विजयशंकर चतुर्वेदी की रचनाएँ

आखिर कब तक

गाँठ से छूट रहा है समय
हम भी छूट रहे हैं सफर में

छूटी मेले जाती बैलगाड़ी
दौड़ते-दौड़ते चप्पल भी छूट गई
गिट्टियों भरी सड़क पर
हल में जुते बैल छूट गए
छूट गया एक-एक पुष्ट दाना

देस छूट गया
रास्ते में छूट गए दोस्त
कुछ जरूरी किताबें छूट गईं
पेड़ तो छूटे अनगिनत
मूछोंवाले योद्धा भी छूट गए
जिसे लेकर चले थे वह वज्र छूट गया

छूट गया ईमान
पंख छूट गए देह से
हड्डियों से खाल छूट गई
आखिर कब तक नहीं छूटेगी सहनशक्ति?

आती थीं ऐसी चिट्ठियाँ

आती थीं ऐसी चिट्ठियाँ
जिनमें बाद समाचार होते थे सुखद
अपनी कुशलता की कामना करते हुए
होती थीं हमारी कुशलता की कामनाएँ।

गाँव-घर, टोला-पड़ोसी
सब चले आते थे बतियाते चिट्ठियों में
आटा गूँथती पड़ोसिनों के साथ
आती थी माँ
बहन की छाया मेरी मेज़ पर बैठ जाती थी निःशब्द।

कलश धरे माथ ट्रैक्टर की पूजा करती आती थीं किसानिनें
हल और बैलों के टूटते रिश्ते चले आते थे।

चिट्ठियाँ बताती थीं
कि कैसे किराने की दुकान में घुस आया है मुंबई
नशे के लिए अब कहीं नहीं जाना पड़ता अलबत्ता
अस्पताल इतनी दूर जैसे दिल्ली-कलकत्ता।

मुफ़्त मोतियाबिन्द शिविर नहीं पहुँच पाई बूढ़ी काकी
यही कोफ़्त है, वरना लिखने में क्या धरा है बाकी।

पता चल जाता था कि
किसके खलिहान में आग लगा दी किसने
किसने किसका घर बना दिया खंडहर
किसकी बहन निकल गई किसके साथ
अबकी किसकी बेटी के पीले हुए हाथ।

आभास

उठा नहीं हूँ उठ-सा गया हूँ
गिरा नहीं हूँ गिर-सा गया हूँ

भरा नहीं हूँ भर-सा गया हूँ
डरा नहीं हूँ डर-सा गया हूँ

जिया नहीं हूँ जी-सा गया हूँ
मरा नहीं हूँ मर-सा गया हूँ।

एलबम

यह अचकचाई हुई तस्वीर है मेरे माता-पिता की
क़िस्सा है कि इसे देख दादा बिगड़े थे बहुत
यह रही मेरी झुर्रीदार नानी मुझे गोद में लिए
खेल रहा हूँ मैं नानी के चेहरे की परतों से
फ़ौजी वर्दी में यह नाना हैं मेरे
इनके पास खड़ी यह बच्ची माँ है मेरी
फिर मैं हूँ माँ की उँगली थामे स्कूल जाता ।

एक धुँधली तस्वीर है बचपन के साथी की
साँप काटने से जब मरा बहुत छोटा था ।

खिड़की पर यह दुबली लड़की बहन है मेरी
दिखती है फ़ोटो में जाने किसकी राह देखती ।

यह मैं हूँ और पत्नी उदास घूँघट में
ठीक बाद में यह है उसका बढ़ा हुआ पेट
फिर तीन-चार तस्वीरें हैं हमारे बाल-बच्चों की ।

कुछ तस्वीरें ऐसी भी हैं
जिन्हें देखने की दिलचस्पी अब किसी में नहीं बची
ये सब साथ-साथ पढ़ने-लिखने वाले लड़के थे ।

आख़िर में तस्वीर लगी है एक बहुत बूढ़े बाबा की
कान के पीछे हाथ लगाए आहट लेने की मुद्रा में
यह बाबा नागार्जुन है ।

कदम आते हैं

कदम आते हैं घिसटते हुए
लटपटाते हुए कदम आते हैं

कदम आते हैं बूटदार
खड़ाऊदार कदम आते हैं

कदम आते हैं लहराते हुए
डगमगाते हुए कदम आते हैं

कदम आते हैं सधे हुए
ठहरे हुए कदम आते हैं

कदम आते हैं जमीन पर जमते हुए
जमीन पर जमते हुए कदम जाते हैं।

कपास के पौधे 

कपास के ये नन्हें पौधे क्यारीदार
जैसे असंख्य लोग बैठ गए हों
छतरियाँ खोलकर

पौधों को नहीं पता
उनके किसान ने कर ली है आत्महत्या
कोई नहीं आएगा उन्हें अगोरने
कोई नहीं ले जाएगा खलिहान तक

सोच रहे हैं पौधे
उनसे निकलेगी धूप-सी रुई
धुनी जाएगी
बनेगी बच्चों का झबला
नौगजिया धोती

पौधे नहीं जानते
कि बुनकर ने भी कर ली है ख़ुदकुशी अबके बरस

सावन की बदरियाई धूप में
बढ़े जा रहे हैं कपास के ये पौधे
जैसे बेटी बिन माँ-बाप की ।

किसके नाम है वसीयत 

झाँझ बजती है तो बजे
मँजीरे खड़कते हैं तो खड़कते रहें
लोग करते रहें रामधुन
पंडित करता रहे गीता पाठ मेरे सिरहाने
नहीं, मैं ऐसे नहीं जाऊँगा।

आखिर तक बनाए रखूँगा भरम
कि किसके नाम है वसीयत
किस कोठरी में गड़ी हैं मुहरें।
कसकर पकड़े रहूँगा
कमर में बँधी चाबी का गुच्छा।

बाँसों में बँधकर ऐसे ही नहीं निकल जाऊँगा
कि मुँहबाए देखता रह जाए आँगन
ताकती रह जाए अलगनी
दरवाजा बिसूरता रह जाए।
मेरी देह ने किया है अभ्यास इस घर में रहने का
कैसे निकाल दूँ कदम दुनिया से बाहर।

चाहे बंद हो जाए सिर पर टिकटिकाती घड़ी
पाए हो जाएँ पेड़
मैं नहीं उतरूँगा चारपायी से।
चाहे आखिरी साबित हो जाए गोधूलिवेला
सूरज सागर में छिप जाए
रात चिपचिपा जाए पृथ्वी के आरपार
कृमि-कीट करने लगें मेरा इंतजार
धर्मराज कर दें मेरा खाता-बही बंद
मैं डुलूँगा नहीं।

खफा होते हैं तो हो जाएँ मित्र
शोकाकुल परिजन ले जाएँ तो ले जाएँ
मैं जलूँगा नहीं।

ख़रीद-फ़रोख़्त

चुटकी बजाते हुए जब कोई कहता है
कि वह खड़े-खड़े ख़रीद सकता है मुझे
तो ख़ून का घूँट पीकर रह जाता हूँ मैं ।

लेकिन एक सुबह पता चलता है —
मुझे तो रोज़ ही बेच देते हैं सौदागर
कभी इस मुल्क़, तो कभी उस मुल्क़ के हाथों ।

मैं जिस दफ़्तर में काम करता हूँ
उससे भी राय नहीं ली जाती
दफ़्तर समेत बेच दिया जाता हूँ ।
रोज़ बेच दी जाती है मेरी मेहनत

माता-पिता का दिया मेरा नाम,
जहाँ पैदा हुआ था वह गाँव भी बेच दिया जाता है।
वह क़ब्रिस्तान, वह शमशान भी नहीं बख़्शा जाता
जहाँ पड़े हैं हमारे पुरखों के अवशेष ।

ड्रायवर से बिना पूछे
बेच दी जाती है उसकी ड्रायवरी ।
मज़दूर की निहाई,
मछुआरे का जाल,
बढ़ई का रन्दा,
लोहार की हाल,
तमाम पेशे बेच दिए जाते हैं ।

काश्तकार बेच दिए जाते हैं खड़ी फ़सलों समेत
नदियों का हो जाता है सौदा मछलियों से बिना पूछे ।
खनिज बेच दिए जाते हैं,
बेच दिया जाता है आकाश-पाताल,
हमारी तन्हाइयाँ तक नहीं बख़्शते बाज़ार के ये बहेलिये ।

हमारी नीन्द, हमारी सादगी
हमारे सुकून की लगाई जाती है बोली,
गर्भ में पल रहे शिशुओं तक का हो जाता है मोलभाव ।
यों तो कुछ लोग हमेशा रहते हैं बिकने को आतुर,
लेकिन बिकना नहीं चाहती वह स्त्री भी
जो खड़ी रहती है खम्भे के नीचे ग्राहक के इन्तज़ार में ।

हमारी ख़रीद-फ़रोख़्त में कोई नहीं पूछता हमारी मर्ज़ी
कोई नहीं बताता कि कितने में हुआ हमारा सौदा, किसके साथ ।
मेरे जानते तो कोई नहीं लगा सकता मोल आत्मा का
पर वह भी बेच दी जाती है कौड़ियों के मोल बिना हमें बताए।
जिसके बारे में हमें पता चलता है,
एक बिके हुए दिन की पराई सुबह में ।

गुरुजन

चींटी हमें दयावान बनाती है
बुलबुल चहकना सिखाती है
कोयल बताती है क्या होता है गान
कबूतर सिखाता है शान्ति का सम्मान ।

मोर बताता है कि कैसी होती है ख़ुशी
मैना बाँटती है निश्छल हंसी
तोता बनाता है रट्टू भगत
गौरैया का गुन है अच्छी संगत ।

बगुले का मन रमे धूर्त्तता व धोखे में
हंस का विवेक नीर-क्षीर, खरे-खोटे में
कौवा पढ़ाता है चालाकी का पाठ
बाज़ के देखो हमलावर जैसे ठाठ ।

मच्छर बना जाते हैं हिंसक हमें
खटमल भर देते हैं नफ़रत हममें
कछुआ सिखा देता है ढाल बनाना
साँप सिखा देता है अपनों को डँसना ।

उल्लू सिखाता है उल्लू सीधा करना
मछली से सीखो — क्या है आँख भरना
केंचुआ भर देता है लिजलिजापन
चूहे का करतब है घोर कायरपन ।

लोमड़ी होती है शातिरपने की दुम
बिल्ली से अन्धविश्वास न सीखें हम
कुत्ते से जानें वफ़ादारी के राज़
गाय से पाएँ ममता और लाज ।

बैल की पहचान होती है उस मूढ़ता से
जो ढोई जाती है अपनी ही ताक़त से
अश्व बना डालता है अलक्ष्य वेगवान
चीता कर देता है भय को भी स्फूर्तिवान ।

गधा सरताज है शातिर बेवकूफ़ी का
ऊँट तो लगता है क़लाम किसी सूफ़ी का
सिंह है भूख और आलस्य का सिरमौर
बाक़ी बहुत सारे हैं कितना बताएँ और…

सारे पशु-पक्षी हममें कुछ न कुछ भरते हैं
तब जाकर हम इनसान होने की बात करते हैं ।

चंद आदिम रूप 

बाढ़ में फंसने पर
वैसे ही बिदकते हैं पशु
जैसे ईसा से करोड़ साल पहले ।

ठीक वैसे ही चौकन्ना होता है हिरन
शेर की आहट पाकर
जैसे होता था हिरन बनने के दिनों में ।

गज और ग्राह का युद्ध
होता है उसी आदिम रूप में ।

जैसे आज भी काट खाता है दाँतों से
नखों से फाड़ देता है मनुष्य शत्रु को
निहत्था होने पर ।

चेहरे थे तो दाढ़ियाँ थीं

चेहरे थे तो दाढ़ियाँ थीं
बूढ़े मुस्कुराते थे मूछों में
हर युग की तरह
इनमें से कुछ जाना चाहते थे बैकुंठ
कुछ बहुओं से तंग़ थे चिड़चिड़े
कुछ बेटों से खिन्न
पर बच्चे खेलते थे इनकी दाढ़ी से
और डरते नहीं थे
दाढ़ी खुजलाते थे जुम्मन मियाँ
तो भाँपता था मोहल्ला
नहीं है सब खैरियत
पिचके चेहरों पर भी थीं दाढ़ियाँ
छिपातीं एमए पास जीवन का दुःख
दाढ़ीवाले छिपा लेते थे भूख और रुदन
कुछ ऐसे भी थे कि उठा देते थे सीट से
और फेरते थे दाढ़ी पर हाथ
बहुत थे ऐसे
जो दिखना चाहते थे बेहद खूँखार
और रखते थे दाढ़ी।

चिट्ठियाँ 

आती थीं ऐसी चिट्ठियाँ
जिनमें बाद समाचार होते थे सुखद
अपनी कुशलता की कामना करते हुए
होती थीं हमारी कुशलता की कामनाएँ।

गाँव-घर, टोला-पडोसी
सब चले आते थे बतियाते चिट्ठियों में
आटा गूंधती पडोसिनों के साथ आती थी माँ
बहन की छाया मेरी मेज़ पर बैठ जाती थी निःशब्द।

कलश धरे माथ ट्रैक्टर की पूजा करती आती थीं किसानिनें
हल और बैलों के टूटते रिश्ते चले आते थे।

चिट्ठियाँ बताती थीं
कि कैसे किराने की दूकान में घुस आया है मुम्बई
नशे के लिए अब कहीं जाना नहीं पड़ता अलबत्ता,
अस्पताल इतनी दूर है जैसे दिल्ली-कलकत्ता।

मुफ़्त मोतियाबिंदु शिविर नहीं पहुँच पाई बूढ़ी काकी
यही कोफ़्त है, वरना क्या लिखने में अब धरा है बाक़ी।

पता चल जाता था कि
किसके खलिहान में आग लगा दी किसने
किसने किसका घर बना दिया खंडहर
किसी बहन निकल गई किसके साथ
अबकी किसकी बेटी के पीले हुए हाथ

किसने बेच दिया पुरखों का खेत जुए के चक्कर में
कौन फौज़ से तीन माह की छुट्टी ले बैठा है घर में।

चिट्ठियाँ खोल देती थीं पोल सरपंची के चुनाव की
फर्जी डॉक्टर की दवा से मरी विधवा ठकुराइन की।
बरसों से अधूरी पड़ी सड़क परियोजना की
बहू को जला मारने की पारिवारिक योजना की।

लेकिन कुछ चिट्ठियाँ आती थीं हाथों-हाथ
लाती थीं गाँव से उखड़े पाँव
उनमें थोड़ा लिखा समझना होता था बहुत।

इधर एक अरसे से नहीं आई कोई चिट्ठी
मेरे पते पर मेरे नाम।
क्या पता लोग लिखते हों और फाड़ देते हों
क्योंकि मैं आज तक किसी को नहीं दिलवा पाया
एक वाचमैन तक का काम।

जन्मस्थान

किसी को नहीं रहता याद
कहाँ गिरा था वह पहली बार धरती पर
कहाँ जना गया
किस ठौर कटी थी उसकी नाल?
आसान नहीं है सर्वज्ञों के लिए भी यह जान लेना
कि क्यों पैदा होता है कोई?

कितने ईसा
कितने बुद्ध
कितने राम
कितने रहमान
कितने फुटपाथ
कितने अस्पताल
कितने रसोईघर
कितने मैदान
कितने महल
कितने अस्तबल
कौन पार पा सकता है जच्चाघरों से?

कैसे बता सकती हैं ख़ानाबदोश जातियाँ
किन-किन तम्बुओं में जनी गईं वे
घाट-घाट का पानी पीकर
कैसे चली आईं अयोध्या तक…?

जनहित याचिका

न्यायाधीश,
न्याय की भव्य-दिव्य कुर्सी पर बैठकर
तुम करते हो फैसला संसार के छल-छद्म का
दमकता है चेहरा तुम्हारा सत्य की आभा से।
देते हो व्यवस्था इस धर्मनिरपेक्ष देश में।
जब मैं सुनता हूँ दिन-रात यह चिल्लपों-चीख पुकार।
अधार्मिक होने के लिए मुझ पर पड़ती है समाज की जो मार
उससे मेरी भावनाओं को भी पहुँचती है ठेस,
मन हो जाता है लहूलुहान।
न्यायाधीश,
इसे जनहित याचिका मानकर
जल्द करो मेरी सुनवाई।
सड़क पर, दफ्तर या बाजार जाते हुए
मुझे इंसाफ की कदम-कदम पर जरूरत है।

तस्दीक

मां ने कहा-
ठहरो सिद्धार्थ, कहां जाते हो इस तरह सबको त्यागकर?
देखो, सिसक रही है यशोधरा
किवाड़ की आड़ में
मचल रहा है नन्हा राहुल उसकी गोद में.

घर ने कहा-
मां ठीक ही कहती है बेटा
यहां हमेशा से नहीं था घर
पहले थे बहुत झाड़-झंखाड़
ऊबड़खाबड़ नदी-पहाड़
किया गया समतल इसे चट्टानें तोड़ताड़
बांधे गये घास-फूस के झोपड़े-मकान

जरा और मृत्यु तो तब भी बेटा
अब भी है
लेकिन घर त्याग कर इस तरह
नहीं चल दिये पुरखे
उनके समय भी नहीं थी कोई फैक्ट्री
नहीं थी कोई गन्ना मिल इलाके में
फिर भी यहीं गड़ा रहा उनका खूंटा
यहीं रमाये रहे धूनी.

नीम का पेड़ बोला-
घर बिलकुल ठीक कहता है बेटा.
वैसे जहां भी जाओगे
कोई बोधिवृक्ष नहीं पाओगे
वहां भी ढोओगे पीड़ाआें के पहाड़
करोगे चाकरी
तोड़ोगे हाड़
दु:ख पीछा करते चले आयेंगे.

बरगद ने समझाया-
नीम कभी झूठ नहीं बोलता बेटा.
जब हम सब तुम्हें यहां नहीं देख पायेंगे
हम सबके आंसू बारिशें बन जायेंगे.

बूढ़ा पीपल इस बात की तस्दीक करता है-
सयाना वह है
जो घर में रहकर गृहस्थी की बात करता है

देवता हैं तैंतीस करोड़ 

बहुत दिनों से देवता हैं तैंतीस करोड़
उनके हिस्से का खाना-पीना नहीं घटता
वे नहीं उलझते किसी अक्षांश-देशान्तर में
वे बुद्धि के ढेर
इन्द्रियाँ झकाझक उनकी
सर्दी-खाँसी से परे
ट्रेन से कटकर नहीं मरते
रहते हैं पत्थर में बनकर प्राण
कभी नहीं उठती उनके पेट में मरोड़
देवता हैं तैंतीस करोड़ ।

हम ढूँढ़ते हैं उन्हें
सूर्य के घोड़ों में
गन्धाते दुखों में
क्रोध में
शोक में
जीवन में
मृत्यु में
मक्खी में
खटमल में
देश में
प्रदेश में
धरती में
आकाश में
मन्दिर में
मस्जिद में
दंगे में
फ़साद में
शुरू में
बाद में
घास में
काई में
ब्राह्मण में
नाई में
बहेलिए के जाल में
पुजारी की खाल में
वे छिप जाते हैं
सल्फ़ास की गोली में !

देवता कन्धे पर बैठकर चलते हैं साथ
परछाई में रहते हैं पैवस्त
सोते हैं खुले में
धूप में
बारिश में
गाँजे की चिलम में छिप जाते हैं हर वक़्त

नारियल हैं वे
चन्दन हैं
अक्षत हैं
धूप-गुग्गुल हैं देवता
कुछ अन्धे
कुछ बहरे
कुछ लूले
कुछ लंगड़े
कुछ ऐंचे
कुछ तगड़े
बड़े अजायबघर हैं
युगों-युगों के ठग
जन्मान्तरों के निष्ठुर
नहीं सुनते हाहाकार
प्राणियों की करुण पुकार

हम तमाम उम्र अधीर
माँगते वर गम्भीर
इतनी साधना
इतना योग
इतना त्याग
इतना जप
इतना तप
इतना ज्ञान
इतना दान
जाता है निष्फल ।

वे छिपे रहते हैं मोतियाबिन्द में
फेफड़ों के कफ़ में
मन के मैल में
बालों के तेल में
हमारी पीड़ाएँ नुकीले तीर
छूटती रहती हैं धरती से आकाश
और बच-बच निकल जाते हैं तैंतीस करोड़ देवता ।

हमारा घोर एकान्त
घनी रात
भूख-प्यास
घर न द्वार
राह में बैठे खूँखार
तड़कता है दिल-दिमाग
लौटती हैं पितरों की स्मृतियाँ
राह लौटती है
लौटते हैं युग
वह सब कुछ लौटता है
जो चला गया चौरासी करोड़ योनियों का
और तिलमिला उठते हैं तैंतीस करोड़ देवता ।

दुनिया अभी जीने लायक है

मैं सोचता था
पानी उतना ही साफ पिलाया जाएगा
जितना होता है झरनों का
चिकित्सक बिलकुल ऐसी दवा देंगे
जैसे माँ के दूध में तुलसी का रस
मैं जहर खाने जाऊँगा
तो रोक लेगा कोई
ड्रायवर मंजिल तक पहुँचा देगा
और मैं मार लूँगा एक नींद
घर पहुँचूँगा तो बाल-बच्चे मिलेंगे सही-सलामत
ट्रेन के सामने आ जाने पर
लगा दिया जाएगा ब्रेक ऐन मौके पर
और लोग डाँट पिलाएँगे-
‘यह क्या नादानी है, दुनिया अभी जीने लायक है।’

नौकरी पाने की उम्र 

जिनकी चली जाती है नौकरी पाने की उम्र
उनके आवेदन पत्र पड़े रह जाते हैं दफ़्तरों में
तान्त्रिक की अँगूठी भी
ग्रहों में नहीं कर पाती फेरबदल
नहीं आता बरसों-बरस कहीं से कोई जवाब

कमर से झुक जाते हैं वे
हालाँकि इतनी भी नहीं होती उमर
सब पढ़ा-लिखा होने लगता है बेकार
बढ़ी रहती हैं दाढ़ी की खूँटियाँ

कोई सड़क उन्हें नहीं ले जाती घर
वे चलते हैं सुरंगों में
और चाहते हैं कि फट जाए धरती
उनकी याददाश्त एक पुल है

कभी-कभार कोई साथी
नज़र आता है उस पर बैठा हुआ
वे जाते हैं
और खटखटाते हैं पुराने बन्द कमरे
वहाँ कोई नहीं लिपटता गले से
चायवाला बरसों से बूढ़ा हो रहा है वहीं
मगर बदल जाते हैं लड़के साल दर साल

जिनकी चली जाती है नौकरी पाने की उम्र
वे सोचते हैं नए लड़कों के बारे में
और पीले पड़ जाते हैं ।

प्रेम हमारा

मैंने देखा तुम्हें गुलफरोश के यहाँ
गुलाब चुनते हुए
देखता ही रहा।

तुम वे फूल चढ़ा सकती थीं मंदिर में
या खोंस सकती थीं जूड़े में
मगर रख आईं समंदर किनारे रेत पर मेरा नाम खोदकर।

भेजता हूँ प्रेम संदेश
उपग्रहों से होते हुए पहुँचते हैं तुम तक
मेरी मशीन पर उभर आता है तुम्हारा चेहरा

बनाती हो तुम भी कम्प्यूटर पर मेरी तस्वीर
भरती हो उसमें मनचाहे रंग

फिर सुरक्षित कर लेती हो मुझे स्क्रीन पर
हमेशा के लिए।

गली-गली मारे फिरने की फुरसत कहाँ हमें?
यह भी नहीं कि किसी बाग-बागीचे जाएँ
विक्टोरिया पर मरीन ड्राइव का चक्कर लगाएँ

हाथ में हाथ, आँखों में आँखें डालें
चौपाटी पर पैरों से पानी उछालें
मनुष्य होने के उत्सव मनाएँ।

रोबोट बना जड़ दिए जाते हैं हम कुर्सियों पर
लगातार झरती है हमारे दिल पर
रेडियो विकिरण की धूल
जैसे साइबर स्पेस में मंडराता हो कोई जलता बगूल।

अब कहाँ रहा आग का वह दरिया?
हमें तो जाना होगा अंतरिक्ष के पार

क्या पता किसी ग्रह से आ जाए
तुम्हारे लिए प्रकाशपुंजीय तार
और मैं उड़ जाऊँ हमेशा के लिए तुम्हारी स्क्रीन से

कल सारी रात बनाता रहा
तुम्हारे चेहरे का कोलाज
मगर हर रंग लगा मुझसे थोड़ा नाराज

वैसे तो मुझको तुम सुंदर लगती पूरे मन से
मुस्करा लेती हो मशीन पर इतने भोलेपन से।

बारिश की बून्दें 

बारिश की बून्दें चुईं
टप…टप…टप
काँस की टटिया पे
छप…छप…छप
बरखा बहार आई
नाच उठा मन
घनन घनन घन,
घनन घनन घन ।

उपले समेट भागी
साड़ी लपेट भागी
पारे-सी देह भई
देहरी पे फ़िसल गई
अपनी पड़ोसन
घनन घनन घन,
घनन घनन घन ।

बिल में भरा पानी
दुखी चुहिया रानी
बिजली के तार चुए
जल-थल सब एक हुए
पेड़ हैं मगन
घनन घनन घन,
घनन घनन घन ।

फरर-फरर बहे बयार
ठण्ड खटखटाए दुआर
कैसे अब आग जले
रोटी का काम चले
मचल रहा मन

घनन घनन घन,
घनन घनन घन ।

बारिश में स्त्री 

बारिश है
या घना जंगल बाँस का
उस पार एक स्त्री बहुत धुँधली
मैदान के दूसरे सिरे पर झोपड़ी
जैसे समंदर के बीच कोई टापू
वह दिख रही है यों
जैसे परदे पर चलता कोई दृश्य
जैसे नजर के चश्मे के बगैर देखा जाए कोई एलबम
जैसे बादलों में बनता है कोई आकार
जैसे पिघल रही हो बर्फ की प्रतिमा
घालमेल हो रहा है उसके रंगों में
ऊपर मटमैला
नीचे लाल
बीच में मटमैला-सा लाल
स्त्री निबटा रही है जल्दी-जल्दी काम
बेखबर
कि देख रहा है कोई
चली गई है झोपड़ी के पीछे
बारिश हो रही है तेजतर
जैसे आत्मा पर बढ़ता बोझ
नशे में डोलता है जैसे संसार
पुराने टीवी पर लहराता है जैसे दूरदर्शन का लोगो
दृश्य में हिल रही है वह स्त्री
माँज रही है बर्तन
उलीचने लगती है बीच-बीच में
घुटने-घुटने भर आया पानी
तन्मयता ऐसी कि
कब हो गई सराबोर सर से पाँव तक
जान ही नहीं पाई
अंदाजा लगाना है फिजूल
कि होगी उसकी कितनी उम्र
लगता है कि बनी है पानी ही की
कभी दिखने लगती है बच्ची
कभी युवती
कभी बूढ़ी
शायद कुछ बुदबुदा रही है वह
या विलाप कर रही है रह-रह कर
मैदान में बारिश से ज्यादा भरे हैं उसके आँसू
थोड़ी ही देर में शामिल हो गई उसकी बेटी
फिर निकला पति नंगे बदन
हाथ में लिए टूटा-फूटा तसला
वे चुनौती देने लगे सैलाब को
जो घुसा चला आता था ढीठ उनके संसार में
बारिश होती गई तेजतर
तीनों डूबने-उतराने लगे दृश्य में
जैसे नाविक लयबद्ध चप्पू चलाएँ
और महज आकृतियाँ बनते जाएँ
मैं ढीठ नजारा कर रहा था परदे की ओट से
तभी अचानक जागा गँदले पानी की चोट से
इस अश्लीलता की सजा
आखिरकार मिल ही गई मुझे।

बीड़ी सुलगाते पिता

खेत नहीं थी पिता की छाती
फिर भी वहाँ थी एक साबुत दरार
बिलकुल खेत की तरह ।

पिता की आँखें देखना चाहती थीं हरियाली
सावन नहीं था घर के आसपास
पिता होना चाहते थे पुजारी
ख़ाली नहीं था दुनिया का कोई मन्दिर
पिता ने लेना चाहा संन्यास
पर घर नहीं था जंगल ।

अब पिता को नहीं आती याद कोई कहानी
रहते चुप अपनी दुनिया में
पक गए उनकी छाती के बाल
देखता हूँ
ढूँढ़ती हैं पिता की निगाहें
मेरी छाती में कुछ ।

पिता ने नहीं किया कोई यज्ञ
पिता नहीं थे चक्रवर्ती
कोई घोड़ा भी नहीं था उनके पास
वे काटते रहे सफ़र
हाँफते-खखारते
एक हाथ से फूँकते बीड़ी
छाती दबाए हुए दूसरे हाथ से ।

पिता ने नहीं की किसी से चिरौरी
तिनके के लिए नहीं बढ़ाया हाथ
हमारी दुनिया में सबसे ताक़तवर थे पिता ।

नँधे रहे जुए में उमर भर
मगर टूटे नहीं
दबते गए धरती के बहुत-बहुत भीतर
कोयला हो गए पिता
कठिन दिनों में जब ज़रूरत होगी आग की
हम खोज निकालेंगे
बीड़ी सुलगाते पिता ।

भूल सुधार

मैं बहुत पुराना एक जवाब सुधारना चाहता था
जो बिगड़ गया था मुझ से स्कूल के दिनों में
और मेरे सपनों में आता था।

गज़ब ये कि उसकी जांच-कॉपी मिल गई थी मुझे
अरसा बाद एक दिन परचून की दूकान में
चाय की पत्ती में लपटी हुई।

मुझे सजाना था हॉस्टल का वह कमरा
जिसे अस्त-व्यस्त छोड़ मैं निकला था कभी न लौटने के लिए।

मुझे कटाना था अपना नाम उस खोमचे वाले की उधारी से
जो बैठता था गोलगप्पे लेकर स्कूल के गेट पर।

विदा करते वक़्त हाथ यों नहीं हिलाना था
कि दोस्त लौट ही न सकें मेरी उम्र रहते।

माँ की वह आलमारी करीने से लगानी थी
जिसमें बेतरतीब पड़ी रहती थीं साड़ियाँ
जो मुझे माँ जैसी ही लगती थीं।

रुई जैसी जलती यादों को
वक़्त की ओखली में कूट-कूट कर चूरन बना देना था।
लौटा देना था वह फूल
जो मेरी पसलियों में पाथर बनकर कसकता रहता है दिन-रात।

काग़ज़ की कश्ती यों नहीं बहाना थी
कि वह अटक जाए तुम तक पहुँचने के पहले ही।

मुझे संभालकर रखना था वह स्वेटर
जो किसी ने बुना था मेरे लिए गुनगुनी धूप में बैठकर
मेरा नाम काढ़ते हुए।

मुझे खोज निकालना था वह इरेज़र
जो उछल-कूद में बस्ते से गिर गया था
छुटपन में।

बहुत-सी भूलें सुधारना थीं मुझे
पृथ्वी को उल्टा घुमाते हुए ले जाना था
रहट के पहिये की तरह
पृथ्वी के घूमने के एकदम आरंभ में।

माँ की नींद 

किताब से उचट रहा है मेरा मन
और नींद में है माँ ।
पिता तो सो जाते हैं बिस्तर पर गिरते ही,
लेकिन बहुत देर तक उसकुरपुसकुर करती रहती है वह
जैसे कि बहुत भारी हो गई हो उसकी नींद से लम्बी रात ।

अभी-अभी उसने नींद में ही माँज डाले हैं बर्तन,
फिर बाँध ली हैं मुट्ठियाँ
जैसे बचने की कोशिश कर रही हो किसी प्रहार से
मैं देख रहा हूँ उसे असहाय !

माँ जब-तब बड़बड़ा उठती है नींद में
जैसे दबी हो अपने ही मलबे के नीचे
और ले रही हो साँस
पकड़ में नहीं आते नींद में बोले उसके शब्द
लगता है जैसे अपनी माँ से कर रही है कोई शिकायत ।

बीच में ही उठकर वह साफ़ कराने लगती है मेरे दाँत
छुड़ाने लगती है पीठ का मैल नल के नीचे बैठकर
कभी कंघी करने लगती है
कभी चमकाती है जूते
बस्ता तैयार करके नींद में ही छोड़ने चल देती है स्कूल
मैं किताबों में भी देख लेता हूँ उसे
सफ़ों पर चलती रहती है अक्षर बनकर
जैसे चलती हैं बुशर्ट के भीतर चीटियाँ ।

किताब से बड़ी हो गई है माँ
सावधान करती रहती है मुझे हर रोज़
जैसे कि हर सुबह उसे ही बैठना है इम्तिहान में
उसे ही हल करने हैं तमाम सवाल
और पास होना है अव्वल दर्जे में ।

मेरे फ़ेल होने का नतीजा
मुझसे बेहतर जानती है माँ ।

मिट्टी के लोंदों का शहर

अन्तरिक्ष में बसी इन्द्रनगरी नहीं
न ही पुराणों में वर्णित कोई ग्राम
बनाया गया इसे मिट्टी के लोंदों से
राजा का किला नहीं
यह नगर है बिना परकोटे का
पट्टिकाओं पर लिखा
हम्मूराबी का विधान यहाँ नहीं लागू
सीढ़ियोंवाले स्नानागार भी नहीं हैं यहाँ
यहाँ के पुल जाते अक्सर टूट
नालियों में होती ही रहती टूट-फूट
इमारतें जर्जर यहाँ की ।

द्रविड़ सभ्यता का नगर भी नहीं है यह
यहाँ नहीं सजते हाट काँसे-रेशम के
कतारों में खड़े लोग
बेचते हैं श्रम और कलाएँ सिर झुकाए
करते रहते हैं इन्तज़ार किसी देवदूत का
रोग, दुख और चिन्ताओं में डूबे
शाम ढले लौटते हैं ठिकानों पर
नगर में बजती रहती है लगातार कोई शोकधुन ।

वंशावली

परदादा

वेदव्यास
मालपुए
कर्मकांड
दुनियादार

दादा

तुलसीदास
दूध-भात
खेती-पाती
समझदार

पिता

कार्ल मार्क्स
चना-चबेना
यूनियनबाजी
कलाकार

मैं

बेक़िताब
भुखमरी
बेरोज़गारी
कर्ज़दार

(मशहूर अमेरिकी कवयित्री हाना कान के असर में। २४ दिसम्बर, २००६ को रचित)

वजह नहीं थी उसके जीने की

पहला तीखा बहुत खाता था इसलिए मर गया
दूसरा मर गया भात खाते-खाते
तीसरा मरा कि दारू की थी उसे लत
चौथा नौकरी की तलाश में मारा गया
पाँचवें को मारा प्रेमिका की बेवफाई ने
छठा मरा इसलिए कि वह बनाना चाहता था घर
सातवाँ सवाल करने के फेर में मरा
आठवाँ प्यासा मर गया भरे समुद्र में
नौंवा नंगा था इसलिए शर्म से मरा खुद-ब-खुद
दसवाँ मरा इसलिए कि कोई वजह नहीं थी उसके जीने की।

सम्बन्धीजन

मेरी आँखें हैं माँ जैसी
हाथ पिता जैसे
चेहरा-मोहरा मिलता होगा ज़रूर
कुटुम्ब के किसी आदमी से ।

हो सकता है मिलता हो दुनिया के पहले आदमी से
मेरे उठने-बैठने का ढंग
बोलने-बतियाने में हो उन्हीं में से किसी एक का रंग
बहुत सम्भव है मैं होऊँ उनका अंश
जिन्होंने देखे हों दुनिया को सुन्दर बनाने के सपने
क्या पता गुफ़ाओं से पहले-पहल निकलने वाले रहे हों मेरे अपने
या फिर पुरखे रहे हों जगद्गुरू शिल्पी
गढ़ गए हों दुनिया भर के मन्दिरों में मूर्तियाँ
उकेर गए हों भित्ति-चित्र
कौन जाने कोई पुरखा मुझ तक पहुँचा रहा हो ऋचाएँ
और धुन रहा हो सिर ।

निश्चित ही मैं सुरक्षित बीज हूँ सदियों से दबा धरती में
सुनता आया हूँ सिर पर गड़गड़ाते हल
और लड़ाकू विमानों का गर्जन

यह समय है मेरे उगने का
मैं उगूँगा और दुनिया को धरती के क़िस्सों से भर दूँगा
मैं उनका वंशज हूँ जिन्होनें चराई भेड़ें
और लहलहा दिए मैदान

सम्भव है कि हमलावर मेरे कोई लगते हों
कोई धागा जुड़ता दिख सकता है आक्रान्ताओं से
पर मैं हाथ तक नहीं लगाऊँगा चीज़ों को नष्ट करने के लिए
भस्म करने की निगाह से नहीं देखूँगा कुछ भी
मेरी आँखें माँ जैसी हैं
हाथ पिता जैसे ।

समय गुजरना है बहुत

बहुत गुजरना है समय
दसों दिशाओं को रहना है अभी यथावत
खनिज और तेल भरी धरती
घूमती रहनी है बहुत दिनों तक
वनस्पतियों में बची रहनी हैं औषधियाँ
चिरई-चुनगुन लौटते रहने हैं घोंसलों में हर शाम
परियाँ आती रहनी हैं हमारे सपनों में बेखौफ
बहुत हुआ तो किस्से-कहानियों में घुसे रहेंगे सम्राट
पर उनका रक्तपात रहना है सनद
और वक्त पर हमारे काम आना है
बहुत गुजरना है समय।

सिर्फ एक बार 

मुझे आने दो
हंसते हुए अपने घर
एक बार मैं पहुँचना चाहता हूँ
तुम्हारी खिलखिलाहट के ठीक-ठीक क़रीब

जहाँ तुम मौजूद हो पूरे घरेलूपन के साथ
बिना परतदार हुए कैसे जी लेती हो इस तरह ?

सिर्फ एक बार मुझे बुलाओ
खिलखिलाकर तहें खोलो मेरी
जान लेने दो मुझे
घर को घर की तरह

सिर्फ एक बार ।

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