐ ‘वली’ किस अगे करूँ फ़रियाद
ज़ुल्‍म करते हैं बेवफ़ा के नयन

ख़ूब रू ख़ूब काम करते हैं

ख़ूब रू ख़ूब काम करते हैं
यक निगह में तमाम करते हैं

देख ख़ूबाँ कूँ वक्‍त़ मिलने के
किस अदा सूँ सलाम करते हैं

क्‍या वफ़ादार हैं कि मिलने में
दिल सूँ सब राम-राम करते हैं

कम निगाही सूँ देखते हैं वले
काम अपना तमाम करते हैं

खोलते हैं जब अपनी ज़ुल्फ़ाँ कूँ
सुबह आशिक़ कूँ शाम करते हैं

साहब-ए-लफ़्ज़ उसको कह सकते
जिस सूँ ख़ूबाँ कलाम करते हैं

दिल लिजाते हैं ऐ ‘वली’ मेरा
सर्व क़द जब खि़राम करते हैं

तुझ हुस्ऩ ने दिया है बहार आरसी के तईं

तुझ हुस्‍न ने दिया है बहार आरसी के तईं
बख़्शा है ख़ाल-ओ-ख़त ने निगार आरसी के तईं

रौशन है बात ये कि अवल सादालोह थी
बख़्शे हैं उसके मूँह सूँ सिंघार आरसी के तईं

ख़ूबी मिनीं अवल सूँ हुई है दहचंद तर
जब सूँ किया सनम ने दो-चार आरसी के तईं

हैरत की अंजुमन में वो हैरत फ़ज़ा ने जा
यक दीद में किया है शिकार आरसी के तईं

किस ख़त के पेच-ओ-तब कूँ दिल में रखे कि आज
ज्‍यूँ आब जू नहीं है क़रार आरसी के तईं

हैरत सूँ आँख अपस की न मूँदे हश्र तक
यक पल तो उस निज़क जो गुज़ार आरसी के तईं

गर उसके देखने की ‘वली’ आरज़ू है तुझ
बेगी अपस के दिल को सँवार आरसी के तईं

चाहो कि होश सर सूँ अपस के बदर करो

चाहो कि होश सर सूँ अपस के बदर करो
यक बार उस परी की गली में गुज़र करो

है कि़स्‍स-ए-दराज़ के सुनने की आरज़ू
उस जुल्‍फ़-ए-ताबदार की तारीफ़ सर करो

बूझो हलाल-ए-चर्ख़ कूँ अबरू-ए-पीर ज़ाल
उसकी भवाँ के ख़म पे अगर टुक नज़र करो

उस गुल के गर विसाल की है दिल में आरज़ू
शबनम नमन तमाम अँखियाँ अपनी तर करो

ऐ दोस्ताँ बनंग हुआ हूँ मैं होश सूँ
पीतम का नाँव ले के मुझे बेख़बर करो

पहुँचा है जिसको हिज्र की सख़्ती सूँ
उस बेख़बर कूँ हाल सूँ मेरे ख़बर करो

हर शे’र सूँ ‘वली’ के अज़ीजाँ बयाज़ में
मिस्‍तर के ख़त कूँ रिश्‍तए-सल्‍क-ए- गुहर करो

चाहो कि पी के पग तले अपना वतन करो

चाहो कि पी के पग तले अपना वतन करो
अव्‍वल अपस कूँ अजज़ में नक्‍श़-ए-चरन करो

हे गुलरुख़ाँ कूँ ज़ौक़-ए-तमाशा-ए-आशिक़ाँ
दाग़ाँ सिती दिलाँ कूँ उसके चमन करो

साबित हो आशिक़ाँ में जला जो पतंग वार
तार-ए-निगाह-ए-शम्‍अ सूँ उसका कफ़न करो

गर आरज़ू है दिल में हम आगोशिए-सनम
अँसुआँ सूँ अपने सेज जर फ़र्श-ए-चमन करो

चाहो कि हो ‘वली’ के नमन जग में दूरबीं
अँखियाँ में सुरमा पीव की ख़ाक-ए-चरन करो

ग़फ़लत में वक्त़ अपना न खो हुशियार हो 

ग़फ़लत में वक्‍त़ अपना न खो हुशियार हो हुशियार हो
कब लग रहेगा ख़्वाब में बेदार हो बेदार हो

गर देखना है मुद्दआ, उस शहिद-ए-मा’नी का रौ
ज़ाहिर परीशाँ सूँ सदा, बेज़ार हो बेज़ार हो

ज्‍यूँ चतर दाग़-ए-इश्‍क कूँ रख सर पे अपने अव्‍वलन
तब फ़ौज-ए-अहल-ए-दर्द का, सरदार हो, सरदार हो

वो नोबहार-ए-आशिक़ाँ, ज्‍यूँ सहर जग में है अयाँ
ऐ दीद: वक़्त-ए-ख़्वाब नईं, बेदार हो, बेदार हो

मत्‍ले का मिसरा ऐ ‘वली’ दर्द-ए-ज़बाँ कर रात-दिन
ग़फ़लत में वक़्त अपना न खो, हुशियार हो, हुशियार हो

आज दिसता है हाल कुछ का कुछ

आज दिसता है हाल कुछ का कुछ
क्‍यूँ न गुज़रे ख़याल कुछ का कुछ

दिल-ए-बेदिल कूँ आज करती है
शोख़ चंचल की चाल कुछ का कुछ

मुजकूँ लगता है ऐ परी पैकर
आज तेरा जमाल कुछ का कुछ

असर-ए-बाद:-ए-जवानी है
कर गया हूँ सवाल कुछ का कुछ

ऐ ‘वली’ दिल कूँ आज करती है
बू-ए-बाग़-ए-विसाल कुछ का कुछ

तुझ मुख पे जो इस ख़त का अंदाज़ा हुआ

तुझ मुख पे जो इस ख़त का अंदाज़ा हुआ ताज़ा
अब हुस्‍न के दीवाँ का शीराज़ा हुआ ताज़ा

फूलाँ ने अपस का रंग ईसार किया तुझ पर
तुझ मुख पे जब ऐ मोहन ये ग़ाज़ा हुआ ताज़ा

उस हुस्‍न के आलम में तू शुहरा-ए-आलम है
हर मुख सूँ तेरा जग में आवाज़ा हुआ ताज़ा

सीने सूँ लगाने की हुई दिल कूँ उमंग ताज़ी
आलस सिती जब तुझ में ख़मियाज़ा हुआ ताज़ा

जो शे’र लिबासी थे ज्‍यूँ फूल हुए बासी
जब शे’र ‘वली’ तेरा यो ताज़ा हुआ ताज़ा

अब जुदाई न कर ख़ुदा सूँ डर

अब जुदाई न कर ख़ुदा सूँ डर
बेवफ़ाई न कर ख़ूदा सूँ डर

रास्‍त कैशाँ सूँ ऐ कमाल अबरू
कज अदाई न कर खुदा सूँ डर

मत तग़ाफ़ुल कूँ राह दे ऐ शोख़
जगहँसाई न कर खुदा सूँ डर

है जुदाई में ज़िदगी मुश्किल
आ, जुदाई न कर खुदा सूँ डर

आशिक़ाँ कूँ खहीद कर के सनम
कफ़हिनाई न कर खुदा सूँ डर

आरसी देखकर न हो मग़रूर
ख़ुदनुमाई न कर खुदा सूँ डर

उस सूँ जो आशना-ए-दर्द नहीं
आशनाई न कर खुदा सूँ डर

रंग-ए-आशिक़ ग़ज़ब सूँ ऐ जा़लिम
कुहरबाई न कर खुदा सूँ डर

ऐ ‘वली’ ग़ैर-ए-आस्‍ताना-ए-यार
जुब्‍बा साई न कर खुदा सूँ डर

ऐ बाद-ए-सबा बाग़ में मोहन के

ऐ बाद-ए-सबा बाग़ में मोहन के गुज़र कर
मुझ दाग़ की इस लालए-ख़ूनीं कूँ ख़बर कर

क्‍या दर्द किसी कूँ कि कहे दर्द मिरा जा
ऐ आह मिरे दर्द की तूँ जाके ख़बर कर

सब तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल कूँ मिरे हक़ में रवा रख
ऐ शोख़ मिरी आह सूँ अलबत्‍ता हज़र कर

दूजा नहीं ता पी सूँ कहे दिल की हक़ीक़त
ऐ दर्द तू जा जीव में उस पी के असर कर

क्‍या ग़म है उसे तौर-ए-हवादिस सूँ जहाँ में
बूझा जो कोई गर्दिश-ए-साग़र कूँ सपर कर

कई बार लिखा उसकी तरफ़ नामे कूँ लेकिन
हर बार सटा अश्‍क ने मुझ नामे कूँ तर कर

हर वक़्न सट कुलहे-ए-तगाफ़ल कूँ अँखाँ में
टुक मेहर सूँ इस तरफ़ ऐ बेमहर नज़र कर

उस साहिब-ए-दानिश सूँ ‘वली’ है ये तअज्‍जुब
यकबारगी क्‍यूँ मुझकों गया दिल से बिसर कर

ऐ सर्व-ए-ख़रामाँ तूँ न जा बाग़

ऐ सर्व-ए-ख़रामाँ तूँ न जा बाग़ में चलकर
मत क़मरी-ओ-शम्‍शाद के सौदे में ख़लल कर

कर चाक गरेबाँ कूँ गुलाँ सेहन-ए-चमन में
आये हैं तिरे शौक़ में पर्दे सूँ निकल कर

सन्‍अत के मुसव्विर ने सबाहत के सफ़्हे पर
तस्‍वीर बनाया है तिरी नूर कूं हल कर

ऐ नूर-ए-नज़र शम्‍अ कूँ देखा हूँ सरापा
तुझ इश्‍क़ की आतिश सिती काजल हुआ जलकर

बेआब लगे आब-ए-हयात उसकी नज़र में
पानी हुआ तुझ गाल के जो इश्‍क़ में गलकर

तुझ अबरू-ए-ख़मदार सूँ हर्गिज़ न फिरे दिल
क्‍यूँ जावे सिपाही दम-ए-शम्‍शीर सूँ टल कर

ऐ जान-ए-‘वली’ लुत्‍फ़ सूँ आ बर में मिरे आज
मुझ आशिक़-ए-बेकल सिती मत वादा-ए-कल कर

अजब नहीं जो करे दिल में शेख़ की तासीर

अजब नहीं जो करे दिल में शेख़ की तासीर
अगर मुक़द्दमए-इश्‍क़ कूँ करूँ तहरीर

जुनून-ए-इश्‍क़ हुआ इस क़दर ज़मीं को मुहीत
कि पारसा कूँ हुई मौज-ए-बोरिया ज़ंजीर

ज़बान-ए-क़ाल नहीं तिफ़्ल-ए-अश्‍क कूँ लेकिन
ज़बान-ए-हाल सूँ करते हैं इश्‍क़ की तक़रीर

सफ़े पे चेहरा-ए-उश्‍शाक़ के मुसव्विर-ए-इश्‍क़
जिगर के ख़ूँ सों लिखा तिफ़्ल-ए-अश्‍क की तस्‍वीर

गली सूँ नेही की क्‍यूँ जा सकूँ ‘वली’ बाहर
हुई है ख़ाक परी रू की रह की दामनगीर

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