विजय गौड़ की रचनाएँ

बारिश में भीगती लड़की को देखने के बाद

एक

झमाझम पड़ती
वर्षा की मोटी धारों के बीच
लड़की चुपचाप
सिर पर छाता ताने चलती है

छाते से चेहरे को
इतना ढक लेती है लड़की
कि आस-पास से गुज़रने वाला
चेहरा भी न देख पाएँ

छाते से ढकी लड़की
होती है आत्म केन्द्रित;
सड़क पर बहते गंदे पानी को देख
लड़की सोचती है,
कितना फ़र्क है नदी और नाले में
जबकि, पानी की नियति
सिर्फ बहना ही है

चप-चप करती
चप्पल की आवाज़ के साथ ही
लड़की गर्दन को पीछे घुमा
देखती है कपड़ों को ;
यह ख़याल आते ही
कि कपड़े तो पूरी तरह से
गंदे हो चुके हैं
लड़की कुढ़ने लगती है

बारिश है कि लगातार
बढ़ती जा रही है
लड़की चाहे जितना कोशिश कर ले
बचने की
पर सामने से आता ट्रक
नहीं छोड़ता
लड़की को भिगोए बगैर

ऊपर से नीचे तक
पूरी तरह से भीग चुकी है लड़की
यही कारण है कि
लड़की ने छाता बंद कर लिया है

बारिश के बीच ठक-ठक करती
चल रही है लड़की

दो

चाय की चुस्कियों के बीच
लड़की का ख़याल आते ही
बाहर वर्षा की मोटी-मोटी धारें
दिखाई देने लगती है
मोटी-मोटी धारों के बीच
लड़की दौड़ रही है
घंटाघर के चारों ओर

तीन

भीगी हुई लड़की को देखने के बाद
ऐसे कितने लोग हैं
जो यह सोच पाते हैं
कि लड़की का भीगना
ख़तरनाक हो सकता है
उसके लिए भी
और देश के लिए भी ।

तैयारी

बच्चे किलक रहे हैं लगातार

दिन दोपहरी का सूरज
चढ़ रहा है आकाश में
बूढ़ी स्त्रियाँ
बहू और बेटियों के बच्चों की
मालिश कर रही है,

तेल सने खुरदरे हाथों से
नवजात शिशुओं के
मुलायम-मुलायम बदन रगड़ रही है,

रगड़ रही हैं
बच्चों के चेहरे
छाती
हाथ
जांघ
और सुप्त पड़े अंग

बच्चे ओर जोर से चीख रहे हैं।

तैयारी

बच्चे किलक रहे हैं लगातार

दिन दोपहरी का सूरज
चढ़ रहा है आकाश में
बूढ़ी स्त्रियाँ
बहू और बेटियों के बच्चों की
मालिश कर रही है,

तेल सने खुरदरे हाथों से
नवजात शिशुओं के
मुलायम-मुलायम बदन रगड़ रही है,

रगड़ रही हैं
बच्चों के चेहरे
छाती
हाथ
जांघ
और सुप्त पड़े अंग

बच्चे ओर जोर से चीख रहे हैं।

ऐसे में

घर के भीतर
सीलन भरी दीवारों पर,
जहाँ सब कुछ चट कर जाने को
तेज़ी से दौड़ रही है दीमक
क्या, बचाई जा सकती हैं वहाँ क़िताबें ?

बचाया जा सकता है
लकड़ी का सामान,
संदूक ?

वहाँ नहीं बची रह सकती
दो घड़ी सुस्ताने के लिए
लगाई गई चारपाई

ऐसे में तुम
वर्षों से सूखे तैल चित्र को
कैसे बचा पाओगे ?

सोचो थोड़ी देर 

आख़िर कब तक
सरकारों का बदल जाना
मौसम के बदल जाने की तरह
नहीं रहेगा याद

कब तक यही कहते रहेगें
इस बार गर्मी बड़ी तीखी है
बारिश भी हुई इस बार ज़्यादा
और ठंड भी पड़ी पहले से अधिक

गुज़रते हुए 

घाटियों से उठते धुएँ
और पंखा झलते पहाड़ों से
लय बैठाते,
वाहन में सवार
खिड़की से गर्दन बाहर निकाल
उलटते रहे खट्टापन

बुग्यालों पर पिघल चुकी
बर्फ़ के बाद
हरहराती-फिसलन से
बेदख़ल कर दी गयी
भेड़-बकरियों की मिमियाहट
को खोजते हुए बढ़ते रहे
जली हुई चट्टानों की ओर

खो चुके रास्तों को खोजना
जोख़िम से भरा ही था

रूपकुंड की ऊँचाई से भी ऊपर
ज्यूरागली के डरावने पन के पार
शिला-समुद्र पहुँचना
आसान नहीं इतना।
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

पहाड़ों की खोह में है रूपकुंड
रूपकुंड में नहीं सँवारा जा सकता है रूप
बर्फानी हवाएँ
वैसे ही फाड़ देंगी चेहरा
यदि मौसम के गीलेपन को
निचोड़ दिया चट्टानों ने,
खाल पर दरारें तो
गीलेपन के खौफ़ से भी न डरेंगीं,

एक उम्र तक पहुँचने से पहले
यूँ ही नहीं
सिकुड़न बना लेती है घर
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

नाम मात्र से आकर्षित होकर
रूपकुंड का रास्ता पकड़ना
ख़ुद को जोख़िम में डालना होगा
तह दर तह बिछी हुई बर्फ़ के नीचे
दबे हुई लाशें
अनंतकाल से दोहरा रही हैं,
कटी हुई चट्टानों में
रुकने का
जोख़िम न उठाना कभी
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

सदियों से उगती रही है
बेदनी बुगयाल में बुग्गी घास,
चरती रही हैं भेड़ें
आली और दयारा बुग्याल में भी

रंग बदलती घास ही
चिपक जाती है बदन पर भेड़ों के
जो देती है हमें गर्माहट
और मिटाती है
भेड़ चरवाहों की थकावट
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

अतीश, पंजा, मासी-जटा
अनगिनत
जड़ी-बूटियों के घर हैं
बुग्याल,
कीड़ा-झाड़
हाल ही में खोजा गया
नया खजाना है
जो पहाड़ों के लुटेरों की
भर रहा है जेब
!!!!!!!!!!!!!!!!!!

बुग्याल के बाद भी
कितनी ही चढ़ाई और उतराई होंगी
रूपकुंड तक पहुँचने में
कितने ही दिन
रपटीले पहाड़ों पर
ढूंढ कर
कोई समतल कहा जा सकने वाला कोना
करेगें विश्राम
पुकारेगें एक दूसरे का नाम,
आवाज़ों के सौदागर
नहीं लगा पाएंगें शुल्क,
निशुल्क ही
कितने ही दिनों तक
सुन सकते हैं
पत्थरों के नीचे से
बहते पानी की आवाज़
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

बुग्यालों पर ख़रीददार होंगे,
क्या कह रहें हैं जनाब
बिकने के लिए भी तो
कुछ नहीं है बुग्यालों में
समय विशेष पर उगने वाली
जड़ियाँ तो
किसी एक टूटी हुई गोठ पर
टांग दिये गये
राजकीय चिकित्सालय से
किसी भी तरह की
उम्मीद न होने का सहारा भर हैं
फिर ऐसा क्यों हो रहा है हल्ला,
रोपवे खिंच जाएगा वहाँ
सड़क पहुँच जाएगी

गाड़ियों के काफिले
पहुँचने से इतनी पहले
बेदख़ल कर दिए गए जानवर
फिर किस लिए ?
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
रूपकुंड के शीश पर
चमकती है ज्यूरागली
पाद में फैले हैं बुग्याल;
आली, बेदनी, कुर्मातोली, गिंगातोली
बाहें कटावदार चट्टानों में
दुबक कर बैठे
ग्लेशियरों में धँस गई हैं
चेहरे को भी छुपा लिया है बर्फ़ ने
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

बर्फ़ में मुँह छुपाये
रुपकुंड के चेहरे को
ज़रा संभल कर देखना
मौसम उसकी प्रेमिका है,
कोहरे में ढक देंगें बादल
ओलावृष्टि से
क्षत-विक्षत हो जाएगें शरीर
कोई रपटीला ग्लेशियर भी
धकेल सकता है
हज़ारों फ़ुट गहरी खाई में
कार्बन डेटिंग के अलावा
और कोई आकर्षण
नहीं रहेगा मानव शरीर का
बर्फ़ के नीचे दुबका कीड़ा-झाड़
ज्यादा अहमियत रखता है
मुनाफ़ाख़ोरों के लिए।
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

हाँ जी की नौकरी
न जी का घर,
बड़बड़ाते और आशंकित ख़तरे से डरे
बढ़ते रहे
नरेन्द्र सिंह दानू और देवीदत्त कुनियाल

बगुवावासा में ही
छोड़ दो सामान, सर
बिना पिट्ठु के ही
रूपकुंड तक पहुँचना आसान नहीं है
ज्यूरागली तो मौत का घर है, सर

क्षरियानाग पर पस्त होने के बाद भी
नहीं रुके
नहीं रुकेगें शिला-समुद्र तक,
हमने ढेरों पहाड़ किए हैं पार

ज्यूरागली का रास्ता नहीं है आसान
पहाड़ों का पहाड़ है ज्यूरागली,
नीचे मुँह खोले बैठा है रुपकुंड

हमारे पिट्ठुओं का वजन
गीले हो चुके सामानों से बढ़ गया है, सर
पर नहीं हटेगें हम पीछे
चलेगें आपके साथ-साथ
बाल-बच्चेदार तो आप भी हैं न सर
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

पहाड़ ताक़त से नहीं
हिम्मत से होते हैं पार
दृढ़ इच्छाशक्ति ही
कंधों पर लदे
पिट्ठुओं के भार को हवा कर सकती है,
हवा की अनुपस्थिति में तो
उठते ही नहीं पैर
फेफड़ों की धौंकनी तो
ग़ुम ही कर देती है आवाज़

रपटीले पहाड़ों पर
रस्सी क्रे सहारे चढ़ना-उतरना
टंगी हुई हिम्मत को
अपने भीतर इकट्ठा करना है बस।
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

बर्फ़ीली ढलान पर
नहीं होता कोई पद-चिन्ह,
किसी न किसी को तो
उठाना ही पड़ेगा जोखिम
आगे बढ़ने का
काटने ही होगें फुट-हॉल
पीछे आने वालों के लिए

कमर में बंधी रस्सी के सहारे
आगे बढ़ते हुए
फुट-हॉल काटता व्यक्ति
रस्सी पर चलने का
करतब दिखाता
नट नज़र आता है।
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

धीरे-धीरे चलना, सर
तेज़ चलकर रुक जाने में
कोई बुद्धिमानी नहीं है, सर
ऐसे तो एक कैंची भी
नहीं कर पाएगें पार
खड़ी चढ़ाई पर चढ़ना तो
और भी मुश्किल हो जाएगा
धीरे-धीरे चलना, सर

ऊँचाईयों को ताकते हुए तो
दम ही टूट जायेगा,
अपने से मात्र दो फ़ुट आगे ही
निगाह रखें, सर
रुक-रुक कर नहीं
ऐसे एक-एक क़दम चलें सर

सिर्फ क़दमों पर निगाह रखें, सर

सिर्फ़ अपने क़दमों की
लय बैठायें, सर
ऊँचाई दर ऊँचाई अपने आप
पार हो जाएगीं

देखना ही है तो
नीचे छूट गए
अपने साथी को देखें, सर
कहीं उसे आपकी मदद की ज़रूरत तो नहीं

बेशक थकान कितनी ही भर चुकी हो
बेशक मुश्किल हो रहा हो पाँव उठाना,
धीरे-धीरे चलते रहें, सर
लय बैठाने के लिए अभ्यास ज़रूरी है,
क़दम गिन-गिन कर शुरु करें, सर
रुकना ही है तो
गिनती पूरी होने पर ही
पल भर को
खड़े-खड़े ही रुकें, सर
चढ़ाई पर तो
बदन आराम मांगता ही है
ठहरिये मत, सर
वैसे भी यूँही कहीं पर ठहर जाना तो
ख़तरनाक हो ही सकता है, सर

धीरे-धीरे चलें, सर
सिर्फ़ चलते रहें
एक ही लय में बिना थके
पीठ का बोझ तो वैसे ही हवा हो जाएगा
सिर्फ़ कमर को थोड़ा झुका लें, सर

सिर नही ।
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

ढाल पर उतरते हुए तो
और भी सचेत रहें, सर
घुटनों पर जोर पड़ता है;
ध्यान हटा नहीं कि
रिपटते चले जाएंगें
बस वैसे ही चलें, एक-एक क़दम

ध्यान रखें सर
पिट्ठू, लाठी या कैमरा
कुछ भी फँस सकता है चट्टान में
एक बार डोल गए तो
मैं भी कुछ नहीं कर पाऊंगा, सर
वैसे आप निष्फिकर रहें
मैं आपके साथ हूँ
आगे निकल चुके साथियों को,
यदि हम ऐसे ही चलते रहे,
जल्द ही पकड़ लेगें
वे दौड़-दौड़ कर निकले हैं
लम्बा विश्राम
जो उनकी ज़रूरत हो जाएगा
उन्हें वैसे ही थका देगा, सर

उनके पास पहुँच कर भी
हम ज़्यादा नहीं रुकेगें
बढ़ते ही रहेगें, सर
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

तम्बाकू न खाओ, सर
बीड़ी भी ठीक नहीं
चढ़ाई में वैसे ही
फूल-फूल जाती है साँस
हमारा क्या
हमारा तो आना जाना ठहरा
आपका तो कभी-कभी आना ठहरा, सर।
!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

तुम्हारे सिर पर पसीना होगा
अभी चढ़ाई चढ़के आए हो,
टोपी उतारना ठीक नहीं

हमारी तरह साफा बांध लो सर
वरना हवा पकड़ लेगी ‘सर’।

शब्दार्थ :

बुग्यालों= ऊँचे पहाड़ो पर घास के मैदान
रुपकुंड, ज्यूरागली, शिला-समुद्र= जगहों के नाम
अतीश, पंजा, मासी-जटा= जड़ी-बूटियां
कीड़ा-झाड़= विशेष प्रकार की जड़ी। इसमें कीड़े के पेट से ही पौधा बाहर निकलता है। यानी जीव और वनस्पति की एकमय प्रमेय का साक्ष्य भी। इसका तिब्बती नाम है- यारक्षागंगू और अंग्रेजी नाम है- ब्वतकेमच

स्थगित होते हुए हम

उम्र के नपे-तुले
बचे हुए दिनों में
स्थगित हो जाने से पहले
रायपुर पोस्ट आफ़िस का
बूढ़ा क्लर्क,
बीड़ी का सुट्टा मार सकने की भी
फुर्सत बची नहीं है जिसके पास
मक्कार दुनिया के
सबसे मक्कार यंत्र के झरोखे पर
मिचमिची आँखों से
बड़ी मुश्किलों से पढ़ते हुए
उस कॉलम की इबारत को
जिसमें भरा जाना है आवश्यक विवरण
लम्बी लगी लाईन को कैसे समझाये
कि एक प्रोग्राम से निकलकर
दूसरे में जाने के लिए भी
लगता है वक़्त-
किसी को रजिस्ट्री करानी है
किसी को जमा कराना है टेलीफ़ोन का बिल

सबसे पीछे वाला व्यक्ति
जिसे बिजली का बिल जमा कराना है
आगे वाले से पूछता है
लाईन क्यों नहीं खिसक रही है भाई
और झल्लाहट में दिए गए जवाब के साथ
भरता है हामी,
इन बूढ़े खूसटों को तो
कर ही देना चाहिए रिटायर अब।

वे गांधीवादी हैं

वे गांधीवादी हैं, या न भी हों
पर गांधी जैसा ही है उनका चेहरा
खल्वाट खोपड़ी भी चमकती है वैसे ही

वे गांधीवादी हैं, या न भी हों
गांधीवादी बने रहना भी तो
नहीं है इतना आसान;
चारों ओर मचा हो घमासान
तो बचते-बचाते हुए भी
उठ ही जाती है उनके भीतर कुढ़न
वैसे, गुस्सा तो नहीं ही करते हैं वे
पर भीतर तो उठता ही है
गांधी जी भी रहते ही थे गुस्से से भरे,
कहते हैं वे,
गांधी नफ़रत से करते थे परहेज,
गुस्से से नहीं

वे गांधीवादी हैं, या न भी हों
गांधी ‘स्वदेशी’ पसंद थे
कातते थे सूत
पहनते थे खद्दर
वे चाहें भी तो
पहन ही नहीं सकते खद्दर
सरकार गांधीवादी नहीं है, कहते हैं वे,
विशिष्टताबोध को त्यागकर ही
गांधी हुए थे गांधी
गांधीवादी होना विशिष्टता को त्यागना ही है

वे गांधीवादी हैं, या न भी हों
अहिंसा गांधी का मूल-मंत्र था
पर हिंसा से नहीं था इंकार गांधी जी को,
कहते हैं वे,
समयकाल के साथ चलकर ही
किया जा सकता है गांधी का अनुसरण।

है कौन-सा रास्ता

बन्दूक की नाल को
किसी भ्रष्ट अर्थशास्त्री
के सिर पर तानो
या, रुपयों के बदले
फ़ैसला सुनाते
किसी न्यायाधीश की
पसली में घुसा दो चापड़

मात्र एक नोट की ख़ातिर
चलती हुई लाईन पर
बिजली के खम्भे पर टंगे
किसी लाईनमैन के
चूतड़ों के नीचे लगा दो आग

या, ऐसे ही
किसी चौराहे पर
ट्रैफिक नियमों के ख़ैर-ख़्वाह से
करो सीधे मुठभेड़

तब भी क्या कर पाओगे दुरस्त
इस सड़ी गली व्यवस्था को ?

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत

किसी का आना
और किसी का चले जाना
किसी का पैदा होना
और किसी का मर जाना
किसी का डूबना
और किसी का तैरते रहना
किसी का सो जाना
और किसी का जागते रहना,
उत्साहित करते हैं उन्हें
और चाहते हैं वे,
उन्हीं की तरह उत्साहित रहे
परेशानियों में दम तोड़ती दुनिया भी

नशे से भरा उत्साह ही पैदा करेगा
नये खरीद्दार
पैदा होगा नया बाज़ार
और उनके अटे पड़े मालों पर
होने लगेगी ख़ून-पसीने की बौछार

उत्साह के नशे में
एक बेवज़ह, फ़ालतू
बहस शुरु होगी

इसी तरह चलेगा व्यापार

ग्लोबलाईजड पूंजी का
संकट होगा दूर

मुक्ति चित्र 

चार मंज़िला इमारतों में
शाम के वक़्त
एकदम छोटे बच्चे
काम से लौटते पिता का
इंतज़ार करते हुए
झूल रहे होगें
बॉलकनी की रैलिंग में,
पत्नियों के जूड़े से
बिखर रही होगी
चमेली के फूल की
भीनी-भीनी महक
आँखों में काजल के डोरे
ओठों पर बिखरा हुआ सुर्ख़ लाल रंग
गुलाब की पंखुड़ियों का
अहसास दिलाएगा

एक हाथ जूड़े पर
दूसरा कोहनी के सहारे
रैलिंग की दीवार पर,
ठुड्डी को टिकाए
दूर तक ताक रही होगीं
नव-विवाहिताएँ,
किसी दूसरे क्वार्टर की खिड़की से
ताक रही हो सकती हैं
जवाँ होती पुरुष निगाहें,
इस बात से बेख़बर
वें अपनी उंगलियों को

भीतर ही भीतर
उठते संगीत के साथ
थिरकाती हुई भी हो सकती हैं मगन

यह किसी बड़े बाज़ार की दुनिया का
विज्ञापनी चित्र नहीं
हाँ, टीवी पर देखे गए
तमाम विज्ञापनों का
एक कोलाज ज़रूर उभरेगा,
तालाब में तैरती
मछली की तरह
चिपट-पोशाक पहनी लड़की की मुस्कराहट भरा

आपको भी यदि ऐसा ही दिखाई दे
तो इसमें तुम्हारा कसूर नहीं,
यह मेरे ही कैमरे की आँख है
जो हो गई है हिस्सा बाज़ार का
वरना, यह तो तय बात है
कि सदियों से
दासता की जंज़ीर में जकड़ी हुई
लड़की की मुक्ति
बॉलकनी से झाँकने भर की
छूट दे देने से नहीं होगी।

साक्षात्कार, संस्मरण और तुम्हारे विचारवान लेख

कविता हमेशा नहीं होती वक्तव्य
जबकि, वक्तव्य में निकल ही पड़ते हैं विचार

धर्म समाज की ज़रूरत है
मार खाने से ही आता है समझ में,
एक अदला धर्म
एक बदला धर्म
धर्मों में भी धर्म,

भटका चुका विचार ही तो है धर्म
विचार की शान पर ही
बनते हैं संगठन
धर्म बनाता है गिरोह
‘महान विचारक’
संगठन के भीतर भी बना लेते हैं गिरोह

सांगठनिक बुनावट का
ख़ूबसूरत वस्त्र भी
नहीं छुपा पाएगा
नापाक इरादों को,
सांगठनिक कसीदाकारी
करने वाले जुलाहों के
हाथ काट कर ही
बेशक खेला गया हो गिरोहगर्दी का खेल

गिरोह के भीतर ही रह सकते हैं सुरक्षित
गुंडे, हत्यारे और लम्पट ।

गिरोह लम्पटों की ज़रूरत है।

तुम्हारे संस्मरणों में
तुम्हारे पाला बदलने के कारणों को
ढूंढा नहीं जा सकता
किसी उल्लू की आँख से ;

पहाड़ की खोह में
समूचित धूप न पड़ पाने की वज़ह से
बची हुई थोड़ी-सी बर्फ़ की
गढ़ी गयी आकृति; ओम
तुम्हारे भीतर
तमसो मा ज्योतिर्गमय का
नाद उत्पन्न कर रही है,
और प्रार्थना में बुदबुदाते
तुम्हारे होठों पर
फड़-फड़ाकर चिपक गया है तमस

तुम्हारी भोली-भाली अदा है निराली;
जो वर्षों से दबी
तुम्हारे भीतर की घृणा के प्रकटीकरण पर
अपनी नादानी का
झूठा सहारा ले रही है
तुम्हारी तिजोरियाँ
पुरस्कारों से भरी पड़ी हैं
जिनके भार से दबी जा रही हैं
तुम्हारी संवेदनाएँ

बेशक भाषा की जादूगरी का
गजब का करिश्मा करते रहे हो तुम
हाथ की सफ़ाई का
जबरदस्त अभ्यास है तुम्हें
पर घृणित विचारों में लिपटी तुम्हारी भाषा
नहीं कर पा रही है सम्मोहित

तुम सब हत्यारों के सिपहसलार हो,
जो अपनी नाजुक-सी भाषा के कोड़े
हत्यारों के रथ पर जुते घोड़ों को
धीरे-धीरे मारते हो
ताकि उनकी बग्घी को खींचता घोड़ा
दौड़े बहुत-बहुत तेज़
और हत्यारे हत्याओं से फैला दें
इतनी दहश्त
कि हत्यारों का समर्थन करना
तुम्हारी मज़बूरी जान पड़े

अचानक तुम्हारे पाला बदल लेने पर
हकबका कर भी तुम्हारे विरोध की
हिम्मत न जुटा पाए
कोई इक्का-दुक्का बचा हुआ
विरोधी हत्यारों का

निश्चित ही तुम ऐसे सारे महानुभाव
पीठों के पीठ
ज्ञानपीठ हो

बंडियों के नीचे छिपाए हुए
गात पर रगड़ खाते
जनेऊ के लटकते धागे को
छुपाने की अब कोई ज़रूरत नहीं
तुम्हारे ध्वज वाहकों ने
त्रिशूल, बल्लम और नृशंस हत्या के
उम्दा से उम्दा हथियारों से लैस
हत्यारों की फौज
तुम्हारी हिफ़ाज़त में कर दी है खड़ी
यूँ ही नहीं निकल पड़ा है
तुम्हारा अवचेतन
साक्षात्कार, संस्मरण और
तुम्हारे विचारवान लेखों में

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