वसी शाह की रचनाएँ

आँखों में चुभ गईं तिरी यादों की किर्चियाँ 

आँखों में चुभ गईं तिरी यादों की किर्चियाँ
काँधों पे ग़म की शाल है और चाँद रात है

दिल तोड़ के ख़मोश नज़ारों का क्या मिला
शबनम का ये सवाल है और चाँद रात है

कैम्पस की नहर पर है तिरा हाथ हाथ में
मौसम भी ला-ज़वाल है और चाँद रात है

हर इक कली ने ओढ़ लिया मातमी लिबास
हर फूल पुर-मलाल है और चाँद रात है

छलका सा पड़ रहाहै ‘वसी’ वहशतों का रंग
हर चीज़ पे ज़वाल है और चाँद रात है

उदास रातों में तेज़ काफ़ी की तल्ख़ियों में

उदास रातों में तेज़ काफ़ी की तल्ख़ियों में
वो कुछ ज़ियादा ही याद आता है सर्दियों में

मुझे इजाज़त नहीं है उस को पुकारने की
जो गूँजता है लहू में सीने की धड़कनों में

वो बचपना जो उदास राहों में खो गया था
मैं ढूँढता हूँ उसे तुम्हारी शरारतों में

उसे दिलासे तो दे रहा हूँ मगर से सच है
कहीं कोई ख़ौफ़ बढ़ रहा है तसल्लियों में

तुम अपनी पोरों से जाने क्या लिख गए थे जानाँ
चराग़ रौशन हैं अब भी मेरी हथेलियों में

जो तू नहीं तो ये मुकम्मल न हो सकेंगी
तिरी यही अहमियत है मेरी कहानियों में

मुझे यक़ीं है वो थाम लेगा भरम रखेगा
ये मान है तो दिए जलाए हैं आँधियों में

हर एक मौसम में रौशनी सी बिखेरते हैं
तुम्हारे ग़म के चराग़ मेरी उदासियों में

कितनी ज़ुल्फ़ें कितने आँचल उड़े चाँद को क्या ख़बर

कितनी ज़ुल्फ़ें कितने आँचल उड़े चाँद को क्या ख़बर
कितना मातम हुआ कितने आँसू बहे चाँद को क्या ख़बर

मुद्दतों उस की ख़्वाहिश से चलते रहे हाथ आता नहीं
चाह में उस की पैरों में हैं आबले चाँद को क्या ख़बर

वो जो निकला नहीं तो भटकते रहे हैं मुसाफ़िर कई
और लुटते रहे हैं कई क़ाफ़िले चाँद को क्या ख़बर

उस को दावा बहुत मीठे-पन का ‘वसी’ चाँदनी से कहो
उस की किरनों से कितने ही घर जल गए चाँद को क्या ख़बर

तुम मिरी आँख के तेवर न भुला पाओगे

तुम मिरी आँख के तेवर न भुला पाओगे
अन-कही बात को समझोगे तो याद आऊँगा

हम ने ख़ुशियों की तरह दुख भी इकट्ठे देखे
सफ़्हा-ए-ज़ीस्त को पलटोगे तो याद आऊँगा

इस जुदाई में तुम अंदर से बिखर जाओगे
किसी माज़ूर को देखोगे तो याद आऊँगा

इसी अंदाज़ में होते थे मुख़ातिब मुझ से
ख़त किसी और को लिक्खोगे तो याद आऊँगा

मेरी ख़ुशबू तुम्हें खोलेगी गुलाबों की तरह
तुम अगर ख़ुद से न बोलोगे तो याद आऊँगा

आज तो महफ़िल-ए-याराँ पे हो मग़रूर बहुत
जब कभी टूट के बिखरोगे तो याद आऊँगा

तो मैं भी ख़ुश हूँ कोई उस से जा के कह देना 

तो मैं भी ख़ुश हूँ कोई उस से जा के कह देना
अगर वो ख़ुश है मुझे बे-क़रार करते हुए

तुम्हें ख़बर ही नहीं है कि कोई टूट गया
मोहब्बतों को बहुत पाएदार करते हुए

मैं मुस्कुराता हुआ आईने में उभरूँगा
वो रो पड़ेगी अचानक सिंघार करते हुए

मुझे ख़बर थी कि अब लौट कर न आऊँगा
सो तुझ को याद किया दिल पे वार करते हुए

ये कह रही थी समुंदर नहीं ये आँखें हैं
मैं इन में डूब गया ए‘तिबार करते हुए

भँवर जो मुझ में पड़े हैं वो मैं ही जानता हूँ
तुम्हारे हिज्र के दरिया को पार करते हुए

दुख दर्द में हमेशा निकाले तुम्हारे ख़त

दुख दर्द में हमेशा निकाले तुम्हारे ख़त
और मिल गई ख़ुशी तो उछाले तुम्हारे ख़त

सब चूड़ियाँ तुम्हारी समुंदर को सौंप दीं
और कर दिए हवा के हवाले तुम्हारे ख़त

मेरे लहू में गूँज रहा है हर एक लफ़्ज़
मैं ने रगों के दश्त में पाले तुम्हारे ख़त

यूँ तो हैं बे-शुमार वफ़ा की निशानियाँ
लेकिन हर एक शय से निराले तुम्हारे ख़त

जैसे हो उम्र भर का असासा ग़रीब का
कुछ इस तरह से मैं ने सँभाले तुम्हारे ख़त

अहल-ए-हुनर को मुझे पे ‘वसी’ ए‘तिराज है
मैं ने जो अपने शेर में ढाले तुम्हारे ख़त

परवा मुझे नहीं है किसी चाँद की ‘वसी’
ज़ुल्मत के दश्त में हैं उजाले तुम्हारे ख़त

समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तिरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से
कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

तिरी यादों की ख़ुशबू खिड़कियों में रक़्स करती है
तिरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से
किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर जूँही
क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

हर इक मुफ़लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं
कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को
ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

तिरे कूचे से अब मेरा तअल्लुक़ वाजिबी सा है
मगर जब भी गुज़रता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर
‘वसी’ मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

कहो तो लौट जाते हैं 

कहो तो लौट जाते हैं….
अभी तो बात लम्हों तक है, सालों तक नहीं आई
अभी मुस्कानों की नौबत भी नालों तक नहीं आई
अभी तो कोई मज़बूरी ख़यालों तक नहीं आई
अभी तो गर्द पैरों तक है, बालों तक नहीं आई
कहो तो लौट जाते हैं…
चलो एक फ़ैसला करने शजर[1] की ओर जाते हैं
अभी काजल की डोरी सुर्ख़ गालों तक नहीं आई
ज़बाँ दांतों तलक है, ज़हर प्यालों तक नहीं आई
अभी तो मुश्क-ए-कस्तूरी[2] ग़ज़ालों[3] तलक नहीं आई
अभी रुदाद-बे-उन्वाँ[4] हमारे दर्मियाँ है
दुनियावालों तक नहीं आई
कहो तो लौट जाते हैं…
अभी नज़दीक है घर, और मंज़िल दूर है अपनी,
मुबादा नार [5]हो जाए, ये हस्ती नूर है अपनी
कहो तो लौट जाते हैं…
ये रस्ता प्यार का रस्ता;
रसन[6] का, दार[7] का रस्ता बहुत दुश्वार है जानाँ
कि इस रस्ते का हर ज़र्रा[8]भी इक कोहसार[9]है जानाँ
कहो तो लौट जाते हैं…
मेरे बारे न कुछ सोचो…
मुझे तय करना आता है रसन का, दार का रस्ता…
ये आसिबों[10] भरा रस्ता ये अंधी घार[11] का रस्ता
तुम्हारा नर्म-ओ-नाज़ुक हाथ हो अगर मेरे हाथों में,
तो मैं समझूँ के जैसे दो जहाँ है मेरी मुट्ठी में
तुम्हारा कुर्ब[12] हो तो मुश्किलें काफ़ूर[13] हो जाएँ
ये अन्धे और काले रास्ते पुर-नूर[14] हो जाएँ
तुम्हारे गेसुओं की छाँव मिल जाए तो
सूरज से उलझना बात ही क्या है
उठा लो अपना साया तो मेरी औक़ात ही क्या है
मुझे मालूम है इतना के दामें-ज़िन्दगी [15]पोशीदा [16]है इन चार क़दमों में
बहुत सी राहतें मुज्मिर[17] है इन दुश्वार रस्तों में
मेरे बारे न कुछ सोचो तुम अपनी बात बतलाओ
कहो तो चलते रहते हैं कहो तो लौट जाते हैं
कहो तो लौट जातें हैं…

आँखों से मेरे इस लिए लाली नहीं जाती 

आँखों से मेरे इस लिए लाली नहीं जाती
यादों से कोई रात खा़ली नहीं जाती

अब उम्र, ना मौसम, ना रास्‍ते के वो पत्‍ते
इस दिल की मगर ख़ाम ख्‍़याली नहीं जाती

माँगे तू अगर जान भी तो हँस कर तुझे दे दूँ
तेरी तो कोई बात भी टाली नहीं जाती

मालूम हमें भी हैं बहुत से तेरे क़िस्से
पर बात तेरी हमसे उछाली नहीं जाती

हमराह तेरे फूल खिलाती थी जो दिल में
अब शाम वहीं दर्द से ख़ाली नहीं जाती

हम जान से जाएंगे तभी बात बनेगी
तुमसे तो कोई बात निकाली नहीं जाती

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