वाज़दा ख़ान की रचनाएँ

शिकार

विषादयुक्त चेहरे
चेहरों पर चढ़े मुखौटे
टँगे हैं जैसे खूँटी पर

एक दो तीन चार…
गिनती में शायद वे दस हैं

तलाशते हुए कोई शिकार ।

आहटें 

वे आहटें मुझ तक नहीं आएँगी
वे उजाले के दीये मुझ तक नहीं आएँगे
आते हैं मुझ तक वे काफ़िले जो रेतीली
सरहदों में चला करते हैं

अक्सर रूहें पाँवों के निशान छोड़कर
क़ाफ़िले में ही आगे बढ़ जाती हैं

उन निशानों पर कभी तेज़ हवा ढूहें बनाती है
कभी उन्हें अपने संग उड़ाकर ले जाती है

शब्द

शब्द देह में
घुलमिल जाते हैं जब

ढूँढ़ पाना उन्हें
होता है कितना मुश्किल

मगर वही शब्द शब्दकोश में
कितनी आसानी से
मिल जाते हैं ।

धूप

हरी धूप पर बर्फ़-सी बिछी सफ़ेद धूप
गढ़ रही है अपने कुशल हाथों से तमाम अक्स
आसमान के माथे पर सूरज टँकने के बावजूद
अस्पष्ट हैं आकृतियाँ

अस्फुट से हैं स्वर कुछ बुदबुदाहटें हैं
अकथनीय है जीवन की परिभाषा
बहरहाल चलो रू-ब-रू होते हैं दूब के संग
जो साहस और शिद्दत के साथ
सूरज का सामना करती हुई
पाँव तले रौंदे जाने पर भी शीश उठाए
खिली है

कहीं यह उसकी मज़बूरी तो नहीं ?

नीम अँधेरे में

सम्पूर्ण परिदृश्य में एक कथा
उजागर होती है कि तमाम
मानवीय संवेदनाएँ त्रासदी का
शोक मनाती एक दमघोंटू
उदास वातावरण में तब्दील
हो गई बिना कोई राग सुनाए, बिना
कोई गीत गाए

न चाहते हुए भी उन्हें पाँव रखना
पड़ता है बंजर ज़मीन पर
जहाँ धारदार चट्टानें अपनी
अपनी सोच के साथ गुँथी हुई हैं पगडँडियों में
नुकीली चट्टानों के बीच चलते जाते हैं पाँव

पीड़ा से विगलित
छलछलाते अश्रुओं के संग कि
यहीं सरज़मीन आई है पांवों
तले, शायद यही अंजाम होता है
उन मूक आँखों का, जिन्हें पढ़
नहीं पाते लोग

त्रासदियाँ निरन्तर उनके संग
चलती रहती हैं अपना वजूद लिए
निःशब्द / बेआवाज़
टूटती रहती हैं ख़्वाहिशें / बिखरती
रहती है देह कहीं

फिर भी धुन्ध के साथ नीम अँधेरे में
पलते रहते हैं सपने ।

पलकों के भीतर

एक धीमी न सुनाई देने वाली चीख़
निरन्तर गूँज रही है वजूद में मेरे
उमड़ता है हृदय, हृदय में ही

समन्दर ठाठें मारता है पलकों के भीतर ही
देह थरथराती है एक अनजाने वेग से

होंठ बीनते हैं एक पैग़ाम
जो ख़्वाहिशों के साथ
चाँद पर उतर जाते हैं बेहद ख़ामोशी से

अदृश्य नहीं हैं वे
मगर नज़र नहीं आते हैं
जबकि होते हैं वे
जीवन का सबसे अहम हिस्सा ।

मुट्ठी भर आसमान

आकाश में टँगी तमाम ख़्वाहिशों
में से
अपनी पसन्द की ख़्वाहिश
बीन लेना चाहती हूँ मैं
हमेशा के लिए

सहेजकर ज़िन्दगी की हर
सतह पर रखना चाहती हूँ
ताकि वो निरन्तर मुझे
प्रेरित करती रहें

मुट्ठी भर आसमान पाने के लिए
अपने हिस्से की धूप
स्याह आँचल में
भर लेने के लिए
ज़िन्दगी का एक हसीन टुकड़ा

हिस्से में आई
बंजर ज़मीन पर
उगा लेने के लिए ।

अमूर्त हर्फों में लिखे हुए 

तुमने कहा था किसी हिम युग में
एक बार हम जो नहीं कह पाते
हलक में घुट जाते हैं शब्द
उन्हें हम अपने मन की डायरी के
पन्नों पर उतार देते हैं
और ये भी कहा था कि युग के
बदलने से पहले
शब्दकोश में सतही मायने होते हैं
हमें खुद ही ढूँढ़ने होते हैं मायने
पर मैंने तो अनवरत यात्रा के
तमाम कालों में अपनी खामोशी में
कई बार कहा तुमसे
तुम मेरी आकाशीय इच्छाओं के अनुरूप हो
कई कई रूप हो
जो ढलते रहे अलग अलग नक्षत्रों अक्षांश
और देशांतर की रेखाओं में
वही रूप सैंधव घाटी दजला फरात
ग्रीक प्रतिमाओं में भटकते रहे
यहाँ तक कि मिस्र की ममीज में भी
कितने कितने मायने थे
इनमें अमूर्त हर्फों में लिखे हुए
जिन्हें तुम बिना चश्मे के
साफ साफ पढ़ सकते थे
दिव्य दृष्टि थी तुम्हारी
मेरे भीतर का सच
तुम्हारे होठों पर आते आते
रुक गया कई बार
छुपा लेते हो तुम उन्हें
अपने अतीत के गलियारे में
वर्तमान से बेपरवाह
वक्त मिलने पर करते हो तुम
उन सचों का विश्लेषण
ढूँढ़ते हो तुम भी उसमें थोड़ा थोड़ा
अपना सच
तभी तो मुक्त नहीं हो पाते हो
अपनी जड़ों से
चूँकि तुम उसी बोधि वृक्ष के नीचे जन्मे थे
नि:संग अनंत
जहाँ मैंने अपनी इच्छाएँ रखी थीं
साथ में रखा था अँधेरे कागज पर
लिखा खत
तुम ही उसे पढ़ सकते थे बारंबार
तुम्हारे पास गहन लिपि के
दस्तावेज हमेशा से थे।

उस जंगल का नाम

मुझे ढेर सारे फूल चाहिए
उस रात को ढकने के लिए
जहाँ मेरे सारे रंग खो जाते हैं
बचती है आर्द्रता सोचती रहती हूँ
सुनहरे होते सपनों के साथ
रंगों से लिख दूँगी असीम दुलार की
एक नई भाषा कोई अंतर्कथा जो
प्रथम प्रतिश्रुति बने
पर वे गायब हो जाते हैं हर रात
कभी कभी दिन में भी
यहाँ दिन रात का कोई अर्थ नहीं
अर्थ सिर्फ उनके लापता हो जाने से है
फिर याद आ जाती है
न चाहते हुए भी हरे भरे वृक्षों पर
पुष्पित होते फूलों की
किस घनेरे होते जंगल में देखा था उन्हें
अब तो भूल गयी हूँ
उस जंगल का नाम
हाँ रास्ता अभी भी याद है जरा जरा।

तुममें खिलतीं स्त्रियाँ

कभी फूल कभी पत्ती कभी डाल बन
तुममें खिलतीं स्त्रियाँ
कभी बादल कभी इंद्रधनुष बन
तुम्हारे भीतर कई कई रंग
गुंजार करती स्त्रियाँ
आसमान में उड़ती सितारे ढूँढ़तीं
प्रेम में पड़ती स्त्रियाँ
समंदर में समाती नदी बनतीं
तेज धूप में डामर की सड़कों पर चलती
सड़क बनाती स्त्रियाँ
अँधेरी बावड़ी में सर्द पानी और जमी काई बनती
वस्त्रों से कई कई गुना
लांछन पहनती स्त्रियाँ
बिंदी माथे पर सजा दुख की लकीरों को
चेहरे की लकीरों में छुपाती स्त्रियाँ
सीवन उधड़ी और फीकी पड़ती उम्मीदों को
पुराने किले में कैद करती
बार बार नमी वाले बादलों से टकराती स्त्रियाँ
अपनी मुट्ठियों में रोशनी भरने पर भी
जमीन पर टप्पे खाते संबंधों को
ज्वार भाटा में तब्दील होते देखतीं
खुद को तमाम आकारों धूसर शेड्स से
मुक्त करने की कोशिश करती स्त्रियाँ
उन तमाम शब्दों के अर्थ में
जिनमें वे ‘मोस्ट हंटेड और वॉन्टेड’ हैं
(शिकार और चाहत)
में घुली कड़वाहट को निगलने की
कोशिश करती स्त्रियाँ
क्या सोचती हैं तुम्हारे बारे में
मुस्कराती हैं दबी दबी हँसी
हँसती हैं जब स्त्रियाँ
कायनात की तमाम
मुर्दा साँसों में इत्र उगाती हैं स्त्रियाँ।

दरिया रेत की

काँटों से छिलती
रेजा रेजा होती
वो अपने दरिया तक पहुँची
दरिया ने उदासीनता
अख्तियार कर ली।

बेचैनी उतरती है सूरज पर

चाँद तुम मेरे भीतर सदियों से
ठहरी झील में इठलाने लगे हो
सपने जगाने लगे हो
ये जानते हुए कि तुम्हारा असली घर
आकाश है
झील तो मात्र तुम्हारा प्रतिबिंब है
इसके बावजूद जब तुम हँसते हो
सारी नदियों में एक साथ उफान पर उठती हैं
लहरें अपनी खनक भरी बूँदों के संग
और चाँद जब तुम देखते हो कभी एकटक
डगमगा जाती है पृथ्वी अपनी धुरी पर फिर
चौबीस घंटे में परिक्रमा पूरा करने का क्रम
परिणित हो जाता है अनंत यात्रा में
तुम तक पहुँचने की फिक्र इच्छाएँ और
तीव्रतम ख्वाहिशें रचने लगती हैं अनगिनत शब्द
बनने लगती हैं पंक्तियाँ दर्द होने लगते हैं
उनके मायने धड़कनों में पर कुछ हासिल नहीं
यहाँ तक कि मेरे ‘तुम’ हो जाने के बाद
मेरे होने का अर्थ भी
इसलिए तुम मुझे उन्हीं तंग गलियारों में
घूमने दो जहाँ सिर्फ बेचैनी उतरती है सूरज पर
गहनतम ध्यान से
तुम्हारे समय को साधने के क्रम में
किसी मुलाकात में
यूँ ही तुम्हारे मुख से निकल गया
और आएँगे जज्बात घूमेगी पृथ्वी
अपनी धुरी पर

बसंत ऋतु ले आएगी
ढेर सारे गुलमोहर के फूल
कई रंगों से रूबरू होगी तुम
कर सकोगी पूरा उन अधूरे रंगों को
जिनकी दरकार तुम्हें
रंगों के साथ रंग बनकर है।

रुलाई 

अंतर्मन में रुलाई
गोलाई में उमड़ती घुमड़ती है
इत्तेफाक है चाँद भी गोल है
पृथ्वी भी और बाकी सभी ग्रह भी
बनाती हूँ रास्ता उन्हीं ग्रहों के बीच
रुलाइयों को बहने के लिए
बहता बहता रुदन अपने दीवानेपन के साथ
शायद ख्याल पा जाए तुम्हारे मन में
कोई जिंदा तहरीर बने।

रूह की उजली साँसों में घुला थोड़ा सा इत्र

थोड़े से शब्द बदलना चाहती हूँ जीवन के
बहुत ही उदासी से घुले हैं अर्थों में
थोड़ी सी संवेदनाएँ बदलना चाहती हूँ
रुख मोड़ना चाहती हूँ उनका
कि गिरें उपजाऊ जमीन पर
बने वहाँ तमाम जीवित रंगों के चित्र
थोड़ी सी हवा मुट्ठी में कैद करना चाहती हूँ
बना लूँ माध्यम उन्हें
अपनी आती जाती साँसों का
थोड़ी सी रेत समंदर की गहराई को
अँधेरी बावड़ी के पानी में मिलाना चाहती हूँ
कि सूरज का आगाज हो जाए
थोड़ी सी रोशनी सूरज को उतारना चाहती हूँ
आँखों में कि देह चमक जाए
रूह की उजली साँसों में घुला
थोड़ा सा इत्र पी जाना चाहती हूँ
महक भर जाए हजारों सालों की उदास साँसों में
कि रजनीगंधा के सफे़द फूलों में
लाल रंग की हमजोली बनाकर
बिछा बिछा देना चाहती हूँ
डाली पर फुदकती कोयल के लिए
कितनी अपनी लगती हो कोयल
चीखती हो बिना बात पर गुस्सा हो जाती हो
अचानक चुप हो जाती हो
चुप ही रहना
नहीं तो कोई चुरा लेगा तुम्हारे
गले की मिठास
फिर मेरे लाख चाहने पर भी
न लौट सकेगी आवाज आहट
ये मुलाकात नहीं मानी जाएगी
दो पल की किसी बेचैन सुबह की तरह।

सुर्ख रंगतों की तलाश

हाँ रंगों के बीच रहकर बन जाती हूँ
कोई रंग तो क्या चाँद तुम्हारी
आँखों में कोई तस्वीर नहीं उभरती
क्यूँ नहीं भरते तुम उसमें अपने जज्बात
आखिर तु्म्हें भी अपनी रुहानी रंगों के साथ
सुर्ख रंगतों की तलाश है
तुम भी तो ढूँढ़ना चाहते हो
अपने होने की जड़ें
तभी न तुम अक्सर
अपने आसमान के घर से
इस छोर से उस छोर तक
चुपचाप चक्कर लगाते हो
कभी बादलों के संग टहलते हो
कभी चुपके से झील में उतर आते हो
कभी पत्तियों शाखों टहनियों के पीछे
छुप जाते हो
कभी शुद्ध अवलोकन बन जाते हो
धरती का
आखिर धरती को प्रकाशमान
तुम्हें ही करना है
कहीं कम कहीं ज्यादा।

सिलसिला

चाहतों में डूब जाने बह जाने का
सिलसिला नदी ने शुरू किया था
तभी न पहाड़ से उतरती
दूर तक सफर करती
पहुँचती है समंदर तक
समंदर सुरूर में है
थोड़ा गुरूर में भी
पता है उसे नदी को
उस तक आना है।

बारिश में भीगा चांद 

चांद
बारिश में भीगता है
पता नहीं बारिश में धुंधलापन था
या आंखों के पानी का एहसास
कि तुम्हारे सपनों की
नब्ज सुन्न हो गई.
चांद तुम धूप में पड़े-पड़े
धरती पर सच की लकीर
खींचा करते थे
कितनी लकीरें खींची
झुंड सा बना दिया
लेकिन तुम्हारा सच
बहुत कमजोर था, जिस दिन
धूप नहीं हुई, बह गई
सारी लकीर हवा में और
तुम्हारे सपनों की रंगीन दुनिया
जिन्हें तुम आकार लेते हुए
देखना चाहते थे
उसी ने (ईश्वर) चुरा ली
जिसने तुम्हें दी थी.

सलवटों वाला चेहरा

सलवटों से भरा एक चेहरा
संभाल के रखा है
संदूकची में
जिसे गाहे-बगाहे पहन लेता हूं.
एक चेहरा और है मेरे पास
उसमें भी लकीरें हैं
मगर वो स्वाभाविक है,
दरअसल
यही मेरा असली चेहरा है.
सलवटों को तो
मैं कभी-कभी ओढ़ लेता हूं
वक्त की जरूरतों के
हिसाब से.

कुछ और बोल दो

कुछ और शब्द बोल दो
ताकि मैं एक जीवित
कविता बना लूं
वैसे तो तमाम शब्द हैं किताबों में
मगर उनमें वो बात कहां
वे तो मृत हैं.
मुझे बनानी है एक
जीवित कविता
उसके शब्द
तुम्हारे ही मुख से झरेंगे
तभी तो सांस ले सकेगी
सुकून पा सकेगी कविता.
कई बार ऐसा होता है कि
तुम्हारे मुख से झरते शब्द
झरने में बहती लहरों सा
जुड़ने लगते हैं
और उस वक्त मेरे पास
कागज-कलम नहीं होती
उन शब्दों को हृदय में कैद भी
नहीं कर पाती
चढ़ जाती है उस पर
समय की परत
खोने लगते हैं वे
अपना रूप और
बचती है सिर्फ आजीवित देह.

कहो दु:ख

कहो दु:ख
मैं वो लिखी इबारत मिटा दूं
जो तुमने रूह की जिस्म पर
उकेरी थी
मेरे लाख ना चाहने के बावजूद
तुम अपनी ड्यूटी पर थे
पीछे हटना तुम्हें गवारा न था
और मुझे तुम्हारा रहना
नागवार लगना
लेकिन तुम न माने अमिट.
मिटा रही हूं अब
उन्हें सदियों से
वो मिटाने को नहीं आते
मेरे हाथ, लहूलुहान हो जाते
इसी उम्मीद में
शायद तुम कभी मुझमें से निकलकर
मेरे सामने खड़े हो जाओ
कम से कम
पूछ तो सकूंगी तुमसे
कैसे हो दुख
अब तो थोड़ा मुझे
हंसने दो.

दु:ख की महायात्रा

वो एक महायात्रा थी
दुख ने पूछा चलोगी, पता नहीं कब
मैं धरती की मुंडेर पर अधलेटी
दुख में ही डूबी थी.
क्या दुख इतना प्यारा होता है?
इतना अपनापन होता है
उस सूनसान आकाश में
दोनों तरफ गंगा थी
उड़ते बादल और
बीच में हम
किसी अद्भुत अनुभव के सीने से
लिपटते हुए
जो नहीं था उसमें होते हुए
जो था उसे भुलाते हुए
बहुत सारी हंसी थी
उस दिन दुख में.
मैं भी हंस रही थी संग-संग
घूमते रहे हम सारा आकाश
वहां अंधेरे अंतरिक्ष में गए जो
मेरे भीतरी हिस्से से जुड़ा है.
क्या ये
प्रमाण नहीं है कि दुख कितना
अच्छा लगता है, उसके गले लगकर
रहना चाहती हूं
विलीन हो जाना चाहती हूं दुख में.

मिट्टी, हवा और मैं

क्या जरूरत थी सपने तुम्हें
सदियों से मेरे इर्द-गिर्द मंडराने की
राहों में ढूंढती रही हूं अपने सत्व को
कि तुम झट से ढक लेते हो मुझे
तुम कहते थे न-
सूक्ष्म रूप से तुझमें हूं
तेरे हर चिंतन में, तेरी हर सांस में
उतार रही थी उन्हें मैं
मन के फलक से आसमान के फलक
पर, अपना सर्वश्रेष्ठ विधान रचने को
तुममें ढूंढ लिया था
अपना सत्व- धरती, आकाश, सागर
मिट्टी, हवा और मैं.
सब तुझमें विलीन हो गए थे
पलकों की नमी शिव बनने लगी
ये विचार भी तुमने गढ़ा
साधना-ए-शिव बनने का
दिशा बनने लगी, कल्पना रूप ग्रहण
करने लगी.
युग का शाश्वत सत्य तू
उड़ता रहा तितली बन
मेरी देह से अपने अमूर्तन तक.

शून्यकाल से घट रही महाघटना

पूरे जग का अंधियारा
एक जीवन में कैसे
उतर आता है, ये तुम्हें देखकर
जाना चांद
खूबसूरती में लोग
तेरा नाम लेते हैं
दुनिया के सारे महाग्रंथ
गढ़े जाते हैं तुम्हें देखकर
पर चांद तुम कितने उदास हो.
तुम्हारे वश में कुछ नहीं
कितने मजबूर हो तुम
गोल-गोल धरती पर
गोल-गोल सा दमकने के बाद
तुम्हारा ह्रास होना ही है.
तुम न चाहो तो भी
धरती न चाहे तो भी
दरअसल तुम्हें
धरती के चांद के रूप में आरोपित होना
नहीं था
जब तुम्हारा खुद पर वश
नहीं, तो उसे कैसे संवारोगे
कैसे दोगे उसे इस सच का ज्ञान
जब सच इतना निर्मम हो.
चलो जाने दो इस बातचीत की
दौर को
ये कोई कहानी तो नहीं
जिसकी शुरुआत और अंत हो
ये तो एक महाघटना है
जो शून्यकाल से घट रही है
अब चांद युग में.

सफेद चांद

सफेद झक्क चांद
दु:ख ओढ़े
मुस्कुरा ही दिया और मैंने
चुपके से देख ली
जज्ब कर ली, अपने जज्बातों में
ऐसा करना
कितना अच्छा लगा था मुझे
पर ये तय है
अच्छी बातें बार-बार
नहीं होतीं और दुख
बार-बार गिरता है आंगन में
कितना बुहारुंगी मैं
कहीं तुम्हारी वह मुस्कान
अंधेरे आंगन की
कच्ची मिट्टी में धुल न जाए
अन्तत: जिसका डर था मुझे
वही हुआ
ढूंढती फिर रही हूं तुम्हारी
मुस्कान उस छोटे से आंगन में
घुल गई है वो
कच्ची मिट्टी में ऐसे
जैसी कभी थी ही नहीं.

लाल रंग की इबारत

हल्के हल्के पानी वाले बादलों के बीच
पीली लम्बी पट्टी खिंची थी
मेरे हृदय से
तुम्हारे हृदय तक
कल बिना सलाखों वाले जंगले पर
लेटकर
पढ़ रही थी उसे लाल रंग की इबारत
पीली पट्टी पर लाल रंग की इबारत
तुमने भी कभी
उसे पढ़ा होगा
असल में उसे तुमने ही पढ़ा होगा
मैंने तो तुम्हें हथेलियों में बांध लिया था
थोड़ी रोशनी, थोड़ा अंधेरा
यही सिलसिला चला आ रहा था
चांद के घटने बढ़ने के साथ
तुमने अपनी
हथेलियों में बांधा मेरी हथेलियों को
और जंगले पर लटकी शाख पर
नज्म लिखी.

कुफ्र हुआ, कुछ न हुआ 

ख्वाहिशों का विलाप हुआ
कुफ्र हुआ
और कुछ न हुआ
बादल फटा पानी गिरा आसमान से
दरक दरक कर
चट्टानें टकराती बिखरती रहीं
और कुछ न हुआ
उसने जेब से अपना हाथ
निकाल क्षितिज पर उगे
इन्द्रधनुष को अचानक छू लिया
एक मुट्ठी रंग उसकी हथेलियों में आए
और कुछ न हुआ
जिस्मों का धीरे धीरे बुत में
तब्दील होते जाना / नब्जों का सुन्न होना
और कुछ न हुआ
सूखे पत्तों को समेटकर
दामन में भर लिया
आग लगी और कुछ न हुआ.

हम पत्थर की क्यूं ना हुई?

बादलों के साथ सफर करते सूरज
रौशनी भरी थी आंखों में
रौशनी थी कि चुभ रही थी
पानी बनी जा रही थी आंखों में
गूंज रहा था कोई नाद
हम शर्मिंदा हैं…
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई
बिना श्राप के भी.

क्यूं भर दिए तमाम जज्बात, चोट
और खून के कतरे जिस्म में
क्यूं रची हमारे भीतर कायनात
हम शर्मिंदा हैं…
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई

क्यूं हम मेकअप से, लिपिस्टिक से
रंगी-पुती हैं, क्यूं हम तंग कपड़े पहनती हैं
क्यूं हम दिन-रातों में, घरों में, बाहर
चलने का दु:साहस करती हैं
हम शर्मिंदा हैं…
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई

हम जिस्म बनी, माल बनी, सौदा बनी
समझौता बनी, जायदाद बनी
आन-बान-शान बनी
हम शर्मिंदा हैं…
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई

हम घूंघट निकालती हैं
दुपट्टों से सिर ढकती हैं
पूरी आस्तीन की कमीज पहनती हैं
तुम्हारी हर ज्यादतियों को
खुद में जज्ब करती हैं
हम शर्मिंदा हैं…
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई

हम अकेले आसमान में नहीं उड़ना चाहती
हम उड़ना चाहती हैं तो ये चाहत भी
पालती हैं कि तुम साथ उड़ो
क्या हम शर्मिंदा हों अपनी चाहत पर
या कि इस सोच पर
कि इससे पहले हम-
पत्थर की क्यूं ना हुई

या खुदा तूने हमें क्यूं बनाया
गर बनाया भी तो इस जहान में भेजा क्यूं

तमाम संवेदनाओं में रंगकर
हम शर्मिंदा हैं…
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई

हम अपने लड़की होने का शोक मनाएं
कॉन्फेशन करें, क्या करें हम
लड़की होना गर कुसूर है हमारा
तो सीता, मरियम
आयशा को भूलकर
हम शर्मिंदा हैं…
कि हम पत्थर की क्यूं ना हुई

एक ऐसी कविता
जिसमें दर्द है / दु:ख है / आंसू है
पीड़ा है / आधी सदी है
मैं शर्मिंदा हूं…
लिखने से पहले
कि मैं पत्थर की क्यूं ना हुई.

(ये कविता दिल्ली गैंगरेप पीड़ित लड़की को समर्पित…जो आसमान का कोई तारा बन गई)

मां की टेर 

सदी के इस महाकुंभ में
सूर्य की रश्मियों के बीच
मैंने तुम्हें
बांहें फैलाए
आंसुओं में बिलखते देखा
मां!

हां, तुम ही थी मां
होठों पर तुम्हारे
एक टेर थी-
‘मेरे लाल’
मुझे छोड़कर तू कहां गया?

और मां का वह लाल
जिसे अपने रक्त और
आंसुओं से सींचकर
बड़ा किया था
वह प्रयाग की इस त्रिवेणी में
अपने पापों को धोने
के साथ
अपनी इस गठरी का
बोझ भी
उतार गया.

कितनी अन्तर्कथाएं मन में चलती हैं 

कितनी अन्तर्कथाएं मन में चलती हैं
बहती हैं नदियों में सदियों में
सदियों तक यहां वहां जाने कहां कहां
कभी कभी तुम्हारे मन तक
एक बार अपनी सम्पूर्ण जिजीविषा के साथ
तुमसे प्रेम करना चाहती हूं
तुम्हारे बनाये पेड़ पौधे आसमान बादल
चिड़ियों से प्रेम किया
तुम्हारे बनाये गये मनुष्यों से प्रेम किया
यहां तक कि अपने अनन्त अधूरेपन से भी
अब तुमसे प्रेम करना चाहती हूं
सम्पूर्ण दीवानगी के साथ
मिली है मुझे विरासत में
माथे पर मेरे हौले से रखना तुम अपना हाथ
तुम्हारे नर्म सुकून स्पर्श से मुंद जाएं आंखें
कि आसुओं की नमी में रौशनी आ जाये
अन्धेरों की जगह
हौले से थपकना मेरा जिस्म मां की तरह
जैसे थपकन मेरे रूह में समा जाये
सदियों से भटकती छटपटाती रूह
एक लम्बी शान्त पुरसकून की नींद सो जाये
तुम उठाना बांहों में मुझे
जैसे लोग च़ढ़ाते हैं फूल
दफ़्न कर देना आराम कब्र में
मिल जाऊंगी तुममें हमेशा के लिये.

तुम्हारी उपस्थिति शून्यवत कर देती है

तुम्हारी उपस्थिति शून्यवत कर देती है
दिन रात को लड़खड़ा जाती हैं बेचैनिया
ओठों पर उभर आती है तुम्हारी ख़ामोशी
रख नहीं पाती खुद को तुम्हारे समक्ष
या तुम देखना नहीं चाहते
महसूस भी नहीं करना चाहते
गुलमोहर के फूलों की थरथराहट
दरअसल कुछ गणनायें
अनन्त काल से ही ग़लत सही होती आ रही हैं
मनुष्य को कोई वश नहीं उस पर
हां ये ज़रूर है हम चाहें तो
सितारे नक्षत्रों को पढ़ते हुये
गणनाओं को अपेक्षित आकाशगंगाओं में
ढाल सकते हैं तसल्ली के लिये
बांट सकते हैं सहजता
क्षितिज पर रख सकते हैं अपनी गम्भीरता
रेतीली सूखी सतह पर
सूरज की उगती हुयी किरणों को लेकर
कोई कालजयी कृति बनायी जा सकती है
असम्भव शब्दों से लिखी जा सकती है दोबारा
आत्मकथा.

कहीं गीली ज़मीन नहीं कि रोप दूं 

कहीं गीली ज़मीन नहीं कि रोप दूं
कोमलता के पौधे
कि जड़ पकड़ रही मिट्टी
गिर जायेगा मन पेड़ से गिरी
नादान पत्तियों की तरह
भर जायेगा धुंआ पहाड़ों से बहता
नील नदी की उन्नत घाटियों में
हो जायेंगे सुडौल
तितली के पंख वर्जनाओं की एक लम्बी तान
नैतिकता के दौर में अखण्ड कथा की तरह
बांची जाती है
बचा लेगी कुछ ज़मीन
कुछ वर्जनायें आसमान में घूमती हैं
ज़रूर तुम्हें भिगोती होगी
अपवाद नहीं हो कुछ शताब्दियों में
अपवाद नहीं होते
इसी तरह असभ्यतायें भी सभ्य होने
की परम्परा में नैतिकता का पद
ग्रहण करती हैं गढ़ती हैं तमाम सच
जो ग्रह उपग्रह तक में घुले हैं
पक्का कुछ झूठ भी तिरते होंगे
वर्जनाओं के अन्तरिक्ष में
इन्हीं घूमती ब्रह्माण्डीय वर्जनाओं और
असभ्यताओं को एहसास करने के
किसी चौकस क्रम में
नहीं बनती कोई तथाकथित नैतिकता
न रचती है़ कोई उपदेशात्मक आचरण
सदियों से ढंकी मुंदी लगातार चल रही हैं
वर्जनायें सच के समानान्तर.

गहरी अन्धेरी खाइयों से निकलकर

गहरी अन्धेरी खाइयों से निकलकर
बहती गूंजती आवाज़ों
और खिलखिलाहट के संग
खुद को रखती हूं तुम्हारे भीतर
तुम्हारा भरापन खोल देता है
गाढ़े समय का कोई किस्सा
फिर मिलेंगे का कोई विधान
रचा था या रचने को थे
घुल जाती है तुममें
हवाओं के संग यहां वहां डोलती
कोई सर्जनात्मक सोच
लिखती जाती हूं फिर
ज़िन्दगी की कोई तहरीर
तुम्हें एहसास तक नहीं होता
कितना उद्वेग कितनी हलचल
कितनी बेचैनियां झऱ रही हैं
गुलमोहर के फूलों के साथ
खिले हैं जीवन की सीधी तीखी पड़ती धूप में
अपनी लालिमा के साथ तुम अपनी परछाईं
तक हटा लेते हो वहां से
एहतियातन कोई फतवा जारी न हो जाय़े
क्या इतनी गहनता से आवेशित
होती है कविता
क्या उतरती है शाम पर ऐसी कोई रात
क्या गुज़रती है कोई रूह
अनजाने शून्य में ऐसे चुपचाप
क्या पनपती है कोई इन्द्रधनुष
आकाश में कोई परीकथा
ऐसे ही कभी सोचकर देखना एक बार
परतों में दबी रेखायें
अब कितनी अमूर्त हो चली हैं.

तुम ही ऐसा कर सकते हो

मेरे भीतर उगी सच्चाइयों की कुछ गहरी
रंगतों को तुम चुरा लो और
मैं तुम्हारा वक़्त
मैरी नज़्मों को तुम चांद के भीतर रख दो
तुम ही ऐसा कर सकते हो
तुम्हारी उंगलियों में भी न जाने कितनी
नज़्में क़ैद हैं रिहा होने की छटपटाती
तुम ही ऐसा कर सकते हो
अपने अहम के साथ रहते हुये भी
मेरे अनजाने अजन्में कितने रुपाकारों को
अपने भीतर संजोये तुम
अनियन्त्रित कठिन होते दिन रात में
अन्तर्विरोध से तपते दहलते घबराते
कीच मिट्टी सर्द में घुलते सपने
कई बार याद दिलाते हैं मुझे
आधे अधूरे वज़ूद आकारों के कि
अमूर्तन भी एक हिस्सा है
बातों का वादों का.

सौन्दर्य का सबसे प्रिय गीत

सौन्दर्य का सबसे प्रिय गीत
नीले हरे रंग से गुंथे देह वृक्षों में
लहरा रहा है
ख़ामोश उदासी के साथ
अंगड़ाइयां रूप लेना चाहती हैं कि
आसमान की सादगी नदी के वक्राकार मोड़
घाटियों का अन्धेरा
अनहद नाद की धुन कोई अजपा जाप
उसकी रूह में पैबस्त है
आओ अपने मन की तूलिका का
एक स्ट्रोक (स्पर्श) लगाना
चिड़िया की आंखों पर
चहचहाहट के कितने पल बीते समय में
और आने वाले समय में गुन्जार होंगे
थोड़े डर के साथ थोड़ा फासले पर
थोड़ी सी बची जगह में मन कैनवस पर
साथ ही अपनी पहली ग़लती को बचाकर
रखना भविष्य के लिये
अभी कितने रंगों से बावस्ता
होना बाकी है.

हम लड़कियाँ 

हम लड़कियाँ मान लेती हैं
तुम जो भी कहते हो
हम लड़कियाँ शिकवे-शिकायत
सब गुड़ी-मुड़ी कर
गठरी बनाकर
आसमान में
रुई के फाहे सा
उड़ते बादलों के ढेर में
फेंक देती हैं,
कभी तुम जाओगे वहाँ
तो बहुत सी ऐसी गठरियाँ मिलेंगी

हम लड़कियाँ
देहरी के भीतर रहती हैं
तो भी शिकार होती हैं
शायद शिकार की परिभाषा
यहीं से शुरू होती है

हम लड़कियाँ
छिपा लेती हैं अपना मन
कपड़ों की तमाम तहों में
उघाड़ते हो जब तुम कपड़े
जिहादी बनकर
मन नहीं देख पाते हो

हम लड़कियाँ
कितना कुछ साबित करें
अपने बारे में
हर बार संदिग्ध हैं
तुम्हारी नजरों में

हम लड़कियाँ
बन जाती हैं तुम्हारे लिए
भूख-प्यास
बन जाती हैं तुम्हारे लिए
अजीवित प्राणी
तुम उन्हें उछाल देते हो
यहाँ-वहाँ गेंद की तरह

हम लड़कियाँ
धूल की तरह
झाड़ती चलती हैं
तुम्हारी उपेक्षा, तिरस्कार, अपमान
तब जाकर पूरी होती है कहीं
तुम्हारी दी हुई आधी दुनिया

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