विनय दुबे की रचनाएँ

मेरा गाँव भी सीख जाएगा

मेरे गाँव में भी अब
पहुँचने लगे हैं अफ़सर
और रहने लगे हैं

मेरा गाँव भी अब सीख जाएगा
किसी से बोलना
न बोलना किसी से
किसी को देखकर न देखना
देखने के लिए बुलाना

मेरा गाँव भी अब सीख जाएगा
चिट भेजना, खिलाना-पिलाना
रिरियाना, घिघियाना
बोलना अर्ज़ी की भाषा में

मेरे गाँव में भी अब
रहने लगे हैं अफ़सर
मेरा गाँव भी अब सीख जाएगा

दिल्ली होने से तो अच्छा है

मैं पहाड़ देखता हूँ
तो पहाड़ हो जाता हूँ

पेड़ देखता हूँ
तो पेड़ हो जाता हूँ

नदी देखता हूँ
तो नदी हो जाता हूँ

आकाश देखता हूँ
तो आकाश हो जाता हूँ

दिल्ली की तरफ़ तो मैं
भूलकर भी नहीं देखता हूँ
दिल्ली होने से तो अच्छा है
अपनी रूखी-सूखी खाकर
यहीं भोपाल में पड़ा रहूँ

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