वाजिद अली शाह की रचनाएँ

गर्मियाँ शोखियाँ किस शान से हम

 गर्मियाँ शोख़ियाँ किस शान से हम देखते हैं
क्या ही नादानियाँ नादान से हम देखते हैं

ग़ैर से बोसा-ज़नी और हमें दुश्नामें
मुँह लिए अपना पशेमान से हम देखते हैं

फ़स्ल-ए-गुल अब की जुनूँ-ख़ेज़ नहीं सद-अफ़सोस
दूर हाथ अपना गिरेबान से हम देखते हैं

आज किस शोख़ की गुलशन में हिना-बंदी है
सर्व रक़्साँ हैं गुलिस्तान से हम देखते हैं

‘अख़्तर’-ए-ज़ार भी हो मुसहफ़-ए-रुख़ पर शैदा
फ़ाल ये नेक है कुरआन से हम देखते हैं

ग़ुंचा-ए-दिल खिले जो चाहो तुम

 ग़ुँचा-ए-दिल खिले जो चाहो तुम
गुलशन-ए-दहर में सबा हो तुम

बे-मुरव्वत हो बे-वफ़ा हो तुम
अपने मतलब के आश्ना हो तुम

कौन हो क्या हो क्या तुम्हें लिक्खें
आदमी हो परी हो क्या हो तुम

पिस्ता-ए-लब से हम को क़ुव्वत दो
दिल-ए-बीमार की दवा हो तुम

हम को हासिल किसी की उल्फ़त से
मतलब-ए-दिल हो मुद्दआ हो तुम

यही आशिक़ का पास करते हैं
क्यूँ जी क्यूँ दर-प-ए-जफ़ा हो तुम

उसी अख़्तर के तुम हुए माशूक़
हँसो बोलो उसी को चाहो तुम

सुना है कूच तो उन का पर इस

 सुना है कूच तो उन का पर इस को क्या कहिए
ज़बान-ए-ख़ल्क़ को नक़्क़ारा-ए-ख़ुदा कहिए

मिसी लगा के सियाही से क्यूँ डराते हो
अँधेरी रातों का हम से तो माजरा कहिए

हज़ार रातें भी गुज़रीं यही कहानी हो
तमाम कीजिए इस को न कुछ सिवा कहिए

हुआ है इश्क में ख़ासान-ए-हक़ का रंग सफ़ेद
ये क़त्ल-ए-आम नहीं शोख़ी-ए-हिना कहिए

तोराब-ए-पा-ए-हसीनान-ए-लखनऊ है ये
ये ख़ाक-सार है ‘अख़्तर’ को नक़्श-ए-पा कहिए

उल्फ़त ने तेरी हम को तो रक्खा

उल्फ़त ने तेरी हम को तो रक्खा न कहीं का
दरिया का न जंगल का समा का न ज़मीं का

इक़्लीम-ए-मआनी में अमल हो गया मेरा
दुनिया में भरोसा था किसे ताज ओ नगीं का

तक़दीर ने क्या क़ुतुब-ए-फ़लक मुझ को बनाया
मोहताज मेरा पाँव रहा ख़ाना-ए-ज़ीं का

इक बोरिए के तख़्त पे औक़ात बसर की
ज़ाहिद भी मुक़ल्लिद रहा सज्जादा-नशीं का

‘अख़्तर’ क़लम-ए-फ़िक्र के भी अश्क हैं जारी
क्या हाल लिखूँ अपने दिल-ए-ज़ार-ओ-हज़ीं का

याद में अपने यार-ए-जानी की

याद में अपने यार-ए-जानी की
हम ने मर मर के ज़िंदगानी की

दोस्तो को अदू किया हम ने
कर के तारीफ़ यार-ए-जानी की

क्यूँ न रुसवा करे ज़माने में
ये कहानी ग़म-ए-नहानी की

रूह होएगी हश्र में साहब
इक निशानी सरा-ए-फ़ानी की

ख़ाक-सारी से बढ़ गया इंसाँ
अर्ज़ पर सैर आसमानी की

ज़र्द सूरत पे हिज्र में न हँसो
शरह है रंग-ए-ज़ाफ़रानी की

आज कल लखनऊ में ऐ ‘अख़्तर’
धूम है तेरी ख़ुश-बयानी की

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